
भाग 1
CEO की खुली शर्ट के नीचे नीले-काले जख्म देखकर अर्जुन मल्होत्रा के हाथ से पोछा छूट गया, और उसी पल उसे समझ आ गया कि वह या तो अपनी नौकरी खो देगा, या किसी बहुत बड़े राज में फँस जाएगा।
रात के 11:00 बज रहे थे। मुंबई के नरीमन पॉइंट में खड़ी “मेहरा ग्लोबल टावर्स” की 50वीं मंज़िल पर इतनी खामोशी थी कि एसी की आवाज़ भी डर पैदा कर रही थी। अर्जुन सिर्फ एक नाइट सफाईकर्मी था। उसके जूते पुराने थे, घुटने में पुरानी चोट थी, और जेब में बस इतने पैसे थे कि वह घर लौटते वक्त लोकल ट्रेन का टिकट ले सके।
4 दिन बाद कमरे का किराया देना था। 6,500 रुपये कम पड़ रहे थे। उसकी 7 साल की बेटी अनाया की दमा की दवा भी खत्म होने वाली थी। अनाया इस वक्त उनकी पड़ोसन सुनीता आंटी के घर सो रही थी, क्योंकि अर्जुन रात की ड्यूटी करता था। वह सोच रहा था कि अगर शनिवार को ढाबे में बर्तन धोने की शिफ्ट मिल जाए, तो शायद किराया भी निकल जाए और इनहेलर भी।
तभी सिक्योरिटी सुपरवाइज़र सुरेश ने उसे ऊपर भेज दिया था।
“50वीं मंज़िल साफ कर दे। बोर्डरूम के डस्टबिन खाली कर। CEO मैडम के ऑफिस को हाथ मत लगाना। समझा? वहाँ गलती हुई तो सीधा बाहर।”
अर्जुन ने बस सिर हिला दिया था।
लेकिन जब वह आद्या मेहरा के ऑफिस के सामने पहुँचा, दरवाज़ा थोड़ा खुला था। अंदर से रोशनी आ रही थी। उसने सोचा, अगर डस्टबिन भरा मिला और सुबह शिकायत हुई तो उसकी आधी तनख्वाह कट जाएगी।
उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।
कमरे के बीचोंबीच आद्या मेहरा खड़ी थी।
देश की सबसे ताकतवर कारोबारी महिलाओं में से एक। अखबारों में जिसका चेहरा चमकता था। टीवी पर जिसे “भारत की स्टील लेडी” कहा जाता था। वही आद्या मेहरा इस वक्त अपनी पीठ के पीछे हाथ ले जाकर एक कठोर मेडिकल ब्रेस खोलने की कोशिश कर रही थी। उसकी सिल्क की कमीज़ आधी खुली थी। पसलियों के पास गहरे चोट के निशान थे। कमर से सीने तक धातु और पट्टियों वाला ब्रेस उसके शरीर को जकड़े हुए था।
अर्जुन के मुंह से आवाज़ नहीं निकली।
आद्या पलटी।
उसने चीख नहीं मारी। उसने मदद भी नहीं माँगी। बस उसकी आँखों में ऐसा डर चमका जिसे वह तुरंत गुस्से में बदलना चाहती थी।
“बाहर जाओ,” उसने ठंडी आवाज़ में कहा।
अर्जुन पीछे हट गया। दरवाज़ा बंद किया और लगभग भागता हुआ सर्विस लिफ्ट तक पहुँचा।
पूरी रात उसे नींद नहीं आई। सुबह तक उसका कार्ड बंद हो जाएगा, यह तय था। उसने अनाया को देखा, जो पुराने गद्दे पर सोते-सोते खाँस रही थी। उसके पास बैठकर अर्जुन ने बस इतना कहा, “बस कुछ दिन और, बिट्टू। पापा संभाल लेंगे।”
लेकिन अगली रात जब वह ऑफिस पहुँचा, उसका एक्सेस कार्ड हरी बत्ती दिखाकर खुल गया।
सुरेश ने उसे घूरते हुए कहा, “ऊपर बुलाया है। CEO मैडम खुद इंतज़ार कर रही हैं।”
