
PART 1
जिस क्षण सावित्री ने अपने 1 साल के नाती आरव की कलाई छुई, वह पूरे आँगन में चीख उठीं, “उसे अभी उससे दूर रखो!”
लखनऊ के गोमती नगर वाले उस पुराने मगर साफ-सुथरे घर में दोपहर की धूप पीतल के लोटे जैसी चमक रही थी। तुलसी के गमले के पास हल्की अगरबत्ती जल रही थी, रसोई से इलायची वाली चाय की महक आ रही थी, और मीरा ने सोचा था कि महीनों बाद अपनी माँ के घर आकर शायद उसका मन थोड़ा हल्का होगा। लेकिन सावित्री की उस चीख ने सब कुछ चीर दिया।
आरव ने बोलना अभी ठीक से शुरू नहीं किया था। वह बस “मा”, “बा” और अधूरे-से स्वर निकालता था, जिन्हें सुनकर मीरा की सारी थकान पिघल जाती थी। पर उस पल उसका चेहरा सिकुड़ गया। उसकी आँखें फैल गईं, होंठ काँपने लगे, और वह ऐसे रोया जैसे किसी ने उसके भीतर दबा कोई पुराना डर जगा दिया हो।
मीरा ने उसे झट से सीने से लगा लिया।
“माँ, आपको क्या हो गया है? बच्चा डर गया!”
सावित्री वहीं खड़ी रह गईं। उनकी आँखें आरव की कलाई पर अटकी थीं। वह कोई डरपोक औरत नहीं थीं। उन्होंने 27 साल सरकारी अस्पताल के बाल विभाग में नर्स की नौकरी की थी। उन्होंने बुखार में तपते बच्चे देखे थे, झूठ बोलते अभिभावक देखे थे, और वह खामोशी भी पहचानी थी जिसमें दर्द बोल नहीं पाता।
धीरे से उन्होंने कहा, “मीरा, उसकी कलाई देख।”
“क्या देखूँ?”
मीरा चिढ़ी हुई थी। उसे लगा माँ फिर वही कर रही हैं, हर बात में बीमारी, हर बात में खतरा। उसके पति निखिल ने कितनी बार कहा था, “तुम्हारी माँ अस्पताल में काम कर चुकी हैं, उन्हें हर जगह अनहोनी दिखती है। आरव को उनसे दूर ही रखना बेहतर है।”
मीरा ने उस बात पर भरोसा कर लिया था। शायद सुविधा के कारण। शायद थकान के कारण।
सावित्री ने काँपते हाथों से आरव की छोटी-सी कलाई रोशनी की ओर मोड़ी।
तभी मीरा ने देखा।
कलाई पर फीकी, सफेद, गोल-गोल रेखाएँ थीं, जैसे किसी ने बहुत कसकर कोई पट्टी बाँधी हो। चोट नीली नहीं थी, पर निशान बहुत साफ था। अंगूठे के पास भूरा-सा छोटा दाग भी था, जैसे सुई या दबाव का पुराना चिह्न।
मीरा का गला सूख गया।
“शायद खिलौने में फँस गया होगा,” उसने कहा, पर उसकी अपनी आवाज़ उसे झूठी लगी।
सावित्री की आँखें भर आईं। “खिलौने ऐसे निशान नहीं छोड़ते। और जब मैंने हाथ छुआ, इसने कंधा पीछे खींच लिया। जैसे इसे पता हो कि हाथ पकड़कर खींचा जाएगा।”
आरव ने चेहरा मीरा की गर्दन में छिपा लिया। उसका रोना तेज नहीं था। वह थका हुआ रोना था, जैसे 1 साल के बच्चे ने भी सीख लिया हो कि ज्यादा शोर नहीं करना चाहिए।
मीरा दाँतों के दवाखाने में सहायक थी। सुबह 9 बजे निकलती, शाम 7 बजे लौटती। निखिल घर से हिसाब-किताब का काम करता था। सब कहते थे, “कितनी किस्मत वाली हो, पति बच्चा संभालता है।” मीरा भी यही मानती रही। महँगी आया नहीं रखनी पड़ी। सास दूर रहती थीं। माँ को निखिल “बहुत दखल देने वाली” कहता था।
पिछले कुछ हफ्तों से आरव बहुत सोता था। मीरा जब घर लौटती, वह अक्सर बिस्तर पर ढीला पड़ा मिलता। निखिल कहता, “दाँत निकल रहे हैं। बच्चे ऐसे ही होते हैं। तुम काम पर जाती हो, इसलिए हर बात में अपराधबोध पालती हो।”
सावित्री ने पूछा, “जब तू काम पर होती है, इसे कौन संभालता है?”
