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जिस दिन बेरोजगार पिता ने बेटे की आखिरी थाली का आधा हिस्सा ठंड में कांपती बूढ़ी औरत को दे दिया, उसी रात 28 रुपये वाली जेब ने एक अरबपति का घमंड तोड़ दिया

भाग 1

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राघव शर्मा ने जिस दिन अपनी नौकरी खोई, उसी शाम उसने अपने बेटे आरव के लिए खरीदी आखिरी थाली का आधा हिस्सा दिल्ली की ठंडी सड़क पर बैठी एक अजनबी औरत को दे दिया। उस थाली में 2 गरम रोटियां, थोड़ी दाल, चावल और सब्जी थी, और उसकी जेब में बचा था सिर्फ 28 रुपये। घर पर 6 साल का आरव उसका इंतजार कर रहा था, वही बच्चा जिसने 2 साल पहले अपनी मां मीरा को अस्पताल के सफेद बिस्तर पर खो दिया था और तब से अपने पिता की आंखों में ही पूरी दुनिया ढूंढता था।

राघव गुड़गांव के एक बड़े वेयरहाउस में माल चढ़ाने-उतारने का काम करता था। काम भारी था, तनख्वाह छोटी थी, लेकिन हर महीने किराया, स्कूल फीस और दूध का हिसाब किसी तरह पूरा हो जाता था। उस सुबह मैनेजर ने 17 मजदूरों को एक साथ बुलाया और ठंडी आवाज में कहा—कंपनी खर्च घटा रही है। कोई बहस नहीं, कोई चेतावनी नहीं, बस एक लिफाफा और गेट से बाहर निकलने का इशारा।

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राघव ने अपना पुराना बैग उठाया, जिसमें आरव की छोटी फोटो, मीरा की लाल चुन्नी का टुकड़ा और फटे दस्ताने रखे थे। बाहर पार्किंग में उसके साथी गालियां दे रहे थे, कोई रो रहा था, कोई फोन पर पत्नी से झूठ बोल रहा था कि सब ठीक है। राघव चुप था। उसे सिर्फ मीरा की आखिरी बात याद आ रही थी—आरव को कभी अकेला मत पड़ने देना।

लेकिन उस दिन उसे लगा, वह हार गया।

घर जाने से पहले वह लाजपत नगर की एक छोटी ढाबा दुकान पर रुका। दिमाग कह रहा था कि 120 रुपये बचा ले, 3 दिन मैगी बन जाएगी। दिल कह रहा था, आज रात आरव को डर से पहले गर्म खाना मिलना चाहिए। उसने वही थाली खरीदी जो आरव को सबसे पसंद थी। वह सोच रहा था कि घर जाकर मुस्कुराएगा, पहले बेटे को खिलाएगा, फिर धीरे से बताएगा कि पापा नई नौकरी ढूंढ रहे हैं।

सड़क के बीच बने छोटे पार्क में उसने उसे देखा।

एक बूढ़ी औरत लोहे की बेंच पर बैठी कांप रही थी। बाल बिखरे हुए, शॉल फटी हुई, हाथ में पुराना कपड़े का झोला। पास से महंगे फोन लिए लोग गुजर रहे थे, कोई रुक नहीं रहा था। एक औरत ने अपने बच्चे को खींचकर दूसरी तरफ कर लिया। 2 कॉलेज लड़के हंसे और आगे बढ़ गए। बूढ़ी औरत किसी से मांग भी नहीं रही थी, बस जैसे ठंड और भूख को चुपचाप सह रही थी।

राघव कुछ कदम आगे निकल गया, फिर रुक गया। उसके हाथ में थाली गरम थी। जेब लगभग खाली थी। घर पर बेटा इंतजार कर रहा था।

फिर भी वह वापस मुड़ा।

वह बेंच पर बैठा, थाली खोली और बिना पूछे आधा खाना उस औरत की तरफ बढ़ा दिया।

—मांजी, खा लीजिए। अभी गरम है।

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औरत ने उसे ऐसे देखा जैसे किसी ने उसे इंसान मानकर बात किए हुए बहुत दिन हो गए हों।

—तुम्हारे पास बहुत है क्या? —उसने धीमे से पूछा।

राघव हंसा नहीं, बस थककर बोला—नहीं। आज सुबह नौकरी चली गई। घर पर 6 साल का बेटा है। यह शायद आज का आखिरी अच्छा खाना था।

औरत के कांपते हाथ थम गए।

—फिर मुझे क्यों दे रहे हो?

