
भाग 1
मुंबई के उस 5-स्टार होटल के संगमरमर के फर्श पर खून की पतली लकीर फैली हुई थी, और पूरे हॉल में खामोशी ऐसी जम गई थी जैसे किसी ने सबकी साँसें बंद कर दी हों।
गोल्डन रूम में उस रात एक बड़ी बिजनेस पार्टी रखी गई थी। नाम था “वेस्ट मैनेजमेंट कॉर्पोरेट डिनर”, लेकिन मुंबई के असली लोगों को पता था कि यह सिर्फ नाम था। अंदर बैठे ज्यादातर आदमी सूट में थे, मगर उनकी आँखों में व्यापार से ज्यादा डर और हिंसा थी। दरवाजों पर भारी-भरकम गार्ड खड़े थे। शराब के ग्लास, महंगे सिगार, चमकते झूमर और नकली मुस्कुराहटों के बीच एक अजीब-सी दहशत तैर रही थी।
काव्या शर्मा उस हॉल के कोने में मिठाइयों की मेज ठीक कर रही थी। वह 28 साल की थी, “रॉयल स्वाद कैटरिंग” की हेड पेस्ट्री शेफ और फ्लोर मैनेजर। उसका शरीर भरा हुआ था, चेहरा गोल, आँखें शांत और हाथों में ऐसी सफाई जैसे चीनी भी उसके स्पर्श से कला बन जाए। लोग अक्सर उसके शरीर को लेकर फुसफुसाते थे, लेकिन काव्या ने वर्षों में सीख लिया था कि दूसरों की नजर उसकी कीमत तय नहीं करती।
वह काजू कतली, चॉकलेट मोदक और गुलाब जामुन के छोटे-छोटे कप सजा ही रही थी कि हॉल के भारी दरवाजे खुले।
विक्रांत मल्होत्रा अंदर आया।
मुंबई के अंडरवर्ल्ड में उसका नाम फुसफुसाकर लिया जाता था। बाहर से वह लॉजिस्टिक्स और रीसाइक्लिंग कंपनियों का मालिक था, अंदर से शहर के सबसे खतरनाक नेटवर्क का सरदार। लंबा कद, पत्थर जैसा चेहरा, गहरी आँखें और ऐसा दबदबा कि उसके आते ही बड़े-बड़े लोग सिर झुका लेते थे।
विक्रांत सीधे मिठाइयों की मेज की तरफ आया। काव्या ने सिर उठाया तो उसकी नजर विक्रांत से टकरा गई।
एक पल के लिए विक्रांत ठहर गया।
उसने जिंदगी में बहुत खूबसूरत औरतें देखी थीं, मगर काव्या में कुछ अलग था। वह बनावटी नहीं थी। उसके चेहरे पर डर भी था, मगर आत्मसम्मान भी। उसके भरे शरीर में ऐसी सच्चाई थी जो विक्रांत की हिंसक दुनिया में दुर्लभ थी।
“तुम्हारा नाम?” विक्रांत की भारी आवाज गूंजी।
“काव्या,” उसने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा।
विक्रांत ने एक चॉकलेट मोदक उठाया, मगर उसकी आँखें काव्या से हटी नहीं।
“तुम्हारा कोई है?” उसने अचानक पूछा।
काव्या चौंक गई। उसे रोहन मेहरा याद आया, जो पिछले 1 महीने से उसे पसंद करने की बात कर रहा था और कल उसे कॉफी पर बुलाने वाला था।
“अभी नहीं,” काव्या ने कहा।
अगले ही पल विक्रांत के हाथ में पकड़ा कांच का ग्लास चटककर टूट गया। खून उसकी हथेली से बहने लगा, मगर वह हिला तक नहीं।
