
भाग 2
उस रात सांतियागो सो नहीं सका।
वह होटल के बिस्तर पर बैठा रहा, मोबाइल हाथ में लिए, धुंधली तस्वीर को बार-बार ज़ूम करके देखता रहा।
तस्वीर हिल गई थी।
सड़क की रोशनी चेहरों को धुंधला कर रही थी।
दोनों छोटी लड़कियाँ लगभग परछाइयों जैसी दिख रही थीं।
लेकिन हरे रंग की पोशाक पहने वह औरत अब भी वहीं थी।
बहुत ज़्यादा मिलती-जुलती।
बहुत ज़्यादा असली।
माउरो चुपचाप उसके सामने बैठ गया।
कई वर्षों में पहली बार उसने कोई मज़ाक नहीं किया।
उसने बस एक कप कॉफ़ी मेज़ पर रखी और कहा,
“कल फिर चलते हैं। लेकिन कोई पागलपन मत करना, ठीक है?”
तीन दिनों तक वे उसी इलाके में लौटते रहे।
सांतियागो खुद को एक टूटे हुए जासूस जैसा महसूस कर रहा था, जो किसी भूत के जेलाटो खरीदने आने का इंतज़ार कर रहा हो।
वह आइसक्रीम की दुकान के सामने बैठ जाता, टैबलेट पर नक्शे देखने का नाटक करता और हर गुज़रते चेहरे को ध्यान से देखता।
तीसरे दिन…
वह औरत अकेली दिखाई दी।
वह एक पुराने भवन से कपड़े का थैला और धूप का चश्मा पहने बाहर निकली।
चलते-चलते मोबाइल पर संदेश पढ़ रही थी।
सांतियागो बिना सोचे खड़ा हो गया।
“उसे डरा मत देना,” माउरो ने कहा।
लेकिन तब तक सांतियागो सड़क पार कर चुका था।
जब वह उसके सामने पहुँचा, उसके मुँह से शब्द ही नहीं निकले।
महिला ने सिर उठाया।
उनकी नज़रें मिलीं।
वह…
वालेरिया का चेहरा था।
वही नाक।
वही होंठ।
वही गहरी आँखें…
जिन्होंने उसके घर की रसोई में न जाने कितनी बार उसे बेबस कर दिया था।
लेकिन उनमें पहचान नहीं थी।
न डर।
न अपराधबोध।
सिर्फ़ विनम्र शिष्टता।
“स्कूज़ा… क्या मुझे जाने दोगे?” उसने अजीब-से लहजे में कहा, जिसमें इतालवी और स्पेनिश दोनों घुली हुई थीं।
सांतियागो ने मुश्किल से निगलते हुए कहा,
“माफ़ कीजिए।”
वह हल्का-सा मुस्कुराई और आगे बढ़ गई।
सांतियागो पीला पड़ा हुआ वापस मेज़ पर आकर बैठ गया।
माउरो बुदबुदाया,
“वही है।”
“नहीं,” सांतियागो ने टूटी हुई आवाज़ में जवाब दिया।
“वह औरत मुझे पहचानती ही नहीं थी।”
यह बात उसे उसे ज़िंदा देखने से भी ज़्यादा गहराई से लगी।
क्योंकि वालेरिया बहुत-सी बातें छिपा सकती थी…
लेकिन वह कभी उसे किसी अजनबी की तरह नहीं देख सकती थी।
उसकी आँखें हमेशा सच बता देती थीं।
अगर वह अभिनय करती…
तो वह पहचान लेता।
उसी रात उसने दोना रेबेका को फोन किया।
चार साल से ज़्यादा हो गए थे, दोनों ने बात नहीं की थी।
घंटी छह बार बजी।
“हेलो?”
“दोना रेबेका… मैं सांतियागो बोल रहा हूँ।”
दूसरी तरफ़ कुछ पल तक सन्नाटा छाया रहा।
वह हैरानी का नहीं…
डर का सन्नाटा था।
“सांतियागो… क्या हुआ?”
उसने आँखें बंद कर लीं।
“मुझे आपसे एक सवाल पूछना है।
और इस बार…
मुझसे झूठ मत बोलिए।”
“मैं समझी नहीं।”
“क्या वालेरिया की कोई बहन थी?”