“निखिल।”
“हर दिन?”
“हाँ, माँ।”
सावित्री ने आँखें बंद कर लीं। “आज ही अस्पताल चलना होगा।”
“सिर्फ 2 निशानों के लिए?”
“निशान से ज्यादा उसकी आँखें बोल रही हैं।”
तभी मीरा का फोन काँपा। निखिल का संदेश था।
“माँ के घर पहुँच गई? जल्दी लौटना। आरव को नींद चाहिए।”
मीरा ने आखिरी वाक्य 3 बार पढ़ा। पहली बार उसे वह चिंता नहीं लगा। वह आदेश लगा।
सावित्री ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा, “बेटी, किसी बड़े आदमी की इज्जत बचाने से पहले बच्चे की जान बचा।”
मीरा ने जैसे-तैसे आरव को गाड़ी की सीट में बैठाया। सावित्री पीछे उसके साथ बैठीं, पुराने लोकगीत की धुन धीमे-धीमे गुनगुनाती रहीं। रास्ते में निखिल का नाम फिर फोन पर चमका।
आरव ने स्क्रीन देखी।
और तुरंत अपने दोनों छोटे हाथों से चेहरा ढक लिया।
मीरा के भीतर कुछ टूट गया।
PART 2
अस्पताल में डॉक्टर ने आरव को सामान्य बुखार वाले बच्चे की तरह नहीं देखा। उसकी कलाई की तस्वीरें ली गईं, छाती सुनी गई, पीठ टटोली गई, आँखों की पुतलियाँ जाँची गईं। मीरा हर सवाल पर छोटी होती गई।
“कभी गिरा था?”
“मुझे नहीं पता।”
“दिन में सबसे ज्यादा किसके साथ रहता है?”
“उसके पिता के साथ।”
खून की जाँच के बाद डॉक्टर लौटीं तो उनके चेहरे पर वह चुप्पी थी जिससे अच्छे लोग भी डर जाते हैं।
“बच्चे के खून में नींद लाने वाली दवा के अंश हैं। इतनी मात्रा अपने-आप नहीं जा सकती।”
मीरा की साँस रुक गई।
सावित्री ने दीवार पकड़ ली।
डॉक्टर ने आगे कहा, “एक पुरानी पसली की चोट भी दिख रही है। यह साधारण गिरने जैसी नहीं लगती।”
मीरा के फोन पर निखिल के संदेश बरस रहे थे।
“कहाँ हो?”
“जवाब दो।”
“मुझे मजबूर मत करो।”
“मेरा बेटा तुरंत घर लाओ।”
मेरा बेटा।
एक बार भी नहीं—आरव कैसा है?
अस्पताल की सामाजिक कार्यकर्ता ने पुलिस को बुलाया। मीरा को घर से जरूरी सामान लेने के लिए सुरक्षाकर्मियों के साथ जाना था। निकलने से पहले सावित्री ने पूछा, “मीरा, जब आरव पैदा हुआ था, निखिल किसी को उसे गोद लेने क्यों नहीं देता था?”
मीरा के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
उसी पल उसे याद आया—निखिल ने 2 डॉक्टरों की मुलाकातें अचानक रद्द कर दी थीं।
और अब उन्हें आरव का कमरा खोलना था।
PART 3
मीरा उस रात अपने घर पत्नी बनकर नहीं लौटी। वह माँ बनकर लौटी थी।
उनके अपार्टमेंट की इमारत वैसी ही थी—नीचे दूधवाले की साइकिल, सीढ़ियों पर चप्पलों की कतार, पड़ोस की खिड़की से आती प्रेशर कुकर की सीटी। दुनिया सामान्य थी, और यही सामान्यता मीरा को चुभ रही थी। जिस घर को वह सुरक्षित समझती रही, वहाँ शायद उसका बच्चा महीनों से डरना सीख रहा था।
निखिल ने दरवाज़ा खुद खोला।
उसने हल्की नीली कमीज़ पहन रखी थी, बाल सँवारे हुए थे, चेहरा वैसा ही शांत जैसे रिश्तेदारों के सामने रहता था। पहले उसने मीरा को देखा, फिर सावित्री को, फिर पीछे खड़े पुलिसकर्मी को।
उसकी मुस्कान मिट गई।
“ये सब तमाशा क्या है?”
