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गोंद से चिपकाई गई 2 जुड़वाँ बेटियों को माँ ने चमत्कार बनाकर बेच दिया, लेकिन जब एक बेटी ने रोकर कहा “मेरा शरीर मेरा है”, तब रात की भागती कार ने पूरे परिवार का सबसे डरावना सच खोल दिया…

PART 1

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—अगर तुम दोनों सच में एक ही शरीर से जुड़ी पैदा हुई होतीं, तो आज हम इस सीलन भरे 1 कमरे में नहीं सड़ रहे होते।

दिल्ली के लक्ष्मी नगर की तंग गली में बने किराए के फ्लैट में 14 साल की अनाया और सिया मल्होत्रा एक साथ चुप हो गईं। टीवी पर शाम का एक शो चल रहा था, जिसमें जुड़वाँ बहनों की कहानी दिखाई जा रही थी। एंकर उनकी हिम्मत, इलाज, दान और विदेश से आए डॉक्टरों की बात कर रही थी। स्क्रीन के सामने बैठी उनकी माँ मीरा की आँखों में पहली बार वैसी चमक आई थी, जैसी वह किराया भरते समय कभी नहीं दिखाती थी।

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अनाया को वह चमक डरावनी लगी। सिया ने हल्की-सी मुस्कान दबा ली।

मीरा ने वही देख लिया।

—देखा, सिया समझती है। तुझमें ही हमेशा ज़्यादा अक्ल रही है।

दोनों बहनें एक जैसी दिखती थीं। वही चेहरा, वही आँखें, वही कंधों तक बाल। स्कूल की टीचर भी कई बार नाम बदल देती थीं। लेकिन उस रात अनाया को लगा जैसे उनके बीच कोई दरार खिंच गई हो।

3 दिन बाद मीरा ने उन्हें कमरे में बुलाया। बिस्तर पर 2 सफेद सूट रखे थे, किनारे से ऐसे सिले हुए कि पहनने पर दोनों की कमर और पसलियाँ एक-दूसरे से चिपकी लगें।

—पहनो।

—क्यों? अनाया ने डरकर पूछा।

मीरा ने दराज से स्किन कलर टेप और ऑनलाइन मंगाई गई मेडिकल गोंद निकाली।

—क्योंकि अब हमारी किस्मत बदलने वाली है।

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अनाया पीछे हट गई।

—मम्मी, यह गलत है।

थप्पड़ इतना तेज पड़ा कि सिया भी काँप गई।

—गलत? गलत यह है कि तुम्हारी माँ लोगों के घरों में मेहंदी लगाकर, ब्लाउज सिलकर पेट पाले। गलत यह है कि 2 लड़कियाँ बस साधारण पैदा हुईं।

सिया ने अनाया का हाथ दबाया।

—बस एक बार कर लो। देखने में क्या जाता है?

गोंद लगते ही अनाया की त्वचा जलने लगी। मीरा ने दोनों को मजबूती से पास खींचा, टेप चिपकाया और मोबाइल कैमरा ऑन कर दिया।

—मुस्कुराना मत। बीमार दिखो। बेचारा दिखना सीखो।

पहले अनाया को लगा यह बस 1 वीडियो होगा। लेकिन अगले ही हफ्ते मीरा ने कहानी गढ़ ली। उसने कहा कि उसकी बेटियाँ जन्म से आंशिक रूप से जुड़ी हैं, डॉक्टरों ने अलग करने से मना किया है और एक महँगा ऑपरेशन ही उनका भविष्य बचा सकता है।

क्राउडफंडिंग पेज बना। पुराने मेडिकल कागजों में झूठे शब्द जोड़े गए। पड़ोसियों से कहा गया कि लड़कियाँ शर्मीली हैं, इसलिए बाहर कम दिखती हैं।

फिर गुरुग्राम के एक चैरिटी इवेंट में उन्हें ले जाया गया। लोग पास आकर धीमी आवाज़ में पूछते, क्या दर्द होता है, कैसे सोती हो, स्कूल कैसे जाती हो। एक बुजुर्ग महिला ने रोते हुए 5000 रुपये दान कर दिए।