अर्जुन का खून जम गया।
50वीं मंज़िल पर आद्या मेहरा अपने कांच के डेस्क के पीछे बैठी थी। चेहरा शांत था, बाल बंधे हुए थे, कपड़े बेदाग थे। जैसे पिछली रात कुछ हुआ ही न हो।
उसने एक फाइल मेज पर सरकाई।
“मैंने तुम्हारे बारे में सब पता करवा लिया है,” उसने कहा।
अर्जुन ने फाइल खोली। उसमें उसकी तनख्वाह, किराया, अनाया की मेडिकल रिपोर्ट, पत्नी की मौत का कागज़, बैंक बैलेंस, सब कुछ था।
उसका चेहरा अपमान से लाल हो गया।
“गरीब हूँ, मैडम,” वह बोला, “बिकाऊ नहीं।”
आद्या की आँखें पहली बार हल्की काँपीं।
“मुझे बिकाऊ आदमी नहीं चाहिए,” उसने कहा, “मुझे ऐसा आदमी चाहिए जो राज रख सके। और जिसे किसी को बचाने के लिए पैसों की सख्त जरूरत हो।”
अर्जुन कुछ बोलता, उससे पहले ऑफिस का इंटरकॉम बजा। आद्या ने स्क्रीन देखी और उसका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
स्क्रीन पर उसके चाचा और बोर्ड चेयरमैन, राजीव मेहरा, ऊपर आते दिख रहे थे।
आद्या ने अर्जुन की तरफ देखा।
“अगर उन्होंने मुझे इस हालत में देख लिया,” उसने धीमे से कहा, “तो शुक्रवार तक मैं इस कंपनी से बाहर हो जाऊँगी।”
तभी दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ रुक गई।
भाग 2
राजीव मेहरा ने दरवाज़ा खोला और मुस्कुराते हुए अंदर आया, लेकिन उसकी आँखें कमरे की हर चीज़ नाप रही थीं।
“आद्या, इतनी रात को?” उसने कहा। “और यह सफाईकर्मी यहाँ क्यों है?”
आद्या खड़ी होने लगी, पर उसके चेहरे पर दर्द की एक महीन रेखा दौड़ गई। अर्जुन ने तुरंत फाइल उठा ली और डस्टबिन के पास खड़े होकर बोला, “साहब, मैडम ने पुराने पेपर हटाने को कहा था। गलती मेरी थी, देर हो गई।”
राजीव ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“तुम लोग कभी नियम नहीं सीखते।”
वह आद्या के पास गया। “बोर्ड मीटिंग कल सुबह कर दी है। निवेशक भी होंगे। तुम ठीक तो हो न?”
आद्या मुस्कुराई। “मैं हमेशा ठीक होती हूँ।”
लेकिन जैसे ही राजीव बाहर गया, आद्या का हाथ मेज पर कस गया। अर्जुन ने पहली बार समझा कि वह सिर्फ चोट नहीं छिपा रही थी, वह अपने ही परिवार से लड़ रही थी।
फिर आद्या ने सच बताया।
4 महीने पहले उत्तराखंड में उसका हेलिकॉप्टर क्रैश हुआ था। 3 वर्टिब्रा में फ्रैक्चर, 4 पसलियाँ टूटीं। मीडिया को बताया गया कि वह जापान में रिट्रीट पर है। अगर बोर्ड को असली मेडिकल रिपोर्ट मिल जाती, तो कंपनी के क्लॉज़ के अनुसार उसे CEO पद से हटा दिया जाता। राजीव यही चाहता था।
“मुझे तुम्हारी जरूरत है,” आद्या ने कहा। “ड्राइवर बनोगे, असिस्टेंट बनोगे, दवाइयाँ संभालोगे। जब मैं गिरने वाली होऊँ, मुझे पकड़ोगे। बदले में 75,000 रुपये हफ्ते के। तुम्हारी बेटी का पूरा इलाज।”
अर्जुन ने अनाया का चेहरा याद किया।
“मैं झूठ नहीं बोलूँगा,” उसने कहा।
