
PART 1
तीसरे घंटे की ड्राइव के बाद जब कर्नल अंजलि राठौड़ अपने पति को बिना बताए सरप्राइज देने गुरुग्राम के उस चमचमाते टावर में पहुँची, तो गेट पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड ने सिर झुकाकर कहा, “मैडम, साहब की पत्नी तो पहले ही ऊपर हैं।”
वह वाक्य संगमरमर के फर्श पर गिरकर जैसे हजार टुकड़ों में बिखर गया।
अंजलि वहीं ठिठक गई। उसके कंधों पर भारतीय सेना की औपचारिक वर्दी थी, सीने पर पदक करीने से लगे थे, और हाथ में एक छोटा-सा काला बैग था। वह जयपुर से लगभग 3 घंटे कार चलाकर आई थी। सैन्य समारोह जल्दी समाप्त हो गया था और उसे 2 सप्ताह पहले घर लौटने की अनुमति मिल गई थी। उसने न राजीव को संदेश भेजा, न फोन किया। उसने सोचा था, इतने सालों बाद अचानक दरवाजे पर उसे देखकर राजीव की आँखों में वही पुरानी चमक लौट आएगी।
लेकिन गार्ड उसे इस तरह देख रहा था जैसे वह किसी और की जिंदगी में गलती से दाखिल हो गई हो।
“मैं अंजलि राठौड़ मेहरा हूँ,” उसने धीमी आवाज में कहा, “राजीव मेहरा की पत्नी।”
गार्ड का चेहरा सफेद पड़ गया।
“जी मैडम… मेरा मतलब… मैडम मेहरा तो रोज आती हैं। अभी 31वीं मंजिल पर गई हैं।”
अंजलि ने शोर नहीं किया। उसने काउंटर पर हाथ नहीं मारा। वह बस खड़ी रही, क्योंकि उसने युद्धक्षेत्र में सीखा था कि सबसे खतरनाक विस्फोट अक्सर भीतर होते हैं।
तभी निजी लिफ्ट खुली।
एक औरत बाहर आई। क्रीम रंग की साड़ी, मोतियों की पतली माला, सधे हुए कदम, और वह शांत मुस्कान जो सिर्फ उन लोगों के चेहरे पर होती है जिन्हें दुनिया रास्ता देना सीख चुकी होती है। दो कर्मचारी तुरंत हट गए।
“नमस्ते, मैडम मेहरा।”
औरत ने हल्के से सिर हिलाया।
अंजलि की साँस अटक गई।
क्योंकि उस औरत के गले में वही चाँदी का छोटा-सा 5 कोनों वाला पदक था, जिसके किनारे पर हल्की खरोंच थी। राजीव ने वह पदक अंजलि को उस रात दिया था जब कश्मीर में एक कठिन ऑपरेशन के बाद उसे विशेष सम्मान मिला था। उसने रसोई में खड़े होकर रोते हुए कहा था, “मुझे गर्व है कि मैं तुम्हारा पति हूँ।”
अब वही पदक किसी और के गले में चमक रहा था।
उसके सम्मान की तरह।
उसकी जगह की तरह।
उसकी पूरी जिंदगी की तरह।
औरत ने एक पल के लिए अंजलि की तरफ देखा। न डर, न हैरानी। जैसे वह उसे पहचानती हो, फिर भी गुजर जाना अपना अधिकार समझती हो।
अंजलि टावर से बाहर निकल आई। बाहर दिल्ली-गुरुग्राम की सड़क पर गाड़ियाँ भाग रही थीं, हॉर्न बज रहे थे, लोग फोन पर हँस रहे थे, जैसे दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ा कि अभी-अभी एक पत्नी अपनी ही जिंदगी के दरवाजे से बाहर कर दी गई है।
उसका फोन बजा।
राजीव का संदेश था।
“तुम बहुत याद आ रही हो, जान। बस 15 दिन और, फिर तुम घर होगी।”
अंजलि देर तक स्क्रीन देखती रही।
राजीव को लगता था कि वह अभी जयपुर में है।
