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अंतिम विदाई के कमरे में 2 नन्हे ताबूत रखे थे, तभी दादी ने कहा “ये बच्चे इसके साथ रहने से अच्छा भगवान के पास हैं”, और उसी पल बेटी के पुराने फोन ने माँ पर लगा सबसे भयानक इल्जाम पलट दिया

PART 1

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श्मशान घाट के शांत प्रार्थना कक्ष में, 3 महीने के आरव और अयान के 2 छोटे सफेद ताबूतों के सामने, सावित्री मेहरा ने धीमे लेकिन साफ़ शब्दों में कहा, “ये बच्चे इसके साथ रहने से अच्छा भगवान के पास चले गए।”

पूरा हॉल जैसे पत्थर बन गया।

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नेहा मेहरा वहीं खड़ी रह गई। उसके हाथ सुन्न थे, आँखें सूखी थीं, और सीने के भीतर कोई ऐसी चीख अटकी थी जो बाहर आकर सब कुछ तोड़ सकती थी। सामने फूलों से ढके 2 नन्हे ताबूत रखे थे। वही बच्चे, जिन्हें पाने के लिए उसने 6 साल अस्पतालों के चक्कर काटे थे, अनगिनत इंजेक्शन सहन किए थे, मंदिरों में मन्नतें बाँधी थीं, और हर महीने टूटी उम्मीदों के साथ खुद को संभाला था।

दिल्ली के लोधी रोड स्थित उस अंतिम संस्कार गृह के बाहर ट्रैफिक वैसे ही चल रहा था। लोग ऑटो पकड़ रहे थे, चाय पी रहे थे, मोबाइल पर हँस रहे थे। लेकिन अंदर नेहा की दुनिया 2 सफेद बक्सों में बंद पड़ी थी।

सावित्री मेहरा काली बनारसी साड़ी में बेहद संभली हुई दिख रही थी। माथे पर छोटी-सी बिंदी, गले में मोती की माला, हाथ में रुद्राक्ष की माला। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर रुमाल सूखा था। नेहा ने उस सूखे रुमाल को देखा और समझ गई कि कुछ लोग रोने का अभिनय भी पूजा की तरह करते हैं।

“मैंने सबको पहले ही कहा था,” सावित्री ने फिर कहा, “घर में अनुशासन नहीं, माँ कमजोर, हर बात में अपनी मर्जी। बच्चे ऐसे घरों में कैसे बचते?”

नेहा का मन हुआ कि वह उसके मुँह पर चिल्लाए। कहे कि उसने रातों-रात जागकर दोनों बच्चों की साँसें गिनी थीं। हर दूध की मात्रा डायरी में लिखी थी। हर छींक पर डॉक्टर को फोन किया था। हर रोने पर उन्हें सीने से लगाकर चलती रही थी। मगर गला बंद था।

उसके बगल में उसका पति रोहन खड़ा था। सफेद कुर्ता-पायजामा पहने, आँखें झुकी हुईं। वह गुरुग्राम की एक दवा कंपनी में रीजनल मैनेजर था। लोगों के सामने बोलने में तेज़, मीटिंग में निर्णायक, लेकिन अपनी माँ के सामने हमेशा चुप। आज भी वही चुप्पी उसके चेहरे पर चिपकी हुई थी।

नेहा के माता-पिता जयपुर से रातोंरात आए थे। पिता मनोज शर्मा की मुट्ठियाँ काँप रही थीं। माँ सुनीता अपनी साड़ी के पल्लू में चेहरा छुपाए रो रही थीं। मगर मेहरा परिवार हॉल में ज़्यादा था—चाचा, बुआ, पड़ोसी, कीर्तन मंडली की महिलाएँ, वे सब जो जन्म पर मिठाई लेकर आए थे और आज नेहा से नजरें चुरा रहे थे।

पीछे से किसी ने फुसफुसाया, “3 बच्चे संभालना इसके बस का नहीं था।”

किसी और ने कहा, “सावित्री जी सही कहती थीं।”