राघव ने थाली उसकी गोद में रखते हुए कहा—क्योंकि इस वक्त आपको मुझसे ज्यादा जरूरत है।

औरत की आंखों में अचानक पानी भर आया। उसने खाना खाया, मगर हर निवाले के साथ वह राघव को देखती रही। जैसे वह उसका चेहरा याद कर रही हो।

जब राघव उठने लगा, उसने पूछा—तुम्हारा नाम?

—राघव शर्मा।

—राघव, तुम्हें अंदाजा भी नहीं कि तुमने क्या कर दिया है।

राघव ने सोचा, भूखी औरत आशीर्वाद दे रही है। वह मुस्कुराकर चला गया। उसे नहीं पता था कि वह औरत असल में भारत की सबसे ताकतवर अरबपति महिलाओं में से एक थी।

भाग 2

घर पहुंचते ही आरव दरवाजे तक भागा, लेकिन थाली का आधा हिस्सा देखकर रुक गया। उसकी मासूम आंखों में सवाल था। उसी वक्त मकान मालकिन शकुंतला आंटी भी आ गईं। —किराया 5 दिन से लेट है, राघव। और आज फिर बच्चे को आधा खाना? तुमसे नहीं हो पाएगा तो गांव भेज दो इसे। राघव का चेहरा जल उठा, मगर उसने आरव को पीछे कर लिया। —मेरा बेटा कहीं नहीं जाएगा। शकुंतला ने ताना मारा—भावना से पेट नहीं भरता। आरव ने पिता का हाथ पकड़ लिया। रात को राघव ने बची दाल में पानी मिलाकर दोनों ने खाई। वह झूठी मुस्कान बनाकर बोला—आज पापा ने रास्ते में एक दादी को खाना दिया। आरव ने पूछा—हमारे पास कम था ना? राघव ने सिर झुका लिया। बच्चे ने अपनी आधी रोटी पिता की तरफ सरका दी—तो आप भी खाओ। राघव की आंखें भर आईं। अगले 12 दिन वह नौकरी ढूंढता रहा। हर जगह जवाब मिला—कॉल करेंगे। पुराने साले विनोद ने फोन पर कहा—मीरा होती तो तुम्हारी हालत देखकर शर्म से मर जाती। राघव ने फोन काट दिया, लेकिन शब्द सीने में चुभ गए। उसी रात आरव को हल्का बुखार हुआ और दवा के लिए भी पैसे कम पड़े। राघव मेडिकल स्टोर के बाहर खड़ा था, तभी एक काली कार उसके सामने रुकी। सफेद कुरते में एक आदमी उतरा। —राघव शर्मा? —हां। —काव्या राजवंशी मैडम आपसे मिलना चाहती हैं। राघव ने नाम सुना तो डर गया। राजवंशी ग्रुप वही कंपनी थी जिसने हजारों लोगों की नौकरी काटने की खबरों से अखबार भरे थे। वह बोला—मैंने क्या किया? आदमी ने सिर्फ इतना कहा—मैडम ने कहा है, वही आदमी लाना जिसने ठंड में अपनी आखिरी थाली बांटी थी। राघव का खून जैसे जम गया।

भाग 3

अगली सुबह राघव पहली बार राजवंशी टावर के सामने खड़ा था। 42 मंजिल की शीशे की इमारत आसमान को चीरती हुई लग रही थी। गेट पर सुरक्षा गार्ड, लॉबी में संगमरमर का फर्श, दीवारों पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें, और अंदर आते-जाते लोग जिनके जूते ही शायद राघव के महीनेभर के राशन से महंगे थे। वह अपनी धुली हुई लेकिन पुरानी शर्ट में असहज खड़ा था। उसे लग रहा था, कहीं गलती से उसे यहां बुला लिया गया है।

रिसेप्शन पर उसका नाम पहले से दर्ज था। उसे लिफ्ट से ऊपर ले जाया गया। 41वीं मंजिल पर जब दरवाजा खुला, तो सामने कांच की दीवारों वाला दफ्तर था, जहां से पूरा दिल्ली शहर नीचे धुंध में तैरता दिख रहा था।

एक बड़ी मेज के पीछे एक महिला खड़ी थी। रेशमी साड़ी, मोतियों की माला, सफेद बालों में सलीका, चेहरे पर वह शांत अधिकार जो सिर्फ बहुत बड़ी ताकत रखने वालों में होता है।

राघव ने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

फिर उसने उसकी आंखें देखीं।

वही आंखें।

ठंडी बेंच पर बैठी वह बूढ़ी औरत, वही कांपती नजर, वही गहराई। कपड़े बदल गए थे, चेहरा साफ था, मगर आंखों में वही रात अटकी हुई थी।

राघव के मुंह से निकला—आप?

