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खून से लथपथ 7 साल की बच्ची गलियारे में मदद मांगती रही, दरवाज़े के पीछे बच्चे कांप रहे थे… तभी एक नर्स ने नियम तोड़कर वह दरवाज़ा खोला, और सबकी सांसें रुक गईं

भाग 1

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स्कूल की सफेद दीवारों के बीच 7 साल की बच्ची खून से सनी बाँह पकड़े पड़ी थी, और पूरे गलियारे में कोई उसकी मदद करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।

दिल्ली से कुछ दूर गाज़ियाबाद के शांत सेक्टर में बना “सरस्वती विद्या मंदिर इंटरनेशनल स्कूल” हमेशा माता-पिता के लिए सुरक्षित जगह माना जाता था। सुबह 7:45 बजे पहली घंटी बजती, बच्चे बैग घसीटते हुए क्लास में जाते, टीचर मुस्कुराकर नमस्ते करतीं, और बाहर खड़े माता-पिता हाथ हिलाकर लौट जाते। उस स्कूल में झगड़े होते थे, रोना होता था, बच्चों की छोटी-मोटी चोटें होती थीं, पर किसी ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वही स्कूल डर की सबसे बड़ी कहानी बन जाएगा।

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42 साल की स्कूल नर्स सविता मिश्रा रोज़ की तरह सबसे पहले मेडिकल रूम खोल चुकी थी। उसकी मेज़ पर दवाइयाँ करीने से रखी थीं, अलमारी में पट्टियाँ, इनहेलर, ग्लूकोज़, ऑक्सीजन सिलेंडर और बच्चों की मेडिकल फाइलें थीं। स्कूल में कई बच्चों के लिए वह सिर्फ नर्स नहीं थी, बल्कि वह जगह थी जहाँ डर थोड़ा कम हो जाता था।

प्रिंसिपल अरविंद मेहरा दरवाज़े पर आए और मुस्कुराकर बोले, “आज तो दिन शांत लग रहा है, सविता जी।”

सविता ने हल्की हँसी के साथ कहा, “आपने बोल दिया, अब कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर होगी।”

दोनों ने इसे मज़ाक समझा था।

9:12 बजे एक छोटा बच्चा घुटना छिलवाकर आया। सविता ने उसके घुटने पर कार्टून वाली पट्टी लगाई। वह रोते-रोते बोला, “मेरी मम्मी कहती हैं नर्स लोग भगवान जैसे होते हैं।”

सविता ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “भगवान नहीं बेटा, बस कोशिश करते हैं कि दर्द कम हो जाए।”

9:30 बजे स्कूल रिसोर्स ऑफिसर इंस्पेक्टर आदित्य राणा अपनी नियमित विज़िट पर पहुँचे। बच्चे उन्हें बहुत पसंद करते थे। कोई उन्हें अपनी ड्राइंग दिखाता, कोई अपनी टूटी दाँत वाली मुस्कान। आदित्य भी कभी जल्दबाज़ी नहीं करते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि बच्चों का भरोसा जीतना किसी भी सुरक्षा से बड़ा काम है।

9:43 बजे अचानक मुख्य गेट की तरफ़ से एक तेज़ धमाका हुआ।

पहले सबको लगा कोई भारी चीज़ गिरी होगी। फिर दूसरा धमाका हुआ। फिर तीसरा।

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सविता का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने आवाज़ पहचान ली थी। यह पटाखा नहीं था। यह दुर्घटना नहीं थी। यह गोली थी।

इंटरकॉम पर प्रिंसिपल मेहरा की काँपती लेकिन संभली हुई आवाज़ गूँजी, “सभी क्लास तुरंत लॉकडाउन करें। यह ड्रिल नहीं है।”

दरवाज़े बंद होने लगे। बच्चे मेज़ों के नीचे छिपने लगे। टीचर पर्दे गिराने लगीं। गलियारे में एक नन्ही बच्ची लाइब्रेरी की किताबें पकड़े रोती हुई खड़ी थी।

सविता दौड़ी, उसका हाथ पकड़ा और मेडिकल रूम में खींच लाई। अंदर 2 और बच्चे, 1 आया और 1 घायल डर से काँपती टीचर आ चुकी थीं। उसने दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई, अलमारी खिसकाकर दरवाज़े के आगे लगा दी।