अनाया शर्म से जमीन में धँस जाना चाहती थी।

सिया ने सिर झुका लिया, आवाज़ काँपाई और कहा—

—हम 2 हैं, पर कभी-कभी लगता है कि हम 1 ही साँस से ज़िंदा हैं।

कैमरों को वही लाइन पसंद आई।

पैसा आने लगा। मीरा ने नया सोफा खरीदा, सोने की पतली चेन ली, फिर बोली कि जल्द ही वे अच्छे इलाके में शिफ्ट होंगे। मगर रात को जब गोंद हटती, अनाया की त्वचा पर फफोले और निशान रह जाते। सिया चुप रहती, जैसे दर्द भी अभिनय का हिस्सा हो।

एक रात अनाया ने फुसफुसाकर कहा—

—18 की होते ही मैं चली जाऊँगी। मुंबई, पुणे, कहीं भी। बस यहाँ से दूर।

सिया दीवार की तरफ मुँह किए बोली—

—और मैं?

—तुम भी जहाँ चाहो जा सकती हो।

—मतलब ज़रूरी नहीं कि मेरे साथ।

अनाया जवाब नहीं दे पाई।

5 महीने बाद सब कुछ एम्स के एक सेमिनार में टूट गया। बाल सर्जन डॉक्टर नंदिता राव ने उनकी “जुड़ाई” देखी और मीरा से पूछा—

—आप कह रही हैं पसलियों के पास जन्मजात जुड़ाव है, लेकिन फोटो में निशान हर बार अलग जगह दिखता है।

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

एक स्वयंसेवक ने सूट के नीचे गोंद की परत देख ली। टेप का कोना खुला। नीचे जली हुई त्वचा दिख गई।

हॉल में सन्नाटा छा गया।

मीरा बेटियों को खींचकर बाहर ले गई। घर पहुँचते ही उसने दरवाजा बंद किया। अगली सुबह वह टिकट, नकली रिपोर्ट और एक फाइल लेकर आई।

—नेपाल सीमा के पास एक प्राइवेट डॉक्टर है। वह कर देगा जो कुदरत ने अधूरा छोड़ा है। उसके बाद कोई हमें झूठा नहीं कहेगा।

अनाया की साँस रुक गई।

—आप हमें सच में जोड़ने जा रही हैं?

सिया ने मीरा के हाथ पकड़ लिए। उसके आँसू गिर रहे थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान थी।

—धन्यवाद, मम्मी। अब अनाया मुझे छोड़कर नहीं जा पाएगी।

PART 2

मीरा ने कहा कि वे 2 दिन बाद निकलेंगे। बाहर वालों को बताया गया कि यह सिर्फ “स्पेशल कंसल्टेशन” है। उसने दोनों के फोन छीन लिए, कमरे के बाहर कैमरा लगा दिया और दरवाजा बाहर से बंद करने लगी।

सिया ने विरोध नहीं किया।

अनाया ने हर चीज़ देखनी शुरू की—खिड़की की ग्रिल, पुराना ताला, किचन में पड़ी टैबलेट, वाई-फाई का पासवर्ड, डॉक्टर नंदिता का नाम। हर छोटी चीज़ अब जान बचाने का रास्ता थी।

रात को मीरा कहती—

—ऑपरेशन के बाद इंटरव्यू आएँगे। लोग चमत्कार पसंद करते हैं।

अनाया ने सिया से कहा—

—तुम समझ रही हो? वह हमें घायल कर देगी।

सिया ने खाली आँखों से जवाब दिया—

—वह बस सच बना रही है।

अगले दिन अनाया को सिया की डायरी मिली। एक ही लाइन कई बार लिखी थी—

“अगर हम सच में एक शरीर बाँटेंगे, तो वह मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ेगी।”

अनाया समझ गई कि कैद सिर्फ माँ नहीं थी।

मीरा नहा रही थी। अनाया ने टैबलेट से डॉक्टर नंदिता को मैसेज भेजा—गोंद, नकली कागज, सीमा, टिकट, जबरन ऑपरेशन। उसने अपनी जली त्वचा की फोटो भी भेज दी।

फिर उसने आधार कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र वेंटिलेशन ग्रिल में छिपा दिए।

शाम को मीरा पागलों की तरह कागज ढूँढने लगी। अनाया चुप रही।

सिया घुटनों के बल बैठी, ग्रिल खोली और सारे कागज मीरा को पकड़ा दिए।

मीरा ने तुरंत कहा—

—हम आज रात निकल रहे हैं।

रात 3:12 पर वे किराए की कार में बैठीं। मीरा के फोन पर नोटिफिकेशन चमका—

“सूचना प्राप्त हुई। जाँच शुरू।”

