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चाचा को बीमारी में छोड़ने वाला भतीजा जब छिपे सोने और पुराने नोटों पर हक मांगने पहुंचा, तो 19 साल का अनाथ लड़का चुपचाप 3 फिल्म डिब्बे निकाल लाया—“पहले ये देख लो” 📽️😢 और पर्दे पर जो बचपन चला, उसने अदालत से पहले ही खेल पलट दिया

भाग 1:
नगर पंचायत की नीलामी में जब 19 साल के बेघर अर्जुन ने टूटे हुए खुले सिनेमाघर के लिए हाथ उठाया, तो पूरा हॉल ऐसे हँसा जैसे किसी भूखे लड़के ने महल खरीदने की जिद कर दी हो।

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—यह जमीन कोई समझदार आदमी नहीं खरीदेगा, और तू तो अपने सिर पर छत तक नहीं रखता।

नीलामी अधिकारी की आवाज में दया नहीं, तमाशा था। सामने बैठे जमीन दलाल मुस्कुरा रहे थे। कुछ लोग फुसफुसा रहे थे कि लड़का पागल है। अर्जुन की फटी हुई कमीज, धूल भरे जूते और कंधे पर लटकता पुराना बैग देखकर किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि उसके पास बोली लगाने लायक पैसे भी होंगे।

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लेकिन अर्जुन के पास 4100 रुपये थे। यह रकम उसने 2 साल में चाय की दुकानों पर गिलास धोकर, बस अड्डे पर बोरे उठाकर और शादी के पंडालों से बचे खाने के बदले काम करके जोड़ी थी। उसके पास एक और चीज थी, जो पैसों से ज्यादा कीमती थी। एक पुरानी तस्वीर।

तस्वीर में एक छोटा बच्चा अपनी मां के कंधों पर बैठा था। पीछे सफेद पर्दा चमक रहा था। ऊपर जंग लगे बोर्ड पर लिखा था, सूरज प्रकाश खुला सिनेमाघर। तस्वीर में उसकी मां हंस रही थी, और अर्जुन की छोटी उंगलियां उसकी चोटी पकड़े हुए थीं।

अर्जुन को अपनी मां की आवाज याद नहीं थी। चेहरा भी धुंधला था। बस यही तस्वीर उसके लिए सबूत थी कि किसी दिन, किसी ने उसे प्यार से उठाया था।

वह 5 साल का था जब उसकी मां बीमारी से चली गई। रिश्तेदारों ने 13 दिन तक रोने का नाटक किया, फिर उसे जिला बाल गृह छोड़ आए। वहां से वह कभी किसी अस्थायी परिवार के घर, कभी किसी आश्रम, कभी किसी ठेकेदार की झोपड़ी तक घूमता रहा। 18 साल का होते ही बाल गृह वालों ने उसे एक काली थैली, 2 जोड़ी कपड़े और एक वाक्य दिया।

—अब खुद संभलना सीखो।

तब से अर्जुन खुद को संभाल रहा था, लेकिन उसके भीतर हमेशा एक खाली जगह थी। उसी खाली जगह ने उसे उस पुराने सिनेमाघर तक खींचा था।

3 दिन पहले वह बस अड्डे के पास बेहोश होने ही वाला था कि शांति मौसी ने उसे देखा। उनका छोटा सा ढाबा था, जहां मजदूर, रिक्शावाले और पंचायत के बाबू खाना खाते थे। उन्होंने बिना पूछे उसके सामने दाल, चावल और आलू की सब्जी रख दी।

—पहले खा ले, फिर अपनी इज्जत बचाना।

अर्जुन ने कांपते हाथों से प्लेट पकड़ी।

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—मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं।

