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सड़क हादसे के बाद अस्पताल में घायल पड़ा आदमी अपनी पुरानी मोहब्बत को डॉक्टर बनकर सामने देखता है, लेकिन जब मंगेतर ने कहा “यह मरीज स्टाफ को परेशान कर रहा है”, 15 साल पुरानी चिट्ठियों का सच खुलने लगा

भाग 1

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सड़क हादसे के बाद जब अर्जुन मेहरा ने पहली बार आँखें खोलीं, तो अस्पताल की सफेद रोशनी से पहले उसे एक औरत की काँपती आवाज़ सुनाई दी, जो उसका पूरा नाम ऐसे पुकार रही थी जैसे 15 साल से उसे अपने सीने में छिपाए बैठी हो।

“अर्जुन मेहरा… सुन पा रहे हो?”

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वह 33 साल का था, गुरुग्राम की बरसाती सड़क पर उसकी मोटरसाइकिल को एक तेज़ एसयूवी ने टक्कर मारी थी। हेलमेट टूटकर स्ट्रेचर के नीचे पड़ा था, बाएँ हाथ की त्वचा छिल चुकी थी, पसलियों में जलती हुई चोट थी और सिर के ऊपर घूमती अस्पताल की बत्तियाँ उसे ऐसा महसूस करा रही थीं जैसे भगवान ने अदालत लगा दी हो।

उसने होंठ हिलाए, पर आवाज़ नहीं निकली। तभी वह चेहरा उसके ऊपर झुका।

घने काले बाल पीछे बंधे हुए। आँखों में वही गहराई। ठोड़ी के पास वही छोटा तिल, जिसे वह कभी 12वीं की रसायन शाला में तीसरी बेंच से चुपचाप देखा करता था।

सान्वी कपूर।

स्कूल की वह लड़की, जिससे अर्जुन ने कभी अपने दिल की बात नहीं कही थी, क्योंकि वह कैंटीन में 25 रुपये बचाकर समोसा बाँटने वाला लड़का था और सान्वी शहर के सबसे बड़े अस्पताल मालिक की बेटी थी।

अब वह स्कूल की सफेद कुर्ती में नहीं थी। वह गहरे नीले अस्पताल के कपड़ों में थी, गले में पहचान पत्र था, हाथों में दस्ताने थे और चेहरे पर ऐसी गंभीरता थी, जैसे उसने लोगों को मौत के दरवाजे से खींचना सीख लिया हो।

“सान्वी?” अर्जुन की आवाज़ टूटी।

उसका चेहरा आधे पल के लिए बदल गया। पेशेवर सख्ती के नीचे कोई पुराना दर्द चमका, फिर उसने खुद को संभाल लिया।

“अच्छा है, याददाश्त बची है,” उसने धीमे से कहा, “अब मेरी उंगली देखो।”

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“पहले भी देखता था,” अर्जुन ने दर्द में बुदबुदाया।

सान्वी की भौं हल्की उठी। “क्या?”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं। “स्कूल में… तुम बहुत तेज़ चलती थीं।”

उसके होंठों पर मुस्कान आई, पर वह तुरंत छिप गई। “तुम्हें यह भी याद है?”

“बेकार बातें ज़्यादा याद रहती हैं।”

“आज शायद वही काम आएँगी।”

अस्पताल के आपात कक्ष में मशीनें बीप कर रही थीं। बारिश की गंध, दवाइयों की तीखी बू और डर से भरी आवाज़ें हवा में मिली थीं। सान्वी ने उसकी पुतलियाँ देखीं, कंधा दबाकर चोट जाँची, पसलियों के पास सावधानी से हाथ रखा। उसके हाथ स्थिर थे, लेकिन हर बार जब वह अर्जुन को छूती, उसकी उंगलियाँ आधे क्षण के लिए ठहर जातीं, जैसे वह घायल आदमी के भीतर उस लड़के को पहचान रही हो जो कभी स्कूल की सभा में सबसे पीछे खड़ा रहता था।

“जब तुम्हें लाए,” उसने बहुत धीरे कहा, “मैं डर गई थी।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा। यह बात चोट से ज़्यादा लगी।

“तुमने पहचान लिया था?”