या शायद वह जानता था कि वह लौट चुकी है।
उसी रात अंजलि ने कनॉट प्लेस के पास एक होटल में अपने मायके वाले नाम, अंजलि राठौड़, से कमरा लिया। कमरे में पहुँचकर उसने पर्दे बंद किए, वर्दी को कुर्सी पर रखा और लैपटॉप खोल दिया।
उसने कंपनी का नाम लिखा।
मेहरा स्ट्रैटेजिक कंसल्टिंग।
तस्वीरें खुलती चली गईं। राजीव बड़े उद्योगपतियों, नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक संस्थाओं के बीच मुस्कुरा रहा था। लगभग हर तस्वीर में वही औरत उसके बगल में थी।
रिया मेहरा।
संस्थापक की पत्नी।
एक तस्वीर में रिया अंजलि के वसंत विहार वाले घर की ड्राइंग रूम में खड़ी थी, उसी पीतल के दीये के पास जो अंजलि की माँ ने उसकी शादी पर दिया था। दूसरी तस्वीर में उसने वे मोती के झुमके पहने थे जिन्हें अंजलि ने अपनी अलमारी में बंद समझ रखा था। तीसरी तस्वीर में वह सेना परिवारों के लिए आयोजित एक चैरिटी डिनर में वही पदक पहने मुस्कुरा रही थी, और राजीव उसके पीछे तालियाँ बजा रहा था।
अंजलि ने लैपटॉप बंद कर दिया।
तभी फोन बजा।
उसकी बेटी, नेहा।
“माँ… आप दिल्ली आ गई हो?”
अंजलि सीधी बैठ गई।
“तुझे कैसे पता?”
कुछ पल सन्नाटा रहा।
“पापा ने अभी फोन किया था। उन्होंने कहा अगर आप मुझसे संपर्क करें तो मैं उन्हें तुरंत बता दूँ।”
अंजलि ने खिड़की के बाहर देखा। बारिश में हेडलाइट्स जख्मों जैसी चमक रही थीं।
राजीव जानता था।
और उसी पल अंजलि समझ गई कि यह सिर्फ एक प्रेमिका की कहानी नहीं थी। यह उससे कहीं पुरानी, गहरी और गंदी साजिश थी।
PART 2
“नेहा, आज रात अपने पापा को वापस फोन मत करना,” अंजलि ने कठोर आवाज में कहा।
“माँ, हुआ क्या है?”
“मुझे अभी सब नहीं पता। लेकिन मैं पता लगाऊँगी।”
फोन रखने के बाद अंजलि ने अपनी पुरानी साथी फराह खान को बुलाया। फराह कभी सेना की खुफिया शाखा में थी। वह सच को चीनी में लपेटकर नहीं बोलती थी।
सब सुनकर उसने सिर्फ इतना कहा, “राजीव से अभी मत मिलना। वह पहले से कहानी बना चुका है।”
अगले 5 दिन अंजलि ने उसी टावर के बाहर एक साधारण कार में बैठकर निगरानी की। रिया हर सुबह सफेद एसयूवी में आती। रिसेप्शन उसे मालिकन की तरह सलाम करता। दोपहर में राजीव उसके कंधे पर हाथ रखकर निजी लिफ्ट में जाता। वे छिपे हुए प्रेमी नहीं लगते थे। वे बसे हुए लोग लगते थे।
तीसरे दिन फराह ने पुराने अखबार, कंपनी रजिस्ट्रियां और फाउंडेशन के कागज निकाले। रिया 5 साल पहले राजीव की कंपनी में आई थी। फिर सैनिक परिवारों के नाम पर बनी फाउंडेशन की निदेशक बनी। फिर धीरे-धीरे हर जगह “रिया मेहरा, राजीव मेहरा की पत्नी” कहलाने लगी।
अंजलि ने अपनी छोटी बहन पूजा को फोन किया।
“तू रिया को जानती है?”
फोन के उस पार खामोशी ने सब कह दिया।
“दीदी… राजीव जी ने कहा था आप दोनों अलग हो चुके हो।”
अंजलि के हाथ सुन्न हो गए।
“और तूने मान लिया?”
