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अस्पताल के बिस्तर पर 4 दिन बाद पति ने तलाक के कागज़ फेंककर हँसते हुए कहा, “तुम मुझसे लड़ ही नहीं सकती,” पत्नी ने रोने के बजाय चुपचाप फोन उठाया, वकील को एक शब्द कहा, और उसी पल उसे पता नहीं था कि अदालत में पहले से एक सीलबंद फाइल उसका इंतज़ार कर रही थी।

PART 1

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अस्पताल के सफेद कमरे में, चक्कर आने के 4 दिन बाद, अरविंद ने तलाक के कागज़ मीरा के कंबल पर फेंके और हँसते हुए कहा, “तुम्हारे पास मुझसे लड़ने के पैसे नहीं हैं।”

मीरा खन्ना के दाएँ हाथ में अभी भी सलाइन लगी थी। माथे के पास मशीन की धीमी बीप चल रही थी, आँखों के नीचे थकान ऐसे जमा थी जैसे कई रातों की नींद किसी ने चुरा ली हो। दिल्ली के बड़े निजी अस्पताल की 7वीं मंज़िल पर वह 4 दिन से निगरानी में थी। सब कुछ एक साधारण सुबह शुरू हुआ था—रसोई में गैस पर चाय चढ़ी थी, पूजा की थाली मेज़ पर रखी थी, बाहर सब्ज़ीवाले की आवाज़ आ रही थी, और अचानक पूरी दुनिया घूम गई थी।

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स्टील का गिलास गिरा, चाय फर्श पर फैल गई, और मीरा के घुटने जवाब दे गए। पड़ोस की शांति आंटी ने दरवाज़ा खुला देखा तो दौड़कर आईं। उसी ने एम्बुलेंस बुलाई थी।

अरविंद उस दिन अस्पताल पहुँचा भी तो सिर्फ 12 मिनट के लिए। डॉक्टर से उसका पहला सवाल था, “डिस्चार्ज कब तक होगा?” जैसे पत्नी नहीं, कोई अटका हुआ बिल हो।

आज सुबह वह कमरे में ऐसे दाखिल हुआ जैसे किसी बोर्डरूम में प्रेज़ेंटेशन देने आया हो। महँगा सूट, चमकते जूते, हाथ में चमड़े का फोल्डर और चेहरे पर वही आत्मविश्वास जो दूसरों को छोटा करके पैदा होता है।

मीरा ने सूखे होंठों से पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?”

अरविंद ने कंधे उचकाए।

“मर तो नहीं रही हो। इसलिए सोचा, काम की बात कर लेते हैं।”

उसने फोल्डर खोला और कागज़ उसके पैरों के पास रख दिए।

“तलाक की अर्जी। मेरी वकील ने जहाँ साइन करना है, निशान लगा दिए हैं। गुरुग्राम वाला फ्लैट मैं रखूँगा, मर्सिडीज़ भी। मुख्य खाते मेरे पास रहेंगे। तुम्हें तुम्हारे कपड़े, गहने और जो पर्सनल चीज़ें हैं, मिल जाएँगी। बहुत साफ़ और सम्मानजनक ऑफर है।”

मीरा ने कागज़ों को देखा। नाम, तारीख़, संपत्ति, बैंक, दावे—8 साल की शादी एक ठंडी सूची में बदल दी गई थी।

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“तुम ये यहाँ कर रहे हो?” उसने धीमे से पूछा।

अरविंद मुस्कुराया।

“यहीं अच्छा है। तुम शांत हो, भाग नहीं सकती, ड्रामा भी नहीं करोगी। और सच कहूँ, मीरा, तुम कोर्ट-कचहरी की लड़ाई झेलने की हालत में नहीं हो।”

दरवाज़े के पास से नर्स गुज़री। मीरा के गाल शर्म से जल उठे। अरविंद को हमेशा यही पसंद था—उसे लोगों के सामने कमजोर दिखाना। रिश्तेदारों के बीच वह कहता था, “मीरा घर से लैपटॉप पर थोड़े-बहुत हिसाब-किताब करती है।” दोस्तों से कहता, “मेरी पत्नी बहुत सीधी है, बिज़नेस की समझ नहीं है।”

