
भाग 1:
जिस रात अर्जुन मल्होत्रा अपनी प्रेमिका के लिए हीरों का कंगन खरीदकर घर लौटा, उसी रात उसकी पत्नी और 3 महीने की बेटी उसकी जिंदगी से हमेशा के लिए गायब हो चुकी थीं।
गुरुग्राम के सेक्टर 57 में उसकी 3 मंजिला कोठी हमेशा रोशनी, नौकरों की आवाज़ और बच्ची के रोने से भरी रहती थी। लेकिन उस रात जैसे ही अर्जुन ने मुख्य दरवाजा खोला, अंदर ऐसा सन्नाटा था मानो घर नहीं, किसी ने उसकी आत्मा खाली कर दी हो।
सुबह उसने नंदिनी से कहा था कि उसे जयपुर में बहुत जरूरी कारोबारी बैठक के लिए जाना है। नंदिनी ड्राइंग रूम के कोने में बैठी थी। उसकी गोद में उनकी बेटी मीरा सो रही थी। नंदिनी के बाल बिखरे थे, आंखों के नीचे काले घेरे थे, और उसके चेहरे पर वह थकान थी जिसे अर्जुन रोज़ देखता था, मगर कभी स्वीकार नहीं करता था।
—फिर जा रहे हो? मीरा को रात भर बुखार था।
अर्जुन ने अपनी घड़ी ठीक की।
—नंदिनी, कंपनी ऐसे नहीं चलती। हर बात पर रोना बंद करो।
नंदिनी ने कुछ नहीं कहा। बस मीरा की पीठ सहलाती रही।
अर्जुन ने जाते-जाते बेटी के माथे को छुआ भी नहीं। उसे लगा था कि घर, पत्नी, बच्ची—सब वहीं रहेंगे, जैसे हमेशा रहते हैं। उसे बस अपनी दूसरी जिंदगी जीनी थी, थोड़ी आज़ादी, थोड़ा रोमांच, थोड़ा वह झूठ जिसे वह प्यार समझ बैठा था।
लेकिन वह जयपुर नहीं गया।
वह दिल्ली के वसंत कुंज गया, जहां रिया खन्ना उसका इंतजार कर रही थी।
रिया 29 साल की थी, चमकती हुई, तेज बोलने वाली, और अर्जुन की कमजोरी को पहचान चुकी थी। वह जानती थी कि अर्जुन को तारीफ चाहिए, जिम्मेदारी नहीं। वह जानती थी कि उसे यह सुनना पसंद है कि वह घर की छोटी-छोटी बातों के लिए नहीं बना।
जब अर्जुन ने कार रोकी, रिया ने दरवाजा खोला और मुस्कुराकर बोली।
—तुम्हारा चेहरा बता रहा है कि फिर पत्नी ने बच्ची का बहाना बनाया।
अर्जुन हंस पड़ा।
—हर दिन वही। दूध, दवाई, डायपर, नींद नहीं, मदद करो। आदमी क्या करे?
रिया ने उसका कॉलर ठीक किया।
—आदमी अपनी जिंदगी जीता है। तुम कोई आया नहीं हो।
उस एक वाक्य ने अर्जुन की सारी शर्म मिटा दी।
पूरा दिन वे महंगे मॉलों में घूमते रहे। रिया ने हीरों का कंगन चुना, कश्मीरी शॉल, विदेशी इत्र, सोने की बालियां और एक लाल रेशमी साड़ी जो नंदिनी की 6 महीने की किराने की सूची से भी महंगी थी। अर्जुन ने हर बिल कार्ड से भरा। हर बार मशीन पर रकम देखकर भी उसे कोई झटका नहीं लगा।
दोपहर में वे छतरपुर के एक आलीशान होटल गए। कमरे में रिया ने आईने के सामने खड़े होकर कंगन पहना और कहा।
—तुम्हारी पत्नी ने तुम्हें कभी ऐसे देखा है?
