
PART 1
7 साल के आरव को उसके पिता ने पूरे गाँव की चौपाल पर थप्पड़ मारकर कहा था, “अगर उस पागल ने किसी को चोट पहुँचाई, तो जान से तू भरेगा,” और उस दिन बरसों पुरानी हवेली के सामने खड़ी भीड़ ने बच्चे की आँखों से इंसानियत मरते हुए देखी थी।
राजस्थान के झुंझुनू जिले के छोटे से कस्बे खाटूवास में चौधरी परिवार का नाम बहुत बड़ा था। हवेली, खेत, अनाज की कोठियाँ, पंचायत में दबदबा—सब कुछ था। पर उसी हवेली के पीछे, पुराने पशुशाला के पास, लोहे की जंजीर से बँधा एक आदमी भी था।
वह आदमी था आरव का चाचा, राघव चौधरी।
लोग कहते थे कि राघव पागल है। दादी सावित्री कहतीं, “उसकी आँखों में अपशकुन है।” दादा भैरों सिंह कहते, “इसे घर के भीतर लाया तो कुल बर्बाद हो जाएगा।” आरव के पिता महेन्द्र तो हर बार थूककर कहते, “वह मेरा भाई नहीं, हमारे खानदान की जिंदा शर्म है।”
लेकिन आरव ने कभी राघव को किसी को मारते नहीं देखा था। उसने उसे बस धूल में बैठे देखा था, सूखे होंठों से आसमान को ताकते हुए, जैसे कोई खोई हुई आवाज़ बादलों में ढूँढ रहा हो। जब बरसात आती, कीचड़ उसके पैरों को ढक लेता। सर्दियों में वह फटी रजाई में काँपता रहता। बच्चे दीवार के पीछे से झाँकते, औरतें कुएँ पर कानाफूसी करतीं, आदमी चाय की दुकान पर हँसते।
“अच्छा है बाँध रखा है,” कोई कहता। “नहीं तो गाँव के बच्चों को उठा ले जाता।”
आरव की माँ मीरा हर रात रसोई से बची रोटी चुपचाप उसकी जेब में रख देती। वह काँपती आवाज़ में कहती, “जल्दी दे आना, बेटा। तेरे पिता ने देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा।”
एक शाम आरव ने राघव के सामने रोटी रखी। राघव ने पहले उसे नहीं छुआ। फिर धीरे से रोटी तोड़ी, आधी आरव की तरफ बढ़ा दी।
“तू भी खा,” उसने भर्राई आवाज़ में कहा।
आरव को उस दिन पहली बार समझ आया कि जिसे सब राक्षस कह रहे थे, वह भूखा इंसान था।
उसके बाद वह कभी गुड़ का टुकड़ा, कभी आलू की सब्जी, कभी मेले से लाया छोटा-सा लड्डू छिपाकर ले जाता। राघव हर बार कुछ न कुछ लौटाता—कभी सूखी घास से बनी चिड़िया, कभी मिट्टी की छोटी सी नाव, कभी बस एक थकी हुई मुस्कान।
आरव के 7वें जन्मदिन की रात हवेली में दावत थी, पर वह उसके लिए नहीं थी। दावत उसके चचेरे भाई निखिल के लिए थी, जिसे शहर के महंगे स्कूल में दाखिला मिला था। निखिल को मलाईदार खीर और गरम पूरियाँ मिलीं, आरव की थाली में बची हुई सूखी रोटी डाली गई।
बाहर से जंजीर की हल्की आवाज़ आई। आरव चुपके से निकला। राघव ने अपनी हथेली खोली। उसमें खजूर की पतली पत्ती से बनी एक नन्ही चिड़िया थी।
“जन्मदिन मुबारक,” उसने धीमे से कहा।
तभी महेन्द्र वहाँ आ गया। उसने वह चिड़िया उठाकर पैरों तले कुचल दी।
“पागल की निशानी भी पागलपन फैलाती है।”
