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गर्भ में 6 महीने के बच्चे के साथ जब पति ने बारिश में 10,000 यूरो का लिफाफा फेंककर कहा, “इसे लेकर गायब हो जाओ,” तो सास हंसती रही, मगर वह रोई नहीं; बस लिफाफा उठाकर चुपचाप चली गई, और 7 साल बाद वही कागज पूरे परिवार की बर्बादी का पहला सबूत बन गया।

PART 1

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बारिश इतनी बेरहम थी कि जयपुर के सिविल लाइंस वाले सफेद बंगले की सीढ़ियों पर खड़ी गर्भवती राधिका को अपनी ही धड़कनें डूबती हुई सुनाई दे रही थीं, और सामने खड़े अरबपति आर्यन राठौड़ ने उसके हाथ में 10,000 यूरो वाला लिफाफा थमाकर कहा, “इसे रखो और मेरी जिंदगी से निकल जाओ।”

राधिका 6 महीने की गर्भवती थी। उसके पैरों में चप्पल तक नहीं थी। काली नौकरानी वाली सादी वर्दी बारिश से चिपककर उसके शरीर से लिपट गई थी। पेट पर रखे उसके कांपते हाथों के नीचे बच्चा हल्के-हल्के हिल रहा था, जैसे वह भी पूछ रहा हो कि उसका अपराध क्या था।

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बंगले के भीतर रोशनी, संगीत और मेहमानों की हंसी गूंज रही थी। उसी शाम आर्यन की सगाई एक बड़े गुजराती उद्योगपति की बेटी से घोषित की गई थी। अखबार वाले, मंत्री, बैंकर्स, रिश्तेदार, सब मौजूद थे। सबके सामने आर्यन को भारत के ऊर्जा कारोबार का नया चेहरा कहा जा रहा था। किसी ने नहीं जाना कि उसी घर की रसोई में एक औरत उसके बच्चे को पेट में लिए बैठी थी।

आर्यन सफेद कुर्ते-पायजामे में दरवाजे पर खड़ा था। उसके चेहरे पर बेचैनी नहीं, झुंझलाहट थी।

“राधिका, बात समझो,” उसने धीमे मगर कठोर स्वर में कहा, “मेरे परिवार की इज्जत, कारोबार, सब दांव पर है।”

राधिका ने लिफाफे की ओर देखा, फिर अपने पेट की ओर।

“तुम्हें लगता है यह बच्चा कोई गलती है?”

पीछे से उसकी मां, सावित्री देवी राठौड़, आगे बढ़ीं। हीरे का हार, रेशमी साड़ी, माथे पर बड़ी बिंदी और चेहरे पर ऐसा घमंड जैसे दुनिया उनकी मुट्ठी में हो।

“गलती नहीं तो और क्या है?” सावित्री देवी ने हंसकर कहा। “एक कामवाली हमारे खानदान का नाम नहीं ले सकती। पैसा ले, किसी छोटे शहर में चली जा। बच्चे को जन्म देना है तो दे, मगर राठौड़ परिवार से उसका कोई रिश्ता नहीं होगा।”

राधिका की आंखें लाल हो गईं।

“मैं इस घर के शीशे चमकाती थी, तुम्हारी मां के लिए तुलसी की चाय बनाती थी, तुम्हारे मेहमानों की प्लेटें उठाती थी, आर्यन। तुम्हारी दुनिया मैं रोज साफ करती थी। मुझे मत सिखाओ कि यह दुनिया कैसी है।”

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आर्यन का चेहरा सख्त पड़ गया।

“ज्यादा मत बोलो।”

“और तुम मेरे बच्चे को अपने कपड़ों पर लगे दाग की तरह मत देखो।”

सावित्री देवी ने लिफाफा उसके पेट पर धकेल दिया।

“इसमें इतना है कि तेरी औकात बदल जाए। शुक्र मना कि पुलिस नहीं बुला रहे। कल को तू ब्लैकमेल करेगी।”

राधिका ने लिफाफा पकड़ा। 1 पल के लिए उसने उसे सीने से लगाया। फिर वह सीढ़ियों से नीचे उतरी और लिफाफा कीचड़ भरे पानी में फेंक दिया। नोट गीले होकर फैल गए।