मदद रास्ते में थी।

लेकिन कार पहले ही दिल्ली छोड़ चुकी थी।

PART 3

मीरा बिना रेडियो चलाए गाड़ी चला रही थी। उसकी उँगलियाँ स्टीयरिंग पर ऐसे जमी थीं जैसे वह सिर्फ सड़क नहीं, अपनी पूरी बनाई हुई झूठी दुनिया पकड़े हुए हो। पीछे की सीट पर अनाया और सिया फिर से एक बड़े हुडी के नीचे कमर से चिपकाई गई थीं। गोंद पुराने घावों को खींच रही थी, मगर अनाया ने चेहरा सीधा रखा। दर्द दिखाती तो मीरा कहती कि वह नाटक कर रही है।

सिया खिड़की से बाहर देखती रही।

अनाया ने धीमे से पूछा—

—तुम खुश हो? तुमने मुझे बेच दिया।

सिया ने पलटकर देखा।

—मैंने हमें बचाया।

—किससे?

—अलग होने से।

मीरा ने बीच में काटा—

—अब कोई बात नहीं करेगा। चेकपोस्ट पर तुम दोनों थकी हुई हो। जन्म से जुड़ी हो। डॉक्टर से मिलने जा रही हो। बस।

उसने सब तय कर लिया था। पहले वे कानपुर के पास एक गेस्ट हाउस रुकेंगे, फिर गोरखपुर की तरफ बढ़ेंगे, फिर एक आदमी उन्हें सीमा के पास बने निजी नर्सिंग होम तक पहुँचाएगा। मीरा कहती जा रही थी कि वहाँ “सब साफ-सुथरा” होगा, डॉक्टर “ऐसे केस पहले भी देख चुका है” और भारत के बड़े अस्पताल सिर्फ सवाल पूछना जानते हैं, माँ का दर्द नहीं समझते।

सुबह वे हाईवे के एक ढाबे पर रुके। मीरा चाय लेने उतरी और कार लॉक कर गई। अनाया ने शीशा खोलने की कोशिश की, लेकिन चाइल्ड लॉक लगा था। बाहर एक सफाईकर्मी बाल्टी लेकर जा रहा था।

सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—मत करो।

—तुम मुझे ऑपरेशन टेबल पर देखना चाहती हो?

—मैं चाहती हूँ कि हम साथ रहें।

—तुम मेरे साथ रहना नहीं चाहती, सिया। तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारे बिना रह ही न पाऊँ।

सिया ने हाथ छोड़ दिया। उसका चेहरा पहली बार टूटता हुआ लगा।

मीरा लौटी तो उसने दोनों को देखा।

—फिर झगड़ा? अनाया, अपनी बहन से सीख। कम से कम उसे परिवार की कदर है।

अनाया ने माँ की आँखों में देखा।

—परिवार जोड़ता है, चिपकाता नहीं।

मीरा ने चाय का कप सीट पर दे मारा। चाय हल्की गर्म थी, मगर डराने के लिए काफी। फिर उसने अनाया की ठोड़ी पकड़ ली।

—तू मुझे दूसरी बार बर्बाद नहीं करेगी।

ढाबे के बाथरूम में मीरा दोनों को दरवाजे तक ले गई और बाहर खड़ी रही। भागना नामुमकिन था। अनाया को अपनी जेब में एक पुराना पेन मिला। उसने टॉयलेट पेपर पर जल्दी-जल्दी लिखा—

“हम नाबालिग हैं। माँ हमें जबरन ऑपरेशन के लिए सीमा की तरफ ले जा रही है। ग्रे किराए की कार। 2 जुड़वाँ बहनें गोंद से चिपकाई गई हैं।”

उसने पर्ची पेपर होल्डर में आधी बाहर दिखती हुई फँसा दी।

सिया ने उसे देख लिया।

बाहर आते ही वह फुसफुसाई—

—तू नहीं समझती। अगर तू जीत गई, तो मैं खत्म हो जाऊँगी।

अनाया ने कहा—

—नहीं। मैं बस ज़िंदा रहूँगी।

यह वाक्य कार में बहुत देर तक गूँजता रहा।

करीब 10 बजे मीरा का फोन बजा। उसने गलती से स्पीकर ऑन कर दिया। एक आदमी की आवाज़ आई—