काव्या राजवंशी धीरे से मुस्कुराईं, मगर मुस्कान में गर्व नहीं, पछतावा था।

—हां, राघव। उस शाम बेंच पर बैठी औरत मैं ही थी।

राघव पीछे हट गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके साथ खेल किया हो।

—मतलब आप गरीब नहीं थीं? भूखी नहीं थीं? वह सब नाटक था?

काव्या ने कुर्सी से उठकर उसके सामने आना चाहा, मगर राघव ने हाथ रोक दिया।

—मैडम, अगर आपको अमीर लोगों का खेल खेलना था तो किसी और को चुनतीं। मेरे पास सचमुच कुछ नहीं था। वह खाना मेरे बेटे के लिए था।

कमरे में चुप्पी फैल गई। काव्या की आंखें झुक गईं।

—मुझे पता है। और इसी वजह से मैंने तुम्हें ढूंढा।

राघव का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था।

—आपको पता भी है उस रात मेरे घर क्या हुआ? मेरा बेटा आधा पेट सोया। मकान मालकिन ने कहा उसे गांव भेज दो। मेरे पास दवा के पैसे नहीं थे। आप प्रयोग कर रही थीं, मैडम। हम लोग प्रयोग नहीं, जिंदगी जीते हैं।

काव्या ने पहली बार सिर पूरी तरह झुका दिया। उस कमरे में खड़ी अरबों की मालकिन उस आदमी के सामने छोटी लग रही थी जिसके पास 28 रुपये थे।

—तुम ठीक कह रहे हो, राघव। मैंने शुरुआत में इसे प्रयोग समझा था। लेकिन उस दिन जो मैंने देखा, उसने मेरी पूरी जिंदगी तोड़ दी।

राघव चुप रहा।

काव्या ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहना शुरू किया।

—मैं काव्या राजवंशी हूं। लोग मुझे भारत की सबसे सफल बिजनेसवुमन कहते हैं। मेरे पास 26 फैक्ट्रियां हैं, 4 लॉजिस्टिक्स चेन हैं, 38 हजार कर्मचारी हैं। लोग मेरे सामने कुर्सी खींचते हैं, दरवाजे खोलते हैं, मेरी हर बात लिखते हैं। लेकिन सच यह है कि मैं उन 38 हजार लोगों को सिर्फ नंबरों में देखने लगी थी।

वह मेज पर रखी एक फाइल की तरफ मुड़ी।

—मेरी कंपनी एक बड़ा फैसला लेने जा रही थी। खर्च घटाने के लिए हजारों लोगों की नौकरियां काटनी थीं। रिपोर्ट में लिखा था—मानव संसाधन पुनर्गठन। बहुत साफ शब्द थे। लेकिन उसका मतलब था कि हजारों घरों में चूल्हे ठंडे पड़ेंगे, हजारों बच्चों की फीस रुकेगी, हजारों माएं-बाप रात को छत देखते हुए हिसाब लगाएंगे।

राघव की उंगलियां मुट्ठी बन गईं। उसे अपना वेयरहाउस याद आया। वही लिफाफा, वही गेट, वही शर्म।

काव्या बोलीं—उस फाइल पर साइन करने से पहले मुझे लगा, मैं सचमुच जानती ही नहीं कि नीचे की दुनिया कैसी है। इसलिए मैं बिना गाड़ी, बिना फोन, बिना पैसे उस दिन सड़क पर निकली। मैंने पुराने कपड़े पहने, चेहरा ढका, और तय किया कि 1 दिन ऐसे जिऊंगी जैसे उन लोगों में से हूं जिनकी जिंदगी पर मैं फैसले करती हूं।