“तुम्हें झूठ नहीं बोलना,” आद्या बोली, “बस सच को समय से पहले मरने नहीं देना।”
अगले 2 हफ्तों में अर्जुन की दुनिया बदल गई। वह सूट पहनकर आद्या के साथ मीटिंग में खड़ा होता। वह उसके दर्द के संकेत पढ़ना सीख गया। उसकी उंगलियाँ मेज पकड़ें तो दवा। आवाज़ धीमी हो तो सहारा। दाहिना कंधा झुके तो ब्रेस कस गया।
लेकिन उसी दौरान अनाया को तेज अटैक आया। अस्पताल में पैसे जमा करने थे। अर्जुन भागना चाहता था, पर उसी दिन बोर्ड मीटिंग थी। आद्या ने बिना कुछ पूछे अपने निजी डॉक्टर को अनाया के पास भेज दिया।
अर्जुन पहली बार उसके सामने चुप हो गया।
रात को राजीव ने सुरेश को पैसे देकर अर्जुन के बैग में आद्या की मेडिकल रिपोर्ट की कॉपी रखवा दी। अगली सुबह बोर्डरूम में वह रिपोर्ट निकली।
राजीव चिल्लाया, “यह आदमी कंपनी का राज बेच रहा था!”
सभी कैमरे अर्जुन पर घूम गए।
और आद्या उसी पल कुर्सी से उठी, पर उसका शरीर जवाब दे गया।
वह सबके सामने गिरने लगी।
भाग 3
अर्जुन ने बिना सोचे आद्या को पकड़ लिया।
बोर्डरूम में बैठे 18 लोग खड़े हो गए। कैमरों की लाल बत्तियाँ चमक रही थीं। विदेशी निवेशक एक-दूसरे को देख रहे थे। राजीव मेहरा की आँखों में जीत की चमक थी, जैसे वह महीनों से इसी क्षण का इंतज़ार कर रहा था।
“देखा?” राजीव ने ऊँची आवाज़ में कहा। “यही सच है! हमारी CEO गंभीर रूप से अक्षम है। और यह सफाईकर्मी, जिसे इसने अपने आसपास रखा, कंपनी के दस्तावेज़ चुरा रहा था। यह सिर्फ मेडिकल कमजोरी नहीं, कॉर्पोरेट धोखा है।”
आद्या का चेहरा दर्द से सफेद था, लेकिन उसकी आँखें अभी भी झुकी नहीं थीं। अर्जुन ने उसे कुर्सी तक पहुँचाया। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं काँपी।
“मेरे बैग में जो रिपोर्ट मिली,” अर्जुन बोला, “वह मैंने नहीं रखी।”
राजीव हँसा। “बिल्कुल। हर चोर यही बोलता है।”
सुरेश दरवाज़े के पास खड़ा था। उसका चेहरा पसीने से भरा था। अर्जुन ने उसे देखा। सुरेश ने नज़रें झुका लीं।
आद्या ने पानी का गिलास उठाया, लेकिन उसकी उंगलियाँ गिलास पकड़ नहीं पा रही थीं। अर्जुन ने गिलास थामा और उसे धीरे से पानी पिलाया। उस छोटे से दृश्य ने कमरे में बैठे लोगों को कुछ सेकंड के लिए खामोश कर दिया। जिस महिला को वे लोहे की मूर्ति समझते थे, वह इंसान थी। और जिस आदमी को वे सफाईकर्मी कहकर नीचे देख रहे थे, वही उसे गिरने से बचा रहा था।
राजीव ने तुरंत आवाज़ ऊँची की।
“अब भावुक नाटक शुरू होगा? आद्या, कंपनी अस्पताल नहीं है। यह कोई परिवार की रसोई नहीं, जहाँ दया से फैसला हो। तुम्हारी हालत छिपाई गई। यह अपराध है।”
“अपराध?” आद्या ने धीमे से कहा।
उसने अपनी साँस संभाली। फिर अपनी सेक्रेटरी नंदिता की तरफ देखा।
“स्क्रीन ऑन करो।”
राजीव का चेहरा तन गया।
“कौन सी स्क्रीन?”