“तुम्हारा पहचान पत्र देखते ही।”

वह कुछ और कहती, उससे पहले पर्दा सरका। एक लंबा, महँगे सूट वाला आदमी अंदर आया। उसकी कलाई की घड़ी इतनी चमकदार थी कि छोटे से आपात कक्ष में भी उसका अहंकार अलग दिख रहा था।

उसने पहले सान्वी को देखा, फिर अर्जुन को। उसके चेहरे पर मुस्कान आई, पर आँखों में गर्मी नहीं थी।

“सान्वी,” उसने कहा, “मुझे बताया गया तुम यहाँ हो।”

सान्वी का हाथ अर्जुन की कलाई से धीरे-धीरे हट गया। अर्जुन ने वह हरकत देख ली। ऐसे हाथ सिर्फ डर से नहीं हटते, आदत से हटते हैं।

“राघव, मैं काम पर हूँ,” सान्वी ने कहा।

राघव मल्होत्रा। नाम पहचान में आया। अस्पताल के गलियारों में उसके परिवार का नाम हर दान दीवार पर लिखा था। मल्होत्रा समूह, कपूर लाइफकेयर का साझेदार।

“तुम्हारी माँ का फोन आया था,” राघव बोला, “रविवार की पूजा पर आना मत भूलना।”

“मेरी डबल ड्यूटी है।”

“उन्होंने कहा था तुम यही कहोगी।”

सान्वी का चेहरा सख्त हो गया। “तो उन्हें मुझे अच्छी तरह जानना चाहिए।”

राघव की निगाह अर्जुन पर अटक गई। “तुम दोनों एक-दूसरे को जानते हो?”

“स्कूल से,” सान्वी ने कहा।

सिर्फ स्कूल से।

अर्जुन ने उस छोटे शब्द को भीतर उतरते महसूस किया।

राघव ने धीमे से मुस्कराकर कहा, “छोटी दुनिया है।”

अर्जुन दर्द में भी बोल पड़ा, “लेटे हुए आदमी के लिए दुनिया और छोटी हो जाती है।”

सान्वी ने खाँसकर हँसी दबाई। राघव नहीं हँसा।

वह सान्वी के थोड़ा और पास आया। “क्या हम बाहर बात कर सकते हैं?”

“नहीं। मेरे मरीज को सिर की जाँच के लिए भेजना है।”

“तुम हर बात को काम के पीछे क्यों छिपाती हो?”

कमरे की हवा भारी हो गई। अर्जुन को महसूस हुआ कि वह किसी ऐसी लड़ाई के बीच पड़ा है, जो उससे पहले से चल रही थी।

सान्वी ने चार्ट उठाया। “बाद में।”

राघव ने जाते-जाते अर्जुन को देखा। “जल्दी ठीक हो जाइए, अर्जुन।”

अर्जुन का दिल अटक गया।

सान्वी ने तुरंत उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में अचानक वही सवाल था जो अर्जुन के भीतर उठा था।

राघव को उसका नाम कैसे पता था?

पर्दा बंद हुआ, लेकिन तनाव वहीं रह गया।

अर्जुन ने धीमे से पूछा, “मंगेतर?”

सान्वी ने एक थकी हुई नज़र डाली। “दर्द की दवा ने तुम्हारी शर्म भी सुन्न कर दी?”

“शायद।”

वह कुछ क्षण चुप रही। “पूर्व मंगेतर… कम से कम मेरी तरफ से।”

अर्जुन ने छत देखी। “समझ गया।”

“तुम्हें अभी अपनी चोट पर ध्यान देना चाहिए।”

“मुश्किल है। तुमने अभी पूछा कि मुझे विदाई समारोह के बाद की कोई बात याद है। फिर एक महँगा तूफान अंदर चला आया।”

सान्वी का चेहरा बदल गया। उसने आसपास देखा, फिर बहुत धीरे पूछा, “तुम्हें सच में याद नहीं?”

अर्जुन ने आँखें बंद कीं।

स्कूल का आखिरी दिन। मैदान में कुर्सियाँ। सान्वी का नाम पुकारे जाने पर तालियाँ। उसकी माँ रो रही थी। उसके पिता नहीं आए थे। अर्जुन जल्दी निकल गया था क्योंकि उसे रात की शिफ्ट पर जाना था।

फिर बारिश। स्कूल का पिछला गेट। कोई रो रहा था।

“तुम रो रही थीं,” अर्जुन ने धीरे कहा। “तुमने कहा था कि घर नहीं जाना।”

सान्वी की आँखें भर आईं।

“तुमने अपनी जैकेट दी थी,” उसने फुसफुसाया।

अर्जुन की स्मृति अचानक खुल गई।

नीली डेनिम जैकेट। उसकी सबसे पसंदीदा। सान्वी स्कूल की दीवार से लगी खड़ी थी। उसके पिता और माँ काली कार के पास बहस कर रहे थे। वह काँप रही थी। अर्जुन उसे अपनी पुरानी कार में बैठाकर दिल्ली के यमुना किनारे पुराने पुल तक ले गया था। वे घंटों बारिश देखते रहे थे। उसने कहा था कि उसके माता-पिता ने उसका कॉलेज, विषय, दोस्त, जीवन सब तय कर दिया है। उसने कहा था कि वह अपने ही घर में खो रही है।

फिर सान्वी ने पूछा था, “तुम क्या चाहते हो?”