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। वह बस उसके पास जाकर खड़ा हो गया।
शाम को वे महरौली के एक रेस्टोरेंट में बैठे। रिया ने शराब का गिलास उठाया।
—अर्जुन, तुम पैदा ही बड़े लोगों की जिंदगी के लिए हुए हो। बच्चे के रोने और पत्नी की शिकायतों में गलने के लिए नहीं।
अर्जुन ने भी गिलास उठाया।
—मेरी गलती बस इतनी है कि मैंने बहुत जल्दी शादी कर ली।
उसने यह कहते समय एक पल भी नहीं सोचा कि उसी वक्त नंदिनी शायद घर में अकेली बैठी बेटी का तापमान नाप रही होगी।
रात 9 बजे जब वह घर लौटा, कार की पिछली सीट पर चमकदार थैले भरे थे। उसकी कमीज़ पर रिया के इत्र की खुशबू थी और जेब में होटल का बिल। उसने सोचा था नंदिनी शायद नाराज होगी, शायद सवाल करेगी, शायद रोएगी। वह तैयार था झूठ बोलने के लिए।
लेकिन घर में कोई नहीं था।
—नंदिनी?
उसकी आवाज़ दीवारों से टकराकर लौट आई।
ड्राइंग रूम में सोफा नहीं था। बीच की मेज गायब थी। दीवार से शादी की तस्वीर उतार ली गई थी। मीरा के खिलौने, दूध की बोतलें, छोटी गुलाबी चादर, सब गायब था। पूजा घर में नंदिनी की मां की दी हुई चांदी की घंटी तक नहीं थी।
अर्जुन पहले धीरे चला, फिर दौड़ पड़ा।
वह मीरा के कमरे में घुसा।
पालना खाली था।
गद्दा नहीं था।
अलमारी खुली थी, और भीतर सिर्फ एक टूटा हुआ रिबन पड़ा था।
—मीरा!
उसकी चीख खाली कमरे में गूंज गई।
वह अपने कमरे में भागा। नंदिनी की साड़ियां नहीं थीं। उसकी किताबें, दवाइयां, बालों की कंघी, वह नीला मग जिसमें वह हर सुबह चाय पीती थी, सब गायब था। यहां तक कि उसके तकिए की खुशबू भी नहीं बची थी।
रसोई के काउंटर पर सिर्फ एक पीला लिफाफा रखा था।
उस पर लिखा था—
अर्जुन।
उसकी उंगलियां कांप गईं। उसने लिफाफा खोला।
अंदर तलाक के कागज थे, बैंक खातों की कॉपियां, होटल के बिल, गहनों की रसीदें, फोन की बातचीत के स्क्रीनशॉट, रिया के साथ उसकी तस्वीरें, होटल की लिफ्ट में उसकी धुंधली छवि, और अस्पताल के बाहर पार्किंग कैमरे से ली गई एक तस्वीर।
हर झूठ पर पीले पेन से निशान लगाया गया था।
सबसे ऊपर नंदिनी की लिखावट में एक छोटा सा कागज था।
“तुमने दूसरी जिंदगी चुनी। अब उसी में रहो। मीरा को मत ढूंढ़ना। मेरी वकील तुमसे बात करेगी।”
अर्जुन कुर्सी पर बैठ गया। उसे लगा जैसे उसकी छाती पर किसी ने पत्थर रख दिया हो।
तभी लिफाफे के अंदर से एक और कागज गिरा।
वह दक्षिण दिल्ली के उस अस्पताल का आगंतुक रजिस्टर था, जहां मीरा पैदा हुई थी।
उसमें अर्जुन का नाम रात 7:18 बजे लिखा था।
नीचे रात 10:06 बजे रिया खन्ना का नाम था।
अर्जुन के गले में कुछ अटक गया।
अगले पन्ने पर अस्पताल के गलियारे की एक तस्वीर थी। नंदिनी प्रसव कक्ष में थी। उनकी बेटी उसी रात पैदा हुई थी। और तस्वीर में अर्जुन रिया के साथ खड़ा था। उसकी हथेली रिया की कमर पर थी। रिया हंस रही थी। अर्जुन उसके कान में कुछ कह रहा था।
नीचे एक संदेश छपा था, जो उसने उसी रात रिया को भेजा था।
“नंदिनी सो गई है। बच्ची ठीक है। काश उस बिस्तर पर तुम होती।”
अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं।
मीरा के जन्म की रात, जिस रात उसे पिता बनना था, उसने अपने जीवन की सबसे पवित्र घड़ी को धोखे की सबसे गंदी याद बना दिया था।
उसी समय उसका फोन बजा।
रिया का संदेश था।
“सब ठीक है ना? बहुत चुप हो। पत्नी ने नाटक शुरू कर दिया क्या?”