सिपाही शांत स्वर में बोला, “हमें बच्चे की चिकित्सकीय जाँच के बारे में आपसे बात करनी है।”
निखिल हँसा, पर वह हँसी सूखी थी। “चिकित्सकीय जाँच? मीरा को तो हर बात में डर लगता है, और इसकी माँ को तो पूरी जिंदगी अस्पताल में बीमारी ही दिखी है।”
सावित्री चुप रहीं। उन्होंने सिर्फ आरव को देखा। निखिल की आवाज़ सुनते ही बच्चा मीरा के कुर्ते में ऐसे धँस गया जैसे कपड़े के भीतर गायब हो जाना चाहता हो।
निखिल ने हाथ बढ़ाया। “दे दो मुझे।”
साधारण वाक्य था, मगर वह आदेश की तरह गिरा।
मीरा पीछे हट गई। “नहीं।”
निखिल की आँखों में अविश्वास चमका। “मीरा, हद मत करो।”
“मैं उसे तुम्हें नहीं दूँगी।”
“वह मेरा बेटा भी है।”
“वह घायल है।”
1 पल को निखिल का चेहरा बदल गया। वहाँ चिंता नहीं थी। वहाँ पकड़े जाने की घबराहट थी।
सिपाही ने घर में रखी दवाइयाँ देखने को कहा। निखिल ने बाँहें बाँध लीं। “आपके पास अनुमति है?”
“हम प्रतीक्षा कर सकते हैं,” सिपाही बोला, “लेकिन बच्चा आज रात यहाँ नहीं रहेगा।”
निखिल मीरा की ओर मुड़ा। “देख रही हो? तुम्हारी माँ ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया। तुम अपनी ही गृहस्थी जला रही हो।”
मीरा काँप रही थी। मगर डर के नीचे अब कुछ और उठ रहा था—वह गुस्सा था, जो महीनों की चुप्पी, तानों, अपमान और शक के नीचे दबा था।
“मेरी गृहस्थी मेरी बाँहों में है,” उसने आरव को कसकर पकड़ते हुए कहा। “और तुम बताओगे इसे क्या हुआ।”
“बच्चे गिरते हैं।”
“इसके खून में नींद की दवा मिली है।”
निखिल चुप हो गया।
बस 2 सेकंड।
पर वही 2 सेकंड मीरा की जिंदगी का फैसला बन गए।
फिर वह झल्लाकर बोला, “हाँ, मैंने दिया था थोड़ा-सा। दिनभर चीखता रहता था। तुम क्या जानो? तुम तो बाहर चली जाती हो। मैं घर पर फँसा रहता हूँ इसके रोने, मल-मूत्र, दूध और नखरों के साथ। मैं बाप हूँ या नौकर?”
“नखरे?” मीरा की आवाज़ टूट गई। “वह 1 साल का बच्चा है।”
“बच्चे भी सिर खा जाते हैं।”
“कौन-सी दवा दी?”
“साधारण सिरप। बच्चों को देते हैं लोग। कोई जहर नहीं दिया मैंने।”
“बिना मुझसे पूछे?”
