
भाग 1
जब भीड़ भरी दिल्ली की सड़क पर एक बूढ़े आदमी को सिर्फ 1 पैकेट ब्रेड मांगने पर दुकानवाले ने धक्का दिया, तब सबसे पहले रुकी हुई लड़की कोई अमीर बेटी नहीं थी, बल्कि बारिश में भीगती हुई एक डिलीवरी राइडर थी, जिसकी जेब में सिर्फ पेट्रोल के बचे हुए पैसे थे। सानवी मिश्रा पहले ही देर से थी। मोबाइल पर ग्राहक की 3 मिस्ड कॉल चमक रही थीं, पीठ पर बंधे फूड बैग से गर्म खाने की खुशबू निकल रही थी और दिमाग में सिर्फ 1 बात घूम रही थी—मां के इलाज का कर्ज, मौसी की धमकियां और कल की नौकरी का इंटरव्यू। फिर भी जब उसने देखा कि सफेद कुर्ते-पायजामे में एक कमजोर से बुजुर्ग को सब्जी मंडी के बाहर अपमानित किया जा रहा है, वह बाइक रोककर उतर गई। —अंकल, इन्हें धक्का क्यों दिया? दुकानवाला हंसा। —बिना पैसे ब्रेड मांग रहा था। हर कोई कहता है पोता आ रहा है। सानवी ने बूढ़े का हाथ पकड़ा। —दादाजी, चोट लगी? बूढ़े ने कांपती मुस्कान से कहा। —बेटी, भूख लगी थी, इज्जत नहीं मांग रहा था। यह सुनते ही सानवी की आंखें भर आईं। उसे अपनी मां याद आ गई, जो आखिरी दिनों में दवाइयों के लिए दूसरों के दरवाजे देखती रह गई थी। उसने जेब से मुड़े हुए नोट निकाले। —2 पैकेट ब्रेड दीजिए। दुकानवाले ने कीमत बढ़ाकर कहा। —200 रुपये। सानवी समझ गई कि वह उसे बेवकूफ बना रहा है, पर उसने बहस नहीं की। पैसे देकर ब्रेड बूढ़े को पकड़ा दी। —दादाजी, यहां बैठकर खाइए। आपका पोता आए तो उसे बोलिए, बुजुर्गों को इंतजार नहीं करवाते। बूढ़ा उसे बहुत देर तक देखता रहा। —नाम क्या है तुम्हारा? —सानवी। —सानवी, तुम्हारा दिल बहुत साफ है। तुम मेरी बहू बनोगी। वह घबरा गई। —दादाजी, मुझे शादी नहीं करनी। मुझे नौकरी चाहिए, कर्ज चुकाना है। शादी से पेट्रोल नहीं भरता। बूढ़ा हंसा, पर आंखें गंभीर थीं। तभी 2 काली गाड़ियां आकर रुकीं। सिक्योरिटी वाले उतरे और उनके पीछे एक लंबा, सधा हुआ युवक आया। उसका चेहरा शांत था, पर आंखों में आदत थी—लोगों को परखने की। वह आर्यन मल्होत्रा था, मल्होत्रा ग्रुप का 28 वर्षीय वारिस, जिसे देश के बड़े बिजनेस घराने जानते थे, पर आम लोग शायद ही पहचानते थे। —दादाजी, माफ कीजिए, मीटिंग लंबी हो गई। बूढ़े ने गुस्से से कहा। —तू देर से आया और तेरी पत्नी चली गई। आर्यन ठिठक गया। —मेरी क्या? —पत्नी। सानवी। उसने मेरे लिए ब्रेड खरीदी। तू उससे शादी करेगा। आर्यन ने बूढ़े का हाथ पकड़ा। —दादाजी, चलिए घर। आप फिर शुरू हो गए। पर बूढ़ा चुप नहीं हुआ। उसने उसी शाम सानवी को फोन किया। आवाज कमजोर बनाई। —बेटी, छाती में दर्द है। आंखों के आगे अंधेरा आ रहा है। सानवी ने बिना सोचे बाइक मोड़ी। जब वह बताए हुए पते पर पहुंची, वह किसी साधारण घर में नहीं, बल्कि दक्षिण दिल्ली की एक विशाल कोठी के बाहर खड़ी थी। अंदर दादाजी आराम से सोफे पर बैठे थे। सानवी के चेहरे का रंग बदल गया। —आप सच में बीमार थे या मुझे बुलाने के लिए झूठ बोला? कमरे में खड़ा आर्यन चुप हो गया, क्योंकि पहली बार किसी गरीब लड़की ने उनकी दौलत नहीं, उनके झूठ पर सवाल उठाया था। कहानी यहीं से खतरनाक होने वाली थी।
भाग 2
दादाजी ने बिना शर्म के कहा। —मैंने तेरी परीक्षा ली, बेटी। जो लड़की गरीब बूढ़े के लिए पेट्रोल के पैसे खर्च कर दे, वही इस घर की बहू बन सकती है। सानवी ने ठंडी आवाज में कहा। —इंसान की मदद परीक्षा के लिए नहीं की जाती। आर्यन ने पहली बार ध्यान से उसे देखा। गीले बाल, थकी आंखें, हाथों में स्कूटी के निशान और आवाज में ऐसी इज्जत, जिसे पैसे से खरीदा नहीं जा सकता था। तभी सानवी का फोन बजा। स्क्रीन पर लिखा था—मौसी। उसने धीरे से उठाया। —सानवी, 2 लाख कब देगी? तेरी मां के बक्से, साड़ियां और फोटो फेंक दूंगी। —मौसी, प्लीज, उन्हें हाथ मत लगाइए। मैं नौकरी ढूंढ रही हूं। —तो शादी कर ले किसी पैसेवाले से। नहीं तो सब कबाड़ में जाएगा। फोन कट गया। सानवी ने आंखें पोंछीं। दादाजी ने आर्यन की तरफ देखा। —शादी आज होगी। सानवी पीछे हट गई। —नहीं। मैं किसी की दया पर नहीं बिकूंगी। दादाजी बोले। —दया नहीं, रिश्ता। पैसे चाहिए तो मिलेंगे, पर तू कर्ज मानकर लौटा देना, अगर तेरी जिद यही है। आर्यन को लगा, बात पैसे पर आ गई। उसके चेहरे पर शक उतर आया। फिर भी दादाजी के दबाव में सब कुछ तेजी से हुआ। 