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नेहा ने आँखें बंद कर लीं।

तभी एक छोटी हथेली उसकी उँगलियों में फँसी।

वह उसकी 7 साल की बेटी काव्या थी। काली फ्रॉक में, ढीली चोटी, आँखों के नीचे नींद और डर की नीली छाया। उसने नेहा की हथेली 3 बार दबाई। यह उनका गुप्त इशारा था—“मैं तुमसे प्यार करती हूँ।”

“माँ…” काव्या ने फुसफुसाया।

नेहा झुकी भी नहीं थी कि सावित्री फिर बोल उठी।

“मैं मंगलवार और गुरुवार को मदद करने जाती थी। सब जानते हैं। अगर मैं न जाती, तो ये घर कब का टूट जाता। पर कुछ औरतें सलाह नहीं सुनतीं। उन्हें लगता है माँ बनते ही सब आ गया।”

रोहन ने धीमे से कहा, “माँ, बस कीजिए।”

इतना धीमे कि किसी ने सुना भी नहीं।

सावित्री ने बेटे की ओर देखा और बोली, “नहीं बेटा, सच बोलना पाप नहीं। ये बच्चे इसके अहंकार की कीमत चुका गए।”

तभी काव्या ने नेहा का हाथ छोड़ दिया।

वह छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ी। सबकी नजरें उस पर टिक गईं। वह पंडित जी के पास गई, जो मंत्र पढ़ने से पहले ही इस अपमान से जमे खड़े थे।

काव्या ने उनका कुर्ता हल्के से खींचा।

उसकी आवाज़ छोटी थी, मगर पूरे हॉल को चीर गई।

“पंडित जी… क्या मैं सबको दिखा दूँ कि दादी आरव और अयान के दूध में क्या मिलाती थीं?”

सावित्री का चेहरा राख जैसा सफेद पड़ गया।

रोहन ने पहली बार सिर उठाया।

और नेहा को लगा, उसके दर्द की असली शुरुआत अभी हुई है।

PART 2

काव्या ने काँपते हाथों से अपनी पुरानी मोबाइल स्क्रीन खोली। वह मोबाइल नेहा ने उसे गाने सुनने और तस्वीरें लेने के लिए दिया था। स्क्रीन टूटी हुई थी, पर सच साफ़ था।

पहली तस्वीर में सावित्री रसोई में खड़ी थी। मेज पर 2 खुले दूध के बोतल रखे थे। पास में रोहन का काला ऑफिस बैग खुला पड़ा था। सावित्री के हाथ में दवा की सफेद पट्टी थी।

हॉल में सनसनी फैल गई।

“ये बच्ची झूठ बोल रही है,” सावित्री चिल्लाई। “इसे इसकी माँ ने सिखाया है।”

काव्या ने अगली तस्वीर दिखाई। उसमें सावित्री चम्मच से गोली पीस रही थी। तीसरी तस्वीर में वह सफेद पाउडर दूध में डाल रही थी। चौथी में दोनों बोतलें हिला रही थी।

रोहन लड़खड़ाकर आगे बढ़ा।

“माँ… ये कौन-सी दवा थी?”

काव्या ने अपना बैंगनी कॉपी निकाली। उसके पन्नों पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में तारीखें लिखी थीं।

“मंगलवार 14 अप्रैल,” उसने पढ़ा, “दादी ने कहा, अच्छे बच्चे सोते हैं। रोने वाले बच्चे माँ को बेइज्जत कराते हैं।”

नेहा का शरीर बर्फ हो गया।

काव्या ने आखिरी पन्ना खोला।

“मंगलवार 28 अप्रैल। दादी ने कहा, आज रात इन्हें कोई नहीं जगाएगा।”

सावित्री चीखी, “मैंने मारा नहीं! मैं बस उन्हें सुलाना चाहती थी!”

और उसी पल 2 सफेद ताबूतों के सामने पूरा परिवार समझ गया कि मौत अचानक नहीं आई थी। उसे घर की चाबी देकर अंदर बुलाया गया था।

PART 3

कुछ सेकंड तक कोई हिला तक नहीं। फिर शोर फटा—किसी की चीख, किसी की गाली, किसी की सिसकी, किसी की टूटी हुई प्रार्थना। फूलों की गंध अचानक सड़न जैसी लगने लगी। नेहा ने काव्या को अपनी बाँहों में खींच लिया, जैसे अब भी उसे दुनिया से बचाया जा सकता हो।

सावित्री दरवाजे की ओर मुड़ी, पर मनोज शर्मा उसके सामने आकर खड़े हो गए।

“एक कदम भी आगे मत बढ़ना,” उन्होंने कहा।

“हटिए!” सावित्री गरजी। “मैं उनकी दादी हूँ!”