“तुम होती कब हो पूछने के लिए? तुम आती हो, 1 घंटा माँ बनती हो, फिर रोती हो कि थक गई। दिनभर मैं झेलता हूँ।”
मीरा ने उसे देखा। यही आदमी शादी के समय सबके सामने रोया था। यही आदमी आरव के जन्म पर मिठाई बाँटता फिरा था। यही आदमी रिश्तेदारों से कहता था, “बेटे के बिना मेरा घर सूना था।” यही आदमी बाहर से आदर्श पिता दिखता था।
दिखता था।
यही सबसे बड़ा धोखा था।
“आरव को नौकर नहीं चाहिए था,” मीरा ने कहा, “उसे पिता चाहिए था।”
निखिल आगे बढ़ा। “जुबान संभालकर बात करो।”
सिपाही बीच में आ गया। “दूरी बनाए रखिए।”
सावित्री ने मीरा के कंधे पर हाथ रखा। “बेटी, बच्चे के कपड़े ले ले।”
मीरा आरव का छोटा बैग लेने उसके कमरे में गई। कमरे में बादलों वाले चित्र चिपके थे। हल्के पीले परदे, लकड़ी का पालना, रुई जैसा छोटा तकिया, दीवार पर कृष्णा के बाल रूप की तस्वीर, जिसे निखिल की माँ ने जन्म पर भेजा था। सब कुछ प्रेम की तरह सजाया गया था। पर प्रेम के बीच कोई हिंसा छिपी थी।
मीरा ने दराज खोली—कपड़े, लंगोट, तेल की शीशी, छोटा कंबल। फिर अलमारी के नीचे पीछे धँसा प्लास्टिक का डिब्बा दिखा, जिस पर कोई नाम नहीं था।
उसने उसे खींचा।
ढक्कन खुलते ही उसके हाथ बर्फ हो गए।
अंदर 2 मुलायम पट्टियाँ थीं, जिनमें चिपकने वाली धारियाँ लगी थीं। एक आधी खाली नींद लाने वाली खाँसी की दवा की शीशी। दूसरी खुली हुई। चिपचिपी मापने वाली नली। और एक छोटी डायरी।
मीरा ने डायरी खोली।
“दोपहर 1:30 — बहुत रोया।”
“2:00 — दवा दी।”
“2:40 — सो गया।”
“4:10 — उठा, फिर रोना।”
“मात्रा बढ़ानी होगी?”
“मीरा को नहीं बताना।”
मीरा के मुँह से चीख निकली।
“साहब!”
निखिल दरवाज़े पर आ गया। उसका चेहरा अब सभ्य नहीं था।
“मेरी चीजों को हाथ मत लगाओ।”
सिपाही तुरंत भीतर आया। “पीछे हटिए।”
निखिल तेज-तेज बोलने लगा। “यह सब गलत समझ रही है। बच्चा बहुत मुश्किल था। मैं अकेला आदमी हूँ। औरतें थकें तो समाज सहानुभूति देता है, बाप थके तो अपराधी बना देता है। मैं सिर्फ उसे शांत करता था।”
मीरा ने डायरी को अपनी छाती से लगा लिया। “कलाई की पट्टियाँ क्यों थीं?”
निखिल ने मुँह फेर लिया।
“जवाब दो!” मीरा चीखी।
वह अचानक फट पड़ा। “क्योंकि वह हाथ मारता था! बोतल गिरा देता था! कंप्यूटर के तार खींचता था! मेरा काम खराब करता था! तुम सबको लगता है पैसा पेड़ पर उगता है?”
सावित्री दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनकी आँखें लाल थीं, मगर आवाज़ शांत थी। “तूने बच्चे को बाँधा?”