—तो बर्तन मांज देना। भूख का हिसाब बाद में होता है।

यहीं उसने 2 दलालों को बात करते सुना था कि कस्बे के बाहर वाला पुराना खुला सिनेमाघर नीलाम हो रहा है। 9 बीघा जमीन, आधी टूटी स्क्रीन, बंद टिकटघर और एक ऐसी जगह जिसके बारे में कहा जाता था कि मालिक दयाशंकर वहीं अकेले मर गया था।

अर्जुन ने उसी रात तस्वीर निकाली। बोर्ड पर लिखा नाम मिल गया। वह समझ गया कि उसकी जिंदगी का आखिरी सुख कोई सपना नहीं था, वह सचमुच इसी मिट्टी पर हुआ था।

नीलामी में किसी ने बोली नहीं लगाई। जमीन पर पुराना टैक्स बकाया था, बिजली कट चुकी थी, रास्ता कच्चा था और लोग कहते थे कि स्क्रीन के पीछे रात को रोने की आवाज आती है।

—3500 रुपये से शुरुआत।

हॉल में सन्नाटा था।

अर्जुन ने हाथ उठाया।

सबकी गर्दन उसकी तरफ घूम गई।

—नाम?

—अर्जुन।

—पूरा नाम?

लड़का कुछ पल चुप रहा। उसके पास पिता का नाम नहीं था, घर का नाम नहीं था।

—अर्जुन कुमार।

नीलामी अधिकारी ने चश्मा उतारा।

—समझता है क्या खरीद रहा है? वहां पानी नहीं, बिजली नहीं, दीवार नहीं। सांप, झाड़ियां और बदनामी है।

—समझता हूं।

—कल को पछताएगा तो पंचायत पैसे वापस नहीं करेगी।

अर्जुन ने अपनी तस्वीर सीने से दबा ली।

—पछताने को मेरे पास पहले ही बहुत कुछ है।

हथौड़ा गिरा।

—बेचा गया।

हंसी फिर उठी, मगर इस बार अर्जुन ने सिर नहीं झुकाया। पहली बार कोई कागज उसके हाथ में था जिस पर लिखा था कि एक जगह उसकी है। चाहे टूटी हुई, चाहे सूनी, चाहे सबकी नजर में बेकार।

शाम को वह पैदल सिनेमाघर पहुंचा। बरसों से बंद पड़े लोहे के फाटक पर पीपल की जड़ें चढ़ गई थीं। बोर्ड का आधा हिस्सा गिर चुका था। सफेद स्क्रीन बीच से फटी थी और उसके पीछे कौओं ने घोंसले बना लिए थे। पुराने स्पीकर के खंभे खेत में कब्रों जैसे खड़े थे। टिकटघर की खिड़की पर टीन ठुकी थी।

अर्जुन ने ताला खोला। अंदर कदम रखते ही सूखी घास उसके घुटनों से टकराई। हवा में धूल, पुराने पोस्टरों और बरसों की बंद यादों की गंध थी।

—मैं आ गया।

उसने यह बात इतनी धीरे कही कि खुद को भी मुश्किल से सुनाई दी।

रात को उसने टिकटघर के पीछे झाड़ू लगाकर जगह बनाई। शांति मौसी ने उसे 4 रोटियां और प्याज दिया था। उसने 2 रोटियां खाईं, 2 बचाकर बैग में रखीं और फर्श पर चादर डालकर लेट गया। बाहर झींगुर बोल रहे थे। दूर मंदिर की आरती की आखिरी आवाज हवा में घुल रही थी।

नींद आने ही वाली थी कि स्क्रीन की तरफ से कराहने जैसी आवाज आई।

अर्जुन उठा। हाथ में टूटी टॉर्च ली और बाहर निकला। स्क्रीन के नीचे एक बूढ़ा कुत्ता खड़ा था। शरीर दुबला, कान कटे हुए, आंखें धुंधली और थूथन सफेद। वह भौंक नहीं रहा था। बस स्क्रीन के निचले हिस्से को पंजे से कुरेद रहा था।

—अरे, तू यहां रहता है?

