
PART 1
रसोई के ठंडे संगमरमर पर टूटी टांग के साथ पड़ी नंदिनी ने अपने पति आरव को यह कहते सुना, “मम्मी ने बस तुम्हें तुम्हारी औकात समझाई है।”
उसकी दाहिनी टांग घुटने के नीचे अजीब तरह मुड़ गई थी। दर्द इतना तेज था कि उसकी सांसें गले में अटक रही थीं। जयपुर के वैशाली नगर की उस बड़ी, चमचमाती कोठी में हर चीज महंगी थी—पीतल के दीपक, इटालियन टाइलें, शीशम की डाइनिंग टेबल, दीवार पर लगे परिवार के मुस्कुराते फोटो। बस नंदिनी की चीख की कोई कीमत नहीं थी।
सावित्री देवी, उसकी सास, हाथ में वही बेलन पकड़े खड़ी थीं जिससे वह हर रविवार पराठे बेलती थीं। आज उसी बेलन ने नंदिनी की टांग पर पूरी ताकत से वार किया था। ससुर महेन्द्रनाथ सिंक के पास खड़े थे, हाथ में गीला कपड़ा, आंखें झुकी हुईं। उन्होंने सब देखा था, लेकिन उनके चेहरे पर डर से ज्यादा चुप्पी थी।
“आरव… एम्बुलेंस बुला दो,” नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा।
आरव ऑफिस से अभी-अभी लौटा था। वह एक प्राइवेट बैंक में रिलेशनशिप मैनेजर था। बाहर की दुनिया में वह शांत, पढ़ा-लिखा, संस्कारी पति माना जाता था। घर के भीतर उसका यही शांत चेहरा आदेश बन जाता था।
“तुमने फिर मम्मी से बहस की?” उसने पूछा।
नंदिनी के भीतर कुछ टूट गया। 32 साल की नंदिनी दिल्ली में पली थी, जयपुर की एक टेक कंपनी में फाइनेंस मैनेजर थी, और इस घर की ईएमआई का बड़ा हिस्सा वही भरती थी। फिर भी नेमप्लेट पर केवल आरव और उसके माता-पिता का नाम था। शादी के 4 साल में उसने अपनी नौकरी, अपने कपड़े, अपने बोलने का तरीका, अपनी देर से घर लौटने की मजबूरी, सब पर ताने सुने थे।
उस रात उसने सिर्फ इतना कहा था कि वह नौकरी नहीं छोड़ेगी। सावित्री देवी चाहती थीं कि नंदिनी घर पर रहकर उनकी सेवा करे, जबकि वह खुद रोज मंदिर जातीं, किटी पार्टी करतीं और पड़ोसियों के सामने बहू की कमियां गिनातीं।
“जो बहू सास को जवाब दे, उसका यही इलाज होता है,” सावित्री देवी ने दांत भींचकर कहा था।
फिर बेलन चला।
अब नंदिनी फर्श पर पड़ी थी।
आरव उसके पास आया। 1 पल को उसे लगा कि शायद वह डर जाएगा, उसे उठाएगा, उसके सिर पर हाथ रखेगा। लेकिन उसने झुककर उसकी ठुड्डी पकड़ ली।
“इस घर में मेरी मां की इज्जत सबसे ऊपर है,” उसने धीरे से कहा।
“मेरी टांग टूट गई है…”
“तो अब याद रहेगा कि जुबान कितनी चलानी है।”
वह उठा और ड्राइंग रूम में चला गया। थोड़ी देर बाद टीवी की आवाज आई। फिर प्लेटों की खनखनाहट। वे लोग खाना खा रहे थे।
नंदिनी ने सुना, सावित्री देवी बोलीं, “सुबह तक अकल ठिकाने आ जाएगी।”
आरव ने जवाब दिया, “ऐसी औरतों को शुरुआत में ही काबू में रखना पड़ता है।”
नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं। उसकी हथेलियां टाइलों की दरारों में धंस रही थीं। बाहर मानसून की बारिश तेज हो चुकी थी। वह वहीं पड़ी रह सकती थी। सुबह तक इंतजार कर सकती थी। उनसे दया की भीख मांग सकती थी।
लेकिन उस अपमान ने उसके भीतर एक आखिरी आग जला दी।
वह इस घर की रसोई में मरने वाली नहीं थी।
वह कोहनियों के बल घिसटने लगी। हर इंच पर दर्द उसके शरीर को चीरता था। सर्विस दरवाजा पिछली गली की ओर खुलता था, जहां से पड़ोस की बुजुर्ग महिला रुक्मिणी आंटी का घर मुश्किल से 20 कदम दूर था। नंदिनी ने जूते की रैक पकड़कर खुद को खींचा, कुंडी खोली और बारिश में गिर पड़ी।
कीचड़, पानी और अंधेरे के बीच वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
पीछे रसोई की लाइट जली।
उसने मुड़कर देखा।
आरव खिड़की के पीछे खड़ा था। उसने उसे देखा। नंदिनी कीचड़ में घिसट रही थी, हाथ फैलाकर मदद मांग रही थी।
आरव ने कुछ नहीं किया।
फिर उसने लाइट बंद कर दी।
जब नंदिनी रुक्मिणी आंटी के दरवाजे तक पहुंची, उसकी आवाज खत्म हो चुकी थी। उसने बस नीचे से दरवाजे पर 2 बार चोट की।
दरवाजा खुला।
65 साल की रुक्मिणी माथुर, जो पहले सरकारी अस्पताल में नर्स थीं, सामने खड़ी रह गईं। उनका चेहरा सफेद पड़ गया।
“हे भगवान… बेटा, उन्होंने तेरे साथ क्या कर दिया?”