सन्नाटा और भी भारी हो गया।
फिर दोना रेबेका की आवाज़ लगभग फुसफुसाहट की तरह सुनाई दी।
“तुम्हें यह किसने बताया?”
सांतियागो का खून जम गया।
उन्होंने यह नहीं कहा—
“नहीं।”
उन्होंने यह भी नहीं कहा—
“तुम पागल हो।”
उन्होंने पूछा—
“तुम्हें यह किसने बताया?”
“मैंने उसे रोम में देखा,” सांतियागो बोला।
“मैंने वालेरिया जैसी एक औरत देखी।
उसके कान के नीचे वही निशान था।
वह दो बच्चियों और एक आदमी के साथ थी।
मुझे बताइए…
आख़िर यह सब क्या हो रहा है?”
दोना रेबेका ने फोन काट दिया।
सांतियागो मोबाइल को ऐसे देखने लगा जैसे किसी ने उसके चेहरे पर थूक दिया हो।
माउरो धीरे से बड़बड़ाया,
“कमाल है…”
सांतियागो ने कहा,
“हम मेक्सिको जा रहे हैं।”
“आज सीधी फ्लाइट नहीं है।”
“तो बीच में कहीं रुककर जाएँगे।
मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।”
दो दिन बाद वे ग्वादलाहारा के चापालिता इलाके में दोना रेबेका के घर के सामने खड़े थे।
बैंगनी बोगनवेलिया अब भी लगी हुई थीं।
सफ़ेद लोहे का गेट वैसा ही था।
और दरवाज़े के पास ग्वादालूपे माता की वही प्रतिमा थी।
लेकिन जब उन्होंने दरवाज़ा खोला…
सांतियागो को लगा जैसे वह किसी और इंसान को देख रहा हो।
दोना रेबेका अब बहुत छोटी लग रही थीं।
बहुत बूढ़ी।
मानो आठ साल से अपनी पीठ पर पत्थरों का बोझ उठाए चल रही हों।
“अंदर आओ,” उन्होंने कहा।
बैठक में अब भी वालेरिया की ग्रेजुएशन वाली तस्वीर रखी थी।
उसे देखते ही सांतियागो को वही पुराना दर्द महसूस हुआ…
लेकिन इस बार उसमें गुस्सा भी मिला हुआ था।
“मुझे सच बताइए,” उसने कहा।
“अब आपको मुझे दिलासा देने की ज़रूरत नहीं है।
आप पर सच बताने का कर्ज़ है।”
दोना रेबेका हाथ कसकर पकड़कर बैठ गईं।
“उसका नाम…
लूसिया है।”
सांतियागो पलक तक नहीं झपका।
“वालेरिया की एक जुड़वाँ बहन थी।
बिल्कुल उसी जैसी।”
दरवाज़े के पास खड़ा माउरो अवाक रह गया।
सांतियागो को लगा जैसे ज़मीन हिल गई हो।
“वालेरिया ने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”
दोना रेबेका रोने लगीं।
“क्योंकि…
वालेरिया को भी यह नहीं पता था।”
यह जवाब किसी भी विश्वासघात से ज़्यादा दर्दनाक था।
सिसकियों के बीच उन्होंने पूरी कहानी सुनाई।
जब दोनों बच्चियाँ छह साल की थीं…
उनके पिता एर्नान रिवास तामाउलिपास के ख़तरनाक लोगों के साथ जुड़ गए थे।
वह सिर्फ़ हिंसक आदमी नहीं था।
वह पैसों, एहसानों और धमकियों का कारोबार करता था।
जब रेबेका उसे छोड़ना चाहती थीं…
तो उसने कसम खाई कि अगर वह बेटियों को लेकर भागीं…
तो वह पूरे देश में आग लगा देगा, लेकिन उन्हें ढूँढ़ निकालेगा।
रेबेका की बहन कैलिफ़ोर्निया में रहती थी।
वह माँ नहीं बन सकती थी।
एक रात…
बेहद निराशा में…
दोनों बहनों ने एक ऐसा फैसला किया…
जिसे बाद में कोई भी ठीक नहीं कर पाया।
रेबेका के पास वालेरिया रही।
उनकी बहन लूसिया को अपने साथ ले गई।
उन्होंने उपनाम बदल दिए।
संपर्क तोड़ दिया।
सारी तस्वीरें नष्ट कर दीं।
और उस विषय पर फिर कभी बात नहीं की।
“आपने उन्हें अलग कर दिया,” सांतियागो ने बेहद शांत लेकिन खतरनाक आवाज़ में कहा।
“मैंने उन्हें बचाया,” दोना रेबेका रोते हुए बोलीं।
“मैंने सारी ज़िंदगी खुद से यही कहा…
ताकि मैं पागल न हो जाऊँ।”
“और जब एर्नान मर गया?
