
भाग 2
“मिया यहाँ है। माँ भी यहाँ हैं।”
कुछ क्षण की चुप्पी रही।
फिर उनकी आवाज़ बदल गई।
ज़्यादा ऊँची नहीं।
और धीमी।
“कमरे का स्पीकर चालू कर दो।”
“वह पहले से ही चालू है।”
उसी क्षण कमरे में सचमुच सन्नाटा छा गया।
ऐसा सन्नाटा जिसमें लोगों को अपनी ही साँसों की आवाज़ सुनाई देने लगती है।
सुनवाई अधिकारी थोड़ा आगे झुककर बैठ गया। रॉबर्ट के वकील ने अपनी फ़ाइल की ओर नज़र झुका ली, मानो उसके भीतर रखे कागज़ अचानक पहले जितने भरोसेमंद न रहे हों। मेरी माँ ने मिया का हाथ पकड़ लिया। मिया ने पहले फोन की ओर देखा, फिर मेरी ओर, और उसके बाद रॉबर्ट की ओर। उसके छोटे-से चेहरे पर ऐसी गंभीरता थी, जो किसी भी बच्चे के चेहरे पर नहीं होनी चाहिए।
मेरे पिता फिर बोले।
“सुनवाई की अध्यक्षता कौन कर रहा है?”
सुनवाई अधिकारी ने गला साफ़ किया और अपना नाम बताया।
फिर एक और विराम आया, इस बार थोड़ा छोटा।
“मैं समझ गया,” मेरे पिता ने कहा। “इस कार्यवाही के आगे बढ़ने से पहले कुछ अभिलेखों और पहले दायर किए गए दस्तावेज़ों की समीक्षा की जानी चाहिए। मैं फोन पर मामले के गुण-दोष पर चर्चा नहीं करूँगा। लेकिन मैं उस कमरे में मौजूद हर व्यक्ति को यह बता रहा हूँ कि सुश्री मिलर के पास दस्तावेज़ हैं, गवाह हैं और परिवार भी उनके साथ है।”
रॉबर्ट की माँ फुसफुसाईं,
“हे भगवान।”
रॉबर्ट तुरंत उनकी ओर मुड़ा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मेरे पिता की आवाज़ ने पहले ही पूरे कमरे का माहौल बदल दिया था।
जिस व्यक्ति को सब अनुपस्थित समझ रहे थे, उसने जवाब दे दिया था।
जिस व्यक्ति को वे समझ रहे थे कि मैं खो चुकी हूँ, वह अब फोन पर था।
और फिर उन्होंने एक और वाक्य कहा—इतनी शांति से कि मेज़ पर रखी हर फ़ाइल पहले से कहीं ज़्यादा भारी महसूस होने लगी।
“इसाबेला, तुम्हारी माँ जो नीला लिफाफा अपने साथ लाई हैं, उसे खोलो।”
मैंने अपनी माँ की ओर देखा।
उन्होंने धीरे-धीरे अपना हाथ पर्स में डाला और एक लिफाफा बाहर निकाला, जिसे मैंने…
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