बाहर फिर गोली चली।

सब बच्चे सिसकने लगे।

सविता घुटनों के बल बैठी और धीमे स्वर में बोली, “हम चुप्पी वाला खेल खेलेंगे। जो सबसे चुप रहेगा, वही सबसे बहादुर होगा।”

बच्चों ने अपने मुँह पर हाथ रख लिए।

तभी मेडिकल रूम के छोटे स्क्रीन पर सविता की नज़र पड़ी। बाहर गलियारे में 7 साल की एक बच्ची गिरी हुई थी। उसकी एक चप्पल दूर पड़ी थी। उसकी बाँह से खून बह रहा था। वह दरवाज़े की तरफ़ देखकर बहुत धीमे बोली, “मैम… बचा लो…”

आया ने सविता का हाथ पकड़ लिया। “दरवाज़ा मत खोलिए। बाहर मौत है।”

सविता ने स्क्रीन पर बच्ची को देखा। फिर अंदर छिपे बच्चों को। फिर अपने ट्रॉमा बैग को।

उसने धीरे से कहा, “अगर वह तुम्हारी बेटी होती तो?”

और तभी कैमरे में एक साया दिखा। हमलावर उसी गलियारे की तरफ़ वापस मुड़ चुका था।

भाग 2

सविता ने बिना आवाज़ किए ट्रॉमा बैग खोला। उसने सिर्फ ज़रूरी चीज़ें उठाईं—पट्टी, दस्ताने और खून रोकने का सामान। आया की आँखों में डर था। बच्चों की आँखों में भरोसा।

“कोई दरवाज़े के पास नहीं आएगा,” सविता ने फुसफुसाकर कहा। “मैं लौटूँगी।”

दरवाज़ा कुछ इंच खुला। गलियारे की ठंडी हवा भीतर आई, जैसे मौत ने कमरे में झाँक लिया हो। सविता झुककर बाहर निकली और रेंगते हुए बच्ची तक पहुँची।

बच्ची का नाम परी था। वह क्लास 2 में पढ़ती थी। उसकी बाँह पर गहरी चोट थी और खून तेजी से बह रहा था। सविता ने काँपते हाथों को अपने अनुभव से शांत किया। उसने पट्टी बाँधी, खून रोका और परी की आँखों में देखते हुए कहा, “आज नहीं। तू आज नहीं हारेगी।”

परी रोते हुए बोली, “मम्मी…”

“मम्मी से मिलवाऊँगी,” सविता ने कहा।

तभी पीछे से भारी कदमों की आवाज़ आई।

हमलावर गलियारे के मोड़ पर दिख चुका था।

सविता ने परी को बाँहों में उठाया। वह जानती थी कि वह गोली से तेज़ नहीं भाग सकती। पर वह यह भी जानती थी कि अगर वह रुक गई, तो परी नहीं बचेगी।

मेडिकल रूम के अंदर आया ने 3 धीमी खटखटाहट सुनी। वही संकेत जो सविता ने कभी मॉक ड्रिल में बच्चों को सिखाया था। उसने जल्दी से अलमारी हटाई। सविता परी को लेकर भीतर घुसी। दरवाज़ा बंद हुआ। कुंडी लगी। अलमारी फिर दरवाज़े के सामने आ गई।

बच्चों ने राहत की साँस ली, मगर राहत अधूरी थी।

रेडियो पर टूटी हुई आवाज़ आई, “एक अधिकारी घायल… हमलावर पश्चिमी विंग की ओर…”

सविता ने परी को बेड पर लिटाया। तभी फायर अलार्म बज उठा। बच्चे उठने लगे।

सविता ने सख्ती से कहा, “कोई बाहर नहीं जाएगा। जब तक पुलिस खुद सुरक्षित संकेत न दे।”

कुछ मिनट बाद दरवाज़े पर आवाज़ आई, “पुलिस! दरवाज़ा खोलिए!”

आया दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी, पर सविता ने रोक दिया। “कोड बोलिए।”

बाहर कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर इंस्पेक्टर आदित्य की आवाज़ आई और सही सुरक्षा कोड बोला गया।

दरवाज़ा खुला। आदित्य की वर्दी की बाँह पर खून था। उसने दर्द छिपाते हुए कहा, “सविता जी, हमें आपकी ज़रूरत है। लाइब्रेरी के पास कई लोग घायल हैं।”

सविता ने अंदर बच्चों को देखा। परी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मैम… आप वापस आएँगी ना?”