नंदिता ने काँपते हाथों से रिमोट दबाया। बोर्डरूम की बड़ी स्क्रीन पर CCTV फुटेज चला। रात का समय। कॉरिडोर। सुरेश अर्जुन के लॉकर के पास खड़ा था। उसके हाथ में एक भूरे रंग का लिफाफा था। उसने इधर-उधर देखा, फिर अर्जुन के बैग की ज़िप खोली और लिफाफा अंदर रख दिया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सुरेश के होंठ सूख गए।
“साहब… मैं…”
“आगे चलाओ,” आद्या ने कहा।
दूसरा वीडियो चला। पार्किंग बेसमेंट का। राजीव सुरेश को लिफाफा दे रहा था। साथ में नकदी का बंडल।
इस बार कोई नहीं बोला।
राजीव ने खुद को सँभालते हुए कहा, “यह एडिटेड है। यह बेकार चाल है।”
आद्या ने स्क्रीन की तरफ देखा।
“तीसरा वीडियो चलाओ।”
तीसरी रिकॉर्डिंग आवाज़ की थी। राजीव की आवाज़ साफ सुनाई दी।
“मेडिकल रिपोर्ट बोर्ड तक पहुँचनी चाहिए। दोष उस सफाईकर्मी पर जाएगा। आद्या गिरेगी, और कंपनी मेरे हाथ में आएगी।”
इस बार राजीव की मुस्कान गायब हो चुकी थी।
अर्जुन ने आद्या की तरफ देखा। उसे एहसास हुआ कि आद्या सिर्फ चोट से नहीं लड़ रही थी। वह अपने घर के उस आदमी से लड़ रही थी जिसने उसकी माँ की मृत्यु के बाद उसे गोद में खिलाया था, जिसने उसे बेटी कहा था, और अब उसी की कुर्सी के लिए उसे मिटाना चाहता था।
बोर्ड की सबसे वरिष्ठ सदस्य, वीणा राव, धीरे से बोलीं, “आद्या, तुमने यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”
आद्या ने पहली बार कमरे में मौजूद सब लोगों को ध्यान से देखा। उसकी आवाज़ कमज़ोर थी, लेकिन हर शब्द साफ था।
“क्योंकि इस कमरे में लोग ताकत की पूजा करते हैं, इंसान की नहीं। जिस दिन मेरा हेलिकॉप्टर गिरा, डॉक्टर ने कहा था कि मुझे कम से कम 8 महीने आराम चाहिए। उसी शाम राजीव चाचा ने मुझे अस्पताल के कमरे में कहा—‘अब कंपनी मुझे संभालने दो, तुम घर संभालो।’ मैं जानती थी, अगर मेरी रिपोर्ट बाहर गई, तो मेरी मेहनत नहीं देखी जाएगी, सिर्फ मेरी टूटी हड्डियाँ देखी जाएँगी।”
उसने हल्की साँस ली।
“हाँ, मैंने सच छिपाया। लेकिन मैंने कंपनी नहीं छोड़ी। मैंने हर फाइल पढ़ी, हर डील बचाई, हर निवेशक को रोका। मेरे शरीर में चोट थी, दिमाग में नहीं। और अगर इस देश में एक महिला CEO को अपनी टूटी पसलियाँ छिपानी पड़ें ताकि लोग उसकी क्षमता पर सवाल न करें, तो शर्म मुझे नहीं, इस सिस्टम को आनी चाहिए।”
कमरे में बैठे कई लोग नज़रें झुकाने लगे।
राजीव फिर भी हार मानने वाला नहीं था।
“भावनाओं से कानून नहीं बदलता,” उसने कहा। “क्लॉज़ साफ है। गंभीर स्वास्थ्य स्थिति छिपाना पद से हटाने का आधार है।”
तभी बोर्डरूम का दरवाज़ा खुला।
अंदर एक बुजुर्ग डॉक्टर आए। उनके साथ अनाया भी थी, चेहरे पर मास्क, हाथ में छोटा सा हरा गुब्बारा। अर्जुन का दिल धक से रह गया।
“अनाया?” वह घबरा गया। “तुम यहाँ कैसे?”