अर्जुन ने कहा था, “तुम भागो, इससे पहले कि तुम उनकी पसंद की इंसान बन जाओ।”

फिर एक और याद आई।

सान्वी का हाथ उसके गाल पर। काँपते होंठ। बारिश की आवाज़ के बीच पहला चुंबन।

अर्जुन ने आँखें खोल दीं। “तुमने मुझे चूमा था।”

सान्वी की मुस्कान दर्द से भरी थी। “तुमने भी।”

मशीन ने तेज़ बीप किया।

“फिर अगले दिन तुम चली गईं,” अर्जुन ने कहा।

सान्वी ने नीचे देखा। “पापा ने मुझे सुबह 5 बजे मुंबई भेज दिया। फोन ले लिया गया था। मैंने तुम्हें 3 चिट्ठियाँ लिखीं।”

अर्जुन ने गर्दन उठाने की कोशिश की। दर्द बिजली की तरह दौड़ा।

“मुझे कोई चिट्ठी नहीं मिली।”

सान्वी का चेहरा सफेद पड़ गया।

तभी कर्मचारी उसे जाँच कक्ष में ले जाने आया। स्ट्रेचर चलने लगा। सान्वी उसके पास झुकी और इतनी धीमी आवाज़ में बोली कि सिर्फ अर्जुन सुन सके।

“तो किसी ने तुम्हें वे चिट्ठियाँ मिलने नहीं दीं।”

गलियारे के मोड़ पर राघव खड़ा था। उसकी नज़रें सीधे उन दोनों पर थीं।

और उसी पल अर्जुन को लगा कि हादसा उस रात की सबसे बड़ी दुर्घटना नहीं था।

भाग 2

जाँच मशीन की ठंडी सुरंग में लेटे हुए अर्जुन का शरीर अस्पताल में था, पर दिमाग 15 साल पीछे अटका था। 3 चिट्ठियाँ। एक भी उसके हाथ तक नहीं पहुँची। वह सोचता रहा कि उस बरसात वाली रात के बाद सान्वी ने उसे भूलना चुना था, और सान्वी शायद यही मानती रही कि अर्जुन ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा।

जब उसे वापस आपात कक्ष में लाया गया, सान्वी दरवाजे के पास खड़ी थी। राघव उससे धीमे स्वर में बात कर रहा था, पर उसके चेहरे पर वही बंद पिंजरे वाला भाव था।

अर्जुन का स्ट्रेचर रुका।

“जाँच ठीक है,” कर्मचारी बोला, “रिपोर्ट आती ही होगी।”

सान्वी ने सिर हिलाया और राघव की ओर मुड़ी। “अब जाओ।”

“तुम इस आदमी का इलाज नहीं कर सकती,” राघव बोला।

“वह मरीज है।”

“वह अर्जुन मेहरा है।”

सान्वी ठिठक गई। “तुमने उसका पूरा नाम कैसे जाना?”

राघव एक पल चुप रहा। फिर बोला, “तुमने कहा था।”

“नहीं,” सान्वी की आवाज़ ठंडी थी, “मैंने नहीं कहा।”

अर्जुन ने देखा, राघव की चमकदार शांति में दरार पड़ी।

“तुम्हारे घर में उसका नाम लिया जाता था,” राघव झुँझलाकर बोला। “कोई हवाई अड्डे पर काम करने वाला लड़का, जिसे एक बरसाती शाम का मतलब ज़िंदगी लगने लगा था।”

सान्वी का चेहरा बुझ गया। “तुमने क्या किया था?”

राघव हँसा। “मैं 18 साल का था। तुम्हारे पिता ने कहा था, एक छोटी गलती को बड़ा होने से रोकना है।”

“चिट्ठियाँ,” अर्जुन ने कहा।

राघव ने उसकी ओर देखा, पर इनकार नहीं किया।

“तुमने उन्हें रोका?” सान्वी की आवाज़ काँपी।

“मैंने वही किया जो तुम्हारे परिवार ने सही समझा।”

“और अर्जुन की चिट्ठियाँ?”

राघव की चुप्पी जवाब थी।

सान्वी ने एक कदम पीछे लिया, जैसे ज़मीन हिल गई हो। “तुम जानते थे कि मैं उससे प्यार करती थी।”

“तुम भ्रम में थीं।”

“नहीं,” उसने आँसू रोकते हुए कहा, “मैं प्यार में थी।”

अर्जुन ने बैठने की कोशिश की। पसलियों में दर्द फटा, मशीन चीख उठी। सान्वी तुरंत उसके पास आई।

राघव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा। “सान्वी।”

वह पलटी। “मुझे मत छूना।”

सारा आपात कक्ष कुछ क्षण को शांत हो गया।

राघव ने दाँत भींचे। “तुम्हारे पिता यह पसंद नहीं करेंगे।”

सान्वी ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा। “तो उन्हें नापसंद करने दो।”