अर्जुन ने खाली घर देखा। फिर खाली पालना। फिर पीला लिफाफा।
पहली बार उसे समझ आया कि नंदिनी घर छोड़कर नहीं गई थी।
वह उसे उस जिंदगी से निकाल चुकी थी, जिसे उसने खुद अपने हाथों से जला दिया था।
तभी मुख्य दरवाजे में चाबी घूमी।
अर्जुन का दिल धड़क उठा। एक पल को उसे लगा नंदिनी वापस आ गई।
दरवाजा खुला।
अंदर उसका छोटा भाई कबीर आया।
कबीर ने खाली घर देखा, फिर अर्जुन के हाथ में लिफाफा।
उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।
—तो मिल गया तुम्हें।
अर्जुन खड़ा हो गया।
—तुझे पता था?
कबीर ने दरवाजा बंद किया।
—हां।
—कहां है नंदिनी? मेरी बेटी कहां है?
कबीर ने सीधे उसकी आंखों में देखा।
—वह वहां है, जहां तुम्हारी झूठी मर्दानगी की पहुंच नहीं होगी।
अर्जुन ने मेज पकड़ ली।
—तूने उन्हें भगाया?
कबीर की आवाज़ शांत थी, मगर उसमें बरसों का गुस्सा था।
—मैंने अपनी भाभी और अपनी भतीजी को बचाया।
अर्जुन के पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।
और तभी बाहर से पुलिस सायरन की आवाज़ आई।
कबीर ने धीरे से कहा।
—और अर्जुन, यह बस शुरुआत है।
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भाग 2:
कबीर ने अर्जुन के सामने एक सफेद लिफाफा रखा और बिना बैठे बोला कि नंदिनी ने यह उसी वक्त देने को कहा था जब अर्जुन पहला सच पढ़ ले। अर्जुन ने कागज खोला तो उसमें नंदिनी की लिखावट थी। उसने लिखा था कि यह फैसला अचानक नहीं था, क्योंकि अर्जुन बहुत पहले चला गया था—हर झूठी बैठक में, हर होटल के बिल में, हर रात जब मीरा रोती रही और वह फोन उल्टा करके सोने का नाटक करता रहा। उसने लिखा था कि मीरा के जन्म की रात वह पानी मांगने उठी थी और दरवाजे की छोटी खिड़की से उसने अर्जुन को रिया के साथ देखा था। उसके शरीर से खून जा रहा था, बच्ची उसकी छाती से लगी रो रही थी, और उसका पति दूसरी औरत को छू रहा था। अर्जुन ने पत्र 3 बार पढ़ा। तीसरी बार अक्षर धुंधले हो गए। अगली सुबह नंदिनी की वकील अदिति राव का फोन आया। उसने बताया कि नंदिनी ने अस्थायी पूर्ण अभिरक्षा, विवाह संपत्ति के दुरुपयोग और भावनात्मक उपेक्षा के आधार पर मामला दर्ज किया है। दोपहर में रिया उसी हीरे के कंगन और लाल साड़ी के साथ अर्जुन के घर आ गई। खाली कमरे देखकर वह हंसी, फिर जब अर्जुन ने रिश्ता खत्म करने को कहा तो उसका चेहरा बदल गया। उसने धमकी दी