काव्या डर गई, फिर भी उसने तुरंत नैपकिन उठाया और उसके हाथ पर बांधने लगी।
विक्रांत झुका, उसकी आवाज बर्फ जैसी ठंडी थी।
“जिसने भी तुम्हारे करीब आने की सोची है,” उसने फुसफुसाया, “वह अब खतरे में है।”
काव्या का हाथ कांप गया।
तभी विक्रांत का आदमी दौड़ता हुआ आया और उसके कान में कुछ बोला। विक्रांत ने आखिरी बार काव्या को देखा और भीड़ में गायब हो गया।
लेकिन उसी रात, 50 मंजिल ऊपर अपने पेंटहाउस में, विक्रांत एक स्क्रीन पर काव्या की तस्वीर देख रहा था। तस्वीर में रोहन मेहरा उसकी कलाई छू रहा था।
और विक्रांत के सामने खड़े उसके सबसे भरोसेमंद आदमी दुष्यंत ने कहा, “बॉस, रोहन मेहरा कैटरिंग मैनेजर नहीं है। वह अंडरकवर सीबीआई एजेंट है।”
विक्रांत की आँखें काली पड़ गईं।
भाग 2
अगली दोपहर काव्या बांद्रा के एक छोटे मगर महंगे कैफे में बैठी थी। उसने हरे रंग का सूट पहना था, जो उसके शरीर पर बहुत खूबसूरती से बैठ रहा था। सामने रोहन बैठा था, वही मुस्कान, वही नरम आवाज, वही नजरें जिनसे काव्या को लगा था कि शायद कोई सच में उसे देख रहा है।
लेकिन आज उसकी आँखों में बेचैनी थी।
“काव्या,” रोहन ने धीरे से कहा, “उस रात विक्रांत मल्होत्रा ने तुमसे कुछ कहा था? कोई डॉक्स, कोई शिपमेंट, कोई गोदाम?”
काव्या का चेहरा उतर गया।
“मैं समझी थी यह डेट है,” उसने कहा।
रोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मेरी मदद करो। तुम नहीं जानती वह आदमी कितना खतरनाक है।”
तभी कैफे का दरवाजा इतनी ताकत से खुला कि अंदर बैठे लोग सिहर गए।
विक्रांत मल्होत्रा अंदर खड़ा था।
उसके पीछे 2 आदमी दरवाजे रोक चुके थे। विक्रांत की नजर रोहन के हाथ पर गई, जो काव्या की उंगलियों पर था।
“हाथ छोड़ो,” विक्रांत ने कहा।
रोहन खड़ा हुआ, मगर उसकी कमर की तरफ जाती उंगली विक्रांत ने देख ली। अगले ही पल विक्रांत ने उसे कॉलर से पकड़कर मेज पर पटक दिया। कप टूट गए, कॉफी फैल गई और पूरा कैफे चीखों से भर गया।
“विक्रांत, छोड़ दीजिए!” काव्या चिल्लाई।
उसकी आवाज सुनते ही विक्रांत रुका। उसने रोहन को धक्का देकर नीचे गिराया और काव्या की तरफ मुड़ा।
“यह तुम्हें इस्तेमाल कर रहा था,” उसने कहा। “यह सीबीआई एजेंट है। तुम्हारी मासूमियत उसकी फाइल का हिस्सा थी।”
काव्या की आँखों में पानी भर आया।
“और आप क्या कर रहे हैं?” उसने दर्द से पूछा। “आपने मेरी जिंदगी को अपनी जिद समझ लिया?”