उस रात आरव ने सुना कि महेन्द्र और भैरों सिंह सुबह राघव को “नहर के पार” ले जाने की बात कर रहे थे। उनके स्वर में ऐसा अँधेरा था, जिसमें कोई लौटकर नहीं आता।
आधी रात को आरव ने गोदाम से जंग लगा हथौड़ा उठाया। उसके छोटे हाथ काँप रहे थे। उसने ताले पर पहला वार किया। फिर दूसरा। फिर तीसरा। हथेली फट गई, खून लोहे पर फैल गया।
राघव रो पड़ा।
“आरव, भाग जा। वे तुझे मार डालेंगे।”
लेकिन बच्चा नहीं रुका।
जब ताला टूटा, राघव ने उसे सीने से लगा लिया।
“मैं सब याद रखूँगा,” वह फुसफुसाया, और रात के अँधेरे में गायब हो गया।
सुबह महेन्द्र ने आरव को घसीटकर चौपाल पर लाया। पूरा गाँव जमा था। उसने बच्चे का खून से सना हाथ ऊपर उठाकर कहा, “इसने पागल को छोड़ दिया है। अगर राघव ने किसी को नुकसान पहुँचाया, तो इसकी साँसों से हिसाब लिया जाएगा।”
उस दिन से आरव का नाम नहीं रहा। वह “पागल को छुड़ाने वाला लड़का” बन गया।
PART 2
15 साल तक आरव ने वही श्राप ढोया।
स्कूल में बच्चे उससे दूर बैठते। गाँव वाले उसके सामने दरवाज़े बंद कर लेते। महेन्द्र ने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी और शहर के गैरेज में काम करके कमाए पैसे भी छीन लिए। मीरा बीमार पड़ती गई, मगर घर में कोई डॉक्टर नहीं बुलाता था।
एक रात मीरा ने खून खाँसा। आरव ने दीवार की दरार में छिपाए पैसे निकाले, पर लिफाफा खाली था। निखिल नई सोने की चेन पहनकर आईने में मुस्कुरा रहा था।
“शादी की खरीदारी है,” उसने हँसकर कहा। “चाचा ने कहा, तू भी हिस्सा देगा।”
आरव चीखा, “मेरी माँ मर रही है!”
महेन्द्र ने बीड़ी सुलगाई। “तेरी माँ नाटक करती है।”
तभी बाहर ज़मीन काँपी।
हवेली के सामने काली गाड़ियों का काफिला रुका। सूट पहने लोग उतरे। सबसे पीछे से एक लंबा आदमी निकला। उसने पशुशाला के पास जंग लगे छल्ले को छुआ, और उसकी आँखें भर आईं।
महेन्द्र के हाथ से बीड़ी गिर गई।
वह आदमी आरव की तरफ मुड़ा।
“मेरे भतीजे,” राघव ने कहा, “मैं तुझे लेने लौट आया हूँ।”
PART 3
हवेली की हवा अचानक भारी हो गई। जिन दीवारों ने 15 साल तक झूठ सुना था, वे जैसे उसी क्षण काँप उठीं। राघव अब वह भूखा, टूटा हुआ आदमी नहीं था जिसे कभी कीचड़ में बाँध दिया गया था। उसके बालों में सफेदी थी, चेहरे पर पुराने घावों की रेखाएँ थीं, पर आँखों में ऐसी ठहरी हुई ताकत थी कि महेन्द्र एक कदम पीछे हट गया।
“राघव…” महेन्द्र की आवाज़ काँप गई। “भाई, हमने तुझे बहुत ढूँढा।”
राघव ने हल्की, दुखी हँसी हँसी।
“झूठ बोलने से पहले याद कर लिया कर, महेन्द्र। तू कभी अच्छा झूठा नहीं रहा।”
भैरों सिंह अपनी लाठी कसकर पकड़ चुका था। सावित्री ने सिर पर पल्लू खींच लिया। निखिल ने जेब में कुछ छिपाने की कोशिश की।
राघव ने शांत स्वर में पूछा, “बताओ, मैंने किसे मारा था? किस बच्चे को चोट पहुँचाई थी? किस घर में आग लगाई थी?”