“मैं भूखी रह लूंगी,” उसने कहा, “पर अपने बच्चे की कीमत नहीं लगने दूंगी।”

सावित्री देवी का ठहाका बारिश में भी साफ सुनाई दिया।

“गरीब औरत का अभिमान! यही तमाशा रह गया था।”

दरवाजा उसके मुंह पर बंद हो गया।

पर राधिका सचमुच गरीब नहीं थी। राधिका शर्मा वह नाम था जिससे वह इस घर में काम करती थी। उसका असली नाम राधिका मेहता था, दिवंगत फॉरेंसिक ऑडिटर हरिशंकर मेहता की बेटी। उसके पिता की अचानक मौत के बाद उसके चाचा ने कागज बदलकर मेहता कंसल्टिंग हड़प ली थी और राधिका को मानसिक रूप से कमजोर बताकर परिवार से बाहर कर दिया था।

राधिका जयपुर आई थी छिपने के लिए। राठौड़ बंगले में नौकरी उसने मजबूरी में ली थी, पर जल्दी ही समझ गई थी कि ताकतवर लोग नौकरों के सामने अपना असली चेहरा उतार देते हैं। उसने आर्यन के दफ्तर में पड़े फर्जी खातों, शेल कंपनियों, नेताओं को दिए गए पैसों और मजदूरों के भविष्य निधि से खेले गए खेल को देखा था।

आर्यन ने उसी रसोई में उससे प्यार का वादा किया था।

“सौदा पूरा होते ही सबको बता दूंगा,” उसने कहा था।

अब वही आदमी उसे बारिश में फेंक चुका था।

राधिका लड़खड़ाते हुए सड़क तक पहुंची। उसने भीगे हुए लिफाफे को फिर उठा लिया, पैसे के लिए नहीं, सबूत के लिए। बस स्टैंड की पीली रोशनी के नीचे उसने कांपते हाथों से अपने पिता की पुरानी वकील, अधिवक्ता मीरा सक्सेना को फोन किया।

“मीरा आंटी,” उसने टूटती आवाज में कहा, “मैं वापस लड़ने के लिए तैयार हूं।”

फोन के उस पार कुछ पल सन्नाटा रहा।

“अपने चाचा से?”

राधिका ने पेट पर हाथ रखा।

“सबसे। पहले अपनी पहचान वापस लूंगी। फिर अपने बेटे को साबित करूंगी कि उसे इस दुनिया में आने की इजाजत मांगने की जरूरत नहीं थी।”

PART 2

7 महीने बाद, दिल्ली की ठंडी सुबह में राधिका ने एक बेटे को जन्म दिया। उसी दिन अदालत ने उसके चाचा की धोखाधड़ी रद्द कर दी और मेहता कंसल्टिंग की असली उत्तराधिकारी के रूप में राधिका का अधिकार बहाल हुआ।

बच्चे का नाम उसने कबीर रखा।

आर्यन को कोई संदेश नहीं भेजा गया। कोई जन्मपत्री नहीं, कोई फोटो नहीं, कोई गुहार नहीं। बस एक लोहे की तिजोरी में राधिका ने सब रख दिया—भीगा लिफाफा, पुराने संदेश, मेडिकल रिपोर्ट, और वे कागज जो राठौड़ साम्राज्य की नींव हिला सकते थे।

साल बीतते गए। कबीर कागजों, फाइलों और देर रात जलती टेबल लैंपों के बीच बड़ा हुआ। वह शांत बच्चा था, पर उसकी आंखें आर्यन जैसी थीं और सवाल राधिका जैसे।

7 साल की उम्र में एक रात उसने पूछा, “मां, मेरे पापा मर गए हैं?”

राधिका ने सांस रोक ली।

“नहीं।”

“तो वह मुझे देखने क्यों नहीं आए?”

राधिका ने झूठ नहीं बोला।

“क्योंकि उन्होंने तुम्हारे आने से डरना चुना।”

कबीर देर तक चुप रहा, फिर बोला, “जो डरकर बच्चों को छोड़ देते हैं, उन्हें बड़ा आदमी क्यों कहते हैं?”