कुत्ते ने अर्जुन की तरफ देखा, फिर उसी जगह पंजा मारा।

अर्जुन पास गया। वहां लकड़ी के मोटे पटरे लगे थे। ऊपर से चूना और पुराना रंग पोता गया था, जैसे किसी ने मरम्मत छिपाने की कोशिश की हो। पर हाथ लगाते ही अर्जुन को समझ आ गया कि यह मरम्मत नहीं थी। पटरे बहुत सावधानी से कसे गए थे। लोहे के पेंच अंदर धंसे थे। किनारों पर सीमेंट भरा था।

कुत्ता फिर कराहा।

अर्जुन का दिल तेज धड़कने लगा।

उसने टॉर्च की रोशनी नीचे डाली। पटरों के बीच से ठंडी हवा आ रही थी। अंदर खाली जगह थी।

तभी पीछे झाड़ियों में कुछ सरसराया। अर्जुन मुड़ा, मगर कोई नहीं दिखा। बूढ़ा कुत्ता स्क्रीन से चिपककर बैठ गया, जैसे वह उस जगह को बरसों से किसी से बचा रहा हो।

अर्जुन ने कांपते हाथ से दीवार थपथपाई।

अंदर से खोखली आवाज आई।

यह स्क्रीन नहीं थी।

यह बंद दरवाजा था।

और अर्जुन को उसी पल समझ आ गया कि उसने सिर्फ एक उजड़ा सिनेमाघर नहीं खरीदा था। उसने किसी बूढ़े मालिक का दबा हुआ राज, किसी परिवार की छिपी हुई आग और शायद अपनी मां की आखिरी निशानी भी खरीद ली थी।

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भाग 2:

अगली सुबह अर्जुन ने पटरों को खोलने की कोशिश की, लेकिन जंग खाए पेंच ऐसे जमे थे जैसे किसी ने उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया हो। बूढ़ा कुत्ता, जिसे उसने मोती कहना शुरू कर दिया था, दिन भर उसी स्क्रीन के नीचे बैठा रहा और किसी को पास आते देखकर धीमे गुर्राने लगता। तीसरे दिन शांति मौसी पानी के डिब्बे, पुरानी रजाई और कुत्ते का खाना लेकर आईं। उन्होंने अर्जुन से कहा कि कस्बे में सब उसे उस लड़के के नाम से जानने लगे हैं जिसने श्राप खरीद लिया है। उसी शाम रघुवीर काका आए, जो 35 साल तक इसी सिनेमाघर में मशीन चलाते थे। उन्होंने स्क्रीन देखते ही सिर झुका लिया। दयाशंकर और उनकी पत्नी कमला ने यह जगह बनाई थी, जब आसपास सिर्फ खेत और धूल थी। कमला टिकट बेचती थीं, दयाशंकर बच्चों को मुफ्त में भीतर बैठा लेते थे और कहते थे कि जब तक पर्दे पर रोशनी है, कोई आदमी सचमुच अकेला नहीं है। अर्जुन ने अपनी तस्वीर दिखाई तो रघुवीर काका बहुत देर तक उसे देखते रहे। उन्होंने बताया कि दयाशंकर कुछ रातों में आने वाले परिवारों की तस्वीरें लेते थे। एक तस्वीर उन्हें देते, दूसरी अपने पास रखते। बाद के सालों में उन्होंने किसी को पीछे वाले कमरे में जाने नहीं दिया। वह कहते थे कि वह कस्बे की याद बचा रहे हैं। रघुवीर काका ने लोहे की रॉड और ड्रिल मंगवाई। 2 घंटे बाद पटरे टूटे, तो पीछे लोहे का दरवाजा निकला। ताला काटते ही अंदर से बंद हवा, पुराने रसायन और धूल की तेज गंध आई। कमरे में एक खाट, छोटा चूल्हा, लकड़ी की अलमारी और दीवारों पर सैकड़ों तस्वीरें थीं। बच्चे कारों की छत पर, बुजुर्ग चारपाई पर, दुल्हन लाल साड़ी में, मजदूर परिवार स्टील के डिब्बे खोलते हुए, और उन्हीं तस्वीरों के बीच अर्जुन की मां जैसी एक और तस्वीर। अलमारियों में फिल्म के डिब्बे तारीखों के साथ रखे थे। एक लोहे के संदूक में पुराने नोट, सोने की मोहरें, चांदी के सिक्के, बचत प्रमाणपत्र और प्लास्टिक में लिपटी चिट्ठी मिली। दयाशंकर ने लिखा था कि बैंक ने उनके भाई की जमीन खा ली थी, इसलिए उन्होंने अपनी कमाई यहां छिपाई, मगर लालच के लिए नहीं, बल्कि सूरज प्रकाश को फिर जलाने के लिए। जो इस रोशनी को जिंदा रखेगा, वही इस धन का अधिकारी होगा। नीचे चेतावनी थी कि उनका भतीजा विक्रम धन की गंध पाते ही आएगा, क्योंकि वह आदमी नहीं, कीमत देखता है। उसी रात रघुवीर काका ने अर्जुन की तस्वीर की तारीख वाली फिल्म चलाई। दीवार पर उसकी मां हंसती दिखी, कंधे पर छोटा अर्जुन था। अर्जुन टूटकर रो पड़ा। 2 दिन बाद काली गाड़ी फाटक पर रुकी। उससे विक्रम वकील के साथ उतरा और स्क्रीन के खुले हिस्से को देखकर बोला कि वह अपने चाचा की छोड़ी हर चीज लिए बिना नहीं जाएगा।