वह कुछ पल रुकीं।

—राघव, वह मेरे जीवन का सबसे डरावना दिन था।

उसकी आवाज अब भारी हो गई थी।

—सुबह एक चायवाले ने मुझे दुकान से भगा दिया क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे। एक मंदिर के बाहर प्रसाद बांटा जा रहा था, लेकिन लाइन में खड़े आदमी ने कहा—ऐसे लोग आते हैं तो बदबू फैलती है। एक औरत ने अपने बच्चे से कहा—उधर मत देखो। दोपहर तक मुझे सच में भूख लगने लगी थी। शाम तक ठंड हड्डियों में उतर गई। मगर सबसे बुरा भूख या ठंड नहीं था। सबसे बुरा था अदृश्य हो जाना।

राघव की आंखों में हलचल हुई।

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

—लोग मुझे देखते थे, फिर तुरंत नजर फेर लेते थे। जैसे मैं इंसान नहीं, सड़क का दाग हूं। और वह लोग कौन थे? मेरे जैसे लोग। अमीर, पढ़े-लिखे, सुरक्षित लोग। जिनके पास देने को बहुत था, लेकिन देखने की ताकत नहीं थी।

कमरे में हवा भी भारी लगने लगी।

—शाम को मैं उस बेंच पर बैठी थी। मैं थक चुकी थी। मुझे लगने लगा था कि मनुष्य मूल रूप से स्वार्थी है। कि पैसा ही पहचान है। बिना पैसे आदमी कुछ नहीं। उसी वक्त तुम आए। पुराने कपड़ों में, टूटे हुए चेहरे के साथ, हाथ में एक थाली लिए। मुझे लगा तुम भी बाकी सबकी तरह निकल जाओगे। लेकिन तुम बैठ गए।

राघव ने नजर फेर ली।

—आपने मुझसे पूछा था, मेरे पास बहुत है क्या।

—और तुमने कहा था, आज नौकरी चली गई। घर पर 6 साल का बेटा है। फिर भी तुमने आधा खाना मुझे दे दिया। राघव, उस समय मेरे सामने दुनिया का सबसे बड़ा आईना था। जिन लोगों के पास सब था, उन्होंने मुझे कुछ नहीं दिया। जिस आदमी के पास लगभग कुछ नहीं था, उसने मुझे अपना आखिरी खाना दिया।

काव्या की आंखों से आंसू गिर पड़े।

—उस रात मैंने पहली बार समझा कि दया जेब से नहीं, याद से आती है। जिसे भूख याद रहती है, वही भूखे को देख पाता है।

राघव के चेहरे की कठोरता थोड़ी पिघली, लेकिन दर्द अब भी था।

—फिर आपने मुझे क्यों बुलाया?

काव्या ने मेज से एक लिफाफा उठाया, फिर तुरंत वापस रख दिया।

—मैं तुम्हें पैसे दे सकती थी। बहुत पैसे। लेकिन मुझे लगा, वह तुम्हारे साथ अन्याय होगा। क्योंकि तुमने मुझे भीख नहीं दी थी, तुमने मुझे सम्मान दिया था। इसलिए मैं भी तुम्हें दया नहीं, सम्मान देना चाहती हूं।

उन्होंने एक फाइल उसकी तरफ बढ़ाई।

—राजवंशी ग्रुप के सामुदायिक आपूर्ति विभाग में सुपरवाइजर की जगह खाली है। स्थायी नौकरी। मेडिकल बीमा। आरव की पढ़ाई के लिए शिक्षा सहायता। रहने के लिए कंपनी क्वार्टर। तनख्वाह तुम्हारी पुरानी नौकरी से 3 गुना। यह दान नहीं है। यह नौकरी है। क्योंकि जिस आदमी ने अपनी आखिरी थाली बांटते हुए भी अपना चरित्र नहीं खोया, वह मेरी कंपनी में किसी भी डिग्री वाले मैनेजर से ज्यादा कीमती है।

राघव ने फाइल को देखा, पर हाथ नहीं बढ़ाया।

—मैं कोई एहसान नहीं लेना चाहता।

काव्या ने तुरंत कहा—तो एहसान मत लो। काम लो। जिम्मेदारी लो। मुझे ऐसे आदमी चाहिए जो नीचे खड़े लोगों को नंबर नहीं, इंसान समझें। तुम वही करोगे जो मेरे बड़े-बड़े अफसर नहीं कर पाए। तुम मुझे याद दिलाओगे कि फैसले कागज पर नहीं, घरों में उतरते हैं।

राघव के अंदर कुछ टूटकर जुड़ने लगा। उसे मीरा याद आई। अगर वह होती, तो शायद कहती—सर झुकाकर नहीं, सीना सीधा रखकर स्वीकार करो।

उसने धीरे से पूछा—मेरे बेटे को पता चलेगा कि मैं भीख पर नहीं आया?