विक्रांत ने कुछ नहीं कहा। बस उसका हाथ पकड़ा और उसे बाहर खड़ी काली कार में बैठा दिया।
रास्ते भर काव्या खिड़की से बाहर देखती रही। डर, अपमान और टूटे भरोसे के बीच उसे पहली बार लगा कि उसकी दुनिया उसके हाथ से छिन रही है।
कार लोनावला के पास एक ऊंची दीवारों वाले फार्महाउस में दाखिल हुई।
विक्रांत ने दरवाजा खोला और कहा, “यह कैद नहीं है। यह सुरक्षा है।”
काव्या ने उसकी तरफ देखा।
“कैद को सुरक्षा कह देने से वह आजादी नहीं बन जाती,” उसने कहा।
विक्रांत पहली बार चुप हो गया।
भाग 3
लोनावला का वह फार्महाउस बाहर से किसी राजा की हवेली जैसा दिखता था, लेकिन भीतर हर कोने में खतरे की गंध थी। ऊंची दीवारें, कैमरे, हथियारबंद गार्ड, इलेक्ट्रॉनिक दरवाजे और नीचे एक सेफ रूम। काव्या को जिस कमरे में रखा गया था, वह किसी रानी के कमरे जैसा था। अलमारी में उसके नाप के कपड़े रखे थे, सूती कुर्ते, रेशमी साड़ियां, आरामदेह दुपट्टे, यहां तक कि शेफ के नए कोट भी। मगर काव्या को हर चीज में एक अजीब-सी घुटन महसूस होती थी।
वह कमरे में नहीं रुकी। दूसरे ही दिन उसने नीचे की बड़ी रसोई ढूंढ़ ली।
वहां स्टील के काउंटर चमक रहे थे। बड़े ओवन, मसालों की अलमारियां, तांबे के बर्तन और सूखे मेवों से भरे जार रखे थे। काव्या ने बिना किसी से पूछे आटा निकाला, दूध उबाला और इलायची पीसी। उसके हाथ काम करते ही उसका मन थोड़ा स्थिर होने लगा।
दोपहर तक रसोई में केसर फिरनी, बादाम नानखटाई और गुड़ वाले मावा केक की खुशबू फैल गई।
विक्रांत शाम को लौटा तो दरवाजे पर ही ठहर गया। काव्या ने उसकी तरफ देखे बिना कहा, “आपके घर में चीनी बहुत है, लेकिन नमक ठीक से रखा नहीं है।”
विक्रांत ने धीमे से पूछा, “तुम्हें जो चाहिए, लिखवा दो।”
“मुझे आजादी चाहिए,” काव्या ने जवाब दिया।
विक्रांत ने सिर झुका लिया। वह आदमी जिसने बड़े-बड़े डॉन झुका दिए थे, उस एक वाक्य के सामने चुप हो गया।
अगले 4 दिन अजीब तरह से गुजरे। काव्या फार्महाउस में थी, मगर विक्रांत ने उसे छुआ तक नहीं। वह बस शाम को रसोई के एक कोने में बैठता, उसकी बनाई चीजें खाता और उसे ऐसे देखता जैसे दुनिया में उससे बड़ा सच कोई नहीं। काव्या उससे नफरत करना चाहती थी। उसे करनी भी चाहिए थी। लेकिन हर रात जब वह देखती कि वह आदमी उसके सामने हथियार नहीं, बल्कि खामोशी रखता है, तो उसके भीतर उलझन बढ़ती जाती।
एक रात बारिश बहुत तेज थी। बिजली आसमान को फाड़ रही थी। काव्या गरम पाव और मसाला चाय बना रही थी, तभी विक्रांत अंदर आया। उसका चेहरा थका हुआ था। कंधे पर हल्की चोट थी।
“फिर खून?” काव्या ने सख्त स्वर में पूछा।
“सब कुछ साफ करने में वक्त लगता है,” विक्रांत ने कहा।
“आपकी दुनिया में साफ का मतलब क्या है?” काव्या पलटी। “जिसे चाहो खरीद लो, जिसे चाहो धमका दो, जिसे चाहो बचाने के नाम पर बंद कर दो?”
विक्रांत ने पहली बार उसकी आँखों में अपराधबोध के साथ देखा।
“मैंने तुम्हें डराया,” उसने कहा। “लेकिन रोहन ने तुम्हें धोखा दिया। और अब वह सिर्फ एजेंट नहीं रहा। वह शेखावत गैंग के साथ मिल गया है।”
काव्या सन्न रह गई।
“क्यों?”