इसी बीच आर्यन राठौड़ अपने जीवन की सबसे बड़ी डील साइन करने जा रहा था। विदेशी निवेश, सरकारी समर्थन और हजारों करोड़ का अधिग्रहण। पर अंतिम ऑडिट के लिए चुना गया नाम देखकर उसका माथा सिकुड़ गया।

मेहता कंसल्टिंग।

उसी रात सावित्री देवी को पता चला कि उस कंपनी की मालकिन कौन है।

उन्होंने राधिका को फोन किया।

“तो कामवाली ने हिसाब सीख लिया?”

राधिका ने शांत स्वर में कहा, “मैंने झाड़ू उठाने से पहले ही बैलेंस शीट पढ़ना सीख लिया था।”

सावित्री देवी फुफकार उठीं, “अपने नाजायज बच्चे को लेकर हमारे दरवाजे मत आना।”

राधिका की आवाज बर्फ जैसी हो गई।

“इस बार दरवाजा आप नहीं खोलेंगी। अदालत खोलेगी।”

PART 3

राठौड़ एनर्जी ग्रुप का मुख्यालय गुरुग्राम की 38वीं मंजिल पर था, कांच की दीवारों वाला ऐसा टावर जहां से शहर की झुग्गियां भी खिलौनों जैसी दिखती थीं। उसी टावर में आर्यन राठौड़ अपने बोर्ड के सामने मुस्कुराता हुआ खड़ा था। स्क्रीन पर उसका चेहरा चमक रहा था और नीचे लिखा था—नए भारत की ऊर्जा, नया भविष्य।

मेहमानों में पत्रकार थे, निवेशक थे, विदेशी सलाहकार थे, कुछ पुराने मंत्री भी थे। सावित्री देवी पहली कतार में बैठी थीं, जैसे साम्राज्य की महारानी अपने बेटे का राजतिलक देखने आई हो।

आर्यन ने माइक पकड़ा।

“आज राठौड़ ग्रुप केवल एक कंपनी नहीं, बल्कि भारत की प्रगति का प्रतीक बनने जा रहा है।”

तभी उसके निजी सचिव ने कांपते हाथों से फोन आगे बढ़ाया। आर्यन की आंखें स्क्रीन पर टिक गईं। चेहरे का रंग उतर गया।

अधिग्रहण रोक दिया गया था।

कारण था—गंभीर वित्तीय अनियमितताएं, फर्जी राजस्व, छिपे हुए कर्ज, शेल कंपनियां, कर्मचारियों की पेंशन निधि से अवैध निकासी, और गवाहों पर दबाव।

11:40 बजे मीडिया चैनलों ने खबर चला दी। 12:05 बजे शेयर गिरने लगे। 12:30 बजे बैंकों ने क्रेडिट लाइन रोक दी। 1:10 बजे प्रवर्तन निदेशालय और आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारी मुख्यालय में प्रवेश कर चुके थे।

आर्यन ने गुस्से में कहा, “बोर्ड मीटिंग अभी बुलाओ। और पता करो कर्ज किसके हाथ में है।”

सचिव ने धीमे से कहा, “सर, वे लोग आ चुके हैं।”

“कौन?”

“मेहता कंसल्टिंग।”

बोर्डरूम में प्रवेश करते ही आर्यन ठिठक गया।

लंबी कांच की मेज के उस पार राधिका खड़ी थी। गहरे नीले सूट में, बाल सधे हुए, आंखों में 7 साल की आग और 7 साल की चुप्पी। उसके बगल में कबीर था, छोटा-सा, पर सीधा खड़ा। उसके हाथ में प्लास्टिक कवर में सुरक्षित वही पुराना लिफाफा था, पीला पड़ा हुआ, किनारों से मुड़ा हुआ, बारिश की याद से भरा।

आर्यन की कुर्सी पीछे गिर गई।

“यह… नहीं हो सकता,” उसके मुंह से निकला।

कबीर ने धीरे से आगे बढ़कर लिफाफा मेज पर रखा।

“मां कहती हैं, यह आपका है।”

पूरे कमरे में खामोशी छा गई। कुछ बोर्ड सदस्य एक-दूसरे को देखने लगे। कुछ ने आर्यन की आंखों और बच्चे की आंखों के बीच समानता उसी क्षण देख ली।

सावित्री देवी की आवाज चाबुक जैसी गूंजी।

“इस बच्चे को बाहर निकालो।”

मीरा सक्सेना दरवाजे के पास खड़ी थीं। उनके साथ 2 अदालत नियुक्त अधिकारी और 1 फॉरेंसिक टीम सदस्य था।

“कोई बाहर नहीं जाएगा,” मीरा ने कहा। “यह बैठक न्यायिक निगरानी में हो रही है। कोई दस्तावेज नष्ट नहीं होगा, कोई गवाह धमकाया नहीं जाएगा।”

आर्यन ने राधिका को घूरा।

“तुमने क्या किया?”