क्योंकि वह मर चुका है, है ना?
वालेरिया ने मुझसे कहा था कि उसके पिता उसके बचपन में ही मर गए थे।”
दोना रेबेका ने नज़रें झुका लीं।
यहीं दूसरा सच सामने आया।
एर्नान वालेरिया के बचपन में नहीं मरा था।
वह क्रूज़ दुर्घटना से सिर्फ़ तीन साल पहले मरा था।
सांतियागो स्तब्ध रह गया।
“तीन साल पहले?”
“हाँ।”
“तो आपके पास पूरे तीन साल थे…
वालेरिया को यह बताने के लिए कि उसकी एक बहन है।”
“मैं नहीं कर पाई।”
“आपने करना ही नहीं चाहा।”
दोना रेबेका ने अपना चेहरा दोनों हाथों से ढँक लिया।
“मुझे डर था कि वह मुझसे नफ़रत करेगी।”
सांतियागो कड़वाहट से हँसा।
“तो आपने यह बेहतर समझा…
कि वह मर जाए…
बिना यह जाने कि उसकी जुड़वाँ बहन ज़िंदा है?”
दोना रेबेका चुप रहीं।
उनकी वही चुप्पी…
उनकी स्वीकारोक्ति थी।
सांतियागो के भीतर गुस्सा आग की तरह फैल गया।
आठ साल तक उसने सोचा था कि उसका दर्द सिर्फ़ समुद्र से है।
किस्मत से है।
उस टूटी हुई रेलिंग से है।
लेकिन अब उसे समझ आया…
कि वह उस परिवार का भी शिकार था…
जिसने परिणामों का सामना करने के बजाय…
सच को दफ़ना देना चुना।
आख़िरकार उसने पूछा,
“क्या वालेरिया सचमुच मर गई थी?”
दोना रेबेका ने आँसुओं से भरा चेहरा उठाया।
“हाँ, सांतियागो।
मेरी बेटी उसी क्रूज़ पर मरी थी।
यह बात कभी झूठ नहीं थी।”
वह उनसे और ज़्यादा नफ़रत करना चाहता था…
लेकिन उसी पल…
उसका एक हिस्सा फिर टूट गया।
वह मेक्सिको एक बचकानी उम्मीद लेकर लौटा था।
वह चाहता था कि सब झूठ निकले।
वालेरिया ज़िंदा हो।
वह उससे शिकायत कर सके।
उस पर चिल्ला सके।
या उससे नफ़रत करने के बाद भी उसे गले लगा सके।
लेकिन…
नहीं।
वालेरिया अब भी मर चुकी थी।
रोम वाली औरत…
उसकी पत्नी नहीं थी।
वह बस एक ऐसी ज़िंदगी थी…
जो उसी समय कहीं और जी रही थी…
और जिसे एक गुप्त फैसले ने उससे अलग कर दिया था।
“क्या लूसिया को सब पता है?” उसने पूछा।
दोना रेबेका ने सिर हिलाया।
“दुर्घटना के बाद मैंने उसे सब बता दिया।
जब मुझे समझ आ गया कि वालेरिया कभी वापस नहीं आएगी…
तो मैं और नहीं सह सकी।
मैंने उसे फोन किया।
कहा कि उसकी एक बहन थी…
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है।”
दरवाज़े के पास खड़े माउरो से रहा नहीं गया।
“वाह…
कितना सुविधाजनक।”
दोना रेबेका ने शर्म से उसकी ओर देखा।
सांतियागो ने गहरी साँस ली।
“मैं उससे मिलना चाहता हूँ।”
“उसका पति है।
दो बेटियाँ हैं।
वह इटली में रहती है।
वह कोई परेशानी नहीं चाहती।”
“परेशानी?”