कि अगर अर्जुन ने उसे छोड़ा तो वह अदालत में ऐसा वीडियो दिखाएगी जिसमें अर्जुन होटल में नशे में कह रहा था कि नंदिनी सब सह लेगी और बच्चे कुछ याद नहीं रखते। शाम तक अर्जुन को एक और तस्वीर मिली—नंदिनी मीरा को गोद में लेकर एक बाल चिकित्सालय से निकल रही थी। तस्वीर रिया ने भेजी थी। अर्जुन का खून जम गया। रिया को नंदिनी का पता मालूम था। कबीर दौड़ता हुआ आया और बोला कि नंदिनी को फिर जगह बदलनी पड़ी। उसी रात एक अनजान नंबर से कॉल आई। फोन उठाते ही नंदिनी की फुसफुसाती आवाज़ आई। वह बोली कि अर्जुन कुछ न बोले, सिर्फ सुने। फिर फोन के पीछे जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज़ आई। बाहर रिया मीठी, जहरीली आवाज़ में कह रही थी कि नंदिनी दरवाजा खोले, क्योंकि उसे वह चीज लौटानी है जो उसने चुराई है।
भाग 3:
अर्जुन के हाथ से फोन लगभग छूट गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसका धोखा किसी दिन उसकी पत्नी और 3 महीने की बेटी के दरवाजे पर खतरे की तरह खड़ा होगा।
नंदिनी की सांसें टूट रही थीं। मीरा की हल्की सिसकियां फोन में सुनाई दे रही थीं।
अर्जुन पहली बार आदेश देने वाले पति की तरह नहीं, डरे हुए आदमी की तरह बोला।
—नंदिनी, बाथरूम में जाओ। दरवाजा अंदर से बंद करो। फोन मत काटना।
नंदिनी की आवाज़ कांपी।
—तुम यहां मत आना। अगर उसे पता चला कि मैंने तुम्हें फोन किया है तो वह पागल हो जाएगी।
—मैं नहीं आ रहा। मैं पुलिस को फोन कर रहा हूं।
उसने दूसरे फोन से 112 मिलाया। फिर अदिति राव और कबीर को संदेश भेजा। वह फोन कान से लगाए खड़ा रहा। हर धक्का उसकी हड्डियों तक पहुंच रहा था।
बाहर रिया की आवाज़ आई।
—नंदिनी, इतना डर क्यों रही हो? तुम्हारा पति तो मुझे ही चाहता था। बस बच्ची की वजह से तुम बीच में अटकी हो।
नंदिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
रिया ने फिर दरवाजा पीटा।
—तुम्हें लगा छिप जाओगी? अर्जुन ने ही मुझे बताया था कि तुम कमजोर हो। तुम जैसी औरतें रोती हैं, लड़ती नहीं।
अर्जुन की आंखें बंद हो गईं।
वह झूठ अब तलवार बनकर नंदिनी के दरवाजे पर खड़ा था।
12 मिनट बाद पुलिस पहुंची, मगर अर्जुन को वह 12 मिनट 12 साल लगे। फोन पर पहले भागते कदमों की आवाज़ आई, फिर किसी पुरुष की कड़क आवाज़।
—दरवाजे से पीछे हटिए!
रिया चीखी।
—यह मेरा मामला है! वह औरत मेरा घर तोड़ रही है!