सविता ने उसके माथे को छुआ। “जब तक आख़िरी बच्चा सुरक्षित नहीं हो जाता, मैं कहीं नहीं जाऊँगी।”

भाग 3

जब सविता मेडिकल रूम से बाहर निकली, तो उसे अपना वही स्कूल पहचान में नहीं आया। वही गलियारा जहाँ बच्चे कभी टिफिन खोलकर पराठे दिखाते थे, अब टूटे शीशों, बिखरे बैगों और डर की भारी गंध से भरा था। दीवारों पर गोलियों के निशान थे। फर्श पर पानी फैला था। एक कोने में किसी बच्चे की गुलाबी पानी की बोतल लुढ़की पड़ी थी, जैसे किसी ने बचपन को बीच रास्ते में गिरा दिया हो।

इंस्पेक्टर आदित्य आगे चल रहे थे। 2 पुलिसकर्मी दाएँ-बाएँ थे। सविता बीच में थी, कंधे पर ट्रॉमा बैग और आँखों में वही दृढ़ता जो डर से बड़ी होती है। आदित्य की बाँह से खून रिस रहा था, मगर वह बार-बार कह रहे थे, “पहले बच्चे।”

लाइब्रेरी के पास पहुँचते ही सविता ने देखा, लाइब्रेरियन हरिशंकर जी दीवार से टिके पड़े थे। उनके कंधे से खून बह रहा था। एक टीचर अपनी दुपट्टे से दबाव बनाए बैठी थी। वह रो रही थी, पर हाथ नहीं हटा रही थी।

सविता ने घुटनों के बल बैठकर कहा, “आपने सही किया है। बस पकड़कर रखिए।”

उसने पट्टी बदली, खून रोका, नाड़ी देखी। हरिशंकर जी ने आँख खोली और बहुत धीमे बोले, “बच्चे?”

“सुरक्षित हैं,” सविता ने कहा।

यह झूठ नहीं था। यह उम्मीद थी, जिसे सच बनाना अभी बाकी था।

दूसरी तरफ़ असिस्टेंट प्रिंसिपल कविता नायर के माथे पर गहरी चोट थी। उनके चेहरे पर खून था, मगर उनकी पहली बात भी वही थी, “क्लास 3-B?”

सविता ने उनका माथा साफ किया। “लॉकडाउन में हैं। पुलिस निकाल रही है।”

कविता नायर रो पड़ीं। “मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया था… 2 बच्चे बाहर रह गए थे…”

सविता का दिल धक से रह गया। “कहाँ?”

कविता ने काँपते हाथ से स्टाफ रूम की तरफ़ इशारा किया। आदित्य ने तुरंत पुलिस को संकेत दिया। सविता भी उनके साथ बढ़ी, पर एक अधिकारी ने कहा, “नहीं मैडम, यह सुरक्षित नहीं है।”

सविता ने उसकी आँखों में देखा। “वहाँ बच्चे हैं।”

यह 3 शब्द थे, पर उनमें आदेश से ज़्यादा ताकत थी।

स्टाफ रूम के बाहर एक टूटी मेज़ के पीछे 2 बच्चे छिपे मिले। उनमें से एक रोते-रोते आवाज़ भी खो चुका था। दूसरा अपनी छोटी बहन जैसा हाथ पकड़े बैठा था, जबकि वे भाई-बहन भी नहीं थे। डर ने उन्हें परिवार बना दिया था।

सविता ने दोनों को अपने पीछे किया। “नीचे रहो, मेरी चुन्नी पकड़ो।”

जब वे लाइब्रेरी तक पहुँचे, तो पहला बच्चा अचानक बोला, “मैम, आप हमें छोड़कर नहीं गईं।”

सविता ने सिर्फ इतना कहा, “स्कूल में कोई बच्चा अकेला नहीं छोड़ा जाता।”

बाहर मैदान में माता-पिता की भीड़ जमा हो चुकी थी। किसी के हाथ में बच्चे की जैकेट थी, कोई फोन पर बार-बार कॉल कर रहा था, कोई पुलिस बैरिकेड पकड़कर रो रहा था। सबका एक ही सवाल था—मेरा बच्चा कहाँ है?