“उन्होंने कहा था आप करियर के लिए घर छोड़ चुकी हो… आप भावनात्मक रूप से टूट चुकी हो… रिया उन्हें संभाल रही है।”
उसी शाम वसंत विहार की पड़ोसी मिसेज सूद ने धीमे से बताया, “बेटा, वह औरत लगभग 2 साल से तुम्हारे घर में रह रही है।”
PART 3
उस रात अंजलि और फराह वसंत विहार की उसी सड़क पर खड़ी थीं, जहाँ कभी नेहा ने साइकिल चलाना सीखा था। घर की खिड़कियों से पीली रोशनी बाहर गिर रही थी। अंदर वही शीशम की डाइनिंग टेबल थी, वही नीली दीवार थी, वही कोना था जहाँ अंजलि ने अपनी माँ की तस्वीर लगाई थी।
8:40 पर राजीव की कार रुकी।
दरवाजा खुलने से पहले ही रिया बाहर आई। उसने राजीव का बैग लिया, उसका कॉलर ठीक किया, और उसके गाल को इस सहजता से छुआ जैसे वह वर्षों से उसी घर की शामों की मालिक हो।
फराह ने फुसफुसाकर कहा, “यह रिश्ता नहीं, कब्जा है।”
अंजलि की नजर रिया के हाथ पर पड़ी।
वह सिर्फ पदक नहीं पहने थी।
उसकी उंगली में अंजलि की सालगिरह वाली अंगूठी भी थी। वही अंगूठी जिसके बारे में राजीव ने कहा था कि वह बैंक लॉकर में रखी है, ताकि अंजलि की पोस्टिंग के दौरान खो न जाए।
अंजलि कार का दरवाजा खोलने लगी।
फराह ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अभी गई तो वह तुझे पागल साबित कर देगा। यही किरदार उसने तेरे लिए बनाया है।”
अंजलि काँप रही थी।
“वह मेरे बिस्तर पर सोती है।”
“तो हम यह तय करेंगे कि वह वहाँ आखिरी बार जागे।”
अगले दिन फराह उसे दिल्ली की एक तेज-तर्रार वकील, मीरा माथुर, के पास ले गई। मीरा ने सब कुछ सुना, फिर बहुत शांत स्वर में पूछा, “आपके निवेश, कंपनी के हिस्से और शादी के बाद खरीदी संपत्तियों की देखभाल कौन करता था?”
अंजलि की गर्दन झुक गई।
“राजीव।”
मीरा ने फाइल बंद की।
“तो यह सिर्फ वैवाहिक धोखा नहीं है।”
कुछ दिनों बाद एक फॉरेंसिक अकाउंटेंट, अरुण भसीन, 6 मोटी फाइलें लेकर आया। हर फाइल में राजीव की किसी नई परत का सच था। रिया से जुड़ी कंपनियों को दिए गए झूठे कंसल्टिंग भुगतान, फाउंडेशन के नाम पर निकाले गए पैसे, सैनिकों की विधवाओं के लिए आए दान से खरीदे गए महंगे गहने, कंपनी से चुकाया गया वह किराया जहाँ रिया पहले रहती थी, और वसंत विहार के घर की मरम्मत के बिल जिन्हें “कॉर्पोरेट गेस्ट हाउस खर्च” दिखाया गया था।
“कितना?” अंजलि ने पूछा।
अरुण ने चश्मा ठीक किया।
“शुरुआती जाँच में 82 करोड़ से अधिक।”
अंजलि उस रकम पर नहीं टूटी।
वह इस बात पर टूटी कि हर दस्तावेज यह साबित कर रहा था कि राजीव ने सिर्फ धोखा नहीं दिया, उसने एक दूसरी जिंदगी बनाई थी। बैठकों, चेकों, झूठे हस्ताक्षरों और खरीदी हुई चुप्पियों से बनी हुई जिंदगी।
फिर नेहा होटल आई।
उसका चेहरा थका हुआ था, आँखें लाल थीं। वह दरवाजे पर ही रुक गई।
“माँ, पापा कहते थे आपने हमेशा देश को परिवार से ऊपर रखा।”
अंजलि का दिल जैसे एक क्षण को रुक गया।
“नेहा…”
“जब आरव पैदा हुआ था और आप नहीं आईं, उन्होंने कहा था कि इंतजार करना छोड़ दो। माँ को मेडल ज्यादा प्यारे हैं।”
अंजलि ने मुँह पर हाथ रख लिया।
उसे वह रात याद थी। वह सीमा पर एक ऑपरेशन में फँसी थी। उसने राजीव को रोते हुए फोन किया था और कहा था, “नेहा से कहना मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ। कहना मेरा दिल टूट रहा है कि मैं वहाँ नहीं हूँ।”
राजीव ने कहा था, “चिंता मत करो, वह समझती है।”