डॉक्टर ने कहा, “उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। मैडम ने कहा था कि मीटिंग खत्म होने के बाद वह अपने पापा को धन्यवाद कहना चाहती है।”
अनाया धीरे-धीरे अर्जुन के पास आई। उसकी साँस पहले से बहुत बेहतर थी। उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा और आद्या की तरफ देखा।
“आप वही आंटी हैं न, जिन्होंने मेरा अच्छा वाला इनहेलर दिलवाया?” उसने मास्क के पीछे से पूछा।
आद्या का चेहरा पिघल गया।
“हाँ,” उसने धीमे से कहा।
अनाया ने अपने छोटे बैग से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला। “मैंने आपके लिए ड्रॉइंग बनाई है। पापा बोले आप बहुत बहादुर हैं, लेकिन आपको भी कभी-कभी किसी का हाथ पकड़ना पड़ता है।”
बोर्डरूम में बैठे लोग उस कागज़ को देखते रहे। उसमें 3 लोग बने थे। एक लंबा आदमी नीली शर्ट में। एक छोटी लड़की हरे गुब्बारे के साथ। और बीच में एक महिला, जिसकी पीठ पर कुछ अजीब सा बंधा था, लेकिन वह खड़ी थी।
नीचे बच्चे की लिखावट में लिखा था—“जो गिरने से पहले पकड़ ले, वही अपना होता है।”
आद्या ने कागज़ हाथ में लिया। उसकी आँखें भर आईं, लेकिन उसने आँसू गिरने नहीं दिए।
राजीव झुँझलाकर बोला, “यह क्या नाटक है? बच्चे की ड्रॉइंग से कंपनी नहीं चलती।”
अर्जुन पहली बार उसके सामने सीधा खड़ा हो गया।
“कंपनी इंसानों से चलती है, साहब। और इंसान को गिराने वाले लोग कंपनी नहीं बचाते, उसे बेचते हैं।”
राजीव ने उसे थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया, लेकिन उससे पहले वीणा राव ने टेबल पर हाथ मारा।
“बस।”
उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी।
“हमने बहुत सुन लिया। बोर्ड अभी मतदान करेगा। मुद्दा यह नहीं कि आद्या घायल थी। मुद्दा यह है कि क्या उसने कंपनी को नुकसान पहुँचाया। रिकॉर्ड बताता है कि पिछले 4 महीनों में कंपनी का मर्जर सफल हुआ, शेयर वैल्यू 18% बढ़ी, और 3 बड़े क्लाइंट बचे। दूसरी तरफ राजीव मेहरा ने झूठे सबूत लगवाए, कर्मचारी को फँसाया और बोर्ड को गुमराह किया।”
राजीव का चेहरा लाल हो गया।
“तुम लोग भूल रहे हो मैं मेहरा परिवार हूँ!”
आद्या ने उसकी तरफ देखा।
“परिवार वह होता है जो गिरने पर हाथ देता है। कुर्सी खींचने वाला रिश्तेदार हो सकता है, परिवार नहीं।”
मतदान हुआ।
18 में से 16 सदस्यों ने राजीव को तत्काल निलंबित करने और कानूनी कार्रवाई शुरू करने के पक्ष में वोट दिया। 2 लोग चुप रहे। राजीव मेहरा को उसी बोर्डरूम से बाहर ले जाया गया जहाँ वह आद्या को गिराना चाहता था।
लेकिन आद्या ने जीत का जश्न नहीं मनाया।
उसका शरीर अब सच में टूट रहा था। मीटिंग खत्म होते ही उसने कुर्सी की बाँह कसकर पकड़ी। अर्जुन ने तुरंत उसे संभाला।
“बस,” उसने कहा। “अब अस्पताल।”
“नहीं,” आद्या ने कहा, “पहले अनाया को घर छोड़ो।”
“आप पागल हैं क्या?”