फिर किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। मीरा जोर से रो पड़ी। अर्जुन की सांस अटक गई।
कुछ क्षण बाद नंदिनी ने फोन उठाया।
—मीरा ठीक है।
उसने इतना कहा और फोन काट दिया।
अर्जुन फर्श पर बैठ गया। उसके सामने वही पीला लिफाफा था। वह अब कागज नहीं था, फैसला था।
अगले दिन अर्जुन खुद अदिति राव के दफ्तर गया। वह पहले आदमी की तरह नहीं गया जो तलाक रोकना चाहता हो। वह उस अपराधी की तरह गया जो सच बोलने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।
उसने पूरा बयान दिया—रिया के साथ रिश्ता, गुप्त खर्च, होटल, झूठी यात्राएं, अस्पताल की रात, छिपाए हुए पैसे, सब। उसने बैंक खाते खोलकर दिखाए। उसने यह भी स्वीकार किया कि रिया के पास घर की अतिरिक्त चाबी थी, क्योंकि उसने खुद उसे दी थी।
अदिति ने उसे ठंडी नजर से देखा।
—आप समझते हैं कि इससे आप अच्छे आदमी साबित नहीं होंगे?
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—मैं अच्छा आदमी साबित होने नहीं आया। मैं बस यह साबित करना चाहता हूं कि अब झूठ नहीं बोलूंगा।
2 हफ्ते बाद पुलिस ने रिया को नोएडा के एक किराए के कमरे से पकड़ा। वहां से नंदिनी के पुराने पते, क्लिनिक के समय, मीरा की तस्वीरें, गाड़ी के नंबर और अस्पताल की वह नीली बच्ची वाली पट्टी मिली जो नंदिनी ने मीरा की याद के लिए संभालकर रखी थी और बाद में पुराने घर से गायब हो गई थी।
कबीर ने अर्जुन को बताया तो वह देर तक कुछ बोल नहीं पाया।
—वह पट्टी उसके पास कैसे पहुंची?
कबीर का जवाब छोटा था।
—तुम्हारी चाबी से।
अर्जुन ने कोई सफाई नहीं दी। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनमें सफाई भी गुनाह जैसी लगती है।
पहली सुनवाई साकेत परिवार न्यायालय में हुई। नंदिनी हल्की पीली सूती साड़ी में आई थी। उसके चेहरे पर पहले वाली कोमलता अभी भी थी, मगर उसके आसपास अब एक दीवार थी। मीरा वहां नहीं थी। अर्जुन ने पहली बार राहत महसूस की कि बच्ची इस कमरे की गंध से दूर है।
न्यायाधीश ने फाइल पढ़ी। फिर नंदिनी से बोलने को कहा।
नंदिनी खड़ी हुई। उसके हाथ कांपे, पर आवाज़ नहीं।
—मैं अर्जुन को मीरा की जिंदगी से मिटाना नहीं चाहती। लेकिन सच यह है कि मीरा के पहले 3 महीने में मैं शादीशुदा होकर भी अकेली मां थी। मेरा शरीर प्रसव के बाद टूट रहा था। मैं रात भर जागती थी। मैं दूध, दवा और डर के बीच जी रही थी। और मेरा पति हमारे पैसे से किसी औरत को होटल, गहने और सपने दे रहा था।
कोर्ट रूम चुप हो गया।
नंदिनी ने एक लंबी सांस ली।
—जिस रात मीरा पैदा हुई, मैंने उसे अस्पताल के गलियारे में उसी औरत के साथ देखा। मैं चाहती तो वहीं चिल्ला सकती थी। लेकिन मेरी बच्ची रो रही थी। उस रात मुझे समझ आया कि मेरे दुख से बड़ा मेरी बेटी का जीवन है। इसलिए मैं गई। बदला लेने नहीं, बचाने।
अर्जुन ने सिर उठा कर नंदिनी को देखा। उसकी आंखों में नफरत नहीं थी। यही बात अर्जुन को और तोड़ गई। वहां सिर्फ थकान थी, जैसे कोई इंसान बहुत देर तक तूफान में खड़ा रहे और अब बस बैठना चाहता हो।
जब अर्जुन की बारी आई, वह मुश्किल से खड़ा हुआ।
—नंदिनी ने जो कहा, सब सच है। मैंने उसे धोखा दिया। मैंने मीरा को जन्म से पहले ही हल्के में लिया। मैं पिता कहलाने लायक नहीं था। मैंने शादी को सुविधा समझा, पत्नी को इंतजार समझा और बच्ची को ऐसी जिम्मेदारी जिसे नंदिनी अकेले उठा लेगी।
न्यायाधीश उसे देखती रहीं।
—आप अदालत से क्या चाहते हैं?