भाग 3:

विक्रम ने टिकटघर में ऐसे कदम रखा जैसे वह बरसों से उस धूल का मालिक हो। उसके साथ आए वकील ने चमड़े का बैग खोला और कागज मेज पर फैला दिए। बाहर मोती दरवाजे के पास बैठा था। उसकी आंखें विक्रम पर टिकी थीं।

—जमीन इस लड़के ने नीलामी में खरीदी है, यह बात मान ली जाएगी। मगर जमीन के भीतर मिला धन, सोना, सिक्के और दस्तावेज दयाशंकर जी की निजी संपत्ति हैं। उनका कोई पंजीकृत वसीयतनामा नहीं है। इसलिए कानूनी वारिस मेरे मुवक्किल विक्रम हैं।

अर्जुन ने प्लास्टिक में लिपटी चिट्ठी आगे रखी।

—उन्होंने अपनी इच्छा लिखी है। तारीख है, हस्ताक्षर हैं।

वकील मुस्कुराया।

—दीवार के पीछे मिली चिट्ठी अदालत में कहानी लगती है, कानून नहीं। मामला चलेगा तो सालों चलेगा। तब तक सब सील रहेगा।

विक्रम ने दीवारों पर लगी तस्वीरें देखीं। एक तस्वीर में वह खुद छोटा था, मगर उसने अभी उसे पहचाना नहीं।

—मेरे चाचा संत नहीं थे। मेरे पिता कर्ज में डूबे। हमारे घर की जमीन चली गई। मां ने गहने बेचे। और वह यहां बैठकर सोना छिपाते रहे।

रघुवीर काका का चेहरा सख्त हो गया।

—दयाशंकर भी उस हादसे में टूटे थे।

—टूटे थे तो मदद करते। मरते समय यादों की दुकान खोलने से पहले अपने खून को याद करते।

शांति मौसी ने धीरे से कहा।

—खून वही नहीं होता जो नाम में हो। कभी-कभी जो भूखे को रोटी दे, वह भी अपना होता है।

विक्रम ने उनकी तरफ देखा, मगर जवाब नहीं दिया। वकील ने एक कागज अर्जुन की तरफ बढ़ाया।