अनाया ने मास्क के पीछे से धीरे से कहा, “आंटी, डॉक्टर अंकल के पास जाना चाहिए। पापा जब जिद करते हैं, तो मैं भी यही बोलती हूँ।”
आद्या ने उसे देखा और बहुत दिनों बाद सचमुच मुस्कुराई।
“ठीक है,” उसने कहा। “लेकिन आइसक्रीम के बाद।”
अर्जुन ने हैरानी से उसे देखा।
“आपकी हालत—”
“अर्जुन,” आद्या ने कहा, “मैंने 4 महीने दर्द छिपाया है। 20 मिनट खुशी छिपाने का कोई मतलब नहीं।”
उस शाम पहली बार आद्या मेहरा बिना मीडिया, बिना बोर्ड, बिना सुरक्षा के एक छोटी सी आइसक्रीम दुकान के बाहर बैठी। अर्जुन ने अनाया के लिए पिस्ता कुल्फी ली। अनाया ने आद्या को चॉकलेट कोन पकड़ा दिया।
“आपको मीठा पसंद है?” अनाया ने पूछा।
आद्या ने कोन देखा। “मुझे याद नहीं।”
“तो आज से पसंद कर लो,” अनाया ने कहा।
अर्जुन ने सिर झुका लिया ताकि कोई उसकी आँखों की नमी न देख ले।
अस्पताल में आद्या ने आखिरकार पूरी जाँच करवाई। डॉक्टरों ने सख्ती से कहा कि उसे आराम, फिजियोथेरेपी और नियमित इलाज चाहिए। इस बार आद्या ने विरोध नहीं किया। उसने पहली बार अपने शरीर को दुश्मन की तरह नहीं, घायल साथी की तरह देखा।
अगले हफ्ते कंपनी में आधिकारिक घोषणा हुई। आद्या मेहरा अस्थायी मेडिकल रिकवरी पर जाएँगी, लेकिन CEO पद पर बनी रहेंगी। एक प्रोफेशनल अंतरिम ऑपरेशन टीम बनेगी, जिसकी निगरानी वह करेंगी। बोर्ड ने मेडिकल क्लॉज़ में बदलाव भी किया—किसी नेता की बीमारी या चोट को उसकी अक्षमता मानकर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, जब तक वास्तविक प्रदर्शन प्रभावित न हो।
इस बदलाव की खबर मीडिया में फैल गई।
कुछ ने कहा, “स्टील लेडी टूट गई।”
लेकिन आम लोगों ने कहा, “नहीं, पहली बार वह इंसान लगी।”
उसी दौरान अर्जुन की जिंदगी भी बदल रही थी। उसे कंपनी में स्थायी पद मिला—Executive Operations Liaison। लोग पीठ पीछे कहते थे कि एक सफाईकर्मी इतने बड़े पद पर कैसे आ गया। लेकिन जो लोग सच जानते थे, वे चुप रहते थे। क्योंकि उन्होंने देखा था कि उस आदमी ने ताकतवर लोगों से भरे कमरे में एक घायल महिला को गिरने नहीं दिया।
अनाया का इलाज अच्छे डॉक्टर से शुरू हुआ। उसका दमा नियंत्रण में आने लगा। वे धारावी की तंग खोली से एक छोटे लेकिन साफ 1BHK फ्लैट में शिफ्ट हो गए। पहली रात अनाया ने अपनी नई खिड़की से बाहर देखा और कहा, “पापा, यहाँ हवा डराती नहीं।”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। उसने बस उसे कंबल ओढ़ाया और बहुत देर तक उसके पास बैठा रहा।
3 महीने बाद आद्या ऑफिस लौटी।
वह अब भी पूरी तरह ठीक नहीं थी, लेकिन वह छिप नहीं रही थी। मीडिया के सामने उसने ब्रेस पहना। धीमे कदमों से चली। जब किसी पत्रकार ने पूछा, “क्या यह कमजोरी है?” तो उसने कहा, “कमजोरी चोट नहीं होती। कमजोरी सच से भागना होती है।”