राघव बाहर चला गया, पर कुछ ही मिनट बाद 2 सुरक्षाकर्मी आए।

“शिकायत मिली है,” उनमें से एक बोला, “कि मरीज ने कर्मचारी को परेशान किया है।”

अर्जुन ने घायल हाथ उठाया। “मैं अभी इस बिस्तर को भी परेशान नहीं कर पा रहा।”

सान्वी उसके सामने खड़ी हो गई। “झूठी शिकायत दर्ज की गई है। लिखिए, राघव मल्होत्रा ने मरीज की देखभाल में दखल दिया, मुझे धमकाया और बदले में यह शिकायत कराई।”

तभी अस्पताल की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. नीलिमा सेन आईं। उनके साथ सान्वी की माँ भी थीं, रेशमी साड़ी, मोतियों की माला और चेहरे पर ऐसा नियंत्रण जैसे भावनाएँ गरीबों की चीज़ हों।

“सान्वी, मेरे कार्यालय में चलो,” डॉ. सेन बोलीं।

सान्वी ने अर्जुन की ओर देखा। वह डर राघव से नहीं था। वह डर इस बात का था कि कहीं 15 साल बाद भी कहानी उसके बिना लिख दी जाए।

अर्जुन ने उसकी दी हुई पर्ची कसकर पकड़ ली। “इस बार नंबर मेरे पास है।”

सान्वी की आँखें नरम हो गईं।

तभी बाहर से राघव की आवाज़ आई। “हाँ अंकल, वह अभी उसी के साथ है।”

सान्वी की माँ का चेहरा कठोर हो गया।

राघव सान्वी के पिता को फोन कर रहा था।

भाग 3

राघव की आवाज़ सुनते ही सान्वी की माँ, माया कपूर, ने अर्जुन को ऐसे देखा जैसे वह कोई घायल इंसान नहीं, बल्कि उनके बनाए हुए साम्राज्य में घुस आया कीड़ा हो।

“सान्वी,” उन्होंने धीमे लेकिन धारदार स्वर में कहा, “फोन लो। तुम्हारे पिता बात करना चाहते हैं।”

सान्वी ने हाथ नहीं बढ़ाया। “मैं अपने पिता से तब बात करूँगी जब मैं चाहूँगी।”

राघव फोन आगे बढ़ाए खड़ा रहा। उसके चेहरे पर वही पुराना विश्वास था कि कपूर परिवार की बेटी अंत में उसी तरफ लौटेगी जहाँ उसे रखा गया है।

“तुम भूल रही हो,” उसने कहा, “यह सिर्फ तुम्हारा निजी मामला नहीं है।”

सान्वी की आँखें उठीं। “तो फिर किसका मामला है?”

माया कपूर ने गहरी साँस ली। “घर चलकर बात होगी।”

“नहीं,” सान्वी बोली, “आज यहीं बात होगी। 15 साल पहले भी आपने कहा था घर चलकर बात होगी। फिर मेरा फोन ले लिया गया, मुझे मुंबई भेज दिया गया, और मेरी चिट्ठियाँ रास्ते में गायब कर दी गईं।”

आसपास खड़े सुरक्षाकर्मी, नर्सें और डॉ. सेन चुप थे। आपात कक्ष में लोग अभी भी कराह रहे थे, मशीनें बज रही थीं, पर उस पर्दे के भीतर पूरा माहौल किसी पारिवारिक अदालत जैसा हो गया था।

माया कपूर ने होंठ भींचे। “तुम उस उम्र में बच्ची थीं।”

“मैं 18 की थी।”

“तुम्हें अपने भविष्य की समझ नहीं थी।”

“मुझे अपने दिल की समझ थी।”

राघव हँसा। “दिल से अस्पताल नहीं चलते, सान्वी।”

अर्जुन ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। यह आदमी प्रेमी कभी था ही नहीं। वह सौदे का पहरेदार था।

डॉ. नीलिमा सेन ने कड़ा स्वर अपनाया। “श्री मल्होत्रा, यह आपात कक्ष है। आपकी आवाज़ मरीजों को परेशान कर रही है।”

राघव सीधा हुआ। “डॉक्टर, आप जानती हैं मैं कौन हूँ?”

“हाँ,” डॉ. सेन बोलीं, “और आज पहली बार आप यह भी जानेंगे कि अस्पताल में कौन डॉक्टर है।”

राघव का चेहरा लाल पड़ा। “मेरे परिवार की साझेदारी के बिना कपूर लाइफकेयर टिकेगा नहीं।”

सान्वी ने माँ की ओर देखा। “यही सच है?”