“क्योंकि उसे केस चाहिए था। नाम चाहिए था। जब मैंने उसकी चाल तोड़ी, उसने दूसरी तरफ हाथ मिला लिया। अब वह जानता है कि मेरी सबसे बड़ी कमजोरी तुम हो।”
काव्या ने कांपते हुए कप नीचे रखा।
“मैं आपकी कमजोरी नहीं हूं,” उसने कहा। “मैं कोई चीज नहीं हूं।”
“नहीं,” विक्रांत ने धीमे से कहा। “तुम मेरी पहली इंसानियत हो।”
काव्या कुछ बोलती, उससे पहले बाहर धमाका हुआ।
फार्महाउस की लाइटें झपकीं और अंधेरा फैल गया। दूर से गोलियों जैसी आवाजें आईं। गार्ड भागते हुए चिल्लाए। दुष्यंत खून से भीगे माथे के साथ रसोई में घुसा।
“बॉस, पिछली दीवार टूट गई। शेखावत के लोग अंदर हैं। रोहन भी उनके साथ है।”
विक्रांत का चेहरा एक पल में बदल गया। थका हुआ आदमी गायब हो गया, उसकी जगह वही खतरनाक सरदार खड़ा था जिससे पूरा मुंबई डरता था।
उसने काव्या का हाथ पकड़ा।
“मेरे पीछे रहना,” उसने कहा। “कुछ भी हो, हाथ मत छोड़ना।”
वे पिछली गलियारे से नीचे सेफ रूम की तरफ बढ़े। बाहर चीखें थीं, टूटते शीशे थे, बारिश थी और अंधेरे में भागते साये। काव्या का दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे लगा अभी सीना फट जाएगा। विक्रांत ने सेफ रूम का कोड डाला। लोहे का दरवाजा खुलने लगा।
तभी पीछे से आवाज आई।
“वाह, मुंबई का शेर अपनी रानी को छुपाने भाग रहा है?”
काव्या जम गई।
गलियारे के अंत में रोहन खड़ा था। उसके चेहरे पर अब वह मीठी मुस्कान नहीं थी। उसके साथ 3 हथियारबंद आदमी थे। उसकी आँखों में नफरत थी, अपमान था और वह बदला था जो उसके असली चेहरे को नंगा कर रहा था।
“काव्या,” रोहन बोला, “इधर आ जाओ। तुम इस जानवर के साथ मरना नहीं चाहोगी।”
काव्या विक्रांत के पीछे से बाहर आई। उसका चेहरा पीला था, लेकिन आवाज साफ थी।
“तुमने मुझसे झूठ बोला।”
रोहन हंसा।
“झूठ? यह नौकरी थी। तुम आसान रास्ता थीं। एक मोटी, भावुक शेफ, जिसे थोड़ी तारीफ दो तो वह दिल खोल दे। क्या सच में लगा था कि मैं तुम्हें पसंद करता हूं?”
वे शब्द काव्या के भीतर पुराने घावों में चाकू की तरह उतर गए। बचपन की हंसी, कॉलेज की फुसफुसाहटें, रिश्तेदारों के ताने, सब एक साथ लौट आए। मगर इस बार वह झुकी नहीं। उसने अपनी ठोड़ी ऊपर की।
“तुमने मेरा शरीर नहीं देखा,” उसने कहा। “तुमने सिर्फ अपना फायदा देखा। यही तुम्हारी हार है।”
रोहन का चेहरा सख्त हो गया। उसने हथियार उठाया।
विक्रांत ने तुरंत काव्या को सेफ रूम के भीतर धकेला और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया। बीच में एक छोटा बुलेटप्रूफ शीशा था। काव्या ने उस पर दोनों हथेलियां रख दीं।
“विक्रांत!” वह चीखी।
बाहर सब कुछ कुछ ही पलों में हुआ। विक्रांत ने सीधे गोलीबारी नहीं की। उसने गलियारे की बत्ती तोड़ी, अंधेरा गहरा हो गया। दुष्यंत ने दूसरी तरफ से ध्यान भटकाया। विक्रांत ने पहले आदमी को निहत्था किया, दूसरे को दीवार से टकराकर गिराया, तीसरे की बंदूक लात मारकर दूर कर दी। यह कोई फिल्मी खेल नहीं था। हर वार में खतरा था, हर सांस में मौत थी। विक्रांत के कंधे पर गोली छूकर निकली। खून बहा, पर वह रुका नहीं।
रोहन पीछे हटने लगा।
“तुम एक अपराधी हो,” रोहन चिल्लाया।