राधिका ने मेज पर फाइलें रखीं।

“बस वही पढ़ा, जिस पर तुम्हारे हस्ताक्षर थे।”

एक-एक करके कागज खुलते गए। 5 शेल कंपनियों में डाले गए कर्ज। 3 साल तक छिपाए गए घाटे। फर्जी भविष्य राजस्व। कर्मचारियों की पेंशन निधि से निकाली गई रकम। उन छोटे कर्मचारियों के नाम जिन्हें बलि का बकरा बनाने की तैयारी थी। उन ईमेलों के प्रिंटआउट जिनमें आर्यन ने लिखा था कि “मुद्दे को विलय तक दफना दो।”

मुख्य वित्त अधिकारी, निखिल मल्होत्रा, पुलिस अधिकारियों के साथ भीतर आया। उसका चेहरा राख जैसा था। आर्यन ने उसे देखकर दांत भींचे।

“निखिल, इन्हें बताओ कि यह सब गलतफहमी है।”

निखिल ने सिर झुका लिया।

“यह गलतफहमी नहीं है।”

सावित्री देवी चीखीं, “चुप रहो!”

पर मीरा ने रिकॉर्डिंग चला दी। कमरे में आर्यन की आवाज गूंजी।

“नुकसान छिपाओ। बैकअप हटाओ। जरूरत पड़े तो 2 जूनियर कर्मचारियों को आगे कर देना। मैं कुछ अकाउंटिंग एंट्रीज के लिए नहीं गिरूंगा।”

वातानुकूलित कमरे में भी सबके माथे पर पसीना आ गया।

निखिल ने धीमे से कहा, “मैडम सावित्री को सब पता था। उन्होंने ही राधिका मेहता की निगरानी का आदेश दिया था, जब उन्हें समझ आया कि वह कौन है।”

“झूठ!” सावित्री देवी गरजीं।

आर्यन अचानक निखिल की ओर लपका, मगर अधिकारियों ने उसे पकड़ लिया। उस 1 हरकत ने उसके सजे हुए चेहरे से आखिरी नकाब भी उतार दिया।

अब वह उद्योगपति नहीं लग रहा था। वह बस एक डरा हुआ आदमी था, जिसे पहली बार अपनी ही बनाई आग की गर्मी महसूस हो रही थी।

उसने राधिका की ओर देखा।

“राधिका, सुनो। हम बात कर सकते हैं। मैं कबीर को अपना नाम दूंगा। मैं सब ठीक कर दूंगा।”

कबीर ने मां का हाथ पकड़ लिया।

राधिका की आंखें भर आईं, पर आवाज नहीं टूटी।

“उसे नाम की जरूरत नहीं। उसका नाम है।”

“मैं उसका पिता हूं,” आर्यन ने लगभग विनती की।

“तुम उसके पिता तब भी थे जब मैं 6 महीने की गर्भवती बारिश में खड़ी थी। तुम उसके पिता तब भी थे जब तुमने 10,000 यूरो देकर उसे मेरी जिंदगी से मिटाना चाहा। तुम उसके पिता हर उस सुबह थे जब अखबार में अपना चेहरा देखकर भी तुमने यह जानने की कोशिश नहीं की कि कहीं तुम्हारे बेटे का चेहरा तुम जैसा तो नहीं।”

आर्यन की आंखें भीग गईं।

“मैं डर गया था।”

राधिका ने कहा, “मैं भी डरी थी। फर्क इतना था कि मैंने उसे जन्म दिया, तुमने उसे कीमत दी।”