—इस पर हस्ताक्षर कर दो। जमीन अपने पास रखो। अंदर मिली संपत्ति छोड़ दो। बदले में तुम्हें 25 लाख रुपये मिलेंगे। अभी। यहीं।

अर्जुन की सांस अटक गई। 25 लाख रुपये। इतने पैसों में वह किराए का कमरा ले सकता था। साफ बिस्तर, नए कपड़े, रोज भरपेट खाना, शायद पढ़ाई भी। इतने पैसे उसे कभी सपने में भी नहीं मिले थे।

उसके भीतर का भूखा बच्चा फुसफुसाया कि कागज पर हस्ताक्षर कर दे। कौन लड़ता है उन लोगों से जिनके पास वकील, कार और नाम है?

लेकिन बाहर टूटी स्क्रीन खड़ी थी। मोती उसी के सामने पहरा दे रहा था। रघुवीर काका पुराने फिल्म डिब्बों को ऐसे देख रहे थे जैसे वे मंदिर की मूर्तियां हों। शांति मौसी बिना दबाव के चुप थीं। और दीवार पर उसकी मां हंस रही थी, एक ऐसी हंसी में जो मौत के बाद भी बची रह गई थी।

—मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा।

विक्रम की आंखें लाल हो गईं।

—तू भूखा मर जाएगा।

—मरना नया नहीं है। हर रात थोड़ा-थोड़ा मरकर ही यहां तक आया हूं।

वकील ने कागज समेटे।

—तो अदालत में मिलते हैं।

अर्जुन ने दरवाजे की तरफ देखा।

—अदालत में भी मिलेंगे। लेकिन उससे पहले यह पर्दा फिर जलेगा।

विक्रम हंसा।

—किस पैसे से?

रघुवीर काका ने अपनी झुकी कमर सीधी की।

—हाथों से।

शांति मौसी ने कहा।

—और कस्बे से।

बात आग की तरह फैल गई कि सूरज प्रकाश खुला सिनेमाघर 1 रात के लिए फिर खुलेगा। जिन लोगों ने अर्जुन पर हंसी उड़ाई थी, वे भी देखने आए कि लड़का सच में पागल है या जिद्दी। बूढ़े लोग पुराने ब्रश लेकर आए। लड़कों ने झाड़ियां काटीं। किसी ने जनरेटर दिया। किसी ने तार। किसी ने सफेद चूना। शांति मौसी ने कहा कि टिकटघर के पास चाय, समोसे और गुड़ की जलेबी वह बनाएंगी।

एक बूढ़ी औरत ने 2 डिब्बे रंग दिए।

—मेरी शादी से पहले पहली बार मैं अपने होने वाले पति के साथ यहीं फिल्म देखने आई थी। तब डर से पर्दे से ज्यादा उसका चेहरा देख रही थी।

कस्बे के बच्चों ने रास्ते से पत्थर हटाए। कुछ लड़कियों ने बोर्ड पर नया नाम रंगा। अर्जुन ने 18 घंटे काम किया। उसके हाथों में छाले पड़े, फिर छाले फूटे, फिर खून निकला। लेकिन उसने काम नहीं छोड़ा। रात को मोती उसके पास आकर बैठ जाता, जैसे बूढ़ा पहरेदार आखिरकार नए मालिक को स्वीकार कर रहा हो।

3 हफ्ते बाद शनिवार की शाम कच्चे रास्ते पर गाड़ियों, बाइकों, ऑटो और बैलगाड़ियों की कतार लग गई। लोग चारपाइयां, चादरें और बच्चे लेकर आए। कोई टिकट नहीं था। प्रवेश पर सिर्फ एक डिब्बा रखा था, जिस पर लिखा था कि जिसे जितना मन हो, डाल दे।

विक्रम भी आया। इस बार उसके साथ वकील था, पर चेहरे पर उतना भरोसा नहीं था। भीड़ देखकर वह चुप हो गया।