माया कपूर ने नज़रें फेर लीं।

उस छोटे से मौन ने 15 साल की झूठी परवरिश गिरा दी।

सान्वी की आवाज़ बहुत धीमी हुई। “आप मुझे बचा नहीं रही थीं। आप मुझे गिरवी रख रही थीं।”

माया कपूर की आँखें काँपीं, पर उनका अभिमान अभी जीवित था। “तुम्हारे पिता की तबीयत खराब है। समूह पर कर्ज है। मल्होत्रा परिवार ने साथ छोड़ा तो 3 अस्पताल बिक जाएँगे। तुम्हारी एक जिद से 2000 कर्मचारियों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।”

“मेरी शादी से कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं चलनी चाहिए,” सान्वी ने कहा। “और अगर चलती है, तो गलती मेरी नहीं, उन लोगों की है जिन्होंने अस्पताल को परिवार की जागीर समझा।”

राघव ने मोबाइल नीचे किया। “बहुत बोल लिया। तुम्हारे पिता अभी आ रहे हैं।”

“आने दो।”

अर्जुन ने उसकी उंगलियाँ काँपते देखीं। उसने घायल हाथ उठाकर धीरे से बिस्तर की रेलिंग पर रखा। सान्वी ने बिना सोचे उसका हाथ पकड़ लिया।

यह दृश्य माया कपूर को भीतर तक चुभ गया।

“तुम इसे जानती ही कितना हो?” उन्होंने कटु स्वर में पूछा। “एक रात, एक चुंबन, कुछ किशोर भावुकता?”

सान्वी ने अर्जुन का हाथ और कस लिया। “इतना जानती हूँ कि इसने मुझे उस रात भागने को नहीं कहा था। इसने कहा था खुद को बचाओ। आप सबने मुझे हमेशा किसी की बेटी, किसी की मंगेतर, किसी समझौते का हिस्सा बनाया। इसने पहली बार पूछा था मैं क्या चाहती हूँ।”

अर्जुन ने गला साफ किया। दर्द अभी भी था, लेकिन चुप रहना उससे बड़ा दर्द लगने लगा।

“आंटी,” उसने कहा, “15 साल पहले मैं सच में सिर्फ एक जैकेट और आधी तनख्वाह वाला लड़का था। आपने सही देखा था। लेकिन आपको डर इस बात से नहीं था कि मैं गरीब था। आपको डर था कि वह आपके बिना फैसला कर सकती थी।”

माया कपूर ने उसे घूरा। “तुम्हारी हैसियत…”

“आज भी बहुत बड़ी नहीं है,” अर्जुन ने बात काटी। “मैं इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर संचालन प्रबंधक हूँ। किराए के फ्लैट में रहता हूँ। 1 पुरानी कार है। तलाक हो चुका है। बाल भी अब पहले जैसे नहीं हैं। लेकिन मैं किसी और की बेटी को सौदे की तरह इस्तेमाल नहीं करता।”

डॉ. सेन के चेहरे पर हल्की स्वीकृति आई।

राघव ने व्यंग्य से कहा, “वाह। घायल नायक का भाषण पूरा हुआ?”

सान्वी ने उसकी ओर देखा। “तुमने मेरी चिट्ठियाँ चुराईं।”

“तुम्हारे पिता के कहने पर।”

“और अर्जुन की चिट्ठियाँ?”

राघव चुप।

“तुमने वह भी रोकीं।”

“ताकि तुम अपनी जिंदगी खराब न करो।”

“तुमने मेरी जिंदगी को मेरा रहने ही नहीं दिया।”

राघव के चेहरे पर अब गुस्सा खुलकर आ गया। “तुम आज भावनाओं में बह रही हो। कल तुम्हें समझ आएगा कि तुम्हारे पास लौटने को वही घर, वही नाम, वही अस्पताल होगा।”

डॉ. सेन ने अपना टैबलेट खोला। “शायद उससे पहले आपको यह समझना होगा कि सुरक्षा विभाग ने गलियारे की फुटेज निकाल ली है।”

राघव जड़ हो गया।

डॉ. सेन ने स्क्रीन उसकी ओर घुमाई। “आप बिना अनुमति मरीज क्षेत्र में आए, कर्मचारी का हाथ पकड़ने की कोशिश की, मरीज के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज करवाई और परिवार के बोर्ड प्रभाव का इस्तेमाल करके देखभाल में दखल दिया। मैं सूर्योदय से पहले नैतिकता समिति को रिपोर्ट भेज रही हूँ।”

राघव की आवाज़ धीमी हुई। “आप भूल रही हैं, मेरे पिता…”

“नहीं,” डॉ. सेन ने शांत स्वर में कहा, “आप भूल रहे हैं कि अस्पताल दानदाताओं की निजी हवेली नहीं है।”

माया कपूर ने पहली बार घबराकर राघव की ओर देखा। राघव ने फोन फिर कान पर लगाया। शायद दूसरी तरफ सान्वी के पिता थे।

“सर,” वह बोला, “स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही है।”

तभी फोन के स्पीकर से एक कमजोर, थकी हुई पुरुष आवाज़ सुनाई दी। “सान्वी वहाँ है?”