अर्जुन ने धीरे कहा।
—नंदिनी को सुरक्षा। मीरा को स्थिर जीवन। और अगर कभी संभव हो, तो मुझे शर्तों के साथ यह सीखने का मौका कि पिता होना सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, रोज़ की उपस्थिति है।
न्यायालय ने नंदिनी को अस्थायी पूर्ण अभिरक्षा दी। अर्जुन को निगरानी में मुलाकातें, पालन-पोषण की कक्षा, अनिवार्य परामर्श और नंदिनी से सीधे संपर्क पर रोक मिली। पहले वाला अर्जुन इसे अपमान समझता। उस दिन उसे यह दया लगी।
उसकी पहली मुलाकात एक परिवार सहायता केंद्र में हुई। कमरे में प्लास्टिक की रंगीन कुर्सियां थीं, दीवार पर बच्चों की पेंटिंग लगी थीं। जब कर्मचारी ने मीरा को उसकी बांहों में रखा, अर्जुन अकड़ गया।
मीरा बहुत छोटी थी।
या शायद उसने उसे कभी ठीक से देखा ही नहीं था।
उसने बच्ची को ऐसे पकड़ा जैसे कोई टूटी हुई चीज़ हाथ में हो।
—मीरा… बेटा…
मीरा ने आंखें खोलीं। कुछ पल उसे देखा, फिर अपनी मुट्ठी मुंह में डाल ली।
अर्जुन रोना नहीं चाहता था। उसे लगा रोना भी स्वार्थ होगा। फिर भी उसकी आंखें भर आईं।
1 घंटे तक उसने उसे गोद में रखा, दूध की बोतल पकड़ाई, डायपर बदलते समय गलती की, फिर कर्मचारी से सीखा। समय खत्म हुआ तो नंदिनी दरवाजे पर आई। उसने अर्जुन की तरफ सीधे नहीं देखा। बस मीरा को लिया, उसके सिर को सीने से लगाया और मुड़ गई।
अर्जुन ने धीमे से कहा।
—लाने के लिए धन्यवाद।
नंदिनी रुकी नहीं।
लेकिन वह भागी भी नहीं।
महीने धीरे-धीरे बीते। अर्जुन की जिंदगी पहली बार उसके अपने बनाए हुए नतीजों की कैद बन गई। उसने अपनी महंगी कार बेची और पैसे मीरा के नाम खाते में जमा किए। उसने उस कंपनी से दूरी बनाई जहां उसके झूठों को लोग “मर्दों की बात” कहकर हंसते थे। उसने परामर्श लिया। उसने सीखा कि पिता का “मदद करना” शब्द ही गलत है, क्योंकि बच्चा दोनों का होता है। उसने यह भी सीखा कि माफी मांगना आसान है, मगर किसी के भीतर पैदा हुए डर को मिटने में साल लगते हैं।
रिया को अदालत से नंदिनी, मीरा, कबीर और अर्जुन से दूर रहने का आदेश मिला। उसे अनिवार्य मानसिक उपचार और निगरानी में रिहाई मिली। अर्जुन ने सोचा था यह सुनकर उसे शांति मिलेगी, मगर शांति नहीं आई। क्योंकि नंदिनी अभी भी घर बदलती रही, क्लिनिक का रास्ता बदलती रही, खिड़कियां जांचती रही।
तब अर्जुन को समझ आया कि धोखा सिर्फ रिश्ता नहीं तोड़ता, इंसान का सुरक्षित महसूस करने का अधिकार भी चुरा लेता है।
4 महीने बाद उसकी मुलाकातें थोड़ी बढ़ीं। 6 महीने बाद वह मीरा के साथ केंद्र के आंगन में बैठ सकता था। वह एक छोटी डायरी रखता, जिसमें मीरा की हर बात लिखता।