PART 2
सवाई मानसिंह अस्पताल की सफेद रोशनी में नंदिनी ने आंखें खोलीं तो उसकी टांग प्लास्टर में जकड़ी थी। रुक्मिणी आंटी उसके पास बैठी थीं, साड़ी का पल्लू अब भी बारिश से गीला था।
डॉक्टर ने धीमे लेकिन साफ शब्दों में कहा, “यह साधारण गिरने की चोट नहीं है। किसी भारी चीज से जोरदार वार हुआ है। पुलिस को सूचना देनी होगी।”
नंदिनी कांप गई। डर दर्द से बड़ा हो गया था।
रुक्मिणी आंटी ने उसका हाथ थामा। “इस बार चुप मत रहना, बेटा।”
थोड़ी देर बाद महिला काउंसलर और एक पुलिस अधिकारी आए। नंदिनी ने टूटे वाक्यों में सब बताया—बेलन, सास, पति की चुप्पी, खाने की मेज, बारिश, खिड़की।
तभी रुक्मिणी आंटी बोलीं, “मेरे दरवाजे पर कैमरा लगा है। चोरी के बाद लगवाया था। उसमें पिछला आंगन भी दिखता है।”
कमरे में सन्नाटा भर गया।
वीडियो में वार नहीं था, लेकिन नंदिनी थी—बारिश में कीचड़ पर घिसटती हुई। और खिड़की के पीछे आरव था। देखता हुआ। फिर लाइट बुझाता हुआ।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
ऑपरेशन से पहले जांच रिपोर्ट आई। डॉक्टर ने नंदिनी की आंखों में देखकर कहा, “आप 7 हफ्ते की गर्भवती हैं।”
नंदिनी का हाथ अनजाने में पेट पर चला गया।
उस रात रसोई में वह अकेली नहीं थी।
PART 3
यह खबर नंदिनी के भीतर आंधी की तरह उतरी। अभी तक उसे लगता था कि उसने सिर्फ अपनी टांग खोई है, अपना सम्मान खोया है, अपना घर खोया है। अब उसे समझ आया कि उस बेलन की चोट ने उसके भीतर पल रही एक नन्ही जिंदगी को भी खतरे में डाल दिया था।
डॉक्टर माया कपूर ने धीरे से कहा, “बच्चे की धड़कन अभी ठीक है, लेकिन हमें निगरानी रखनी होगी। आपके शरीर ने बहुत बड़ा सदमा झेला है।”
नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं। 7 हफ्ते। उसे लगा था कि मासिक धर्म तनाव की वजह से रुका है। देर रात की रोना-छिपी, अधूरा खाना, घर लौटते समय सीने में उठती घबराहट—उसे लगा था यही वजह है। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसके भीतर एक बच्चा चुपचाप सांस लेना शुरू कर चुका है।
आरव ने पहले दिन 18 कॉल किए। शुरुआत में उसकी आवाज मीठी थी।
“नंदू, बात को इतना बड़ा मत बनाओ। मम्मी रो रही हैं। घर की बात घर में रखो।”
फिर उसका लहजा बदला।
“तुम जानती हो, पुलिस में गई तो सबकी बदनामी होगी।”
फिर असली आवाज बाहर आई।
“तुम मेरी पत्नी हो। जहां मैं कहूंगा, वहीं रहोगी।”
काउंसलर सुषमा ने नंदिनी से पूछा, “अगली कॉल रिकॉर्ड करने की अनुमति दोगी?”