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा था।
बल्कि उसने उस अनुपस्थिति को हथियार बना दिया था।
नेहा फूटकर रो पड़ी।
“मैंने आपसे नफरत की, माँ। मुझे लगा आप आना ही नहीं चाहती थीं।”
अंजलि ने उसे बाँहों में भर लिया।
“मैंने तुझे हर दिन प्यार किया। उन रातों में भी जब मैं दूर थी। खासकर तब।”
दोनों बहुत देर तक रोती रहीं। इतने सालों से राजीव ने उनके बीच जो खामोशियाँ रखी थीं, जो अधूरे संदेश दबाए थे, जो शिकायतें बोई थीं, वे एक-एक कर टूटती चली गईं।
कुछ देर बाद नेहा ने काँपती आवाज में कहा, “शुक्रवार को कंपनी के 25 साल पूरे होने की पार्टी है। ताज पैलेस में। पूरा परिवार, मीडिया, निवेशक, फाउंडेशन के लोग, सब होंगे।”
मीरा ने सिर उठाया।
नेहा बोली, “निमंत्रण पत्र पर लिखा है, राजीव और रिया मेहरा आपको आमंत्रित करते हैं।”
फराह के होंठों पर कड़वी मुस्कान आई।
“कमाल है। उसने सब गवाह खुद बुला लिए।”
मीरा ने समझाया कि कानूनी रास्ता शांत भी हो सकता है। अदालत में, दस्तावेजों के साथ, बिना तमाशे के। लेकिन अंजलि ने रिया की वह तस्वीर देखी जिसमें वह सैनिक परिवारों के कार्यक्रम में उसका पदक पहने खड़ी थी।
“उसने मुझे सार्वजनिक रूप से मिटाया है,” अंजलि ने कहा, “मैं सार्वजनिक रूप से लौटूँगी।”
शुक्रवार की शाम ताज पैलेस का बड़ा हॉल रोशनी से भरा था। झूमर चमक रहे थे, फूलों की सजावट थी, कैमरे घूम रहे थे। 400 से अधिक मेहमान थे। कोई राजीव की दूरदर्शिता की तारीफ कर रहा था, कोई उसकी पारिवारिक मूल्यों वाली छवि की।
राजीव मंच पर काले बंदगले में खड़ा था। रिया उसके साथ गहरे नीले गाउन में थी।
उसके गले में वही चाँदी का पदक चमक रहा था।
बड़े दरवाजों के पीछे अंजलि खड़ी थी। उसके साथ नेहा, फराह, मीरा और अरुण थे। अंजलि ने फिर वही औपचारिक वर्दी पहनी थी। किसी को डराने के लिए नहीं। खुद को याद दिलाने के लिए कि वह मिटाई हुई औरत नहीं, अपने जीवन की असली गवाह है।
नेहा ने उसका हाथ पकड़ा।
“माँ, आप तैयार हैं?”
अंजलि ने गहरी साँस ली।
“डर लग रहा है। लेकिन अब रुकना उससे बड़ा डर है।”
जब दरवाजे खुले तो पहले किसी ने ध्यान नहीं दिया। फिर एक वर्दीधारी महिला हॉल के बीचोंबीच चलती दिखाई दी। आवाजें धीमी होने लगीं। कैमरे उसकी तरफ घूम गए। सामने बैठे एक रिटायर्ड जनरल सम्मान में खड़े हो गए। पूजा का चेहरा buffet के पास सफेद पड़ गया। मिसेज सूद ने मुँह पर हाथ रख लिया।
अंजलि बिना जल्दी किए मंच तक पहुँची।
राजीव ने उसे देखा।
उसकी मुस्कान मर गई।
रिया ने तुरंत पदक पर हाथ रख दिया, जैसे उसे हथेली में छिपाया जा सकता हो।
“शुभ संध्या, राजीव,” अंजलि ने कहा।
राजीव मंच से एक सीढ़ी नीचे उतरा।
“अंजलि, यहाँ नहीं।”
“5 साल से तुमने तय किया कि मैं कहीं भी नहीं हूँ।”
हॉल में हलचल दौड़ गई।
राजीव ने मेहमानों की तरफ बनावटी मुस्कान फेंकी।
“मेरी पत्नी मुश्किल मानसिक दौर से गुजर रही हैं। कृपया हमारी निजी बातों का सम्मान करें।”
नेहा आगे आई।
“अब बस, पापा।”
राजीव चौंका।
“नेहा, यह तुम्हारा मामला नहीं है।”
“आपने मेरी हर चोट को अपना मामला बनाया था।”
सन्नाटा जम गया।
अंजलि ने भीड़ की तरफ मुड़कर कहा, “मेरा नाम कर्नल अंजलि राठौड़ मेहरा है। मैं भारतीय सेना में अधिकारी हूँ और पिछले 31 साल से राजीव मेहरा की वैध पत्नी हूँ।”
हॉल में जैसे हवा खिंच गई।
किसी ने धीरे से पूछा, “तो रिया कौन है?”