विक्रांत ने उसे पकड़ लिया। “और तुम वह आदमी हो जिसने वर्दी की आड़ में एक निर्दोष औरत का दिल तोड़ा।”
रोहन ने आखिरी कोशिश में कहा, “वह तुम्हारे लायक नहीं। तुम जैसे आदमी को बस ऐसी औरत ही मिल सकती है, जिसे दुनिया ने कभी चुना ही नहीं।”
विक्रांत की आँखों में आग जल उठी, लेकिन उसने उसे मारने के बजाय जमीन पर दबाकर हथियार दूर फेंक दिया।
“आज मैं इसे अपनी तरह खत्म नहीं करूंगा,” विक्रांत ने भारी सांस लेते हुए कहा। “आज यह कानून के सामने जाएगा। ताकि काव्या को पता रहे कि उसका सम्मान मेरे गुस्से से नहीं, उसके सच से जीतेगा।”
दुष्यंत और गार्डों ने रोहन को बांध लिया। बाहर पुलिस की गाड़ियां आ चुकी थीं। यह सब विक्रांत की योजना का हिस्सा था। उसने 2 दिन पहले ही एक ईमानदार वरिष्ठ अधिकारी को रोहन और शेखावत गैंग की डील के सबूत भेज दिए थे। फार्महाउस पर हमला रोहन की आखिरी गलती बनने वाला था।
सेफ रूम का दरवाजा खुला। काव्या बाहर आई। विक्रांत घायल था। उसका सूट फटा था, चेहरा थका हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में पहली बार हिंसा से ज्यादा डर था—उसे खो देने का डर।
वह काव्या के सामने घुटनों पर बैठ गया।
“मैंने तुम्हें बचाने के नाम पर तुम्हारी आजादी छीनी,” उसने कहा। “मेरी दुनिया ने मुझे सिखाया कि जिसे चाहो, उसे कब्जे में रखो। लेकिन तुम कोई इलाका नहीं हो, काव्या। तुम इंसान हो। अगर तुम अभी जाना चाहो, तो गाड़ी बाहर खड़ी है। कोई तुम्हें नहीं रोकेगा।”
काव्या ने उसे लंबे समय तक देखा।
उसने उस आदमी को देखा जिसने उसे डराया था। उसने उस आदमी को भी देखा जिसने उसके अपमान पर आग की तरह खड़ा होना चाहा था। लेकिन सबसे ज्यादा उसने उस आदमी को देखा जो पहली बार अपने अपराध को नाम दे रहा था।
“आपने मुझे पहली बार खूबसूरत महसूस कराया,” काव्या ने धीमे से कहा। “लेकिन सिर्फ खूबसूरत महसूस कराना काफी नहीं होता। सम्मान चाहिए। चुनाव चाहिए। भरोसा चाहिए।”
विक्रांत ने सिर झुका दिया।
“मैं सीखूंगा,” उसने कहा।
काव्या ने उसकी घायल बांह पकड़ी और उसे उठाया।
“सीखना होगा,” उसने कहा। “क्योंकि मैं किसी की कैद बनकर नहीं रहूंगी। अगर मेरे साथ चलना है, तो मेरे बराबर चलना होगा।”
विक्रांत ने पहली बार हल्की-सी मुस्कान दी। दर्द से भरी, मगर सच्ची।
अगले 6 महीने मुंबई में बहुत कुछ बदला। रोहन मेहरा और शेखावत गैंग के खिलाफ लंबा केस चला। रोहन को भ्रष्टाचार, साजिश और एक निर्दोष नागरिक को ऑपरेशन में इस्तेमाल करने के अपराध में 30 साल की सजा मिली। उसकी चमकदार छवि अखबारों में बिखर गई। जिन लोगों ने उसे हीरो समझा था, उन्हें पता चला कि वर्दी के पीछे भी लालच छुप सकता है।
विक्रांत ने अपने अवैध धंधों से दूरी बनानी शुरू की। यह आसान नहीं था। उसकी दुनिया में बाहर निकलना भी युद्ध जैसा था। कई पुराने साथी दुश्मन बने, कई सौदे टूटे, कई रातें खून और डर की परछाइयों में गुजरीं। लेकिन इस बार काव्या उसके लिए बहाना नहीं थी। वह उसका कारण थी—एक साफ वजह कि आदमी अपनी विरासत बदल भी सकता है।