निखिल ने उन्हें घूरा। “आप बीच में मत पड़िए।”
“बच्चे के शरीर पर पड़े निशानों में मैं जरूर पड़ूँगी।”
निखिल ने जैसे पहली बार महसूस किया कि घर में अब उसकी आवाज़ आखिरी आवाज़ नहीं रही। उसने मीरा की ओर देखा, फिर आरव की ओर, जो सावित्री की गोद में था। आरव चुप था, पर उसकी उँगलियाँ सावित्री की साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़े थीं।
निखिल ने अचानक डिब्बे की तरफ कदम बढ़ाया। शायद सबूत छीनने के लिए। सिपाही ने उसका हाथ पकड़ लिया। दूसरे सुरक्षाकर्मी ने उसे दीवार से दूर किया। निखिल चिल्लाने लगा कि मीरा पागल है, सावित्री ने साजिश की है, कोई उसके बेटे को उससे नहीं छीन सकता।
सीढ़ियों में दरवाज़े खुलने लगे।
एक पड़ोसी औरत ने फुसफुसाकर कहा, “लेकिन वह तो बच्चे को बहुत प्यार करता दिखता था।”
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
हाँ, दिखता था।
उस रात मीरा आरव को लेकर सावित्री के घर गई। अस्पताल से शिकायत दर्ज हुई। बाल संरक्षण अधिकारी आए। डॉक्टरों ने रिपोर्ट तैयार की। आरव की पसली की पुरानी चोट, कलाई के निशान, दवा की मात्रा, डायरी, बोतलें—सब अब कागज पर था। कागज ठंडे थे, पर उनमें एक बच्चे की चुप्पी दर्ज थी।
सावित्री ने मीरा का पुराना कमरा साफ किया। बिस्तर पर धुली चादर बिछाई। आरव के लिए छोटी मच्छरदानी लगाई। रसोई में दलिया चढ़ाया। वह जानती थीं कि खाना घाव नहीं भरता, पर भूखा शरीर न्याय की लड़ाई नहीं लड़ सकता।
आरव देर रात मीरा के सीने पर सोया। हर तेज आवाज़ पर काँप जाता। जब सावित्री पास आतीं, वह पहले उनके हाथ देखता। धीरे-धीरे, जब समझता कि वे हाथ बाँधेंगे नहीं, सहलाएँगे, तब थोड़ा ढीला पड़ता।
मीरा पूरी रात जागती रही। वह आरव की कलाई देखती रही। निशान हल्के थे, शायद कुछ दिनों में मिट जाते। पर उसके मन में वे हमेशा के लिए गहरे छप गए थे।
उसे हर शाम याद आई जब वह घर लौटकर आरव को सोता पाती थी। निखिल कहता, “जगाना मत, आज बहुत रोया है।” वह मुस्कुराकर बच्चे के माथे पर चुम्बन रखती और सोचती—बेचारा थक गया होगा।
वह थका नहीं था।
उसे थका दिया गया था।
अगली सुबह निखिल की माँ का फोन आया। मीरा ने पहले 8 बार नहीं उठाया। 9वीं बार उठाया।
उधर से बिना नमस्ते आवाज़ आई, “तुम मेरे बेटे की जिंदगी बर्बाद कर रही हो।”
मीरा ने शांत स्वर में कहा, “आपके बेटे ने आरव को दवा देकर सुलाया, बाँधा, और चोट पहुँचाई।”
“निखिल थोड़ा चिड़चिड़ा है, यह तुम जानती हो। बच्चा अगर बहुत रोए तो आदमी का दिमाग खराब हो जाता है। तुम भी तो नौकरी करती हो, घर पर रहतीं तो बात यहाँ तक नहीं आती।”
मीरा की उँगलियाँ फोन पर कस गईं। “थकान में मदद माँगी जाती है। बच्चे को बाँधा नहीं जाता।”
“तुम बढ़ा-चढ़ाकर बोल रही हो।”
“अस्पताल की रिपोर्ट है।”
कुछ देर चुप्पी रही। फिर सास की आवाज़ धीमी हुई। “उसे बचपन से बच्चों के रोने की आवाज़ पसंद नहीं थी। छोटी बहन रोती थी तो कमरे से चीजें फेंकता था।”
मीरा सन्न रह गई।
बचपन से।
फिर उन्होंने जानकर भी उसे ऐसे बच्चे के साथ अकेला छोड़ दिया था?
अगले दिनों में सच की परतें खुलती गईं। निखिल के कंप्यूटर से बच्चों को सुलाने वाली दवाओं की खोजें मिलीं। कुछ संदेश मिले, जिनमें वह अपने दोस्त से लिखता था, “यह बच्चा मेरी जिंदगी खा गया है।” दोस्त ने मजाक में लिखा था, “कुछ पिला दे, ढेर हो जाएगा।” निखिल ने जवाब दिया था, “मिल गया उपाय।”
उसने 2 डॉक्टर की मुलाकातें खुद रद्द की थीं। मीरा से कहा था कि डॉक्टर ने समय बदला है। उसने दवाखाने में फोन करके कहा था, “मेरी पत्नी बेवजह घबराती है, मैं पिता हूँ, मैं संभाल लूँगा।”
मीरा को लगा जैसे उसकी आँखों के सामने उसके घर की दीवारें गिर रही हों। वह सोचती रही—क्या वह इतनी अंधी थी? क्या वह माँ कहलाने लायक थी? कैसे नहीं समझी कि आरव का शांत रहना शांति नहीं, डर था?