नंदिनी ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। पति की आवाज किसी अजनबी के सामने खुलवाना आसान नहीं था। लेकिन फिर उसे खिड़की याद आई। बारिश याद आई। बुझती हुई लाइट याद आई।
उसने कहा, “हां।”
अगली कॉल स्पीकर पर हुई। कमरे में डॉक्टर, काउंसलर और महिला सब-इंस्पेक्टर मौजूद थीं। आरव को इसका पता नहीं था।
“नंदिनी, अब बस करो,” उसने कहा। “मम्मी ने तुम्हें सबक सिखाया, कोई हत्या नहीं की। अगर तुमने उन्हें उल्टा जवाब न दिया होता तो बात इतनी नहीं बढ़ती।”
नंदिनी चुप रही।
“और डॉक्टरों से ज्यादा नाटक मत करना। तुम हमेशा से ड्रामा करती आई हो।”
सब-इंस्पेक्टर ने चुपचाप नोट्स लिए। सुषमा ने नंदिनी की ओर देखा। पहली बार नंदिनी को लगा कि उसका मौन अब उनकी ढाल नहीं रहा। अब वही मौन उन्हें खुद बेनकाब कर रहा था।
अगले दिन आरव, सावित्री देवी और महेन्द्रनाथ अस्पताल पहुंचे। आरव ने हल्की नीली शर्ट पहनी थी और हाथ में एक गुलदस्ता था, जिसकी दुकान की पर्ची अब भी प्लास्टिक पर लगी थी। सावित्री देवी ने रेशमी साड़ी, मोती की माला और वही चेहरा पहन रखा था जो वह रिश्तेदारों के सामने पहनती थीं—बेचारी, संस्कारी, गलत समझी गई मां। महेन्द्रनाथ उनके पीछे ऐसे चल रहे थे जैसे उनकी उम्र अचानक 10 साल बढ़ गई हो।
नंदिनी व्हीलचेयर पर बैठी थी। रुक्मिणी आंटी उसके दाहिने खड़ी थीं। सुषमा बाईं ओर। सब-इंस्पेक्टर ने दरवाजा बंद किया।
आरव आगे बढ़ा। “नंदू, मेरी बात सुनो—”
“नहीं,” नंदिनी ने कहा।
बस 1 शब्द। न चीख, न कांपना। सिर्फ साफ इंकार।
कमरे की हवा बदल गई।
डॉक्टर माया ने फाइल खोली। “हमें आपकी घटना की जानकारी चाहिए।”
सावित्री देवी तुरंत बोलीं, “डॉक्टर साहिबा, हमारी बहू बहुत जिद्दी है। शादी के बाद से घर में शांति नहीं रहने दी। कल भी खुद फिसल गई, अब हमें फंसा रही है।”
“फिसल गई?” डॉक्टर ने पूछा।
आरव ने जल्दी से कहा, “हां, बहस हो रही थी। उसका संतुलन बिगड़ गया।”
“लेकिन चोट सीधी मार से मेल खाती है,” डॉक्टर बोलीं।
आरव के चेहरे पर खिंचाव आया। “आप नंदिनी को नहीं जानतीं। वह छोटी बात को बड़ा बना देती है।”
रुक्मिणी आंटी की हंसी कड़वी थी। “कोई औरत कीचड़ में टांग घसीटकर पड़ोसी के दरवाजे तक नाटक करने नहीं आती।”
सावित्री देवी ने तिरछी नजर से देखा। “आप हमारे घर की बातों में मत पड़िए।”
सब-इंस्पेक्टर ने शांत स्वर में कहा, “अब यह घर की बात नहीं रही। हमारे पास अस्पताल की रिपोर्ट, फोन रिकॉर्डिंग और रुक्मिणी जी के कैमरे की फुटेज है।”
आरव का चेहरा उतर गया।
“कौन सी फुटेज?”