मीरा आगे आई। उसके हाथ में फाइल थी।
“मेहमानों, निवेशकों, फाउंडेशन के दानदाताओं और संबंधित अधिकारियों को कुछ गंभीर दस्तावेज देखने चाहिए। इनमें फाउंडेशन की धनराशि, फर्जी भुगतान, व्यक्तिगत खर्च और सार्वजनिक रूप से वैवाहिक पहचान के गलत उपयोग से जुड़े तथ्य हैं।”
राजीव अंजलि का हाथ पकड़ने बढ़ा।
नेहा बीच में आ गई।
“उन्हें छूना मत। आप उन्हें चुप नहीं कर पाएँगे।”
उस एक वाक्य ने जैसे आखिरी ताला तोड़ दिया।
अरुण ने दस्तावेज बाँटे। उसने तारीखें बताईं, कंपनियों के नाम बताए, बैंक ट्रांसफर समझाए, झूठे बिल दिखाए, उन दान की सूची पढ़ी जो घायल सैनिकों के परिवारों तक कभी पहुँचे ही नहीं। उसकी आवाज शांत थी, लेकिन हर शब्द राजीव की छवि पर हथौड़े जैसा गिर रहा था।
राजीव ने पहले हँसने की कोशिश की। फिर बोला प्रशासनिक गलती है। फिर बोला अंजलि भावुक है। फिर बोला शादी बहुत पहले टूट चुकी थी।
पर इस बार किसी ने उसकी बात को सच मानने की जल्दी नहीं की।
एक पत्रकार ने पूछा, “कर्नल मेहरा, क्या आप कह रही हैं कि आपके पति ने आपकी सेवा के दौरान दूसरी महिला को सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी बताया?”
अंजलि ने राजीव को देखा। उसे वह आदमी याद आया जिसने कभी उसकी सफलता पर आँसू बहाए थे। फिर वही आदमी दिखा जिसने उसकी बेटी के दिल में उसके खिलाफ जहर भरा था।
“मैं कह रही हूँ कि उसने मेरा नाम, मेरा घर, मेरी चीजें और मेरी बेटी का विश्वास एक झूठ को दे दिया। बाकी बातें दस्तावेज कहेंगे।”
रिया धीरे-धीरे मंच से हटने लगी।
फराह उसके रास्ते में खड़ी हो गई।
“इतनी जल्दी, मैडम मेहरा?”