बाल मनोवैज्ञानिक ने उससे कहा, “गलती उस व्यक्ति की है जिसने हिंसा की। उस व्यक्ति की नहीं जिसे झूठ, नियंत्रण और शर्म से अंधेरे में रखा गया।”
सावित्री ने भी वही बात 100 बार दोहराई। “तूने जिस दिन देखा, उसी दिन चली आई। यही याद रख।”
मुकदमा आसान नहीं था। निखिल ने खुद को थका हुआ पिता बताया। उसके वकील ने कहा, “इरादा नुकसान पहुँचाने का नहीं था।” उन्होंने इसे तनाव, गलती, पालन-पोषण का दबाव कहा। पर डॉक्टर की रिपोर्ट, दवा, पट्टियाँ, डायरी, संदेश—सब आरव की ओर से बोल रहे थे।
क्योंकि आरव अभी बोल नहीं सकता था।
पर उसके शरीर ने बयान दे दिया था।
परिवार न्यायालय की सुनवाई वाले दिन निखिल साफ कपड़ों में आया। उसने माथे पर हल्का तिलक लगाया था, जैसे वह किसी शुभ काम पर आया हो। वह मीरा को देखकर बोला, “अब भी समय है। परिवार बचा लो।”
मीरा ने पहली बार उसकी आँखों में बिना डर के देखा। “परिवार वहीं बचता है जहाँ बच्चा सुरक्षित हो।”
न्यायाधीश ने तस्वीरें देखीं। कमरे में चुप्पी फैल गई। उन गोल निशानों को देखकर किसी ने “साधारण गलती” नहीं कहा।
सावित्री ने गवाही दी। वह सीधी बैठीं, हाथ गोद में टिके हुए। “मैंने 27 साल बच्चों की देखभाल की है। मैंने उस दिन दुर्घटना नहीं देखी। मैंने उस बच्चे की आँखों में सीखा हुआ डर देखा।”
मीरा रोई, पर इस बार शर्म से नहीं। वह उस बच्चे के लिए रोई जिसने बोलना नहीं सीखा था, मगर सहना सीख गया था।
अदालत ने निखिल को आरव से दूर रहने का आदेश दिया। आगे की आपराधिक प्रक्रिया चलनी थी। यह खुशी का क्षण नहीं था। कोई माँ अदालत से मुस्कुराते हुए नहीं लौटती जब उसका बच्चा सबूत बन चुका हो। लेकिन मीरा ने पहली बार साँस ली।
बाहर सावित्री आरव को गोद में लिए खड़ी थीं। वह उनकी चाबी के गुच्छे से खेल रहा था। अचानक उसने खिलखिलाकर हँसा।
वह हँसी मीरा के लिए दवा बन गई।
पर ठीक होना धीमा था। आरव की कलाई के निशान जल्दी मिट गए, डर नहीं। कोई हाथ पकड़कर कपड़ा पहनाता तो वह रो पड़ता। दवा की शीशी देखते ही चेहरा फेर लेता। रात में कभी-कभी चीखकर उठ जाता, जैसे वही कमरा फिर लौट आया हो।
मीरा ने काम से छुट्टी ली। फिर धीरे-धीरे आधे दिन काम पर लौटने लगी, लेकिन अब आरव सावित्री के पास रहता। हर शाम वह घर लौटती तो आरव दौड़कर नहीं आता था; वह पहले उसे देखता, पहचानता, फिर धीरे से हाथ बढ़ाता। मीरा उस छोटे हाथ को अपने माथे से लगा लेती।
उसने मनोचिकित्सक से मिलना शुरू किया। उसे समझ आया कि हिंसा सिर्फ थप्पड़ नहीं होती। जब कोई पति पत्नी को उसकी माँ से दूर करे, पैसे पर निगरानी रखे, उसकी चिंता को पागलपन कहे, हर सवाल को दोष बना दे, तो वह भी कैद है। उसने समझा कि उसने महीनों तक नियंत्रण को “स्वभाव”, अपमान को “थकान” और चुप कराने को “घर की शांति” समझ लिया था।
सावित्री ने उसे कभी दोष नहीं दिया। 1 बार भी नहीं। यही मीरा को भीतर से बचाता रहा। रात को आरव के सो जाने के बाद माँ-बेटी रसोई में बैठतीं। कभी चाय, कभी हल्दी वाला दूध, कभी सिर्फ चुप्पी।
मीरा अक्सर कहती, “मुझे पहले समझना चाहिए था।”
सावित्री जवाब देतीं, “बेटी, तू समझी। और तूने दरवाज़ा बंद नहीं किया, बाहर निकली।”
धीरे-धीरे आरव हाथों से डरना छोड़ने लगा। पहले सावित्री की हथेलियाँ उसे भरोसेमंद लगीं, जिनमें सरसों के तेल और आटे की खुशबू रहती थी। फिर मीरा की। फिर उसके नाना की, जो बरसों अलग रहने के बाद भी यह सुनकर दौड़े चले आए थे और बिना कोई सवाल किए आरव के लिए लकड़ी की छोटी गाड़ी लाए थे।
एक दिन पार्क में आरव ने मिट्टी से उठाया हुआ पत्ता एक अनजान बच्चे को दिया। मीरा ने उस छोटे-से इशारे को देखा और रो पड़ी। दुनिया में भरोसा लौटने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता था?