टैबलेट पर वीडियो चलाया गया। स्क्रीन पर बारिश थी। अंधेरा था। फिर नंदिनी का शरीर दिखा—कीचड़ में घिसटता हुआ, टांग पीछे खिंचती हुई, हाथ मिट्टी में धंसते हुए। फिर खिड़की के पीछे आरव दिखा। वह खड़ा रहा। देखा। फिर लाइट बंद कर दी।
कमरे में कोई नहीं बोला।
सावित्री देवी ने होंठ भींच लिए। आरव ने गुलदस्ता पास की कुर्सी पर रख दिया।
“इससे साबित नहीं होता कि मुझे पता था चोट गंभीर है,” वह बोला।
सब-इंस्पेक्टर की आवाज सख्त हो गई। “इससे साबित होता है कि आपने अपनी पत्नी को मदद मांगते देखा और उसे बारिश में छोड़ दिया।”
सावित्री देवी अचानक भड़क उठीं। “मेरे बेटे ने कुछ नहीं किया। मैंने मारा तो क्या हुआ? उसने मुझे उकसाया था। बहू होकर मुझसे आंख मिलाकर बात करती है!”
डॉक्टर ने फाइल बंद की। “आंख मिलाकर बात करने से हड्डी नहीं टूटती।”
नंदिनी ने पहली बार सास की आंखों में देखा। उसे लगा वह यह बात छिपा सकती थी। इस बच्चे की खबर को अपने हाथों में दीपक की लौ की तरह बचाकर रख सकती थी। लेकिन जब उसने सावित्री देवी के चेहरे पर झूठ की वही अकड़ देखी, तो उसे समझ आ गया कि उन्हें अब सच से बचने का कोई अधिकार नहीं है।
“मैं गर्भवती हूं,” उसने कहा।
सावित्री देवी जम गईं।
आरव की आंखें फैल गईं। “क्या?”
“7 हफ्ते।”
महेन्द्रनाथ ने मुंह पर हाथ रख लिया। सावित्री देवी धीरे से कुर्सी पर बैठ गईं। उनके चेहरे पर पछतावा नहीं था। सिर्फ डर था—कानून का डर, समाज का डर, बेटे की नौकरी का डर, और उस सच का डर जिसे वह अब मोहल्ले की चुगलियों से दबा नहीं सकती थीं।
आरव नंदिनी के करीब आया। “तुम मुझे बताने वाली भी नहीं थीं?”
नंदिनी की हंसी सूखी थी। “तुमने मुझे कीचड़ में छोड़ दिया था, आरव। तुमने भरोसे की बात करने का अधिकार उसी रात खो दिया।”
“हम इसे परिवार में सुलझा लेंगे,” उसने धीमे से कहा।
नंदिनी ने सिर हिलाया। यही वाक्य उसने शादी के बाद अनगिनत बार सुना था। जब सावित्री देवी ने उसके कपड़ों पर ताना मारा। जब आरव ने गुस्से में उसका फोन दीवार पर फेंका। जब उसकी कलाई नीली पड़ी। जब उसे कहा गया कि अच्छी बहुएं मायके में रोने नहीं जातीं।
“परिवार में” का मतलब हमेशा होता था—बिना गवाह, बिना कानून, बिना सच।
“नहीं,” नंदिनी ने कहा। “जिस परिवार में बहू को जेल की तरह रखा जाए, वह परिवार नहीं होता।”
अब तक चुप खड़े महेन्द्रनाथ रो पड़े। उनके आंसू बिना आवाज के बह रहे थे। सावित्री देवी ने फुसफुसाकर कहा, “चुप रहो।”
लेकिन इस बार उनकी आवाज उन पर भारी नहीं पड़ी।
महेन्द्रनाथ ने सिर उठाया। “मैंने सब देखा था,” उन्होंने कहा। “सावित्री ने बेलन से मारा। नंदिनी मदद मांग रही थी। आरव ने कहा था, उसे वहीं रहने दो, अकल आएगी। और मैं… मैं डरकर खड़ा रहा।”
सावित्री देवी चीखीं, “गद्दार!”
महेन्द्रनाथ की आवाज टूट रही थी, लेकिन शब्द साफ थे। “गद्दार वह होता है जो किसी घायल औरत को फर्श पर छोड़कर खाना खा सके।”
नंदिनी की आंखों से आंसू बह निकले। यह माफी नहीं थी। यह न्याय भी नहीं था। महेन्द्रनाथ बहुत देर से बोले थे। लेकिन उनकी गवाही ने उस झूठ की दीवार में दरार डाल दी थी, जिसके पीछे नंदिनी 4 साल से घुट रही थी।
उस दिन से सब बदलने लगा। पुलिस शिकायत दर्ज हुई। आरव और सावित्री देवी को नंदिनी से दूर रहने का आदेश मिला। महेन्द्रनाथ को गवाह बनाया गया। नंदिनी की सर्जरी हुई। उसकी टांग में प्लेटें और स्क्रू लगाए गए। दर्द कम नहीं हुआ, बस उसका नाम बदल गया—पहले वह डर था, अब उपचार था।
अस्पताल के दिन अजीब थे। आजादी जीत जैसी नहीं लगी। वह बुखार जैसी लगी। चुप कमरे में भी नंदिनी चौंक जाती। नर्स की ट्रॉली की आवाज से उसका दिल तेज धड़कता। कोई दरवाजा जोर से बंद करे तो उसकी हथेलियां ठंडी पड़ जातीं। फिर कभी-कभी कंपनी के सहकर्मियों के छोटे-छोटे संदेश पढ़कर वह रो पड़ती—“जल्दी ठीक हो जाओ”, “तुम अकेली नहीं हो।”
उसका भाई करण दिल्ली से आया। उसे देखते ही टूट गया।
“दीदी, तुमने हमें बताया क्यों नहीं?”