स्कूल के अंदर क्लास दर क्लास खाली कराई जा रही थी। बच्चे लाइन में हाथ एक-दूसरे के कंधे पर रखकर चल रहे थे। टीचर गिनती कर रही थीं—क्लास से निकलते समय, गलियारे में, लाइब्रेरी में, बस के पास। कोई गलती की गुंजाइश नहीं थी। आज एक नाम भी छूटना अपराध था।

सविता ने हर बच्चे की आँख देखी। किसी के घुटने काँप रहे थे, किसी का चेहरा पत्थर जैसा था, कोई बार-बार उल्टी जैसा महसूस कर रहा था। वह जानती थी, हर चोट खून नहीं बहाती। कुछ चोटें आवाज़ तक नहीं करतीं।

एक बच्चा उसके पास आया और बोला, “मैम, मेरा पेट दर्द कर रहा है।”

सविता ने उसका हाथ पकड़ा। “पेट नहीं बेटा, डर दर्द कर रहा है।”

बच्चे ने पहली बार सिर उठाकर उसे देखा।

करीब 11 बजे रेडियो पर वह आवाज़ आई जिसका सब इंतज़ार कर रहे थे।

“खतरा खत्म। हमलावर पकड़ा गया है। व्यवस्थित निकासी जारी रखें।”

कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला। कोई खुशी से चिल्लाया नहीं। कोई ताली नहीं बजी। सबने बस साँस छोड़ी, जैसे पूरा स्कूल इतने समय से साँस रोके खड़ा था।

लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

रीयूनियन ग्राउंड में बच्चों को माता-पिता से मिलाया जाने लगा। पहचान पत्र देखे गए। सूची मिलाई गई। कोई बच्चा बिना पुष्टि के नहीं छोड़ा गया। एक माँ ने जैसे ही अपने बेटे को देखा, वह दौड़कर घुटनों के बल बैठ गई। बच्चे ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी गर्दन में मुँह छिपा लिया।

फिर परी आई।

उसकी बाँह स्लिंग में थी। चेहरा पीला था, पर आँखों में जान लौट आई थी। उसने अपनी माँ का हाथ छोड़ा और सीधे सविता की तरफ़ दौड़ी। आसपास खड़े पुलिसकर्मी उसे रोकना चाहते थे, लेकिन उसकी माँ ने हाथ उठा दिया।

परी ने सविता की कमर पकड़ ली।

“आप सच में वापस आईं,” उसने कहा।

सविता घुटनों पर बैठ गई। “मैंने वादा किया था।”

परी की माँ आगे आईं। उनके होंठ काँप रहे थे, पर शब्द नहीं निकल रहे थे। उन्होंने सविता को गले लगा लिया। कभी-कभी शुक्रिया बहुत छोटा शब्द लगता है। उस पल भी वही हुआ।

परी के पिता ने हाथ जोड़कर कहा, “आपने हमारी बेटी को नया जन्म दिया।”

सविता ने सिर झुका लिया। “मैंने बस अपना काम किया।”

पीछे से इंस्पेक्टर आदित्य की धीमी आवाज़ आई, “नहीं। आपने उससे कहीं ज़्यादा किया।”

तभी सविता ने पहली बार उनकी बाँह देखी। वर्दी खून से भीग चुकी थी।

“आप घायल हैं,” उसने डाँटते हुए कहा।

आदित्य हल्का मुस्कुराए। “हल्की चोट है।”

“आप पुलिस हैं, भगवान नहीं। बैठिए।”

पास खड़े कुछ बच्चे इस बात पर हल्का हँस पड़े। इतने डर के बाद वह छोटी सी हँसी सबके लिए दवा जैसी थी।

सविता ने आदित्य की चोट साफ की, पट्टी बाँधी। वह दर्द छिपाने की कोशिश कर रहे थे, पर चेहरे की सिकुड़न साफ थी।

“आपको पहले बताना चाहिए था,” सविता ने कहा।

आदित्य ने मैदान में बच्चों को माता-पिता से मिलते हुए देखा। “पहले बच्चे।”

कुछ देर बाद प्रिंसिपल मेहरा सभी सूचियाँ लेकर आए। उनकी आँखें लाल थीं। हाथ काँप रहे थे। उन्होंने अंतिम पन्ना देखा, फिर दूसरा, फिर तीसरा। जैसे उन्हें डर हो कि कहीं सच टूट न जाए।