—मैडम, कैश पूरा चाहिए। दोनों लड़कियों की लिखित सहमति के बिना मैं रिस्क नहीं ले सकता…

मीरा ने फोन काट दिया।

अनाया ने सिया की तरफ देखा।

—सुना? उसे भी पता है यह गैरकानूनी है।

सिया ने होंठ भींचे।

—हम साइन कर देंगे।

—मैं कभी नहीं करूँगी।

—तो मैं कहूँगी कि तू डर गई है, तू हमेशा मन बदलती है, मम्मी जानती हैं हमारे लिए क्या सही है।

मीरा ने शीशे में मुस्कुराकर देखा।

—शाबाश। यही होती है वफादार बेटी।

कानपुर के बाहर ट्रैफिक में कार धीमी हुई। अनाया ने पुलिस की जीप देखी। उसका दिल पसलियों से टकराया। लेकिन मीरा अचानक गाड़ी मोड़कर सर्विस रोड में घुस गई। कुछ देर बाद कार एक छोटे गेस्ट हाउस के पीछे रुकी। वहाँ एक आदमी इंतज़ार कर रहा था। उसने बस पैसे लिए और उन्हें अंदर ले गया।

कमरे में बंद खिड़कियाँ, 2 गद्दे, टूटी मेज और एक सिंक था। मीरा ने दरवाजा बंद किया और फाइल मेज पर रख दी।

—देखा? जब मेरी बात मानो तो सब ठीक रहता है।

अनाया ने तभी सिंक के पास चार्जिंग में लगा फोन देखा।

मीरा उस आदमी से बाहर बरामदे में बात करने लगी। सिया गद्दे पर बैठ गई, घुटनों को पकड़कर। पहली बार उसके हाथ काँप रहे थे।

अनाया धीरे से बोली—

—सिया, डरना गलत नहीं है। मुझे भी डर लगता है। लेकिन मम्मी जो कर रही हैं, वह प्यार नहीं है।

—तेरे बिना मुझे पता नहीं मैं कौन हूँ।

—तो खुद को ढूँढ। पर मेरा शरीर चुराकर अपना जवाब मत बना।

सिया की आँखों में आँसू भर आए।

पहली बार उसने कोई बहाना नहीं बनाया।

अनाया उठी। गोंद खिंची। सिया चाहती तो उसे रोक सकती थी। उसने नहीं रोका। अनाया सिंक तक पहुँची, फोन उठाया और 112 डायल कर दिया।

—इमरजेंसी सेवा, बताइए।

अनाया ने शहर, गेस्ट हाउस का नाम, कार का रंग और अपना नाम बताया ही था कि मीरा अंदर आ गई।

—फोन दे!

संघर्ष छोटा था, लेकिन डरावना। मीरा ने फोन छीना, अनाया का हाथ मरोड़ा। तभी सिया उनके बीच आकर खड़ी हो गई।

—रुक जाओ, मम्मी।

मीरा जम गई।

—क्या कहा?

सिया रो रही थी। वह कैमरे वाली रोने की आवाज़ नहीं थी। वह सचमुच टूट रही थी।

—मैं चाहती थी कि वह मेरे पास रहे। मुझे इतना डर था कि मैंने समझ लिया यह सही है। लेकिन उसे दर्द हो रहा है।

मीरा ने उसे थप्पड़ मार दिया।

—बेवकूफ। मैंने तुम्हें खास बनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया।

7 मिनट बाद दरवाजा पुलिस की चोटों से खुला। स्थानीय पुलिस, चाइल्ड हेल्पलाइन की महिला अधिकारी और 2 मेडिकल कर्मचारी अंदर आए। मीरा का चेहरा तुरंत बदल गया। वह रोती हुई माँ बन गई।

—मेरी बेटियाँ मानसिक रूप से कमजोर हैं। इन्हें बीमारी है। आप लोग समझ नहीं रहे।

एक अधिकारी ने मेज पर पड़े नकली कागज, गोंद, कैश, फोन में आए मैसेज और लड़कियों की चिपकी त्वचा देखी।

—अब डॉक्टर समझेंगे, आप नहीं।

सरकारी अस्पताल में नर्सों ने विशेष सॉल्वेंट से दोनों को अलग किया। अनाया इतनी काँप रही थी कि एक नर्स ने उसका हाथ पकड़ लिया। जब त्वचा अलग हुई, सिया चीख पड़ी, जैसे किसी ने उसका अदृश्य हिस्सा काट दिया हो।