उसे लगता था मीरा साल में मुश्किल से 18 लाख कमाती है।

वह कभी सुनना ही नहीं चाहता था कि मीरा अब मुंबई की एक बड़ी टेक कंपनी में डेटा स्ट्रैटेजी हेड बन चुकी थी। उसके बोनस कई बार अरविंद की सालाना कमाई से ज़्यादा होते थे। उसके पिता की विरासत से बनी कंपनी में उसका हिस्सा था। गुरुग्राम का फ्लैट भी शादी से पहले मीरा के नाम खरीदा गया था।

मीरा ने झूठ नहीं बोला था। उसने बस बोलना बंद कर दिया था, क्योंकि अरविंद हर बार उसकी बात काट देता था।

“अभी क्यों?” मीरा ने पूछा।

अरविंद ने घड़ी देखी।

“क्योंकि मेरी ज़िंदगी रुकी हुई है। तुम हमेशा थकी रहती हो, हमेशा सावधान, हमेशा सवाल। मुझे जीना है।”

“किसी और के साथ?”

उसने जवाब नहीं दिया। वही काफी था।

“नाम क्या है उसका?”

“बात को सस्ता मत बनाओ।”

मीरा ने खिड़की की तरफ देखा। दिल्ली की धुंधली सुबह शीशे पर पड़ी थी। नीचे हॉर्न, एम्बुलेंस और शहर की भागती साँसें चल रही थीं।

“मेरी असिस्टेंट कल कागज़ लेने आएगी,” अरविंद बोला। “साइन कर देना। अपनी माँ को मत बुलाना। वह भोपाल में बैठकर कुछ नहीं समझेंगी।”

वह मुड़ा और चला गया।

कदमों की आवाज़ दूर होती गई। मीरा बहुत देर तक चुप रही। फिर उसने काँपते हाथ से फोन उठाया। कॉन्टैक्ट में एक नाम सेव था—“साड़ी बुटीक।”

कॉल 2 रिंग में उठी।

“मीरा?”

“नंदिता… उसने कर दिया।”

उधर कुछ पल सन्नाटा रहा।

“कहाँ हो?”

“अस्पताल में। वह तलाक के कागज़ लाया था। फ्लैट, गाड़ी, खाते—सब माँग रहा है।”

“साइन मत करना। कागज़ों की फोटो लो। लिफाफा संभालकर रखो। और सुनो, जो सीलबंद फाइल हमने कोर्ट में रखवाई थी, अब वही खुलेगी।”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

नंदिता कोई साड़ीवाली नहीं थी। वह दिल्ली हाई कोर्ट की तेज़तर्रार फैमिली लॉ वकील थी। 3 साल पहले मीरा ने उसे पहली बार फोन किया था, उस रात जब अरविंद ने किचन की दीवार पर गिलास दे मारा था क्योंकि मीरा ने अपने फ्लैट को उसके होटल प्रोजेक्ट के लिए गिरवी रखने से मना कर दिया था।

तभी मीरा ने समझ लिया था—खतरा हमेशा चिल्लाकर नहीं आता। कभी वह मंगलसूत्र पहनाकर आता है, मेहमानों के सामने मुस्कुराता है, और अकेले में कहता है, “साइन कर दो, तुम समझोगी नहीं।”

नंदिता ने सब तैयार कर रखा था। शादी से पहले का अलग संपत्ति वाला समझौता, फ्लैट के कागज़, कंपनी के शेयर, बैंक स्टेटमेंट, अरविंद के धमकी भरे मैसेज, और वह मेडिकल नोट जिसमें लिखा था कि मीरा अभी शारीरिक रूप से कमजोर और मानसिक तनाव में थी।

अरविंद सोच रहा था कि वह बीमार पत्नी को लूटने आया है।

उसे पता नहीं था कि जिस अदालत को वह डराने का हथियार समझ रहा था, वहाँ उसके खिलाफ पहले ही एक गुप्त फाइल सो रही थी।

PART 2

1 हफ्ते बाद मीरा अस्पताल से लौटी तो गुरुग्राम वाले फ्लैट की हवा भी बदली हुई थी। अलमारी खुली पड़ी थी, कुछ दराज़ खाली थीं, महँगी घड़ियाँ गायब थीं, ड्रॉइंग रूम से पीतल का दीपक भी उठा लिया गया था—वही दीपक जो उसके पिता ने गृहप्रवेश पर दिया था।