1 साल बाद आरव के 2 साल पूरे हुए। सावित्री के घर में छोटा-सा जन्मदिन रखा गया। सूजी का हलवा, चॉकलेट केक, रंगीन गुब्बारे, और आरव की पसंद की छोटी खिलौना बस। मीरा ने उन रिश्तेदारों को नहीं बुलाया जिन्होंने कहा था, “बात दबा दो, बच्चा छोटा है, भूल जाएगा।” वह बदला नहीं था। वह आत्मा की सफाई थी।
आरव ने मोमबत्ती देखते ही ताली बजाई। सावित्री ने उसे गोद में उठाया। उसने केक में उँगली डुबोकर अपने गाल पर लगा ली। सब हँसे। मीरा का गला भर आया। इतनी साधारण खुशी भी कभी असंभव लग सकती है, यह उसने उस रात जाना था।
सावित्री ने धीरे से कहा, “जिस दिन मैंने उसकी कलाई छुई थी, मुझे लगा जैसे कोई भीतर से कह रहा हो—चुप मत रहना।”
मीरा ने माँ का हाथ पकड़ लिया। “और मैं उस दिन आने का कार्यक्रम रद्द करने वाली थी।”
“पर तू आई,” सावित्री ने कहा। “कभी-कभी बचाव भी संयोग के कपड़े पहनकर आता है।”
मीरा ने आरव को देखा। उसकी कलाई अब चिकनी थी। उसकी आँखों में चमक थी। वह बिना डर के अपना हाथ आगे बढ़ाकर मीरा के गाल पर चॉकलेट लगा रहा था।
मीरा जानती थी कि अतीत मिटेगा नहीं। वह उन महीनों को वापस नहीं ला सकती जब आरव बोल नहीं पाता था और वह उसके मौन को नींद समझती रही। लेकिन अब जब भी उसका बेटा अपनी छोटी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में फँसाता, वह मन ही मन एक वचन दोहराती—अब कोई मुस्कुराता चेहरा उसके बच्चे की चुप्पी से बड़ा नहीं होगा।
क्योंकि खतरा हमेशा चिल्लाता हुआ नहीं आता।
कभी वह चाय बनाता है।
कभी पड़ोसियों से नमस्ते करता है।
कभी परिवार की तस्वीरों में सबसे आगे मुस्कुराता है।
कभी कहता है, “मैं संभाल लूँगा,” और सब उस पर भरोसा कर लेते हैं।
पर बच्चा बोल न पाए, तब भी उसका शरीर बोलता है। उसकी नींद बोलती है। उसकी आँखें बोलती हैं। उसकी छिपी हुई मुट्ठी बोलती है। उसका अचानक रो पड़ना बोलता है।
और उस दिन मीरा ने समझ लिया था—माँ होना हमेशा सब कुछ पहले से जान लेना नहीं है। कभी-कभी माँ होना उस भयावह सच को स्वीकार करना है कि दुश्मन वही हो सकता है, जिसकी तस्वीर बैठक की दीवार पर सबसे सुंदर फ्रेम में लगी हो।
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