अनाया ने अपनी कमर और सिया की कमर के बीच हवा महसूस की।

बस कुछ सेंटीमीटर।

लेकिन वही पूरी दुनिया थी।

दोपहर तक डॉक्टर नंदिता राव भी पहुँच गईं। उन्होंने बताया कि अनाया का मैसेज मिलते ही उन्होंने दिल्ली पुलिस और बाल कल्याण समिति को सूचना दी थी। ढाबे की सफाईकर्मी को मिला पर्चा भी पुलिस तक पहुँच चुका था। किराए की कार की नंबर प्लेट से रास्ता पता चला। आखिरी कॉल ने गेस्ट हाउस की जगह साफ कर दी।

—तुमने खुद को ढूँढने के लिए रास्ते छोड़े, डॉक्टर नंदिता ने धीरे से कहा।

अनाया ने कुछ नहीं कहा। वह अपनी त्वचा देख रही थी। निशान थे, जलन थी, पर पहली बार वह उसकी अपनी थी।

मीरा गिरफ्तार हुई। उस पर नाबालिगों पर हिंसा, धोखाधड़ी, फर्जी मेडिकल दस्तावेज, अवैध कैद और शारीरिक नुकसान पहुँचाने की साजिश के आरोप लगे। उसके बैग से नर्सिंग होम का अनुबंध, दलाल के मैसेज, दान की रकम की सूची और “ऑपरेशन के बाद इंटरव्यू पैकेज” के नोट्स मिले।

सबसे कठिन गिरफ्तारी नहीं थी।

सबसे कठिन सिया का बयान था।

उसने अधिकारियों के सामने माना कि उसने कागज वापस दिए थे। उसने कहा कि जब टीवी पर जुड़ी बहनों को देखा था, तो पहली बार उसे लगा था कि अगर वे सच में जुड़ जाएँ, तो अनाया उसे कभी छोड़कर नहीं जाएगी।

—मैं उसे मारना नहीं चाहती थी, उसने रोते हुए कहा। मैं बस चाहती थी कि वह मुझे छोड़कर न जाए।

अनाया ने यह बाहर बैठकर सुना। इससे धोखा मिटा नहीं। मगर उसका आकार समझ में आया। और कभी-कभी समझना भी घाव जैसा होता है।

बाल कल्याण समिति ने दोनों बहनों को अलग-अलग संरक्षण गृहों में भेजने का आदेश दिया। सीधे संपर्क पर रोक लगी, जब तक मनोवैज्ञानिक अनुमति न दें। मीरा को उनसे मिलने की इजाजत नहीं मिली। दान खाते फ्रीज हुए। कई दानदाताओं ने शिकायत दर्ज कराई। खबर 2 दिन चैनलों पर चली, फिर देश किसी और सनसनी की तरफ मुड़ गया।

लेकिन अनाया के लिए दुनिया वहीं से शुरू हुई।

दिल्ली के एक सुरक्षित गृह में उसे एक छोटा कमरा मिला। सफेद मेज, नीली चादर, लोहे की अलमारी और सबसे जरूरी—एक दरवाजा, जो अंदर से बंद होता था।

पहली रात वह 20 मिनट तक सिर्फ कुंडी को देखती रही।

कोई अंदर नहीं आया।

कोई चिल्लाया नहीं।

कोई बोला नहीं कि मुस्कुराओ।

फिर वह फूटकर रोई। दुख से नहीं। इसलिए कि सुरक्षा उसके लिए इतनी नई थी कि उसका दिल उसे पहचान नहीं पा रहा था।

अगले हफ्ते पट्टियाँ बदलीं, क्रीम लगी, काउंसलिंग शुरू हुई। अनाया रातों में कैमरों का सपना देखती। लोगों के हाथ, मीरा की आवाज़, गोंद की गंध, दान की पेटी में गिरते नोट। कई बार वह नींद से उठकर बगल में सिया को ढूँढती और खाली चादर देखकर डर जाती।

आजादी कभी-कभी कमी जैसी लगती है।

1 महीने बाद पहली चिकित्सकीय मुलाकात तय हुई। सिया कमरे में आई तो वह बहुत छोटी लग रही थी। ढीला कुर्ता, बँधे बाल, सूजी आँखें। बीच में मनोवैज्ञानिक बैठी थीं।

सिया ने सिर झुकाकर कहा—

—माफ कर दे।

अनाया ने अपनी उँगलियाँ कस लीं।

—किस बात के लिए?