तकिए पर एक पर्ची रखी थी।

“ज्यादा दिन मत रोकना। यह घर तुम्हारे बस का नहीं।”

मीरा ने पर्ची की फोटो ली।

शाम को उसकी कॉलेज की दोस्त ने इंस्टाग्राम स्क्रीनशॉट भेजा। अरविंद जयपुर के एक रिसॉर्ट में था। उसके साथ रिया नाम की औरत थी—हीरे की मुस्कान, लाल साड़ी, और कैप्शन:

“आखिर मिला ऐसा आदमी जो फैसला लेना जानता है। नई शुरुआत। जल्द ही शादी।”

मीरा के भीतर जलन नहीं उठी। कुछ और उठा—उल्टी जैसा सच। उसे छोड़ा नहीं गया था, उसे पहले ही बदल दिया गया था।

अगले दिन अरविंद का मैसेज आया।

“रिया रविवार को फ्लैट देखने आएगी। तुम घर पर मत रहना।”

रविवार को वह सचमुच आया। रिया के साथ।

दरवाज़े का डिजिटल लॉक नहीं खुला। नंदिता के कहने पर कोड बदल चुका था।

अरविंद ने गुस्से में बेल बजाई। मीरा ने ऊपर की बालकनी से देखा।

“दरवाज़ा खोलो,” वह चिल्लाया। “यह मेरा घर है।”

मीरा ने फोन कैमरा ऑन कर दिया।

“दोबारा कहो।”

रिया ने चौंककर पूछा, “अरविंद, तुमने कहा था फ्लैट तुम्हारे नाम है।”

अरविंद का चेहरा पहली बार सफेद पड़ गया।

PART 3

उस दिन के बाद अरविंद की आवाज़ का रंग बदलने लगा। पहले वह आदेश देता था, फिर चेतावनी देता था, फिर विनती और गाली के बीच झूलने लगा। मीरा ने कोई जवाब अपने हाथ से नहीं दिया। हर स्क्रीनशॉट नंदिता के पास जाता, हर कॉल रिकॉर्ड होती, हर धमकी फाइल में जुड़ती गई।

अरविंद की माँ, सरला देवी, ने रोज़ सुबह फोन करना शुरू किया।

“बहू होकर घर तोड़ रही हो? मेरे बेटे ने तुम्हें दिल्ली में रानी बनाकर रखा।”

मीरा पहले हर बात समझाने की कोशिश करती थी। अब नहीं।

सरला देवी कहतीं, “औरत अगर ठंडी हो जाए तो मर्द बाहर जाएगा ही।”

मीरा फोन काट देती।

अरविंद के पिता ने संदेश भेजा, “कम से कम गाड़ी लौटा दो। लड़का काम कैसे करेगा?”

मीरा ने वह संदेश भी नंदिता को भेज दिया।

धीरे-धीरे रिश्तेदारों की अदालत शुरू हो गई। कोई कहता, “अरविंद तो बड़ा हँसमुख है।” कोई पूछता, “तुमने कुछ छुपाया तो नहीं?” कोई चाची सलाह देती, “तलाक में औरत की इज़्ज़त चली जाती है, समझौता कर लो।”

मीरा ने पहली बार जाना कि समाज को सच से ज़्यादा सुविधा पसंद है। एक सफल, मुस्कुराता आदमी सबको भरोसेमंद लगता है। बिस्तर से उठती, चक्कर से लड़ती, कम बोलती औरत हमेशा शक के घेरे में रखी जाती है।

फिर अरविंद ने सबसे बड़ी गलती की।

सुनवाई से 3 हफ्ते पहले उसने रिया के साथ सगाई की पार्टी रखी। जगह थी दिल्ली का एक आलीशान बैंक्वेट हॉल। 80 मेहमान, फूलों की सजावट, डीजे, फोटोग्राफर, चांदी की प्लेटें, और खर्च उसी संयुक्त खाते से किया गया जिस पर अदालत में विवाद दर्ज था।

रिया ने वीडियो पोस्ट किया। अरविंद ग्लास उठाकर कह रहा था, “जल्द ही हम अपने गुरुग्राम वाले घर में होंगे। पुराने साये हटते ही नई जिंदगी शुरू होगी।”