बोर्ड ने उसी दिन आर्यन और सावित्री देवी को सभी पदों से हटाने का प्रस्ताव पास किया। जिन कर्जों को आर्यन ने राहत समझकर साइन किया था, उनकी शर्तों के अनुसार धोखाधड़ी सिद्ध होते ही नियंत्रण ऋणदाताओं को मिलना था। वे ऋणदाता राधिका द्वारा नियंत्रित वैध फंड थे। राठौड़ एनर्जी ग्रुप उसी शाम परिवार के हाथ से निकल गया।

यह बदला नहीं था। यह जलती इमारत से लोगों को बाहर निकालना था।

आर्यन को वित्तीय धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, कर्मचारियों की निधि में हेराफेरी और जांच में बाधा डालने के आरोपों में हिरासत में लिया गया। सावित्री देवी ने कई फोन किए—नेताओं को, पुराने पुलिस अधिकारियों को, पत्रकारों को—पर इस बार किसी ने फोन नहीं उठाया। कुछ सप्ताह बाद गवाहों को धमकाने और दस्तावेज मिटाने की साजिश में उनका नाम भी आरोपपत्र में शामिल हुआ।

मुख्यालय के बाहर पत्रकारों की भीड़ थी। कैमरे राधिका, कबीर और उस पुराने लिफाफे पर टिके थे।

“मैडम मेहता, क्या यह निजी बदला था?” एक पत्रकार ने पूछा।

राधिका ने कांच के दरवाजों के भीतर खड़े कर्मचारियों को देखा। कई लोगों की आंखों में आंसू थे। वे लोग, जिनकी पेंशन, नौकरी, घर और भविष्य कुछ लोगों के अहंकार के कारण मिटने वाले थे।

“बदला कंपनी को डुबो देता,” उसने कहा। “मैं उन लोगों को बचाने आई हूं जिन्हें ये लोग बलि चढ़ाने वाले थे।”

6 महीने बाद राठौड़ एनर्जी का नाम बदलकर मेहता राठौड़ इंडस्ट्रीज रखा गया। स्वतंत्र बोर्ड बना। कर्मचारियों के प्रतिनिधि शामिल किए गए। पेंशन निधि वापस भरी गई। जिन जूनियर कर्मचारियों पर झूठा आरोप लगाने की तैयारी थी, उन्हें सार्वजनिक रूप से निर्दोष घोषित किया गया।

अखबारों ने आर्यन की गिरावट को घमंड की कहानी कहा। सोशल मीडिया पर लोग बंट गए। कुछ बोले राधिका ने 7 साल इंतजार करके वार किया। कुछ बोले, उसने 7 साल खुद को इतना मजबूत बनाया कि सच बोलने पर कोई उसे दबा न सके। हजारों महिलाओं ने लिखा कि उनके जीवन में भी ऐसे दरवाजे बंद हुए थे, जब उन्हें सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत थी।

जयपुर का वही बंगला, जहां कभी राधिका को बारिश में निकाला गया था, अदालत की प्रक्रिया में बिकने लगा। राधिका ने उसे अपने लिए नहीं खरीदा। उसने एक ट्रस्ट के माध्यम से उसे लिया और “नया सवेरा गृह” बना दिया।

जिस ड्रॉइंग रूम में सावित्री देवी बड़े लोगों की मेजबानी करती थीं, वह अब पढ़ाई का कमरा था। जिन अतिथि कमरों में कभी विदेशी मेहमान ठहरते थे, वहां अब अकेली मांएं अपने बच्चों के साथ सुरक्षित रहती थीं। पुरानी रसोई, जहां आर्यन ने राधिका को चुपचाप प्यार के झूठे वादे किए थे, अब सामूहिक रसोई बन गई थी। उसी बरामदे पर, जहां वह नंगे पैर रोई थी, अब बच्चों की गाड़ियों के लिए ढलान बनवाई गई थी।

उद्घाटन के दिन कबीर बहुत देर तक नीले रंग से रंगे उस दरवाजे को देखता रहा।

“मां, यहीं?” उसने पूछा।

राधिका समझ गई।

“हां। यहीं मुझे बाहर निकाला गया था।”

“और अब?”