कोई जवाब नहीं आया।
“मैं बस इतना कहता था कि माँ की मौत बीमारी से नहीं हुई,” राघव बोला। “मैंने उस रात दो आदमियों को कुएँ के पास कुछ दबाते देखा था। मैंने कहा था कि पुलिस को बताऊँगा। फिर मुझे पागल कहा गया, बाँधा गया, और गाँव को कहानी सुना दी गई।”
आरव को लगा जैसे उसके बचपन की सारी गालियाँ अचानक अपने असली चेहरे दिखा रही हैं।
वह तुरंत बोला, “चाचा, माँ अस्पताल में है। इनके लोगों ने उसके कागज़, दवाइयों के पैसे, सब छीन लिए।”
राघव की नज़र निखिल पर गिरी। निखिल का चेहरा पीला पड़ गया। उसके कोट की अंदरूनी जेब से बैंक कार्ड, अस्पताल की पर्चियाँ और मीरा की दवा की रसीदें निकलीं।
राघव ने अपने साथ आए आदमी को इशारा किया। 1 मिनट में गाड़ी तैयार हो गई। आरव, राघव और दो लोग अस्पताल पहुँचे। मगर वहाँ नर्स ने घबराकर कहा, “मीरा चौधरी बेड से गायब हैं। वह बहुत कमजोर थीं, अकेले चल भी नहीं सकती थीं।”
आरव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वे अस्पताल के बाहर, बस अड्डे, मंदिर की सीढ़ियों और सुनसान गलियों में उसे ढूँढते रहे। अंत में पुरानी बावड़ी के पास बने छोड़े हुए शिव मंदिर में मीरा मिली। वह पत्थर के खंभे से टिककर बैठी थी। होंठों पर सूखा खून था और सीने से कपड़े में लिपटा एक डिब्बा चिपकाए हुए थी।
“माँ!” आरव घुटनों के बल गिर पड़ा।
मीरा ने डिब्बा छिपाने की कोशिश की।
“दूर जा, बेटा,” वह फुसफुसाई। “अगर उन्हें पता चला कि तू मेरे साथ है, वे फिर तुझे तोड़ेंगे।”
राघव उसके सामने बैठ गया।
“भाभी।”
मीरा ने आँखें उठाईं। उसे पहचानते ही उसका चेहरा आँसुओं से भर गया।
“राघव… तू जिंदा है।”
“आरव की वजह से।”
मीरा ने काँपते हुए सिर हिलाया।
“सिर्फ आरव की वजह से नहीं। उस सच की वजह से भी, जिसे तूने देखा था।”
तभी बाहर आवाज़ें गूँजने लगीं। महेन्द्र, भैरों सिंह, सावित्री, निखिल और कुछ आदमी मंदिर में घुस आए। महेन्द्र के हाथ में लोहे की सरिया थी।
“मीरा, डिब्बा दे,” उसने दाँत भींचकर कहा।
आरव अपनी माँ के सामने खड़ा हो गया।
“आज तुमने उसे छुआ, तो मैं बेटा नहीं रहूँगा।”
महेन्द्र हँसा, पर आगे नहीं बढ़ा। राघव उसके बगल में खड़ा था।
मीरा ने कपड़ा खोला। अंदर पुराना टीन का डिब्बा था। उसमें पीले कागज़, किनारों से जली चिट्ठी, राघव की माँ कमला देवी की तस्वीर और एक मुड़ी हुई पर्ची थी।
“तेरी माँ ने मुझे यह दिया था,” मीरा ने राघव से कहा। “वह जानती थी कि उसे मारने की तैयारी हो रही है।”
भैरों सिंह का चेहरा राख जैसा हो गया।
महेन्द्र झपटा, पर आरव ने उसे धक्का दे दिया। पहली बार उसका पिता उसके सामने जमीन पर गिरा, और पहली बार आरव ने माफी नहीं माँगी।
उसी क्षण बाहर से चीख आई, “आग!”
किसी ने जलती बोतल टूटी खिड़की से अंदर फेंकी थी। सूखे कपड़े, लकड़ी की चौकी और पुराने परदे धधक उठे। धुआँ भर गया। राघव ने मीरा को बाँहों में उठाया। आरव ने डिब्बा सीने से दबाया। वे आग और धुएँ के बीच बाहर भागे।
पीछे महेन्द्र जमीन पर गिरा हुआ आरव का पैर पकड़ने की कोशिश कर रहा था।
“कागज़ छोड़! उसे मरने दे!”