रिया ने राजीव की तरफ देखा। मदद माँगती हुई।
राजीव ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
अंजलि ने उसी पल समझ लिया कि यह कोई महान प्रेम कहानी नहीं थी। रिया को चमकदार जगह चाहिए थी। राजीव को आज्ञाकारी मुखौटा। दोनों ने एक-दूसरे का इस्तेमाल किया था, जब तक रोशनी उनकी तरफ से हटकर सच पर नहीं पड़ गई।
कंपनी के बोर्ड अध्यक्ष ने फाइल बंद की।
“राजीव, आज रात ही आपसे सारे पदों से अलग होने का अनुरोध किया जाएगा। जांच तत्काल शुरू होगी।”
पार्टी बिना संगीत खत्म हुई। कैमरे चलते रहे। लोग फुसफुसाते रहे। कुछ रिश्तेदार आँखें चुराते रहे। पूजा अंजलि के पास आई, लेकिन अंजलि ने हाथ उठा दिया।
“अभी नहीं।”
अगले 48 घंटों में राजीव को कंपनी से निलंबित कर दिया गया। रिया को फाउंडेशन और सभी पदों से हटाया गया। खातों की जांच शुरू हुई। दानदाताओं ने audit माँगा। मीडिया ने इसे “दिल्ली की सबसे महंगी दोहरी जिंदगी” कहा। अंजलि ने सिर्फ 1 रिपोर्ट देखी, फिर टीवी बंद कर दिया।
राजीव ने उसे 63 बार फोन किया।
उसने एक बार भी जवाब नहीं दिया।
कुछ सप्ताह बाद उसका हाथ से लिखा पत्र आया। उसमें लिखा था कि वह अकेला था, अंजलि हमेशा duty पर थी, रिया ने उसे समझा, चीजें हाथ से निकल गईं। अंजलि ने पत्र पूरा पढ़ा और वकील की फाइल में रख दिया। उसने उसे जलाया नहीं। राख नाटकीय होती है। उसे प्रतीक नहीं, सबूत चाहिए थे।
8 महीने बाद वसंत विहार का घर बिक गया। आखिरी दिन अंजलि वहाँ अकेली गई। दीवारों से तस्वीरें उतर चुकी थीं। कमरे खाली थे। फर्श पर आवाज गूँजती थी। वह उस रसोई में गई जहाँ राजीव ने पहली पदोन्नति पर उसे मिठाई खिलाई थी। उस कमरे में गई जहाँ नेहा ने 10वां जन्मदिन मनाया था। उस bedroom में गई जहाँ रिया इस विश्वास से सोई होगी कि दीवारें असली मालिक का नाम भूल जाएँगी।
ड्रेसिंग रूम के शीशे के सामने अंजलि रुकी।
कई महीनों तक उसे लगता रहा था कि रिया ने उसकी जिंदगी चुरा ली।
लेकिन खाली घर में खड़े-खड़े उसे समझ आया, रिया ने सिर्फ टुकड़े पहने थे।
एक पदक।
एक अंगूठी।
एक नाम।
एक घर की चाबी।
एक निमंत्रण पत्र की पंक्ति।
लेकिन किसी के गहने पहन लेने से कोई उसकी यात्रा नहीं पहन लेता। किसी के बिस्तर पर सो लेने से कोई उसकी पत्नी नहीं बन जाता। किसी की बेटी की चुप्पी का फायदा उठा लेने से कोई माँ नहीं बन जाती।
घर छोड़ने से पहले अंजलि ने गेट के पास लगा छोटा गुलाब का पौधा सावधानी से निकाला। नेहा ने उसे 12 साल की उम्र में चुना था। वह जिद्दी पौधा था, खराब मौसम, उपेक्षा और गलत छँटाई के बाद भी बचा रहा था। अंजलि ने उसे बड़े गमले में रखा और कार में रखकर नोएडा चली गई, जहाँ उसने नेहा के घर से 10 मिनट दूर एक छोटा-सा घर लिया था।
वह घर कम भव्य था, लेकिन उजला था। रसोई में धूप आती थी। लकड़ी का फर्श हल्का चरमराता था। छोटा-सा आँगन था जहाँ उसके नाती-पोते बिना अनुमति दौड़ सकते थे।
तलाक लगभग 1 साल चला। राजीव ने कंपनी की कमान खोई, संपत्ति का बड़ा हिस्सा खोया, और सबसे अधिक वह प्रतिष्ठा खोई जिसे वह चाँदी के बर्तन की तरह चमकाता था। रिया दिल्ली के उन घेरे से गायब हो गई जहाँ पैसा सम्मान का नकाब बन जाता है। पूजा ने कई माफी भरे संदेश भेजे। अंजलि ने अंततः उसे फोन किया, पूरी तरह क्षमा करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी निराशा का बोझ अकेले न ढोने के लिए।
नेहा के साथ रास्ता लंबा था।
दोनों को राजीव के बिना बात करना सीखना पड़ा। यादों को दोबारा जाँचना पड़ा। माफी माँगनी पड़ी, बिना सफाई दिए। यह मानना पड़ा कि प्यार हमेशा खोए हुए साल वापस नहीं लाता, पर वह बाकी बचे समय को बचा सकता है।
रविवार पवित्र हो गए। नेहा आरव और छोटी इरा को लेकर आती। कभी राजमा बनता, कभी आलू परांठे, कभी सूजी का हलवा। बच्चे आँगन में दौड़ते। अंजलि नेहा की बातें सुनती। स्कूल, नौकरी, bills, बच्चों की जिद, सब। वह कम सलाह देती। बहुत सालों तक उसके बारे में किसी और ने झूठे उत्तर दिए थे। अब वह बस उपस्थित रहना चाहती थी।
एक वसंत दोपहर आरव को अलमारी में रखी छोटी डिब्बी मिली।
“नानी, ये आपका है?”