वीडियो 2 घंटे में रिश्तेदारों के व्हाट्सऐप ग्रुपों में फैल गया।

मीरा ने उसे देखा। फिर नंदिता को भेज दिया।

जवाब आया, “उसने गवाहों के सामने दावा कर दिया। अब उसे बोलने दो।”

सोमवार को बैंक ने संयुक्त खाते पर रोक लगा दी। कार कंपनी ने मर्सिडीज़ वापस माँगने का नोटिस भेजा, क्योंकि ईएमआई मीरा की कंसल्टिंग फर्म के खाते से जुड़ी थी और अब भुगतान रोक दिया गया था। बैंक्वेट हॉल ने बकाया माँगा। रिया की पोस्ट अचानक हट गई।

रात 10:26 पर अरविंद का फोन आया।

मीरा ने नहीं उठाया।

उसने 7 बार कॉल किया। फिर वॉइस मैसेज भेजा।

“मीरा, ये क्या किया तुमने? बैंक ने खाता रोक दिया। गाड़ी वाले घर आ गए थे। रिया सोच रही है मैंने झूठ बोला। तुम चाहती क्या हो? मुझे सड़क पर देखना?”

मीरा ने संदेश पूरा सुना। फिर फोन किया।

“बोलो।”

अरविंद की साँस भारी थी।

“तुमने सबको मेरे खिलाफ कर दिया।”

“नहीं। मैंने सिर्फ कागज़ दिखाए।”

“तुम्हारे पास इतना पैसा आया कहाँ से? नंदिता जैसी वकील को कैसे रख लिया? तुम तो कभी इतना कमा ही नहीं सकती थीं।”

वही असली बात थी। तलाक नहीं। बेवफाई नहीं। असली बात उसका तिरस्कार था।

मीरा खिड़की तक गई। नीचे सोसायटी के गार्ड की सीटी सुनाई दे रही थी। मंदिर की घंटी दूर कहीं बज रही थी।

“मैं 4 साल से सालाना 1 करोड़ 8 लाख कमा रही हूँ, बोनस अलग,” उसने शांत आवाज़ में कहा। “कंपनी के शेयर भी हैं। पापा की फर्म में मेरा हिस्सा है। तुम्हें बताया था। तुमने कहा था, ‘मुझे ये नंबर सुनाकर सिर मत खाओ।’”

सन्नाटा।

“तुमने मुझसे छुपाया,” अरविंद बुदबुदाया।

“नहीं। तुमने मुझे सुना नहीं।”

“हम पति-पत्नी थे।”

“हाँ। और शादी से पहले अलग संपत्ति का समझौता तुमने करवाया था, क्योंकि तुम्हें लगा था कि तुम मुझसे ज़्यादा कमाओगे।”

पीछे से रिया की आवाज़ आई, “उसके पास सच में पैसा है? तुमने कहा था वो तुम पर निर्भर है!”

मीरा ने फोन कसकर पकड़ा। उस एक वाक्य ने बची हुई दया भी खत्म कर दी।

“तुमने उसे मेरी कमजोरी बेचकर सपना दिया,” मीरा बोली।

अरविंद अचानक नरम पड़ा।

“देखो, बात बढ़ गई है। हम समझौता कर सकते हैं। तुम चाहो तो कुछ महीने फ्लैट में रह लो, फिर निकल जाना।”

मीरा हँसी नहीं, पर उसके भीतर कुछ टूटकर सीधा हो गया।

“तुम मुझे मेरी ही संपत्ति से निकलने का समय दे रहे हो?”

“मुझे उस घर की जरूरत है। रिया की 1 बेटी है। उसने अपना किराये का घर छोड़ दिया है।”

“तो तुमने 1 बच्ची का भविष्य भी झूठ पर खड़ा कर दिया।”

वह चुप हो गया।

मीरा ने कहा, “क्रूरता यह नहीं कि मैंने बैंक रोका। क्रूरता वह थी जब तुमने अस्पताल में मेरे कंबल पर तलाक फेंका और हँसे।”

कुछ देर बाद अरविंद बोला, “मैंने गलती की।”