सांतियागो खड़ा हो गया।
“परेशानी तो आपने उस दिन पैदा की थी…
जब आपने दो बच्चियों की ज़िंदगी के साथ भगवान बनने का खेल खेला था।
मैं उससे कुछ छीनना नहीं चाहता।
मैं बस यह जानना चाहता हूँ…
कि क्या वह उस बहन के बारे में जानना चाहती है…
जिसे उसने कभी पाया ही नहीं।”
उस दिन दोना रेबेका ने कोई जवाब नहीं दिया।
सांतियागो बिना अलविदा कहे चला गया।
अगले दो हफ्तों तक…
ज़िंदगी उसे नकली लगने लगी।
वह काम करता।
खाना खाता।
संदेशों का जवाब देता।
लेकिन सब कुछ दूर-दूर-सा लगता।
रात को उसने वह डिब्बा खोला…
जिसे उसने वर्षों से बंद रखा था।
वालेरिया के ख़त।
तस्वीरें।
सिनेमा के टिकट।
एक नैपकिन…
जिस पर उसने लिखा था—
“इतने भी गंभीर मत बनो, बेल्त्रान।”
उसे एक नीली डायरी भी मिली।
वह वालेरिया की थी।
उसने उसे कभी पूरी नहीं पढ़ा था।
उसे लगता था कि यह उसकी निजता का उल्लंघन होगा।
लेकिन उस रात…
जब सच उसे भीतर से काट रहा था…
उसने डायरी खोल दी।
क्रूज़ से चार महीने पहले की तारीख़ वाले एक पन्ने पर वालेरिया ने लिखा था—
“आज मैंने सपना देखा कि मेरे जैसी एक लड़की थी।
वह मैं नहीं थी।
वह सड़क के उस पार खड़ी मुझे देख रही थी और कह रही थी कि मैं देर से पहुँची।
अजीब है।
कभी-कभी लगता है जैसे मेरी ज़िंदगी में कोई कमी है…
लेकिन ऐसा कहना बहुत पागलपन लगेगा।”
सांतियागो ने अपना मुँह ढँक लिया।
वालेरिया उस खालीपन को महसूस करती थी…
लेकिन उसका नाम नहीं जानती थी।
दूसरे पन्ने पर लिखा था—
“जब भी मैं अपने बचपन के बारे में पूछती हूँ, माँ अजीब हो जाती हैं।
विषय बदल देती हैं।
उनकी आवाज़ भर्रा जाती है।
शायद हर परिवार कुछ न कुछ छिपाता है।
या शायद…
मेरा परिवार सामान्य से थोड़ा ज़्यादा अजीब है।”
सांतियागो उतना रोया…
जितना अंतिम संस्कार के बाद भी नहीं रोया था।
अपने लिए नहीं।
वालेरिया के लिए।
क्योंकि वह यह सोचते हुए मर गई…
कि उसकी तन्हाई सिर्फ़ एक अजीब एहसास थी।
जबकि सच यह था…
कि उसकी ज़िंदगी से उसकी बहन छीन ली गई थी।
तीन दिन बाद…
उसे एक अनजान नंबर से संदेश मिला।
“हैलो, सांतियागो।
मैं लूसिया हूँ।
माँ ने बताया कि तुमने मुझे रोम में देखा था।
मुझे नहीं पता यह सही है या गलत…
लेकिन मेरा मानना है कि तुम उस बहन को जानते थे…
जिसे मैं कभी गले नहीं लगा सकी।
और मेरे पास ऐसे सवाल हैं…
जिनका जवाब यहाँ कोई नहीं दे सकता।”
सांतियागो ने वह संदेश बारह बार पढ़ा।
फिर जवाब लिखा—
“मेरे पास भी बहुत से सवाल हैं।
लेकिन सबसे बढ़कर…
मेरे पास उसकी यादें हैं।
अगर तुम सुनना चाहो…
तो वे तुम्हारी भी हैं।”
उनकी पहली फोन पर बातचीत छह घंटे चली।
लूसिया…
वालेरिया नहीं थी।
यह पहली बात थी…
जिसे सांतियागो को स्वीकार करना पड़ा।
उनकी आवाज़ मिलती थी।
लेकिन उनका स्वभाव बिल्कुल अलग था।
वालेरिया तेज़ बोलती थी।
उत्साहित हो जाती थी।
बीच में टोक देती थी…