—मैं देखने आया हूं कि तुम विवादित संपत्ति का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे।

अर्जुन ने फिल्म का डिब्बा उठाया।

—धन नहीं। याद इस्तेमाल कर रहा हूं।

अंधेरा गहराया। रघुवीर काका ने मशीन चलाई। पुराना प्रोजेक्टर पहले खांसा, फिर गूंजा, फिर एक सफेद रोशनी हवा को चीरती हुई स्क्रीन पर जा लगी। पूरा मैदान शांत हो गया।

लोगों को लगा कोई पुरानी फिल्म चलेगी। मगर पर्दे पर वही सिनेमाघर उभरा, 25 साल पहले का। नया बोर्ड, भरी गाड़ियां, बच्चों की आवाजें बिना आवाज के होंठों पर, और रोशनी में चमकते चेहरे।

पहले शांति मौसी दिखीं, जवान, बालों में गजरा लगाए, कुल्हड़ में चाय देती हुईं। भीड़ हंसते-रोते तालियां बजाने लगी। फिर एक आदमी दिखा जिसे मरे 12 साल हो चुके थे। उसकी पत्नी उठकर खड़ी हो गई और हाथ जोड़कर स्क्रीन देखने लगी। फिर बच्चे दिखे जो अब पिता बन चुके थे। कोई अपनी मां को देखकर रोया, कोई अपने खोए भाई को देखकर जमीन पर बैठ गया।

कस्बे ने पहली बार खुद को उस उम्र में देखा, जब उसे पता ही नहीं था कि वह एक दिन बूढ़ा हो जाएगा।

अर्जुन धीरे से विक्रम के पास गया।

—कल रात पुराने डिब्बों में एक और फिल्म मिली।

विक्रम ने बिना पलक झपकाए स्क्रीन देखी।

पर्दे पर 6 साल का बच्चा आया। हाथ में लकड़ी की छोटी कार थी। कमला ने उसके गाल से धूल पोंछी, फिर माथे पर चूमा। दयाशंकर ने उसे गोद में उठाया और स्क्रीन की तरफ इशारा किया। बच्चा खिलखिलाया। दयाशंकर भी हंसे। अगले दृश्य में वही बच्चा मोती जैसे एक पुराने कुत्ते के पीछे भाग रहा था।

विक्रम के होंठ कांपे।

—यह मैं हूं।

अर्जुन ने 3 फिल्म डिब्बे उसके हाथ में रखे।

—और भी हैं। तू गर्मियों में यहीं सोया। तूने टिकटघर के पीछे आम खाए। तू दयाशंकर के कंधे पर बैठा। उन्होंने तुझे सोना नहीं दिया, लेकिन मिटाया भी नहीं। उन्होंने तुझे बचाकर रखा।

विक्रम ने डिब्बे ऐसे पकड़े जैसे वे संदूक से निकले सोने से भारी हों।

वकील पास आया।

—मुकदमे की बात करनी होगी।

विक्रम ने स्क्रीन से नजर नहीं हटाई।

—वापस लो।

—लेकिन संपत्ति—

—कहा न, वापस लो।

स्क्रीन पर छोटा विक्रम दयाशंकर की गर्दन पकड़कर हंस रहा था। बड़े विक्रम ने मुंह पर हाथ रख लिया। वह जोर से नहीं रोया। बस कंधे हिलते रहे, जैसे भीतर जमा 30 साल का गुस्सा पिघलकर बाहर रास्ता खोज रहा हो।