मनोज की आँखें लाल थीं। “दादी नहीं, कातिल।”

रोहन वहीं जमीन पर बैठ गया। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसके भीतर की सारी हड्डियाँ निकाल ली हों। वह अपनी माँ और काव्या के बीच देखता रहा। वही काव्या, जिसे वह बच्ची समझकर चुप कराता था। वही माँ, जिसके हर शब्द को वह अनुभव कहता था। वही पत्नी, जिसे वह हमेशा थकी हुई, भावुक, ज़्यादा सोचने वाली कहकर टाल देता था।

नेहा ने काव्या की ठुड्डी उठाई। “तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताया, बेटा?”

काव्या फूट पड़ी। “मुझे डर था कोई मानेगा नहीं। दादी कहती थीं, अगर मैंने कुछ कहा तो वह मुझे भी हॉस्टल भेज देंगी। वह कहती थीं कि पापा हमेशा उनकी बात मानेंगे।”

नेहा ने उसे सीने से लगा लिया। उस पल उसे समझ आया कि उसके घर में सिर्फ उसके बच्चों को नहीं, उसकी आवाज़ को भी धीरे-धीरे जहर दिया गया था।

पंडित जी ने पुलिस को फोन किया। कुछ ही देर में अंतिम संस्कार गृह के बाहर पुलिस की गाड़ियाँ आकर रुकीं। इंस्पेक्टर अंजलि राठौर अंदर आईं। उन्होंने हॉल, ताबूत, काव्या का चेहरा और सावित्री की आँखें देखीं। उन्हें कहानी सुनाने की जरूरत नहीं पड़ी। सच हवा में तैर रहा था।

काव्या का मोबाइल और बैंगनी कॉपी सबूत के तौर पर लिए गए। इंस्पेक्टर ने बहुत नरमी से उससे बस कुछ सवाल पूछे। फिर नेहा की ओर मुड़कर बोलीं, “हम पोस्टमार्टम रिपोर्ट और टॉक्सिकोलॉजी तुरंत दोबारा खुलवाएँगे। कोई भी घर जाकर दवा, बैग, कैमरा या फोन न छुए।”

सावित्री हँसी। वह हँसी डरावनी थी।

“तुम लोग मुझे फँसा रहे हो। मैं इस परिवार की इज्जत हूँ। मैंने इस घर को संभाला है।”

नेहा ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। “तुमने मेरा घर नहीं संभाला। तुमने उसे निगल लिया।”

जब पुलिस ने सावित्री का हाथ पकड़ा, उसने आखिरी वार किया।

“अगर तुम अच्छी माँ होती, तो मुझे ये सब करना ही नहीं पड़ता।”

पहले नेहा ऐसे शब्दों के सामने टूट जाती थी। वह खुद से पूछती थी—क्या सच में वह कमजोर है? क्या वह सच में बच्चों को संभाल नहीं पाई? क्या उसका थकना अपराध था? पर आज उसके सामने 2 ताबूत थे और काव्या की काँपती उँगलियों में सच। वह नहीं टूटी। वह सिर्फ बोली, “मेरे बच्चों की मौत मेरी थकान से नहीं, तुम्हारे घमंड से हुई है।”

सावित्री को ले जाया गया।

अंतिम संस्कार उस दिन पूरा हुआ, पर शांति नहीं आई। आरव और अयान को निगमबोध घाट पर विदा किया गया। दो छोटी चिताएँ, दो छोटे कपड़े, दो फूलों की मालाएँ। नेहा को याद नहीं कि मंत्र किसने पढ़े। उसे सिर्फ काव्या की पकड़ याद रही, जो उसकी साड़ी का किनारा इतनी कसकर पकड़े थी कि उँगलियाँ सफेद पड़ गई थीं।