मीरा को छत का पंखा पसंद था।
ठंडे गीले कपड़े से उसे गुस्सा आता था।
जब कोई छींकता तो वह हंसती थी।
वह चम्मच को हथियार की तरह पकड़ती थी।
एक दिन अर्जुन 10 मिनट पहले केंद्र पहुंच गया। नंदिनी पहले से वहां बैठी थी। मीरा उसकी गोद में थी। दोनों एक-दूसरे को देखकर रुक गए। कर्मचारी घबरा गई, पर नंदिनी ने हाथ से इशारा किया कि सब ठीक है।
अर्जुन ने दूरी बनाकर कहा।
—मैं जल्दी आ गया। माफ करना।
—हां, देखा।
मीरा ने अर्जुन की आवाज़ सुनी। उसने सिर घुमाया और मुस्कुरा दी।
वह छोटी, बिना दांतों वाली, पूरी मुस्कान थी।
अर्जुन के भीतर कुछ टूटकर बहने लगा।
नंदिनी ने भी वह मुस्कान देखी।
—पहचानती है तुम्हें।
अर्जुन ने बहुत धीरे पूछा।
—सच?
—बच्चे उन लोगों को पहचानते हैं जो बार-बार आते हैं।
यह वाक्य आशीर्वाद भी था और चेतावनी भी।
अर्जुन ने कहा।
—मैं आता रहूंगा।
नंदिनी ने उसकी आंखों में देखा।
—यह बात अस्पताल में भी कह सकते थे।
अर्जुन चुप हो गया।
नंदिनी ने मीरा को गोद में ठीक किया।
—अब वादा मत करो। कैलेंडर को बोलने दो।
और अर्जुन ने पहली बार सचमुच कैलेंडर को बोलने दिया।
1 साल तक वह समय पर आया। पैसे समय पर जमा किए। बीमारी में डॉक्टर के पास पहुंचा। नंदिनी को सिर्फ पालन-पोषण वाले ऐप पर जरूरत की बात लिखी। कोई लंबा भावुक संदेश नहीं। कोई दबाव नहीं। कोई “मैं बदल गया हूं” का भाषण नहीं। बस उपस्थितियां, तारीखें, रसीदें, दवाइयां, डायपर और इंतजार।
धीरे-धीरे नंदिनी ने तस्वीरें भेजनी शुरू कीं।
“मीरा को खिचड़ी पसंद नहीं।”
“आज उसने ताली बजाई।”
“आज 3 कदम चली।”
अर्जुन ने तीसरा संदेश पढ़कर पार्किंग में रोया। उसने मीरा के पहले कदम खो दिए थे। लेकिन नंदिनी ने, चाहती तो छिपा सकती थी, फिर भी वीडियो भेजा।
यह माफी नहीं थी।
यह सीमा के साथ दी गई उदारता थी।
तलाक 14 महीने बाद पूरा हुआ। कोई चिल्लाहट नहीं हुई। कोई नाटक नहीं। बस दस्तखत हुए और उस रिश्ते का कानूनी अंत हुआ जिसे अर्जुन बहुत पहले मार चुका था।
बाहर बरामदे में नंदिनी रुक गई। शाम की धूप उसके चेहरे पर थी।
—मैं तुमसे नफरत नहीं करती, अर्जुन।
अर्जुन की आंखें भर आईं।
—तुम्हें पूरा हक था।
—मुझे पता है। लेकिन मैं मीरा को ऐसे घर में नहीं पालना चाहती जहां नफरत का भी अलग कमरा हो।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—तुमने मुझे जितनी आजादी दी, मैं उसके लायक नहीं था।
नंदिनी ने थकी हुई मुस्कान के साथ कहा।