“गलती?” मीरा की आवाज़ काँपी नहीं। “गलती चाय में चीनी कम डालना है। बीमार पत्नी को लूटने की कोशिश गलती नहीं, फैसला होता है।”

उसने फोन काट दिया।

सुनवाई पटियाला हाउस कोर्ट में बरसाती सुबह हुई। बाहर चायवाले के स्टॉल पर भीड़ थी, अंदर गलियारों में फाइलों, गीले जूतों और पुराने पंखों की गंध। मीरा हल्की क्रीम साड़ी में आई। चेहरा पीला था, पर आँखें स्थिर थीं। नंदिता उसके साथ थी।

अरविंद देर से आया। अकेला। सूट पर सिलवटें थीं। दाढ़ी बेतरतीब थी। रिया नहीं आई थी। सुनने में आया कि उसने सारे फोटो हटाकर अपना अकाउंट प्राइवेट कर लिया था।

पीछे सरला देवी बैठी थीं, माथे पर बड़ी बिंदी और आँखों में रोष।

जज ने फाइल खोली।

अरविंद के वकील ने पहले बात शुरू की। उसने कहा कि मीरा ने अपने वास्तविक आय छुपाए, वैवाहिक घर से पति को निकाला, संयुक्त धन रोक दिया और मानसिक प्रताड़ना दी। अरविंद को “बेघर पति” की तरह प्रस्तुत किया गया।

जज ने चश्मे के ऊपर से अरविंद को देखा।

“क्या आपने अस्पताल में पत्नी को तलाक के कागज़ दिए थे?”

अरविंद ने गला साफ किया।

“जी, पर उनकी हालत स्थिर थी।”

“आप डॉक्टर हैं?”

“नहीं, पर डॉक्टर ने कहा था—”

“सवाल का जवाब मिल गया।”

अदालत में हल्का सन्नाटा छा गया।

नंदिता ने बिना आवाज़ ऊँची किए दस्तावेज़ रखे। शादी से पहले का समझौता। फ्लैट की रजिस्ट्री। पिता की वसीयत। कंपनी के खाते। कार लीज़ का अनुबंध। अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट। अरविंद के संदेश। तकिए वाली पर्ची। वीडियो जिसमें वह रिया को “भविष्य का घर” दिखाने की बात कर रहा था। बैंक्वेट के खर्च। संयुक्त खाते से निकासी।

हर कागज़ एक थप्पड़ था, मगर कानूनी भाषा में।

सरला देवी फुसफुसाईं, “कितनी चालाक निकली।”

जज ने तुरंत सिर उठाया।

“एक और टिप्पणी हुई तो आपको बाहर जाना पड़ेगा।”

सरला देवी चुप हो गईं।

अरविंद ने आखिरी कोशिश की।

“माननीय अदालत, मैं मानता हूँ कि कुछ बातें जल्दबाजी में हुईं। मगर वह साधारण पत्नी नहीं है। उसके पास बहुत पैसा है। उसने वर्षों तक अपनी आय छुपाई। मुझे बराबरी का हिस्सा मिलना चाहिए।”

जज ने दस्तावेज़ पलटा।

“आपने विवाह से पहले अलग संपत्ति की शर्त पर हस्ताक्षर किए थे?”

“जी।”

“आपकी पहल पर?”

अरविंद चुप।

“उत्तर दीजिए।”

“जी।”

“तो नियम तब ठीक था जब आपको लगता था कि इससे आपकी संपत्ति सुरक्षित रहेगी। अब वही नियम पत्नी की संपत्ति पर लागू हो रहा है, तो आपको अन्याय लग रहा है?”

अरविंद का चेहरा गिर गया।

जज ने साफ़ कहा, “किसी घर में रहना, उस घर का मालिक बनना नहीं होता।”

मीरा ने पहली बार गहरी साँस ली।

अंतरिम आदेश में फ्लैट की विशेष सुरक्षा मीरा को मिली। अरविंद को वहाँ प्रवेश से रोका गया। मर्सिडीज़ कंपनी को लौटाने का निर्देश दिया गया। संयुक्त खाते पर रोक बनी रही जब तक निजी खर्चों की जाँच पूरी न हो। सगाई पार्टी, होटल बुकिंग और रिया से जुड़े खर्चों को मीरा पर थोपने से मना किया गया। अस्पताल में दबाव डालकर तलाक देने की कोशिश को अदालत ने गंभीर आचरण माना।