अगले दिनों में दिल्ली पुलिस की जाँच ने घर की दीवारों से छिपे हुए सच निकालने शुरू किए। टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट में दोनों बच्चों के खून में नींद की दवा की खतरनाक मात्रा मिली। वह दवा वयस्कों के लिए थी, बच्चों के लिए नहीं। रोहन की कंपनी के सैंपल बैग से गायब पट्टियों का हिसाब मिला। सावित्री के फोन में खोजे गए शब्द मिले—“बच्चा बहुत देर कैसे सोए”, “नींद की गोली दूध में”, “शिशु नींद दवा खतरा”।

मेहरा हाउस, जो बाहर से सम्मानित परिवार का घर लगता था, भीतर से नियंत्रण, अपमान और डर का अड्डा निकला। नौकरानी रेखा ने बयान दिया कि सावित्री कई बार कहती थी, “नेहा को माँ बनना सिखाना पड़ेगा, नहीं तो रोहन की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।” पड़ोसन ने बताया कि उसने कई बार काव्या को रसोई के बाहर सहमा खड़ा देखा था। डॉक्टर ने बताया कि नेहा ने कई बार फोन करके बच्चों की असामान्य नींद को लेकर चिंता जताई थी।

हर बयान ने नेहा के पुराने घाव खोले। हर कागज कह रहा था—तू पागल नहीं थी। तू गलत नहीं थी। तू खतरा महसूस कर रही थी, क्योंकि सच में खतरा था।

रोहन एक शाम घर आया। घर अब घर नहीं था। पालने वैसे ही रखे थे। नीली चादरों पर अब भी छोटे तकियों के निशान थे। दूध की बोतलें धुलकर रखी थीं, जैसे कोई उन्हें फिर भर देगा। नेहा खिड़की के पास बैठी थी। काव्या उसके माता-पिता के साथ जयपुर गई हुई थी, कुछ दिनों के लिए।

रोहन ने आरव की छोटी टोपी हाथ में ली और रो पड़ा।

“मुझे माफ कर दो,” उसने कहा। “मैंने तुम्हारी बात कभी नहीं सुनी। मैंने उसे चाबी दी। मैंने बैग वहीं छोड़ा। मैंने हर बार कहा कि माँ जानती हैं। मैं…”

“तुमने मेरी बात नहीं सुनी,” नेहा ने शांत स्वर में कहा। “यह गलती नहीं थी, रोहन। यह चुनाव था। हर बार तुमने मुझे नहीं, अपनी माँ की सुविधा को चुना।”

वह टूटकर बोला, “मैंने नहीं सोचा था कि वह ऐसा कर सकती है।”

“मैंने भी नहीं सोचा था,” नेहा ने कहा, “लेकिन मैंने महसूस किया था कि वह हमें नुकसान पहुँचा रही है। तुमने मुझे महसूस करने का हक भी नहीं दिया।”

कमरे में लंबी चुप्पी भर गई।

“मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ,” रोहन ने धीरे से कहा।

नेहा ने 2 खाली पालनों की ओर देखा। “मैं अब उस आदमी के साथ नहीं रह सकती, जिसने मेरे बच्चों के ताबूत के सामने भी मेरी तरफ खड़े होने में देर कर दी।”

यह वाक्य किसी चिल्लाहट से ज़्यादा भारी था। उसी दिन उनके बीच विवाह का धागा टूट गया। कागजों पर तलाक बाद में हुआ, पर रिश्ता उसी कमरे में समाप्त हो गया, जहाँ कभी नेहा ने दोनों बच्चों के लिए बादलों वाले परदे लगाए थे।

मुकदमा लगभग 2 साल चला। तब तक काव्या 9 साल की हो चुकी थी। उसने थेरेपी शुरू कर दी थी, पर कुछ डर आसानी से नहीं जाते। उसे दूध की गंध से उल्टी आती थी। वह रात में उठकर नेहा की साँसें सुनती थी। कई बार पूछती, “माँ, दरवाजा बंद है न?” नेहा हर रात उसे कुंडी दिखाती। कहती, “हाँ, अब कोई बिना पूछे अंदर नहीं आएगा।”