आख़िर उन्होंने बहुत धीमे कहा, “हर बच्चा मिल गया। कोई लापता नहीं है।”

इस बार भी कोई तालियाँ नहीं बजीं। बस मैदान में खड़े सैकड़ों लोगों ने एक साथ रोना शुरू कर दिया। यह जीत की आवाज़ नहीं थी। यह बच जाने की आवाज़ थी।

दोपहर के बाद मीडिया वैन आ गईं। कैमरे, माइक, लाइव रिपोर्टिंग, बड़े-बड़े शब्द—बहादुरी, चमत्कार, हीरो। सब सविता को ढूँढ रहे थे। मगर वह स्कूल के अस्थायी मेडिकल टेंट में बैठी बच्चों की दवाइयाँ बाँट रही थी। किसी को इनहेलर चाहिए था, किसी को चश्मा, किसी को सिर्फ अपनी माँ तक संदेश पहुँचाना था।

एक रिपोर्टर ने पूछा, “मैम, देश आपको हीरो कह रहा है। आप क्या कहना चाहेंगी?”

सविता ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। “जिस बच्चे की दवाई खो गई है, पहले उसकी मदद करवा दीजिए।”

रिपोर्टर चुप हो गया।

उस शाम जब सब बच्चे घर जा चुके थे, सविता पहली बार एम्बुलेंस के पास बैठी। उसके हाथ अचानक काँपने लगे। सुबह से जिन हाथों ने खून रोका था, बच्चों को उठाया था, दरवाज़े खोले थे, पट्टियाँ बाँधी थीं, वही हाथ अब पानी की बोतल भी ठीक से नहीं पकड़ पा रहे थे।

एक पैरामेडिक ने पूछा, “आप ठीक हैं?”

सविता ने आदत से कहा, “हाँ।”

फिर कुछ पल बाद उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। “नहीं।”

यह पहला सच था जो उसने उस दिन अपने लिए बोला।

अगले 3 दिन स्कूल बंद रहा। गलियारे खाली रहे। बच्चों की कॉपियाँ मेज़ों पर खुली पड़ी थीं। बोर्ड पर अधूरा सवाल लिखा था। कैंटीन में उस दिन का मेन्यू अब भी लगा था—राजमा चावल, दही और गुलाब जामुन। जैसे जीवन अचानक बीच वाक्य में रुक गया हो।

काउंसलर बुलाए गए। बच्चे धीरे-धीरे बात करने लगे। कुछ नहीं बोले। एक बच्ची हर तेज़ घंटी पर रो पड़ती। एक लड़का दरवाज़े पर दस्तक सुनकर मेज़ के नीचे छिप जाता। कई माता-पिता रातों को जागते रहते। स्कूल सिर्फ इमारत नहीं था, वह सबके भीतर भी टूटा था।

सविता भी काउंसलिंग में गई। पहले उसने कहा, “मैं ठीक हूँ। मैं नर्स हूँ।”

काउंसलर ने पूछा, “क्या आप सो पा रही हैं?”

सविता चुप रही।

“क्या आवाज़ों से डर लग रहा है?”

उसकी आँखें भर आईं।

“क्या आपको बार-बार वही गलियारा याद आता है?”

सविता ने सिर झुका लिया।

उस दिन उसने सीखा कि दूसरों की चोटें भरने वाले लोग भी अंदर से घायल हो सकते हैं।

3 हफ्ते बाद स्कूल अस्थायी बिल्डिंग में खुला। बच्चे धीरे-धीरे आए। माता-पिता उन्हें पहले से ज़्यादा देर तक गले लगाते रहे। कई बच्चे सीधे मेडिकल रूम की तरफ़ देखने लगे।

दरवाज़े पर सविता खड़ी थी।

एक बच्चा बोला, “नर्स मैम आ गईं।”

दूसरे बच्चों के चेहरों पर थोड़ी राहत लौट आई। बच्चों के लिए सुरक्षा कभी-कभी किसी बड़ी दीवार से नहीं, बल्कि एक पहचाने हुए चेहरे से आती है।

कुछ महीनों तक मेडिकल रूम में भीड़ बढ़ गई। किसी को सिर दर्द, किसी को पेट दर्द, किसी को पानी चाहिए, किसी को बस 5 मिनट बैठना था। सविता हर बच्चे को समय देती। वह समझ गई थी कि डर कभी-कभी बीमारी बनकर आता है, कभी चुप्पी बनकर, कभी बस इस सवाल बनकर—“क्या मैं घर फोन कर सकता हूँ?”