आरव ने अपना पैर छुड़ाया और भाग गया।
जयपुर के बड़े अस्पताल जाते समय मीरा की साँस टूट-टूटकर चल रही थी। उसने राघव की तरफ देखा।
“कमला माँ बीमारी से नहीं मरी थीं। भैरों सिंह पर बहुत कर्ज था। वे उसकी जमीन बेच देना चाहते थे। कमला ने मना किया। फिर उन्होंने तुझे भी गिरवी रखने का सौदा किया था—ईंट-भट्ठे वालों के हाथों मजदूरी के लिए।”
राघव ने आँखें बंद कर लीं। उसकी पीड़ा इतनी पुरानी थी कि आँसू भी बाहर आने से डर रहे थे।
अस्पताल में महेन्द्र फिर पहुँचा। वह चिल्लाया, “मैं उसका पति हूँ। मेरी इजाज़त के बिना कोई ऑपरेशन नहीं होगा!”
राघव ने पुलिस बुला ली।
कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आदमी अस्पताल पहुँचे। वे गाँव के पुराने मास्टरजी, हरीश जोशी थे। उनके हाथ में फाइल थी।
“कमला देवी ने मेरे पास कुछ कागज़ छोड़े थे,” उन्होंने कहा। “उन्होंने कहा था, अगर वह अचानक मर जाएँ, तो सच घर के अंदर ही ढूँढना।”
महेन्द्र की आवाज़ बैठ गई। सावित्री बुदबुदाने लगी। भैरों सिंह दीवार से टिक गया।
डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर से बाहर आए। “मीरा जिंदा हैं, पर हालत गंभीर है। बेहोश होने से पहले उन्होंने कहा कि डिब्बे के तले में छिपे कागज़ को बचा लेना।”
आरव ने डिब्बा खोला।
तल खाली था।
निखिल ने नज़रें फेर लीं।
आरव उस पर टूट पड़ा।
“कागज़ कहाँ है?”
निखिल चिल्लाया, “तू भी अपने चाचा जैसा पागल हो गया है!”
यह शब्द अब आरव को घायल नहीं कर पाया। उसने बस कहा, “कागज़ दे।”
पुलिस ने सबकी तलाशी ली। निखिल की जैकेट की अस्तर से एक पुराना कागज़ गिरा। वह कर्ज़ का दस्तावेज़ था।
कर्ज़दार: भैरों सिंह चौधरी।
गारंटीदार: महेन्द्र चौधरी।
नीचे लिखा था कि कर्ज़ न चुकाने पर कमला देवी की पैतृक जमीन और नाबालिग राघव चौधरी को मजदूरी की गारंटी के रूप में सौंपा जाएगा।
राघव ने वह पंक्ति 3 बार पढ़ी।
“वे मुझे बेचने वाले थे,” उसने धीमे से कहा।
भैरों सिंह बोला, “वक़्त बुरा था।”
“नहीं,” राघव ने जवाब दिया। “नीयत बुरी थी।”
मास्टरजी ने बताया कि कमला देवी उनके पास रोती हुई आई थीं। उनके गाल पर चोट थी। उन्होंने कहा था कि घर में उन्हें धीरे-धीरे ज़हर दिया जा रहा है। कुछ दिनों बाद उनकी मौत को बुखार बता दिया गया।
राघव ने सावित्री को देखा।
“काढ़ा कौन बनाता था?”
सावित्री के होंठ काँपे, पर शब्द नहीं निकले।
आरव ने पूछा, “और मेरी माँ? उसे क्यों मरने दिया?”