—मुझे लगा था उन्हें मेरी परवाह नहीं थी।

अर्जुन ने रोशनी की तरफ देखा।

—थी। बस कुछ लोग प्यार को बोलने से पहले ही चुप्पी में बदल जाते हैं।

अगले महीने मुकदमा वापस ले लिया गया। दयाशंकर की चिट्ठी, तारीखें, हस्ताक्षर, फिल्म डिब्बों पर लिखी नोटबुक और विक्रम की लिखित सहमति के बाद अदालत ने उस धन को एक ट्रस्ट में रखने की अनुमति दी। ट्रस्ट का नाम रखा गया, कमला स्मृति रोशनी निधि। शर्त साफ थी कि सूरज प्रकाश खुला सिनेमाघर बिकेगा नहीं, फिर से जलेगा।

विक्रम ने 1 बात और जोड़ी। अपने पिता की पुरानी जमीन वापस लाने की कानूनी कोशिश अलग से की जाएगी, लेकिन सिनेमाघर को लालच की आग में नहीं झोंका जाएगा। उसने पहली बार अर्जुन से हाथ मिलाते हुए कहा कि शायद दयाशंकर ने दोनों को अलग-अलग तरह से अनाथ छोड़ा था।

धन से गाड़ियां नहीं खरीदी गईं। पहले बिजली आई। फिर पानी। टिकटघर ठीक हुआ। स्क्रीन बदली गई, मगर उसके पीछे की छिपी दीवार का एक हिस्सा वैसा ही छोड़ा गया, ताकि लोग भूलें नहीं कि यादें भी कभी-कभी बंद कमरों में दम तोड़ती रहती हैं। रघुवीर काका को स्थायी जिम्मेदारी मिली। शांति मौसी ने खाने का छोटा स्टॉल संभाला। अर्जुन के लिए टिकटघर के पीछे साफ कमरा बना, जिसमें खिड़की थी, बिस्तर था और दरवाजे पर ताला उसका अपना था।

हर शुक्रवार रात फिल्म चलने लगी। बाल गृह के बच्चों के लिए प्रवेश मुफ्त था। यह नियम अर्जुन ने खुद बनाया। पहली ही रात उसने 14 साल के एक लड़के को फाटक के बाहर खड़ा देखा। कंधे पर बैग, आंखों में डर, शरीर ऐसे सिकुड़ा हुआ जैसे दुनिया से कम जगह मांग रहा हो।

अर्जुन उसके पास गया।

—भूख लगी है?

लड़के ने जवाब नहीं दिया।

—अंदर आ जा। यहां अंधेरे से भागकर आने वालों से टिकट नहीं लिया जाता।

लड़का धीरे से भीतर आ गया। शांति मौसी ने उसे समोसा दिया। मोती उसके पैरों के पास जाकर बैठ गया।

समय के साथ टिकटघर की एक दीवार नई तस्वीरों से भर गई। रघुवीर काका मशीन के पास, शांति मौसी कड़ाही के सामने, विक्रम अपनी पुरानी तस्वीर लगाते हुए, मोती पहली कतार में सोता हुआ, और बीच में अर्जुन की वही पुरानी तस्वीर। मां के कंधों पर बैठा बच्चा। पीछे सफेद पर्दा। चेहरे पर वह भरोसा, जो किसी अनाथालय ने उससे छीन लिया था।

लोग अब भी पूछते थे कि स्क्रीन के पीछे मिली असली दौलत कितनी थी। अर्जुन हर बार मुस्कुराता।

—दौलत पीछे नहीं थी। वह तो सामने बैठी थी, बस रोशनी बंद थी।

और जब रात गहराती, प्रोजेक्टर की किरण आकाश को काटती हुई पर्दे पर गिरती, तब अर्जुन समझता कि घर हमेशा दीवारों से नहीं बनता। कभी-कभी घर वह जगह होती है जहां कोई बूढ़ा कुत्ता राज की रखवाली करता है, कोई मौसी बिना हिसाब रोटी देती है, कोई काका टूटे प्रोजेक्टर को दिल की तरह जोड़ता है, और कोई कस्बा तुम्हारे साथ अंधेरे में बैठा रहता है, जब तक पर्दे पर रोशनी फिर से लौट न आए।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.