एक दिन परी अपनी माँ के साथ आई। उसकी बाँह अब ठीक हो चुकी थी। उसने सविता को एक कार्ड दिया। उस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—

“नर्स मैम, आपने कहा था आज नहीं। इसलिए मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूँगी।”

सविता ने कार्ड पढ़ा और उसे अपनी मेज़ की दराज़ में रख लिया। वहाँ पहले से कई चीज़ें थीं—बच्चों की ड्रॉइंग, पुरानी राखियाँ, धन्यवाद के नोट, छोटे-छोटे कागज़ जिन पर बच्चों ने दिल बनाए थे। वही उसकी असली मेडल थे।

कुछ महीने बाद राज्य सरकार ने स्कूल स्टाफ, पुलिस, फायर ब्रिगेड और मेडिकल टीम को सम्मानित करने का कार्यक्रम रखा। सविता जाना नहीं चाहती थी। उसने प्रिंसिपल मेहरा से कहा, “मुझे मंच पर खड़े होकर तालियाँ नहीं चाहिए।”

मेहरा ने शांत स्वर में कहा, “यह आपके लिए नहीं है। यह उन बच्चों के लिए है जिन्हें याद रखना चाहिए कि डर से बड़ी चीज़ भी होती है—इंसानियत।”

कार्यक्रम के दिन जब सविता मंच पर गई, तो हॉल में बैठे बच्चे खड़े हो गए। किसी ने नारा नहीं लगाया। कोई शोर नहीं हुआ। बस सैकड़ों छोटे हाथ जुड़ गए।

परी पहली पंक्ति में खड़ी थी। उसकी आँखें चमक रही थीं।

राज्यपाल ने कहा, “आज हम एक नर्स का सम्मान कर रहे हैं।”

सविता ने माइक पकड़ा। कुछ पल वह चुप रही। फिर उसने कहा, “मुझे हीरो मत कहिए। उस दिन हर टीचर हीरो था जिसने दरवाज़े के सामने खड़े होकर बच्चों को बचाया। हर बच्चा हीरो था जिसने डर के बावजूद चुप रहना सीखा। हर पुलिसकर्मी हीरो था जो अंदर गया। हर माता-पिता हीरो थे जिन्होंने इंतज़ार की आग झेली। मैं अकेली नहीं थी। हम सबने मिलकर बच्चों को घर पहुँचाया।”

हॉल में सन्नाटा था।

फिर उसने परी की तरफ़ देखा।

“लेकिन अगर बच्चों को एक बात याद रखनी है, तो बस यह याद रखें—बहादुरी का मतलब डर न लगना नहीं है। बहादुरी का मतलब है, डर लगने के बाद भी किसी को अकेला न छोड़ना।”

कई साल बाद जब उस स्कूल के बच्चे बड़े हुए, तो हर किसी को उस दिन की अलग-अलग चीज़ें याद रहीं। किसी को टूटे शीशे याद रहे। किसी को सायरन। किसी को अँधेरा कमरा। किसी को अपनी माँ की बाँहें।

लेकिन लगभग हर बच्चे को एक आवाज़ साफ़ याद रही—

“पास रहो, मैं हूँ।”

और शायद इसी वजह से उस डरावने दिन की कहानी सिर्फ हमले की कहानी बनकर नहीं रह गई। वह उस नर्स की कहानी बन गई जिसने दरवाज़ा बंद करके खुद को बचा सकती थी, मगर उसने दरवाज़ा खोला, क्योंकि बाहर एक बच्ची मदद माँग रही थी।

उस दिन स्कूल की दीवारों ने गोलियों की आवाज़ सुनी थी, लेकिन बच्चों के दिलों ने एक और आवाज़ सुनी थी—एक स्त्री की शांत, अडिग आवाज़, जो कह रही थी कि इंसानियत अभी ज़िंदा है।

और जब तक वे बच्चे बड़े होकर अपने बच्चों को यह कहानी सुनाते रहे, सविता मिश्रा सिर्फ एक स्कूल नर्स नहीं रही।

वह वह वादा बन गई, जो हर डरे हुए बच्चे को दुनिया से चाहिए होता है—

“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.