सान्वी का चेहरा बदल गया। पिता की बीमारी का सच भले उसे सौदे में बदल रहा था, पर वह बेटी थी। वह टूटे बिना पिता की आवाज़ नहीं सुन सकती थी।

“हाँ, पापा,” उसने कहा, “मैं यहीं हूँ।”

“घर आ जाओ। बात कर लेंगे।”

“क्या आपने राघव से मेरी चिट्ठियाँ रुकवाई थीं?”

दूसरी तरफ लंबा मौन।

सान्वी की आँखों से आँसू गिर गए। “पापा?”

आवाज भारी हुई। “तुम बहुत छोटी थीं।”

“मैंने पूछा क्या आपने रुकवाई थीं?”

“मैंने तुम्हें बचाया।”

सान्वी ने आँखें बंद कर लीं। जैसे भीतर कुछ अंतिम बार टूटकर शांत हो गया।

“नहीं,” उसने कहा, “आपने मेरी आवाज़ चुरा ली।”

फोन पर सन्नाटा था।

“मैं कल अस्पताल बोर्ड को लिखित इस्तीफा दूँगी,” सान्वी ने कहा। “कपूर लाइफकेयर में मेरी नौकरी, मेरी सगाई, मेरे नाम से जुड़े सभी पारिवारिक निर्णय… सब खत्म। मैं डॉक्टर हूँ, सौदा नहीं।”

माया कपूर ने चीख के करीब आवाज़ में कहा, “सान्वी!”

“और राघव,” सान्वी ने मुड़कर कहा, “मेरे किसी भी कार्यस्थल, घर या मरीज के पास फिर आए, तो मैं पुलिस में शिकायत करूँगी। यह डराने की भाषा नहीं है। यह मेरी पहली साफ बात है।”

राघव ने फोन काट दिया। उसकी आँखों में चोट नहीं, हार थी। ऐसे लोग प्रेम खोने पर नहीं टूटते, नियंत्रण खोने पर टूटते हैं।

वह बाहर चला गया। माया कपूर उसके पीछे कुछ कदम चलीं, फिर रुक गईं। उन्होंने सान्वी को देखा, जैसे पहली बार बेटी को इंसान की तरह देख रही हों।

“तुम सच में उस लड़के के लिए सब छोड़ दोगी?”

सान्वी ने अर्जुन की ओर देखा। फिर माँ की ओर।

“मैं उसके लिए नहीं छोड़ रही,” उसने कहा, “मैं अपने लिए छोड़ रही हूँ। यही फर्क आप कभी समझ नहीं पाईं।”

माया कपूर के चेहरे पर कुछ नरम पड़ा, पर बहुत देर हो चुकी थी। वह बिना कुछ कहे चली गईं।

आपात कक्ष धीरे-धीरे फिर सामान्य आवाज़ों से भरने लगा। कोई बच्चा रोया, कोई नर्स दौड़ी, एक बुजुर्ग ने पानी माँगा। दुनिया चलती रही, जैसे किसी का पूरा अतीत अभी-अभी नहीं खुला हो।

सान्वी बिस्तर की रेलिंग पकड़कर खड़ी रही। उसकी सांसें तेज़ थीं। अर्जुन ने धीरे से कहा, “मेरे अस्पताल आने के तरीके बहुत खराब हैं।”

सान्वी हँस पड़ी। हँसी आँसुओं से भीगी हुई थी। “तुम्हारी छुट्टी की पर्ची इतिहास में दर्ज होगी।”

रिपोर्ट में सिर के भीतर कोई गंभीर चोट नहीं निकली, लेकिन 2 पसलियाँ दरकी थीं, कलाई मोच खा चुकी थी और शरीर पर गहरी खरोंचें थीं। अर्जुन को कुछ घंटों निगरानी में रखा गया। सान्वी को उस मरीज से आधिकारिक रूप से अलग कर दिया गया, लेकिन डॉ. सेन ने सुरक्षाकर्मी को पास ही रहने दिया।

रात के 3 बजे अर्जुन का फोन उसे वापस मिला। उसमें बहन काव्या के 9 मिस्ड कॉल थे। उसने फोन किया।

“तू पागल है?” काव्या रोते हुए चिल्लाई। “मोटरसाइकिल उड़ानी थी?”

“मैंने नहीं उड़ाई, किसी और ने मदद की,” अर्जुन ने कहा।

“मैं आ रही हूँ।”

“बच्चों को लेकर मत आना। अस्पताल है, आधी रात है।”

“तू अकेला है?”