नंदिनी जवाब नहीं दे पाई। क्योंकि वजह 1 नहीं थी। शर्म थी। डर था। समाज का वह बोझ था जो लड़की को शादी बचाने के नाम पर खुद को मिटाना सिखाता है। और वह खतरनाक उम्मीद भी थी कि शायद हिंसक आदमी फिर कभी वही बन जाएगा जिसने शादी के दिन हाथ थामकर कहा था, “मैं हमेशा साथ रहूंगा।”
“मैं सोचती थी सह लूंगी,” उसने कहा।
करण ने उसका हाथ पकड़ा। “सहना तुम्हारा कर्तव्य नहीं था।”
काउंसलर सुषमा की मदद से नंदिनी ने अपने दस्तावेज, बैंक पेपर, लैपटॉप और कुछ कपड़े वापस लिए। पुलिस के साथ करण कोठी गया। अलमारी के पीछे एक छोटे बैग में नंदिनी के असली प्रमाणपत्र, 1 गुप्त डेबिट कार्ड और जयपुर के मालवीय नगर में किराए के छोटे फ्लैट की चाबी मिली।
नंदिनी ने वह फ्लैट 2 महीने पहले लिया था।
उस शाम के बाद जब सावित्री देवी ने चाय का कप दीवार पर दे मारा था और आरव ने कहा था, “तुम्हें अपने नाम की कोई जगह नहीं चाहिए। तुम मेरी पत्नी हो।”
उसने कांपते हाथों से किरायानामा साइन किया था। वहां 2 जोड़ी कपड़े, 1 गद्दा, 1 केतली और 3 स्टील की प्लेटें रखी थीं। लेकिन वह जा नहीं पाई थी।
उसे लगता था कि उसमें हिम्मत नहीं है।
असल में, उसे सिर्फ किसी ऐसे हाथ की जरूरत थी जो बाहर निकलते वक्त दरवाजा पकड़े रहे।
जब वह अस्पताल से निकली, वह ससुराल नहीं गई। करण उसे सीधे उस छोटे फ्लैट में ले गया। कमरा छोटा था। दीवारों पर हल्की सी सीलन थी। रसोई बस इतनी थी कि 1 आदमी मुश्किल से खड़ा हो सके। कोई भारी डाइनिंग टेबल नहीं थी। कोई आदेश देती सास नहीं थी। कोई पति नहीं था जो उसके दर्द को अनुशासन कहे।
दरवाजा बंद होते ही नंदिनी रो पड़ी।
क्योंकि पहली बार कोई उसे “सुधारने” के लिए भीतर नहीं आ सकता था।
अगले महीने कड़े थे—फिजियोथेरेपी, वकील, पुलिस स्टेशन, उल्टियां, सोनोग्राफी, नींद टूटना, अचानक डर जाना। आरव कभी माफी मांगता, कभी धमकाता, कभी कहता, “यह मेरा बच्चा भी है।” नंदिनी कोई जवाब नहीं देती। सब संदेश वकील के पास जाते।
सावित्री देवी ने मोहल्ले में अपनी कहानी फैलाई। नंदिनी लालची है। नंदिनी ने घर तोड़ा है। नंदिनी अपने मायके वालों के कहने पर संपत्ति चाहती है। कुछ लोगों ने विश्वास किया। कुछ ने चुपचाप नजरें फेर लीं। लेकिन रुक्मिणी आंटी हर सुबह अपनी बालकनी से सब देखतीं और 1 दिन सबके सामने बोलीं, “घर तब नहीं टूटता जब औरत बाहर निकलती है। घर तब टूट चुका होता है जब उसे फर्श पर छोड़ दिया जाता है।”
यह वाक्य पूरी कॉलोनी में सावित्री देवी के झूठ से ज्यादा तेज फैल गया।
महीनों बाद अदालत में नंदिनी बैसाखी के सहारे चली। उसके पेट का उभार अब साफ दिखने लगा था। आरव दुबला और थका हुआ लग रहा था। उसका वकील घटना को “घरेलू तनाव” और “दुर्भाग्यपूर्ण गलतफहमी” कहता रहा। सावित्री देवी की ठुड्डी अब भी ऊंची थी, पर हाथ पर्स पर कांप रहे थे।