—कागजों के लिए। कार के लिए। इस बात के लिए कि मैंने तेरे शरीर को अपनी सुरक्षा समझ लिया।

अनाया के भीतर गुस्सा उठा। वह जिंदा था, गर्म था, जरूरी था।

—मैं तुझसे प्यार करती हूँ, सिया। लेकिन मैं तेरी चीज़ नहीं हूँ।

सिया ने सिर हिलाया।

—मुझे अभी नहीं आता कि तुझसे अलग रहकर तुझसे प्यार कैसे करूँ।

—तो सीख। मुझसे दूर रहकर सीख।

यह बात दोनों को लगी। मगर इस बार किसी ने अनाया से अपना वाक्य वापस लेने को नहीं कहा।

अदालत में मीरा ने आखिरी कोशिश की। उसने गरीबी, अकेलेपन, समाज की बेरुखी और “माँ की मजबूरी” की बातें कीं। उसने कहा कि उसकी बेटियाँ बचपन से एक-दूसरे के बिना अधूरी थीं।

सरकारी वकील ने उसके मैसेज पढ़े, जिनमें वह ऑपरेशन के बाद इंटरव्यू, फोटोशूट और विदेशी दान की रकम गिन रही थी। डॉक्टर ने कहा कि उस ऑपरेशन का कोई चिकित्सा उद्देश्य नहीं था, सिर्फ गंभीर खतरा था।

मीरा ने फिर भी सिर नहीं झुकाया।

—मैं चाहती थी कि लोग मेरी बेटियों को देखें।

जज ने ठंडे स्वर में कहा—

—आप चाहती थीं कि लोग आपको देखें।

मीरा को सजा हुई। इतनी नहीं कि निशान मिट जाएँ, पर इतनी कि उसकी बेटियों और उसके बीच एक कानूनी दीवार खड़ी हो जाए।

अनाया ने नए स्कूल में प्रवेश लिया। पहले दिन एक लड़की ने उससे बस पूछा—

—यह सीट खाली है?

उसने यह नहीं पूछा कि निशान कैसे हैं। यह नहीं पूछा कि टीवी वाली जुड़वाँ तुम हो क्या। यह नहीं पूछा कि दिखाओ।

बस एक सीट।

अनाया ने कहा—

—हाँ।

उस शाम उसे सिया की चिट्ठी मिली।

“मुझे लगता था, अगर तू चली गई तो मैं खत्म हो जाऊँगी। काउंसलर कहती हैं कि मुझे सीखना होगा कि मैं कहाँ शुरू होती हूँ और तू कहाँ खत्म। मुझे अभी नहीं आता। पर मैं कोशिश कर रही हूँ।”

अनाया ने कई बार वह लाइन पढ़ी। फिर उसने जवाब लिखा—

“मैं फिर कभी तुझसे चिपकना नहीं चाहती। लेकिन शायद एक दिन तेरे सामने बैठना चाहूँगी, बिना डरे।”

उसने अंत में “तेरी आधी” नहीं लिखा।

उसने सिर्फ लिखा—

“अनाया।”

महीनों बाद उसके निशान अब भी थे। पतले, टेढ़े, जैसे किसी ऐसे देश का नक्शा जिसे छोड़कर उसे भागना पड़ा था। हर सुबह वह क्रीम लगाती। शर्म से नहीं। सबूत छिपाने के लिए नहीं। खुद की देखभाल करने के लिए।

कुछ रातों में उसे अब भी सपना आता कि सिया मुस्कुरा रही है और कोई उन्हें हमेशा के लिए जोड़ रहा है। तब अनाया लाइट जलाती, बिस्तर पर दोनों हाथ फैलाती, जितनी जगह ले सकती थी उतनी लेती और गहरी साँस लेती।

वह अपनी बहन से अब भी प्यार करती थी।

लेकिन उसने समझ लिया था कि प्यार कभी किसी से यह नहीं माँगता कि वह दूसरे को सुरक्षित महसूस कराने के लिए खुद गायब हो जाए।

और उस रात, अंदर से बंद कमरे में, अनाया अकेली नहीं लगी।

वह पूरी लगी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.