काव्या ने “रॉयल स्वाद कैटरिंग” खरीदी नहीं, कमाई। विक्रांत ने पैसे देने चाहे, लेकिन काव्या ने शर्त रखी कि कंपनी उसके नाम पर नहीं, उसके काम पर खड़ी होगी। उसने बैंक से लोन लिया, पुराने कर्मचारियों को वापस बुलाया, नई लड़कियों को ट्रेनिंग दी, खासकर उन महिलाओं को जिन्हें उनके शरीर, उम्र या गरीबी के कारण नौकरी से ठुकराया गया था।
कंपनी का नया नाम रखा गया—“काव्या रसोई एम्पायर।”
उसके पहले बड़े इवेंट में वही मुंबई के अमीर लोग आए, जो कभी उसे सिर्फ “भरी हुई शेफ” कहकर नजरअंदाज करते थे। अब वही लोग उसकी बनाई केसर चीजकेक, पान ट्रफल और गुलाब रसमलाई के लिए लाइन लगा रहे थे। काव्या बोर्डरूम में खड़ी थी, लाल बनारसी साड़ी में, माथे पर छोटी बिंदी, आँखों में वह चमक जो किसी की दया से नहीं, अपने संघर्ष से आती है।
कमरे के पीछे विक्रांत खड़ा था। पहले की तरह छाया में, मगर इस बार मालिक की तरह नहीं। वह उसके पीछे इसलिए नहीं खड़ा था कि वह उसे नियंत्रित करे। वह इसलिए खड़ा था कि जब दुनिया फिर कभी उसे कम समझे, तो वह दुनिया को याद दिला सके कि काव्या खुद एक साम्राज्य है।
इवेंट खत्म होने के बाद काव्या छत पर चली गई। नीचे मुंबई चमक रही थी। विक्रांत कुछ दूरी पर रुका।
“आ सकता हूं?” उसने पूछा।
काव्या ने पीछे मुड़कर देखा। “अब पूछना सीख गए हैं?”
विक्रांत ने धीमे से कहा, “तुमने सिखाया।”
काव्या मुस्कुराई। वह उसके पास आया, मगर उतनी ही दूरी पर रुका जितनी दूरी काव्या ने अपने मौन से तय की थी।
“मैंने तुम्हें पहली रात डराया था,” विक्रांत ने कहा। “और शायद उसी रात मुझे लगा था कि तुम मेरी हो। लेकिन आज समझता हूं, तुम कभी मेरी चीज नहीं थीं। तुम मेरा चुनाव हो सकती हो, अगर तुम चाहो। और मैं तुम्हारा भरोसा बन सकता हूं, अगर मैं लायक बनूं।”
काव्या की आँखें भीग गईं। उसने नीचे शहर की तरफ देखा।
“लोग कहते थे, मेरे जैसे शरीर वाली लड़कियों को बस समझौता करना चाहिए,” उसने कहा। “रोहन ने उसी कमजोरी को हथियार बनाया। आपने उसी जगह मुझे रानी कहा। फर्क यही था।”
विक्रांत ने धीमे से कहा, “तुम रानी हो।”
काव्या ने उसकी तरफ देखा।
“नहीं,” उसने कहा। “मैं सिर्फ रानी नहीं हूं। मैं अपनी कहानी की मालिक हूं।”
विक्रांत ने सिर झुका दिया, जैसे यह बात किसी वचन से कम न हो।
कुछ देर बाद काव्या ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। विक्रांत ने उसे पकड़ा नहीं, पहले उसकी आँखों से अनुमति मांगी। जब काव्या ने हल्का सिर हिलाया, तभी उसने उसकी उंगलियां थामीं।
उस रात मुंबई की हवा में बारिश की हल्की गंध थी। कोई गोली नहीं चली, कोई चीख नहीं गूंजी, कोई दरवाजा जबरन बंद नहीं हुआ। बस 2 लोग खड़े थे—एक औरत जिसने खुद को दुनिया की नजरों से वापस छीन लिया था, और एक आदमी जिसने पहली बार ताकत से ज्यादा सम्मान को चुना था।
नीचे शहर अब भी खतरनाक था। दुनिया अब भी निर्णय देने वाली थी। लेकिन काव्या जानती थी कि उसकी सबसे बड़ी जीत यह नहीं थी कि किसी खतरनाक आदमी ने उसके लिए दुनिया से लड़ाई की।
उसकी सबसे बड़ी जीत यह थी कि उसने खुद के लिए खड़ा होना सीख लिया था।
और जब रात के अंत में विक्रांत ने उसके हाथ पर सिर झुकाकर कहा, “हमेशा,” तो काव्या ने सिर्फ इतना जवाब दिया—
“हमेशा तभी, जब बराबरी रहे।”
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.