अदालत में सावित्री बदली हुई दिखी, पर भीतर से वही थी। सफेद साड़ी, माथे पर चंदन, हाथ में माला। उसके वकील ने कहा, वह “पुराने विचारों वाली दादी” थी, जो बच्चों को सुलाने के घरेलू तरीके समझती थी। उसने कहा कि नेहा मानसिक रूप से कमजोर थी। वह जुड़वाँ बच्चों के दबाव में टूट रही थी। सावित्री ने बस घर बचाने की कोशिश की।

नेहा ने सुना। इस बार उसने आँसू नहीं गिराए। उसे समझ आ चुका था कि हिंसा हमेशा थप्पड़ की आवाज़ नहीं करती। कभी-कभी वह सलाह बनकर आती है। कभी “मैं मदद कर रही हूँ” कहती है। कभी बहू की थकान को अपराध बना देती है। कभी बच्चे की गवाही को कल्पना कह देती है।

फिर काव्या को बुलाया गया।

वह धीरे-धीरे गवाह कक्ष तक गई। उसकी चोटी में नीला रिबन था। उसने पीछे मुड़कर नेहा की ओर देखा। नेहा ने अपनी हथेली उठाई। काव्या ने हवा में 3 बार उँगलियाँ मोड़ीं—उनका वही गुप्त इशारा।

जज ने पूछा, “तुम सच बोलने का मतलब समझती हो?”

काव्या ने कहा, “हाँ। सच वो होता है जिसे बोलते हुए डर लगे, लेकिन फिर भी बोलना पड़े क्योंकि कोई और नहीं बोल रहा।”

अदालत में सन्नाटा छा गया।

काव्या ने अपनी कॉपी के पन्ने पढ़े। मंगलवार, गुरुवार, दादी, पाउडर, बोतलें, बहुत लंबी नींद। उसने बताया कि दादी कहती थीं, “रोने वाले बच्चे घर की औरतों को बदनाम करते हैं।” उसने बताया कि माँ डरती थी, लेकिन पापा कहते थे, “माँ को अनुभव है।” उसने बताया कि आखिरी दिन दादी ने कहा था, “आज रात ये फरिश्तों की तरह सोएँगे।”

तस्वीरें स्क्रीन पर आईं। सावित्री ने पहली बार नजर झुका ली।

नेहा ने उस पल महसूस किया कि सच को बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। कभी वह टूटे फोन की धुंधली फोटो होता है। कभी 7 साल की बच्ची की गलत वर्तनी। कभी एक ऐसा वाक्य, जो अदालत की दीवारों से टकराकर पीढ़ियों की चुप्पी तोड़ देता है।

सावित्री मेहरा को आजीवन कारावास की सजा मिली। अदालत ने कहा कि यह लापरवाही नहीं, नियंत्रण और घमंड से जन्मा अपराध था। फैसले के समय सावित्री ने न नेहा से माफी माँगी, न आरव-अयान के नाम लिए। वह बस चिल्लाती रही कि बहू ने उसका बेटा छीन लिया, परिवार को बदनाम किया, घर की इज्जत मिट्टी में मिला दी।

नेहा ने पहली बार समझा—कुछ लोगों के लिए परिवार प्रेम का नाम नहीं, कब्जे का नाम होता है।

तलाक के बाद रोहन ने काव्या से मिलने की अनुमति माँगी। नेहा ने अदालत और मनोवैज्ञानिक की निगरानी में मुलाकातें स्वीकार कीं। यह क्षमा नहीं थी। यह काव्या को अपने पिता से सच पूछने का अधिकार देना था।

एक मुलाकात में काव्या ने रोहन से पूछा, “जब दादी माँ को बुरा कहती थीं, आप चुप क्यों रहते थे?”

रोहन रो पड़ा। “क्योंकि मैं डरपोक था।”

काव्या ने कुछ देर उसे देखा। फिर बोली, “चुप रहना भी कभी-कभी किसी को चोट पहुँचाने जैसा होता है।”

उस दिन रोहन ने सिर झुका लिया। शायद वही उसकी असली सजा थी—जीते जी अपने मौन की आवाज़ सुनना।

नेहा काव्या को लेकर जयपुर लौट आई। अपने माता-पिता के घर के पास उसने एक छोटा फ्लैट लिया। खिड़की से गुलमोहर का पेड़ दिखता था। सुबह मंदिर की घंटी सुनाई देती थी, शाम को गली में बच्चे क्रिकेट खेलते थे। वहाँ कोई दूसरी चाबी नहीं थी। कोई बिना घंटी बजाए अंदर नहीं आता था। कोई रसोई में खड़ा होकर उसकी माँ होने की योग्यता नहीं तौलता था।