—मैंने तुम्हें आजादी नहीं दी। मैंने खुद को दी।
वह मुड़ी। फिर कुछ सोचकर उसने हाथ बढ़ाया।
यह प्यार नहीं था।
यह वापसी नहीं थी।
यह विदाई थी।
अर्जुन ने उसका हाथ थामा। वह हाथ अब भी गर्म था। परिचित था। मगर अब उसका नहीं था।
—अलविदा, अर्जुन।
—अलविदा, नंदिनी।
उस रात अर्जुन अपने खाली घर लौटा। उसने मीरा के लिए एक कमरा बनाया। दीवार को हल्का पीला रंग दिया। छोटी अलमारी लगाई। किताबें खरीदीं। एक लकड़ी का पलंग लगाया। यह दिखावे के लिए नहीं था। यह उस जगह के लिए था जहां वह बेटी को सच में जगह दे सके।
मीरा 3 साल की हुई तो कुछ रविवार उसके साथ बिताने लगी। 4 साल की हुई तो स्कूल के छोटे कार्यक्रमों में नंदिनी और अर्जुन एक ही पंक्ति में बैठ सकते थे बिना हवा में पुराने जहर के। 5 साल की हुई तो उसका जन्मदिन नंदिनी के नए घर में मनाया गया। केक पर छोटे हाथी बने थे, गुब्बारे टेढ़े लगे थे, और कबीर ने रसोई में पराठे जलाकर सबको हंसा दिया।
मीरा आंगन में दौड़ती हुई चिल्लाई।
—मेरे सारे खास लोग यहां हैं!
नंदिनी और अर्जुन ने एक-दूसरे को देखा।
दोनों हंस पड़े।
इसलिए नहीं कि अतीत मिट गया था।
कुछ भी नहीं मिटता।
भरोसा किसी नल की तरह वापस नहीं खुलता। वह बूंद-बूंद लौटता है, अगर लौटे तो।
उस शाम केक काटने के बाद नंदिनी रसोई में खड़ी थी। उसके गाल पर क्रीम लगी थी। अर्जुन ने अपनी ही गाल पर इशारा किया।
—यहां लगा है।
नंदिनी ने गलत तरफ साफ किया।
—अब?
—नहीं।
वह हंसी।
सचमुच हंसी।
वही हंसी जिसे अर्जुन ने अपने अहंकार के शोर में खो दिया था।
मीरा दौड़कर आई और दोनों की टांगों से लिपट गई।
—मम्मा, पापा, मेरा नया खिलौना देखो!
कुछ पल के लिए वे 3 लोग एक ही फ्रेम में थे—एक ऐसी तस्वीर, जिसकी कल्पना उस रात असंभव लगती थी जब अर्जुन ने खाली घर और पीला लिफाफा पाया था।
नंदिनी ने नीचे मीरा को देखा, फिर अर्जुन की तरफ। उसने कुछ नहीं कहा कि सब माफ है। उसने यह भी नहीं कहा कि अतीत अब मायने नहीं रखता।
बस उसकी उंगलियां अर्जुन की उंगलियों के पास आकर ठहर गईं।
छूना बहुत हल्का था।
लेकिन इस बार वह डर नहीं था।
न मजबूरी थी।
न आदत।
वह चुनाव था।
और अर्जुन ने समझ लिया कि असली चमत्कार यह नहीं था कि उसे अपना परिवार वापस मिल गया।
असली चमत्कार यह था कि नंदिनी ने अपने लिए ऐसी जिंदगी बना ली थी जिसमें उसे अर्जुन की जरूरत नहीं थी…
फिर भी 1 दिन, जब अर्जुन ने सच, समय और पश्चाताप से दरवाजे के लायक होना सीखा, नंदिनी ने वह दरवाजा थोड़ा-सा खोल दिया।
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