काव्या ने कहा—उसे यही पता चलेगा कि उसके पिता को उसके कर्म ने नौकरी दिलाई।

राघव ने कांपते हाथ से फाइल पकड़ ली।

उस दिन से उसकी जिंदगी बदल गई, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

राजवंशी ग्रुप के बोर्डरूम में 3 दिन बाद एक बड़ी बैठक थी। वही फाइल फिर मेज पर रखी थी—खर्च कटौती योजना। बड़े सलाहकार, वित्त अधिकारी, विदेशी प्रेजेंटेशन, स्क्रीन पर आंकड़े। किसी ने कहा—अगर 5200 कर्मचारियों को हटाया जाए तो लाभ 18 प्रतिशत बढ़ेगा। किसी ने कहा—बाजार इसे सकारात्मक संकेत मानेगा। किसी ने कहा—मानवीय असर सीमित रहेगा।

काव्या ने पूरी बात सुनी। फिर स्क्रीन बंद कर दी।

—मानवीय असर सीमित नहीं होता।

कमरे में सन्नाटा।

एक अधिकारी बोला—मैडम, यह बिजनेस निर्णय है।

काव्या ने उसकी तरफ देखा—बिजनेस निर्णय भी इंसानों पर गिरते हैं। मैंने हाल ही में सड़क पर 1 दिन बिताया है। आप सबने कभी वह दिन नहीं जिया, इसलिए आप संख्या बोलते हुए कांपते नहीं।

फिर उन्होंने नई योजना रखी। ऊपरी अधिकारियों के बोनस 1 साल के लिए रोके जाएंगे। अनावश्यक लग्जरी खर्च बंद होगा। मालिकाना लाभ घटेगा, लेकिन छोटे कर्मचारियों की नौकरी बचाई जाएगी। कम वेतन वाले कर्मचारियों के लिए आपातकालीन सहायता कोष बनेगा। अचानक नौकरी जाने पर 3 महीने की पूरी तनख्वाह, बच्चों की फीस सहायता और पुनर्नियोजन प्रशिक्षण मिलेगा। कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों के लिए भी मेडिकल सुरक्षा लागू होगी।

बोर्ड में विरोध हुआ। किसी ने कहा—यह भावुक फैसला है।

काव्या ने सख्त आवाज में कहा—नहीं, यह देर से लिया गया इंसानी फैसला है।

उसी दिन राघव को आधिकारिक नियुक्ति मिली। जब वह घर लौटा, तो शकुंतला आंटी दरवाजे पर फिर खड़ी थीं। उनके हाथ में किराये की रसीद और चेहरे पर वही ताना।

—आज क्या बहाना है?

राघव ने पहली बार बिना गुस्से के मुस्कुराकर कहा—कल तक का हिसाब चुका दूंगा। और अगले महीने हम कंपनी क्वार्टर में चले जाएंगे।

शकुंतला चौंक गईं।

आरव अंदर से दौड़ता आया—पापा, नौकरी मिल गई?

राघव घुटनों के बल बैठ गया और बेटे को गले लगा लिया।

—हां बेटा। पापा को नौकरी मिल गई।

—अच्छी वाली?

—बहुत अच्छी वाली।

आरव ने भोलेपन से पूछा—वही दादी ने दिलवाई?

राघव कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—हां। लेकिन दादी ने इसलिए दिलवाई क्योंकि उस दिन हमने खाना बांटा था।

आरव ने गर्व से कहा—तो हमने सही किया था।

राघव ने बेटे के माथे को चूम लिया।

पहली तनख्वाह आई तो राघव सीधे उसी ढाबे पर गया। उसने वही थाली खरीदी—रोटी, दाल, चावल, सब्जी। इस बार 2 नहीं, 4 थालियां। वह आरव को उसी पार्क में ले गया। वही बेंच अब भी वहां थी। लोहे पर जंग थी, लेकिन राघव को वह किसी मंदिर की चौखट जैसी लगी।

दोनों बैठे। उसने आरव को पूरी कहानी बताई। कैसे नौकरी गई। कैसे पापा डर गए थे। कैसे एक भूखी दादी मिलीं। कैसे आधा खाना बांटने से जिंदगी बदल गई।

आरव ने ध्यान से सुना। फिर उसने अपनी थाली का एक टुकड़ा तोड़ा और बेंच के किनारे रख दिया।

—अगर कोई और भूखा आए तो?