वह आरव और अयान की तस्वीरें साथ लाई। उनकी 2 छोटी टोपियाँ, 2 कंबल, 2 चाँदी के कड़े, बैंगनी कॉपी और वह पुराना फोन। फोन काव्या ने बंद डिब्बे में रख दिया। उसने कहा, “अब इसे सोने दो।”

समय ने जख्म मिटाए नहीं, पर उनके किनारों को थोड़ा मुलायम कर दिया। नेहा ने मातृत्व, शोक और पारिवारिक नियंत्रण पर महिलाओं के समूहों में बोलना शुरू किया। वह कहती, “जब कोई आपके घर में आपकी आवाज़ छोटी करने लगे, उसे संस्कार मत समझिए। जब कोई आपकी थकान को आपकी असमर्थता कहे, उसे अनुभव मत मानिए। और जब कोई बच्चा डरते हुए सच कहे, उसे कल्पना मत कहिए।”

लोग सुनते। कई महिलाएँ रो पड़तीं। कुछ पहली बार मानतीं कि उनके घर में भी “मदद” के नाम पर अपमान हो रहा है। नेहा हर बार काव्या का नाम नहीं लेती, पर हर कहानी में वह बच्ची मौजूद रहती—वह जिसने देखा, लिखा, चुप रही, डरी, फिर भी सही समय पर बोल पड़ी।

एक साल बाद, नेहा और काव्या आरव और अयान की अस्थियाँ विसर्जित करने हरिद्वार गईं। गंगा किनारे सुबह की धूप हल्की सुनहरी थी। पंडित मंत्र पढ़ रहा था। काव्या ने दोनों भाइयों के नाम से फूल पानी में छोड़े।

फूल धीरे-धीरे बहने लगे।

काव्या ने पूछा, “माँ, क्या उन्हें पता है कि मैंने कोशिश की थी?”

नेहा का दिल फिर टूटा, पर इस बार उसमें एक कोमल उजाला भी था।

“उन्हें पता है,” उसने कहा। “उन्हें पता है कि उनकी दीदी ने उन्हें प्यार किया। उन्हें यह भी पता है कि जो काम बड़े लोगों को करना चाहिए था, वह एक छोटी बच्ची ने किया।”

काव्या ने गंगा की ओर देखा। “मैं पहले बोलती तो?”

नेहा ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया। “नहीं। गलती तेरी नहीं थी। तू 7 साल की थी। बच्चों को बचाना बड़ों का काम होता है। उस दिन कई बड़े असफल हुए। तू नहीं।”

काव्या रो पड़ी। नेहा ने उसे सीने से लगा लिया। नदी बहती रही। सूरज ऊपर चढ़ता रहा। दुनिया आगे बढ़ती रही, लेकिन उस सुबह नेहा को लगा कि शायद कुछ दर्द बहना सीख सकते हैं।

आरव और अयान लौटकर कभी नहीं आएँगे। उनके पहले कदम नहीं होंगे, पहला स्कूल नहीं होगा, भाई-बहन की लड़ाइयाँ नहीं होंगी, जन्मदिन पर मोमबत्तियाँ नहीं बुझेंगी। पर उनकी छोटी-सी जिंदगी ने एक मुखौटा फाड़ दिया। उसने दिखा दिया कि बुराई हमेशा अंधेरे चेहरे से नहीं आती। कभी वह दादी बनकर आती है, प्रसाद लाती है, बच्चे को गोद में लेती है, रसोई की चाबी माँगती है और कहती है—“मैं तो बस मदद कर रही हूँ।”

लेकिन सच भी कभी-कभी बहुत छोटा होता है।

वह 3 बार दबाई गई हथेली में छिपा होता है। एक बैंगनी कॉपी में। टूटे हुए फोन की धुंधली तस्वीरों में। 7 साल की बच्ची की काँपती आवाज़ में।

आरव और अयान बोल नहीं सके।

इसलिए उनकी बहन ने उनके लिए बोल दिया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.