उस दिन पूरे देश में उसका बयान वायरल हुआ।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव बंद कमरों में हुआ।
आद्या अब कर्मचारियों को नाम से बुलाने लगी। सफाईकर्मियों के लिए मेडिकल इंश्योरेंस लागू हुआ। नाइट स्टाफ के बच्चों के लिए शिक्षा फंड बना। पुराने कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को स्थायी सुरक्षा मिली। उसने एक नया नियम बनाया—जो लोग कंपनी को रात में साफ रखते हैं, वे भी उसी कंपनी का हिस्सा हैं, सिर्फ परछाई नहीं।
एक शाम अर्जुन 49वीं मंज़िल के अपने छोटे ऑफिस में बैठा था। मेज पर अनाया की वही ड्रॉइंग फ्रेम में लगी थी। बाहर बारिश हो रही थी। मुंबई की सड़कें चमक रही थीं।
फोन पर आद्या का मैसेज आया।
“अनाया की फिजियो क्लास कैसी रही?”
अर्जुन ने जवाब लिखा, “वह डॉक्टर को समझा रही थी कि डायनासोर को इनहेलर कैसे दिया जाता है।”
कुछ सेकंड बाद आद्या का जवाब आया।
“उसे कल ऑफिस लाओ। बोर्डरूम बहुत गंभीर हो गया है। थोड़ी समझदारी चाहिए।”
अर्जुन हँस पड़ा।
अगले दिन अनाया ऑफिस आई। वही 50वीं मंज़िल, जहाँ कभी अर्जुन डर से काँपता हुआ आया था, अब उसकी बेटी हाथ में हरा गुब्बारा लेकर दौड़ रही थी। उसने आद्या की कुर्सी के पास जाकर पूछा, “आंटी, अब आपकी पीठ दुखती है?”
आद्या ने कहा, “कभी-कभी।”
“तो पापा को बुला लेना। वह गिरने नहीं देते।”
आद्या ने अर्जुन की तरफ देखा।
उस नज़र में आदेश नहीं था। एहसान नहीं था। वहाँ एक अजीब सी शांत कृतज्ञता थी, जिसे शब्दों की जरूरत नहीं थी।
शाम को जब अर्जुन अनाया को लेकर घर लौट रहा था, शहर में ट्रैफिक बहुत था। अनाया पीछे की सीट पर सो गई थी। उसकी साँसें साफ थीं, शांत थीं। कोई सीटी नहीं, कोई डर नहीं।
फोन फिर बजा।
आद्या का संदेश था।
“कॉर्पोरेट कार्ड से आइसक्रीम ले लेना। और हाँ, इस बार मेरे लिए भी चॉकलेट कोन।
— A”
अर्जुन ने शीशे में सोती हुई अनाया को देखा। फिर बारिश से धुली सड़क को देखा।
कभी यही शहर उसे निगलने को तैयार लगता था। हर रोशनी किसी और की लगती थी। हर ऊँची इमारत उसे उसकी औकात याद दिलाती थी। लेकिन आज उसे लगा कि शायद शहर पत्थर का नहीं होता। कभी-कभी उसके भीतर भी कोई दरवाज़ा थोड़ा खुला रह जाता है।
और उस आधे खुले दरवाज़े के पीछे, कोई आदमी सिर्फ राज नहीं देखता।
कभी-कभी वह किसी की टूटी हुई हिम्मत देखता है।
कभी-कभी एक घायल CEO और एक गरीब पिता एक-दूसरे को बचा लेते हैं।
और कभी-कभी, एक छोटी बच्ची का हरा गुब्बारा उन सभी ऊँची इमारतों से ज्यादा बड़ा आसमान बन जाता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.