राघव ने उत्तर दिया, “क्योंकि उसने सबूत बचाए। क्योंकि उसने मुझे रोटी दी। क्योंकि उन्होंने जाना कि एक दिन तू बड़ा होकर बोलेगा। इसलिए उन्होंने तुझे बचपन से अपराधी बना दिया।”
मीरा 4 दिन बाद होश में आई। चेहरा सफेद था, आवाज़ टूटी हुई, पर आँखें खुली थीं। उसने आरव का हाथ पकड़ा।
“पश्चिमी दीवार,” उसने कहा।
आरव समझ गया। वह उसके बचपन के कमरे की दीवार थी।
पुलिस के साथ वे हवेली लौटे। खबर फैल चुकी थी। वही लोग जो 15 साल तक चुप रहे थे, अब दरवाज़ों पर खड़े दुखी चेहरे बना रहे थे।
हवेली में मिट्टी के तेल की गंध थी। महेन्द्र का चचेरा भाई देवेंद्र पीछे के आँगन में पकड़ा गया। उसके हाथ काले थे, पास में आधा खाली डिब्बा पड़ा था।
दीवार की 3 ढीली ईंटों के पीछे आरव का पुराना जैकेट मिला। उसी की अस्तर में दवाई की रसीद, काले कपड़े का टुकड़ा और एक खाली शीशी छिपी थी। रसीद पर दो नाम थे—सावित्री चौधरी और महेन्द्र चौधरी।
उसी ज़हर का नाम, जिसे सावित्री बाद में अस्पताल में मीरा की ड्रिप में डालने की कोशिश करते पकड़ी गई।
लेकिन सच अभी पूरा नहीं निकला था।
राघव पुराने पशुशाला के पास रुका। जिस जगह वह बाँधा गया था, वहाँ की मिट्टी थोड़ी धँसी हुई थी।
“यहाँ खोदो,” उसने कहा।
भैरों सिंह काँप उठा। “यह हमारे पुरखों की मिट्टी है।”
आरव ने ठंडे स्वर में कहा, “आज यही मिट्टी बोलेगी।”
पुलिस ने खुदाई की। थोड़ी देर बाद लोहे की चीज़ से टकराने की आवाज़ आई। मिट्टी से प्लास्टिक में लिपटा एक गठ्ठर निकला। उसके अंदर हड्डियाँ थीं और काली पत्थर वाली अंगूठी।
मास्टरजी ने मुँह ढक लिया।
राघव ने कहा, “वही आदमी… जो कर्ज़ वसूलने आया था।”
बाद में पता चला उसका नाम धनराज सेठ था। वह उसी हफ्ते गायब हुआ था, जिस हफ्ते कमला देवी मरी थीं। राघव ने बुखार में भी महेन्द्र और भैरों सिंह को रात में उसे दबाते देखा था। जब उसने सच बताने की धमकी दी, तो उसे पागल घोषित कर दिया गया।
सच अब जंजीर में नहीं बाँधा जा सकता था।
महेन्द्र, भैरों सिंह, सावित्री, देवेंद्र और निखिल गिरफ्तार हुए। निखिल ने आखिरी कोशिश की। उसने इंटरनेट पर एक अधूरा वीडियो डाल दिया, जिसमें आरव अस्पताल में सावित्री को धक्का देता दिख रहा था, पर यह नहीं दिख रहा था कि सावित्री के हाथ में सिरिंज थी।
24 घंटे तक लोग आरव को गालियाँ देते रहे। उसे निर्दयी बेटा, लालची भतीजा, झूठा कहने लगे।
फिर राघव ने पूरे वीडियो डाल दिए।
मंदिर में लगी आग।
निखिल का डिब्बे से कागज़ चुराना।
देवेंद्र का तेल का डिब्बा।
सावित्री का ड्रिप के पास झुकना।
महेन्द्र का ऑपरेशन रोकना, जबकि मीरा खून खाँस रही थी।
गाँव चुप हो गया।
फिर संदेश आने लगे।
“हमें पहले से शक था।”
“हम मदद करना चाहते थे, पर डरते थे।”
“बेचारा राघव, बेचारा आरव।”
राघव ने फोन बंद कर दिया।
“सच के बाद आने वाली हमदर्दी बहुत सस्ती होती है,” उसने कहा।
मुकदमा महीनों चला। आरोपों की सूची लंबी थी—बंधक बनाना, मारपीट, हत्या की कोशिश, सबूत छिपाना, आग लगाना, शव छिपाना, जालसाजी। महेन्द्र ने भैरों सिंह को दोष दिया। भैरों सिंह ने महेन्द्र को। सावित्री ने कहा कि उसने परिवार बचाने के लिए सब किया। निखिल रोया कि वह कुछ नहीं जानता था।
लेकिन चौधरी परिवार की इज्जत उसी दिन मर गई थी, जब उन्होंने एक इंसान को पशुशाला में बाँधा और एक बच्चे को अपने अपराध का बोझ दे दिया।
एक दिन आरव जेल में महेन्द्र से मिलने गया। माफ करने नहीं। बस यह देखने कि अब उसकी आवाज़ से डर लगता है या नहीं।
महेन्द्र हथकड़ी में आया। वह छोटा और थका हुआ दिख रहा था।
“आरव, मैं तेरा बाप हूँ।”
आरव शांत बैठा रहा।
“बहुत देर से याद आया।”
“मीरा अच्छी औरत है। उसे कह, गवाही न दे। राघव के पास पैसा है। सब संभल जाएगा। आखिर हम परिवार हैं।”
आरव की आँखों में ठंड उतर आई।
“जब तुमने माँ के इलाज के पैसे चुराए, तब परिवार नहीं थे। जब तुमने मेरी पढ़ाई रोकी, तब परिवार नहीं थे। जब तुमने चाचा को कीचड़ में बाँधा, तब परिवार नहीं थे। अब डर लगा, तो परिवार याद आ गया?”