अर्जुन ने पर्दे के बाहर खड़ी सान्वी की परछाईं देखी। “पूरी तरह नहीं।”

काव्या कुछ सेकंड चुप रही। “यह आवाज़… कोई लड़की है।”

“मेरी पसलियाँ टूटी हैं, रोमांस नहीं।”

“तू झूठ बोलते समय हमेशा दार्शनिक हो जाता है। सुन, अकेलापन फैसला न करवा दे।”

अर्जुन ने सान्वी की ओर देखा। “शायद इस बार अकेलापन नहीं, याददाश्त फैसला कर रही है।”

काव्या ने सांस छोड़ी। “सुबह फोन करना। और हेलमेट बदलना।”

“पहले शरीर जोड़ लूँ।”

सुबह से पहले अर्जुन को छुट्टी मिल गई। सान्वी ने खुद उसे व्हीलचेयर में बाहर तक पहुँचाया, जबकि अर्जुन बार-बार कहता रहा कि वह चल सकता है।

“तुम्हारी 2 पसलियाँ टूटी हैं,” सान्वी ने कहा। “बहादुरी घर जाकर दिखाना।”

“जी, डॉक्टर साहिबा।”

“मैं डॉक्टर नहीं, आपात चिकित्सा विशेषज्ञ हूँ।”

“मेरे लिए अभी तुम वही हो जिसने मुझे फिर से सांस लेना सिखाया।”

सान्वी ने जवाब नहीं दिया। बाहर बारिश थम चुकी थी। अस्पताल के बाहर की सड़क काली चमक रही थी। हवा में भीगी मिट्टी और फिनाइल की मिली-जुली गंध थी।

कार के पास पहुँचकर सान्वी रुकी। “अर्जुन, मुझे कुछ साफ कहना है।”

वह चुप रहा।

“मैं अब 18 की नहीं हूँ। मेरा परिवार उलझा हुआ है। मैं थकी हुई हूँ। मुझे लोगों पर भरोसा करने में डर लगता है। मैंने अपने जीवन के कई साल किसी और की उम्मीदें ढोते हुए काटे हैं। अगर तुम आज की रात को कोई पुरानी प्रेम कहानी समझकर सुंदर बना रहे हो, तो मैं अभी बता दूँ, मैं आसान नहीं हूँ।”

अर्जुन ने सिर टिकाया और हल्की मुस्कान दी। “मैं तलाकशुदा हूँ। किराए के घर में रहता हूँ। रात को कभी-कभी खाने की जगह चाय पीकर सो जाता हूँ। मेरे घर में 1 कुर्सी है, क्योंकि दूसरी खरीदना मुझे अपनी ही उम्मीदों पर हँसना लगता था। मैं भी आसान नहीं हूँ।”

सान्वी की आँखें भर आईं। “तो हम दोनों गड़बड़ हैं।”

“हाँ,” अर्जुन बोला, “लेकिन इस बार हमारे पास एक-दूसरे के नंबर हैं।”

सान्वी ने पहली बार खुलकर हँसा। वही हँसी, जो 15 साल पहले बारिश में अधूरी रह गई थी।

अगले 6 महीनों में बहुत कुछ बदला। सान्वी ने कपूर लाइफकेयर से इस्तीफा दे दिया। डॉ. नीलिमा सेन की मदद से वह दिल्ली के एक सामुदायिक अस्पताल में काम करने लगी, जहाँ मरीज उसका उपनाम नहीं, उसका हाथ पकड़ने का ढंग याद रखते थे। वह वहाँ बच्चों को इंजेक्शन से पहले कहानियाँ सुनाती, बुजुर्गों की बात पूरी सुनती और रात की ड्यूटी के बाद भी किसी गरीब महिला की दवा की पर्ची समझाए बिना नहीं जाती।

राघव के खिलाफ अस्पताल की नैतिकता समिति ने जाँच खोली। पहले वह बोर्ड से अलग हुआ, फिर उसके परिवार की पकड़ भी कमजोर हो गई। सान्वी ने उस दिन कोई उत्सव नहीं मनाया। उसने बस उसका नंबर बंद किया, अपनी पुरानी सगाई की अंगूठी एक छोटे डिब्बे में रखी और 12 घंटे सोई, जैसे सालों की नींद पहली बार लौटी हो।

माया कपूर ने कई सप्ताह तक सान्वी से बात नहीं की। फिर एक दिन उसने सिर्फ इतना संदेश भेजा, “तुम ठीक हो?”