अरविंद ने धीमे से कहा, “मेरे पास जाने की जगह नहीं है।”

जज ने शांत स्वर में कहा, “यह बात उस समय सोचनी चाहिए थी जब आपने किसी और को वह घर वादा किया जो आपका था ही नहीं।”

फैसला अंतिम नहीं था, पर झूठ की रीढ़ टूट चुकी थी।

बाहर गलियारे में अरविंद ने मीरा को रोका।

“मीरा।”

नंदिता कुछ कदम दूर रुक गई।

अरविंद की आँखें लाल थीं। वह वही आदमी नहीं लग रहा था जो अस्पताल में हँसा था। अब उसके चेहरे पर हार थी, पछतावा नहीं।

“मैं माफी चाहता हूँ,” उसने कहा।

मीरा ने लंबे समय तक उसे देखा।

“मुझे चोट पहुँचाने की, या हार जाने की?”

वह जवाब नहीं दे पाया।

मीरा समझ गई।

“मैंने तुम्हें प्यार किया था,” वह बोला।

“नहीं,” मीरा ने धीरे कहा। “तुमने उस जीवन से प्यार किया जो मेरी वजह से मिला। फ्लैट, गाड़ी, मेहमानों के सामने सफल पति की छवि, मेरे बनाए रिश्ते, मेरी चुप्पी। तुम चाहते थे मैं इतनी समझदार रहूँ कि घर संभालूँ, पर इतनी दिखाई न दूँ कि तुम्हारी रोशनी कम हो जाए।”

अरविंद ने हाथ बढ़ाया।

“हम फिर से कोशिश कर सकते हैं।”

“हम तब खुश हो सकते थे जब तुम मुझे पूरा इंसान मानते। सिर्फ पत्नी नहीं, सिर्फ सुविधा नहीं, सिर्फ चुप रहने वाली औरत नहीं।”

पीछे सरला देवी रो रही थीं। कभी ये आँसू मीरा को तोड़ देते। आज वह उन्हें किसी और परिवार का शोर समझकर आगे बढ़ गई।

अरविंद ने आखिरी बार पूछा, “मैं क्या करूँ?”

मीरा सीढ़ियों के पास रुकी।

“सीखो कि शांत औरत कमजोर नहीं होती। वह बस सही समय पर बोलती है।”

कुछ दिनों बाद मीरा अपने फ्लैट लौटी। सुबह की धूप बालकनी में तुलसी के गमले पर पड़ी थी। घर वैसा ही था, पर हवा अलग थी। यह खालीपन नहीं था। यह उसका अपना सन्नाटा था।

उसने धीरे-धीरे घर सँवारा। शादी की फोटो उतारी और दराज़ में रख दी। पिता का दीपक वापस खरीदना संभव नहीं था, पर उसने उसकी जगह एक छोटा मिट्टी का दिया रखा। रसोई साफ की। चाय बनाई। पहली बार उसने कप में चीनी अपने स्वाद से डाली, किसी की पसंद से नहीं।

शरीर अब भी कभी-कभी डगमगा जाता था। डॉक्टर ने आराम, दवा और सावधानी कही थी। पर मन में जो संतुलन लौट रहा था, उसे कोई रिपोर्ट माप नहीं सकती थी।

फोन बजा। अनजान नंबर।

पहले की मीरा उठाती। समझाती। डरती। माफ कर देती। दूसरे की घबराहट को अपना कर्तव्य समझ लेती।

अब उसने फोन देखा, उल्टा रखा और चाय की चुस्की ली।

अरविंद ने सोचा था वह उसे बिना पैसे, बिना घर, बिना इज़्ज़त छोड़ देगा। उसने उसकी चुप्पी को निर्भरता समझा, उसकी बीमारी को मौका, उसके प्रेम को अनुमति।

उसे देर से पता चला कि मीरा के पास पहले से 3 चीज़ें थीं—सच, सबूत और अब न झुकने की ताकत।

बालकनी के बाहर हवा चली। तुलसी के पत्ते काँपे, फिर स्थिर हो गए।

मीरा मुस्कुराई।

घर वही था।

लेकिन इस बार चाबी सचमुच उसके हाथ में थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.