राघव की आंखें भर आईं। उसने बेटे को सीने से लगा लिया।

कुछ महीनों बाद राजवंशी ग्रुप के कर्मचारियों में बदलाव दिखने लगा। वेयरहाउस में काम करने वाले मजदूरों को पहली बार सुरक्षा जूते समय पर मिले। बीमार बच्चे की वजह से छुट्टी मांगने पर नौकरी जाने का डर कम हुआ। ठेका कर्मचारियों के नाम भी बीमा सूची में जुड़े। 5200 परिवारों में वह रात नहीं आई, जिसका डर राघव ने उस पार्किंग में महसूस किया था।

इनमें से किसी को नहीं पता था कि यह सब एक आधी थाली से शुरू हुआ था। कोई नहीं जानता था कि एक बेंच पर बैठा टूटा हुआ पिता, जिसके पास अपने बेटे को खिलाने तक का पूरा भोजन नहीं था, एक अरबपति महिला के दिल में ऐसा सवाल जगा गया था जिसने हजारों घरों की आग बचा ली।

काव्या कभी-कभी राघव को अपने केबिन में बुलातीं। फैसलों से पहले पूछतीं—अगर यह नीचे तक पहुंचे तो क्या होगा?

राघव बड़ी-बड़ी भाषा नहीं जानता था। वह सिर्फ कहता—मैडम, जिस आदमी को आप हटाएंगी, वह अकेला नहीं जाएगा। उसके साथ उसकी पत्नी की दवा, बच्चे की फीस, बूढ़ी मां की रोटी भी गिरती है।

काव्या सुनतीं। और कई बार फाइल वापस कर देतीं।

एक दिन उन्होंने राघव से कहा—तुम्हें पता है, उस दिन तुमने मुझे खाना नहीं दिया था। तुमने मुझे मेरी आंखें वापस दी थीं।

राघव ने जवाब दिया—नहीं मैडम। आपने मुझे नौकरी नहीं दी थी। आपने मुझे मेरे बेटे के सामने सीधा खड़ा रहने का मौका दिया था।

दोनों कुछ देर चुप रहे। बाहर शहर चमक रहा था। वही शहर जहां लोग रोज किसी न किसी को देखकर भी नहीं देखते।

कई साल बाद भी आरव उस बेंच को याद रखता था। स्कूल में जब बच्चों से पूछा गया कि उसके पिता क्या करते हैं, तो उसने लिखा—मेरे पापा लोगों को याद दिलाते हैं कि गरीब आदमी भी अमीर हो सकता है, अगर उसके पास बांटने वाला दिल हो।

राघव ने वह कॉपी पढ़ी तो मीरा की पुरानी चुन्नी आंखों से लगा ली। उसे लगा, उसने वादा निभा दिया। वह बेटे को अकेला नहीं पड़ने दे पाया। और शायद उसने उसे दुनिया से डरना नहीं, दुनिया को थोड़ा गर्म रखना सिखा दिया।

उस शाम वह फिर उसी पार्क से गुजरा। ठंड हल्की थी। बेंच खाली थी। पास से लोग फोन देखते हुए निकल रहे थे। राघव ने रुककर बेंच को देखा और मन ही मन मीरा से कहा—देखो, आधी थाली ने घर बचा लिया।

फिर वह आगे बढ़ा। रास्ते में एक बूढ़ा आदमी चाय की दुकान के पास बैठा कांप रहा था। राघव रुका। उसने 2 चाय लीं, 2 समोसे लिए, और उसके पास बैठ गया।

—बाबा, गरम है। खा लीजिए।

बूढ़े ने पूछा—बेटा, तुम्हें जल्दी नहीं है?

राघव ने मुस्कुराकर कहा—थी। लेकिन कुछ जगहों पर रुकना जरूरी होता है।

और उस शाम, शहर की भागती हुई भीड़ के बीच, एक आदमी फिर किसी अजनबी के साथ बैठा था। क्योंकि उसे अब पता था कि दुनिया बड़े भाषणों से नहीं, कभी-कभी आधी रोटी, 1 कप चाय और किसी को अदृश्य न मानने की जिद से बचती है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.