और फिर माफ़ी माँग लेती थी।
लूसिया शांत थी।
सावधान थी।
हर शब्द बोलने से पहले सोचती थी।
वालेरिया को कॉफ़ी से नफ़रत थी।
लूसिया दिन में चार कप पीती थी।
वालेरिया पुराना गाना सुनते ही सुपरमार्केट में भी नाचने लगती थी।
लूसिया कहती थी कि उसके दोनों पैर बाएँ हैं…
और उसकी बेटियाँ उसका मज़ाक उड़ाती हैं।
लेकिन…
जब लूसिया पहली बार हँसी…
सांतियागो को अपनी आँखें बंद करनी पड़ीं।
वह वालेरिया नहीं थी।
लेकिन…
उस हँसी में…
वालेरिया का एक हिस्सा अब भी ज़िंदा था।
उसने लूसिया को सब कुछ बताया।
वह शाम…
जब वालेरिया ने रोमांटिक डिनर के लिए पूरा घर मोमबत्तियों से भर दिया था…
और लगभग फायर अलार्म बज गया था।
वह बेघर पिल्लों वाले विज्ञापन देखकर रो पड़ती थी।
उपहार हमेशा अलमारी की उसी दराज़ में छिपाती थी…
और जब सांतियागो उन्हें ढूँढ़ लेता…
तो नाराज़ हो जाती थी।
जब वह गुस्से में होती तो “नेता” कहती।
जब बहुत हँसती तो “अय, नो मांचेस” बोलती।
और जब सुलह करना चाहती…
तो कहती—
“मैं तुम्हें प्यार करती रहूँगी…
चाहे तुम कितने भी सीधे-सादे क्यों न हो।”
दूसरी तरफ़ लूसिया रो रही थी।
“मुझे लगता है…
मैं उसे याद कर रही हूँ,” उसने कहा।
“और इससे मुझे अपराधबोध होता है…
क्योंकि मैं उससे कभी मिली ही नहीं।”
“यह अपराधबोध नहीं है,” सांतियागो ने जवाब दिया।
“यह वह प्यार है…
जो बहुत देर से पहुँचा है।”
कुछ महीनों बाद…
लूसिया अपने पति मात्तेओ और अपनी दो बेटियों के साथ मेक्सिको आई।
मुलाक़ात उसी चापालिता वाले घर में हुई…
जहाँ इतने सालों तक सब कुछ छिपाया गया था।
दोना रेबेका ने पोसोले बनाया।
मानो एक खाना…
दशकों की चुप्पी को ठीक कर देगा।
लेकिन…
ऐसा नहीं हुआ।
जब लूसिया अंदर आई…
दोना रेबेका लगभग घुटनों पर गिर पड़ीं।
मानो वालेरिया सामने खड़ी हो…
और फिर भी न हो।
वही चेहरा…
लेकिन अलग ज़िंदगी।
दोनों बच्चियाँ पड़ोस के कुत्तों और मेक्सिकन मिठाइयों के पीछे भागते हुए बगीचे में चली गईं।
बड़े लोग तस्वीरों से घिरी बैठक में बैठे रहे।
सांतियागो एक डिब्बा लेकर आया।
उसमें वालेरिया के ख़त थे।
उसके झुमके।
नीली डायरी।
कढ़ाई वाला ब्लाउज़।
और वह चाँदी का कंगन…
जो क्रूज़ से बरामद हुआ था।
कंगन देखते ही लूसिया ने दोनों हाथ अपने सीने पर रख लिए।
“क्या…
मैं इसे छू सकती हूँ?”
सांतियागो ने सिर हिलाया।
लूसिया ने उसे बहुत सावधानी से उठाया।
मानो वह कोई पवित्र धरोहर हो।
“पूरी ज़िंदगी मुझे लगा…
मैं अकेली संतान हूँ,” उसने फुसफुसाकर कहा।
“और अब…
मेरी एक बहन है…
लेकिन सिर्फ़ उन चीज़ों में…
जो अब साँस नहीं लेतीं।”
दोना रेबेका रो पड़ीं।
“मुझे माफ़ कर दो, बेटी।”
लूसिया ने उनकी ओर देखा।
“किस बेटी से कह रही हो?
हम दोनों में से किससे?”
उस एक सवाल ने पूरे कमरे को खामोश कर दिया।
दोना रेबेका काँपने लगीं।
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