सान्वी ने जवाब दिया, “पहली बार।”

अर्जुन ने अपने घर में दूसरी कुर्सी खरीदी। फिर तीसरी, क्योंकि काव्या बच्चों के साथ आई। चौथी, क्योंकि सान्वी को खिड़की के पास बैठकर चाय पीना पसंद था। वह घर धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा जैसे किसी ने उसमें इंतज़ार के बजाय जीवन रख दिया हो।

वे जल्दबाजी में प्रेम का नाम नहीं लेते थे। वे सीखते थे।

सान्वी ने जाना कि अर्जुन मटर से नफरत करता है, बारिश से प्यार करता है और अच्छे दिनों में भी थोड़ा सतर्क रहता है। अर्जुन ने जाना कि सान्वी नहाते समय सुर बिगाड़कर गाती है, कुत्तों के पुराने वीडियो देखकर रो देती है और 15 साल पहले लिखी 3 चिट्ठियाँ उसने अब भी संभालकर रखी हैं।

एक शाम वह जूते के डिब्बे में वे चिट्ठियाँ लाई। कागज पीला पड़ चुका था, किनारे मुड़ गए थे, पर शब्द अभी भी जिंदा थे।

पहली चिट्ठी में लिखा था कि मुंबई की खिड़की से बारिश वैसी नहीं लगती जैसी यमुना किनारे लगी थी। दूसरी में उसने पूछा था कि क्या अर्जुन ने अपनी जैकेट वापस माँगनी बंद कर दी क्योंकि वह सच में नाराज है। तीसरी में उसने लिखा था, “अगर तुम जवाब नहीं दोगे, तो भी मैं मानूँगी कि उस रात मैं सच थी।”

अर्जुन ने चिट्ठी पढ़ते हुए आँखें बंद कर लीं। “मैंने भी लिखा था।”

“क्या?”

“2 चिट्ठियाँ। पहली में लिखा था कि तुम्हारी जैकेट मेरे पास नहीं, तुम्हारी याद मेरे पास रह गई है। दूसरी में लिखा था कि अगर तुम खुश हो, तो मैं तुम्हें परेशान नहीं करूँगा।”

सान्वी ने उसके कंधे पर सिर रख दिया। “हम दोनों ने चुप्पी को जवाब समझ लिया।”

“नहीं,” अर्जुन बोला, “हमें चुप कराया गया था।”

उस रात दोनों बालकनी में बैठे रहे। बारिश शुरू हुई। अब वहाँ 2 कुर्सियाँ थीं। उनके बीच कोई महँगी घड़ी, कोई पारिवारिक आदेश, कोई चोरी हुई चिट्ठी नहीं थी।

अगले वसंत में अर्जुन ने मोटरसाइकिल बेच दी। सान्वी ने शर्त रखी थी। उसने एक पुरानी लेकिन मजबूत कार खरीदी। वे उसी पुराने पुल के पास गए, जहाँ 15 साल पहले दोनों ने बारिश में अपनी पहली सच्ची बात कही थी।

दिल्ली बदल चुकी थी। पुल के पास नई बत्तियाँ थीं, किनारे पर चाय वाला मोबाइल भुगतान ले रहा था, और यमुना पहले जैसी नहीं दिखती थी। लेकिन बारिश की बूंदें शीशे पर पड़ते ही समय जैसे पीछे मुड़ गया।

सान्वी ने कार की खिड़की से बाहर देखा। “तुम्हें अब सब याद है?”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा। वह अब स्कूल की लड़की नहीं थी। वह वह स्त्री थी जिसने उसे अस्पताल की रोशनी में पहचान लिया था, जिसने अपने परिवार से लड़कर अपना नाम वापस लिया था, जिसने अधूरी चिट्ठियों को उम्र भर संभालकर रखा था।

“सब,” उसने कहा।

सान्वी ने उसका हाथ पकड़ा। “और डर?”

“है,” अर्जुन ने सच कहा। “लेकिन इस बार डर के बीच तुम हो।”

सान्वी ने धीरे से मुस्कराकर वही किया जो 15 साल पहले बारिश ने अधूरा छोड़ दिया था। उसने उसे चूमा।

इस बार कोई पिता फोन नहीं छीन रहा था। कोई राघव चिट्ठियाँ नहीं रोक रहा था। कोई माँ भविष्य की कीमत नहीं लगा रही थी।

सिर्फ 2 लोग थे, जिन्हें दुनिया ने देर से मिलाया था, पर इतना देर से नहीं कि प्रेम मर जाए।

कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं, उन्हें बस गलत लोगों के हाथों से वापस लेना पड़ता है। अर्जुन और सान्वी ने भी अपना अंत वापस ले लिया था।

और उस रात बारिश में, टूटे हेलमेट, चुराई गई चिट्ठियों और 15 साल की खामोशी के बाद, दोनों ने पहली बार जाना कि खोया हुआ प्रेम हमेशा लौटकर वैसा नहीं आता जैसा गया था।

कभी-कभी वह घायल होकर आता है।

कभी अस्पताल की सफेद रोशनी में आँखें खोलता है।

और कभी पूछता भी नहीं, बस एक पुरानी आवाज़ आपका पूरा नाम पुकारती है…

जैसे वह आपको कभी भूली ही नहीं थी।

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