राधिका ने भीतर भागते बच्चों, फाइल भरती महिलाओं, दूध पीते शिशुओं और मुस्कुराती स्वयंसेविकाओं को देखा।

कबीर ने कहा, “अब हम दरवाजा खोलते हैं।”

राधिका ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“हां, बेटा। अब हम दरवाजा खोलते हैं।”

जेल से आर्यन ने 12 पत्र भेजे। पहले 3 में सफाई थी। अगले कुछ में पुरानी यादों को सुंदर बनाने की कोशिश। आखिरी पत्रों में पहली बार थोड़ा सच था। उसने लिखा कि वह माफी नहीं मांग रहा, क्योंकि माफी मांगने का अधिकार भी कमाना पड़ता है। उसने सिर्फ इतना पूछा कि क्या वह कबीर के जन्मदिन पर उसे एक किताब भेज सकता है।

राधिका ने हर पत्र कबीर को बिना खोले दिया।

“तुम जवाब देने के लिए मजबूर नहीं हो,” वह कहती।

कबीर सिर हिलाता।

“मुझे पता है।”

“और कभी जवाब देना चाहो तो वह भी तुम्हारा अधिकार है।”

“यह भी पता है।”

उस साल कबीर ने जवाब नहीं दिया। अगले साल भी नहीं। राधिका ने दबाव नहीं डाला। उसने समझ लिया था कि सच दरवाजा खोलता है, मगर बच्चे को उस कमरे में धकेला नहीं जा सकता जहां उसकी सांस अभी भारी हो।

2 साल बाद एक वसंत दोपहर, राधिका और कबीर “नया सवेरा गृह” के बगीचे में चल रहे थे। अमलतास के पीले फूल हवा में झूल रहे थे। एक छोटी बच्ची गुब्बारे के पीछे दौड़ रही थी। एक युवा मां बेंच पर बैठी चुपचाप रो रही थी, और एक स्वयंसेविका उसका हाथ पकड़े थी।

जहां कभी राठौड़ परिवार का प्रतीक बना था, वहां अब एक साधारण पट्टिका लगी थी—

“पुनः आरंभ का घर”

कबीर ने अचानक पूछा, “मां, क्या तुम्हें कभी अफसोस होता है कि तुमने उनसे प्यार किया?”

राधिका ठहर गई। यह सवाल आसान झूठ मांगता था, मगर वह अपने बेटे को आसान झूठ नहीं देती थी।

“मुझे अफसोस है कि मैंने खुद से प्यार करना देर से सीखा,” उसने कहा। “उन्हें मैंने उस समय की राधिका बनकर चाहा था—थकी हुई, अकेली, भरोसा करने को तरसती हुई।”

“और अब?”

राधिका ने अपने बेटे को देखा। उसकी आंखें सचमुच आर्यन जैसी थीं, मगर उनमें राधिका की जिद, हरिशंकर मेहता की ईमानदारी और अपनी अलग रोशनी भी थी।

“अब मुझे पता है,” उसने मुस्कुराकर कहा, “कि मेरे जीवन का सबसे बड़ा प्यार वह था, जो मेरे पेट में लात मारकर मुझे याद दिलाता रहा कि मुझे गिरना नहीं है।”

कबीर शर्माकर हंस पड़ा।

“मैं तब से परेशान करता था?”

“बहुत।”

दोनों हंसते हुए आगे बढ़े।

राधिका ने मुड़कर उस बरामदे को देखा। कभी उसे लगता था कि उस रात उससे सब छीन लिया गया था—प्रेम, सम्मान, घर, भविष्य। अब समझ आया कि उस रात उससे सिर्फ भ्रम छीना गया था। शक्ति नहीं।

वह इस घर में नौकरानी बनकर आई थी। अपमान बनकर निकली थी। सच बनकर लौटी थी। और अंत में उसने उसी घर को शरण बना दिया।

लोग अब भी कहते थे कि राधिका ने राठौड़ साम्राज्य छीन लिया। पर राधिका जानती थी, साम्राज्य उसकी जीत नहीं था। इमारतें बिक सकती थीं, शेयर बदल सकते थे, पद गिर सकते थे, नाम मिट सकते थे।

उसकी असली जीत उसके साथ चल रही थी—हाथ में गुब्बारा, आंखों में सवाल, और पूरी जिंदगी सामने लिए।

कबीर ने अपने पिता की जिंदगी बर्बाद नहीं की थी।

उसने बस अपनी मां की कीमत दुनिया को दिखा दी थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.