फिर रिकॉर्डिंग चली।
“मम्मी ने तुम्हें सबक सिखाया, कोई हत्या नहीं की।”
फिर वीडियो चला।
बारिश। कीचड़। नंदिनी का शरीर। खिड़की। आरव। बुझती हुई लाइट।
अदालत में जो सन्नाटा उतरा, वह उस कोठी के सन्नाटे जैसा नहीं था। वह नंदिनी को दबाने वाला सन्नाटा नहीं था। वह सच को देखने वाला सन्नाटा था।
न्याय ने सब कुछ ठीक नहीं किया। वह नंदिनी की टूटी रातें वापस नहीं ला सका। ठंड में उठने वाला टांग का दर्द खत्म नहीं हुआ। किसी की तेज आवाज सुनकर दिल का धड़कना भी तुरंत बंद नहीं हुआ। लेकिन न्याय ने एक रेखा खींच दी। और जिस औरत से हर सीमा छीन ली गई थी, उसके लिए वह रेखा नया घर बनने की पहली दीवार थी।
बच्ची वसंत की एक साफ सुबह पैदा हुई। बाहर गुलमोहर के पेड़ों पर धूप चमक रही थी। नंदिनी ने उसका नाम आशा रखा, क्योंकि रुक्मिणी आंटी ने कहा था, “कुछ फूल टूटी दीवारों के पास भी खिलते हैं।”
आरव ने बच्ची को देखने की मांग की। नंदिनी ने कानूनी सलाह के अनुसार दूरी और सुरक्षा की शर्तें रखीं। यह बदला नहीं था। यह सुरक्षा थी।
धीरे-धीरे उसने सीखा कि शांति का मतलब सबको खुश रखना नहीं होता। माफी का मतलब किसी को फिर से अपनी जिंदगी में खुला दरवाजा देना नहीं होता। और मां का प्यार कोमल हो सकता है, कमजोर नहीं।
1 साल बाद, नंदिनी लगभग बिना लंगड़ाए चलने लगी थी। कभी-कभी टांग खिंचती। कभी उसे रुकना पड़ता। मगर अब वह कुछ नहीं छिपाती थी।
एक रविवार सुबह वह आशा को गोद में लेकर मंदिर के बाहर प्रसाद खरीद रही थी, तभी सामने आरव दिखा। वह कुछ क्षण स्थिर रह गया। उसने बच्ची को देखा, फिर नंदिनी को। उसकी आंखों में शायद पछतावा था, शायद सिर्फ खो देने का डर।
“नंदिनी,” उसने धीमे से कहा।
वह नहीं रुकी।
पीछे से आवाज आई, “माफ कर दो।”
नंदिनी चलती रही।
क्योंकि उसका माफ करना जरूरी हो सकता था, लेकिन उसकी शांति उससे भी ज्यादा जरूरी थी।
घर लौटकर उसने आशा को पालने में सुलाया। छोटी सी हथेली गाल के पास खुली पड़ी थी। खिड़की से बारिश के बाद की रोशनी भीतर आ रही थी। केतली में पानी धीरे-धीरे गुनगुनाने लगा।
कभी घर का सन्नाटा नंदिनी को डराता था। ससुराल में सन्नाटा तूफान से पहले की चेतावनी था—ताने, आदेश, बंद दरवाजे, दबे हुए गुस्से का संकेत।
अब उसके घर का सन्नाटा अलग था।
वह सांस लेता था।
सावित्री देवी ने सोचा था कि उन्होंने बहू को सबक दिया है। आरव ने सोचा था कि उसने पत्नी को उसकी जगह दिखा दी है।
दोनों गलत थे।
जिस जगह उन्होंने नंदिनी को टूटी टांग के साथ रसोई के फर्श पर छोड़ दिया था, वह उसकी जगह नहीं थी।
वह वही बिंदु था जहां से नंदिनी ने उठना शुरू किया।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.