महेन्द्र का चेहरा कठोर हो गया।
“नालायक।”
आरव उठ गया।
“पहले यह शब्द मुझे तोड़ देता था। आज यह साबित करता है कि मैं सही जगह खड़ा हूँ।”
“मैं तुझे श्राप दूँगा।”
आरव ने आखिरी बार उसे देखा।
“तुमने मुझे आज़ाद रहते हुए श्राप दिया था। तब भी मैं जी गया।”
कुछ महीनों बाद मीरा अस्पताल से बाहर आई। राघव ने जयपुर में छोटा-सा घर लिया। मीरा पहले डरी रहती थी। रात को कदमों की आवाज़ न सुनकर भी चौंक जाती। रसोई में बर्तन गिर जाए तो माफी माँगती। चाय पीते समय खिड़की से बाहर सड़क देखती और रो पड़ती।
एक दिन आरव ने पूछा, “दर्द हो रहा है?”
मीरा बोली, “नहीं। बस शांति अजनबी लगती है।”
आरव ने उसका हाथ थाम लिया।
“तो हम उसे अपना बनाना सीखेंगे।”
आरव ने फिर पढ़ाई शुरू की। दिन में वह मोटर मैकेनिक का प्रशिक्षण लेता, शाम को गैरेज में काम करता। राघव ने खर्च उठाने को कहा, पर आरव ने मुस्कुराकर कहा, “पहला महीना उधार दे दो। लिखकर दूँगा।”
राघव ने पहली बार खुलकर हँसा।
“ब्याज लगाऊँगा।”
दोनों समझ गए कि वह उधार नहीं था। वह सम्मान था।
अगले जन्मदिन पर मीरा ने सूजी का हलवा बनाया। थोड़ा ज्यादा मीठा था, लेकिन सबने चुपचाप खाया। राघव ने जेब से खजूर की पत्ती से बनी चिड़िया निकाली। वैसी ही, जैसी 15 साल पहले महेन्द्र ने कुचल दी थी।
आरव ने उसे दोनों हाथों से लिया। उसकी आँखें भर आईं।
“अब इसे कोई नहीं तोड़ेगा,” राघव ने कहा।
1 साल बाद आरव खाटूवास लौटा। हवेली खाली थी। पशुशाला की छत गिर चुकी थी। दीवार से लोहे का छल्ला निकाल दिया गया था, पर उसका काला निशान बचा था—एक घाव की तरह, जो झूठ बोलने से इनकार करता था।
कुछ लोग दूर से उसे देख रहे थे। किसी ने उसका नाम पुकारा। उसने जवाब नहीं दिया।
नफरत से नहीं।
क्योंकि उसने समझ लिया था कि कुछ जगहें विदाई के लायक भी नहीं होतीं। वहाँ से बस निकल जाना होता है।
उसने पत्ती की चिड़िया उसी पत्थर पर रख दी, जहाँ राघव ने 15 साल रातें काटी थीं। हवा ने उसे धीरे से हिलाया।
उसे एक पल के लिए सब दिखा—कीचड़ में बँधा चाचा, खून से भीगा बच्चा, आग में डिब्बा पकड़े माँ, और वह श्राप जो किसी ने उसके माथे पर पत्थर की तरह रख दिया था।
फिर उसने आसमान देखा।
साफ था।
सड़क पर गाड़ी में मीरा बैठी थी। राघव ने दरवाज़ा खोल रखा था।
“और देखना है?” राघव ने पूछा।
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं। यहाँ अब मेरा कुछ नहीं।”
गाड़ी आगे बढ़ी। पीछे किसी बच्चे की आवाज़ आई, “माँ, देखो, धूल बैठ गई!”
आरव ने खिड़की से बाहर देखा।
सचमुच, धूल बैठ चुकी थी।
और 15 साल बाद पहली बार चौधरी हवेली के ऊपर का आसमान बिल्कुल साफ था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.