अंजलि गुलाब के पौधे में पानी दे रही थी। उसने मुड़कर देखा।
डिब्बी में वही चाँदी का पदक था। किनारे की खरोंच अब भी थी।
“हाँ,” उसने कहा।
“फिर ये डिब्बी में क्यों रखा है?”
नेहा घबराकर माँ को देखने लगी।
अंजलि ने पदक हथेली पर रखा।
“कभी-कभी जो चीज कीमती होती है, उसे दुनिया को दिखाना जरूरी नहीं होता। बस खुद को याद रहना चाहिए।”
आरव ने मासूमियत से पूछा, “मम्मी ने कहा था किसी आंटी ने इसे पहना था।”
नेहा का चेहरा लाल हो गया।
अंजलि हल्के से मुस्कुराई।
“हाँ, उसने पहना था।”
“उसने चुराया था?”
अंजलि कुछ पल चुप रही। खिड़की के बाहर गुलाब का पौधा फूलों से भरने लगा था।
“उसने सोचा था कि जो चमकता है, उसे पहनकर वह उसका मतलब भी ले सकती है।”
“ले पाई?”
अंजलि ने डिब्बी बंद कर दी।
“नहीं, बेटा। पदक पहनने वाले की कहानी नहीं बताता। वह बताता है कि उसे पाने के लिए किसी ने क्या सहा है।”
आरव ने गंभीर होकर पूछा, “तो ये भारी नहीं है?”
अंजलि की आँखें नम हो गईं।
“है। लेकिन यह मेरा वजन है।”
उस शाम बच्चों के जाने के बाद नेहा थोड़ी देर और रुकी। दोनों आँगन में बैठीं। आसमान बैंगनी हो रहा था। गुलाब की खुशबू हवा में थी।
नेहा ने सिर माँ के कंधे पर रख दिया।
“मुझे अफसोस है कि मैंने आपको अनुपस्थित समझा।”
अंजलि ने उसकी उंगलियाँ थाम लीं।
“तू बच्ची थी। फिर घायल माँ बनी। वह जानता था कि वह क्या कर रहा है।”
“आपको उस रात पार्टी में जाने का पछतावा होता है?”
अंजलि ने गुलाब को देखा।
“कभी-कभी पछतावा होता है कि मुझे वह करना पड़ा। लेकिन करने का नहीं।”
नेहा और करीब सरक आई।
अंजलि ने आँखें बंद कर लीं।
सच्चा न्याय राजीव का 400 लोगों के सामने गिरना नहीं था। न मीडिया की headlines। न जमे हुए खाते। न वे माफियाँ, जो उन लोगों ने दीं जिन्होंने एक सफल आदमी की बात पर जल्दी भरोसा कर लिया और एक अनुपस्थित औरत का सच पूछना जरूरी नहीं समझा।
सच्चा न्याय यह था।
नेहा का सिर उसके कंधे पर था।
आरव और इरा की हँसी अब भी आँगन में गूँज रही थी।
गुलाब फिर से फूल रहा था।
और अंजलि अब बिना इस डर के सो सकती थी कि कोई और उसकी जिंदगी की कहानी उसकी जगह लिख देगा।
राजीव ने उसके घर में दूसरी औरत बिठाई थी।
लोगों ने उसे मैडम मेहरा कहा था।
उसने उसका पदक पहना था।
एक गार्ड ने अंजलि को उसके अपने अस्तित्व के दरवाजे पर अजनबी समझ लिया था।
लेकिन सच को कभी स्थायी रूप से बाहर नहीं रखा जा सकता।
उसे बस इतना चाहिए होता है कि असली मालिक 2 सप्ताह पहले लौट आए।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.