2 गवाह, 1 वकील, रजिस्ट्री ऑफिस और शाम तक सानवी मिश्रा कानूनी रूप से सानवी मल्होत्रा बन चुकी थी। बाहर निकलते ही आर्यन ने कहा। —यह शादी मेरे लिए असली नहीं है। सानवी ने बैग से कागज निकाला। —यह 2 लाख का उधारी पत्र है। मैं सब लौटाऊंगी। आर्यन ने कागज देखा, पर उसे समझ नहीं आया कि यह लालच था या सम्मान। अगले दिन सानवी “अर्चना जेम्स एंड डिजाइन” में इंटरव्यू देने गई, जिसे हाल ही में मल्होत्रा ग्रुप ने खरीदा था। वहां उसकी पुरानी क्लासमेट नंदिता खन्ना भी थी, जिसने कॉलेज में उसके डिजाइन चुराए थे। नंदिता ने सबके सामने कहा। —डिलीवरी गर्ल अब डिजाइनर बनेगी? फिर उसने सानवी का ही नेकलेस कॉन्सेप्ट अपना बताकर जमा कर दिया। तभी आर्यन वहां पहुंचा, पर उसने खुद को ड्राइवर बताकर छुपा लिया। उसने अपने असिस्टेंट कबीर को इशारा किया। जांच हुई। नंदिता की चोरी पकड़ी गई। सानवी को नौकरी मिल गई। रात को दादाजी ने आर्यन को आदेश दिया। —अब अपनी पत्नी के साथ रह। आर्यन अपनी हवेली छोड़कर सानवी के छोटे से किराए के कमरे में पहुंचा। सानवी ने समझा, उसे मकान मालिक ने निकाल दिया है। उसने दरवाजा खोल दिया। उसी रात, बिजली चली गई, छत टपकी, और आर्यन ने पहली बार देखा कि सानवी रोटी, दर्द और सम्मान को कैसे एक ही थाली में संभालती है। पर उसी रात उसने कहा। —मुझे 2 तरह के लोग सबसे ज्यादा नफरत हैं, धोखा देने वाले और झूठ बोलने वाले। आर्यन चुप हो गया। क्योंकि वह उसी पल उससे सबसे बड़ा झूठ जी रहा था।
भाग 3
सानवी की नई नौकरी आसान नहीं थी। अर्चना जेम्स एंड डिजाइन के चमकदार ऑफिस में लोग उसके डिजाइन से ज्यादा उसकी गरीबी देखते थे। नंदिता फिर भी कंपनी में वापस आ गई, क्योंकि उसका मामा बोर्ड में था। उसने सानवी को देर रात तक अपने अधूरे प्रोजेक्ट पकड़ा दिए। —ये सब सुबह तक पूरा कर देना, वरना तेरे ड्राइवर पति की नौकरी गई समझ। सानवी ने विरोध करना चाहा, पर आर्यन का चेहरा याद आया। वह खुद को गरीब समझती थी, पर उसे लगा आर्यन उससे भी ज्यादा अस्थिर है। उसने सिर झुका लिया। रात 11 बजे जब ऑफिस लगभग खाली था, आर्यन खाना लेकर आया। —तुमने बताया क्यों नहीं? —क्योंकि तुम्हारी नौकरी खतरे में थी। तुम अभी ड्राइवर की नौकरी में नए हो। आर्यन के भीतर कुछ टूट गया। जिस लड़की ने उससे 2 लाख मांगे थे, वही उसके झूठे पद को बचाने के लिए अपमान सह रही थी। उसने फाइलें उठाईं। —मैं मदद करूंगा। —तुम डिजाइन समझते हो? —ड्राइवर भी समझदार हो सकते हैं। उसने 3 घंटे में फॉर्म, माप और प्रस्तुति ऐसी सुधार दी कि अगले दिन क्लाइंट ने उसी प्रोजेक्ट की तारीफ कर दी। मैनेजर ने सबके सामने कहा। —यह काम सानवी का है। उसे बोनस और मल्होत्रा ग्रुप के वार्षिक गाला का वीआईपी निमंत्रण दिया जाता है। नंदिता का चेहरा जल गया।
घर लौटकर सानवी ने देखा कि आर्यन की मां मीरा मल्होत्रा आई हुई थीं। महंगे सूट, मोती के झुमके और हाथ में 4 बड़े डिब्बे। आर्यन ने जल्दी से कहा। —मेरी मां फिल्मों में अमीर औरतों का रोल करती हैं। ये सब प्रॉप्स हैं। मीरा ने आंखें तरेरीं, पर सानवी हंस पड़ी। —आपकी एक्टिंग सच में अच्छी है, आंटी। —आंटी नहीं, मां। मीरा ने उसे गाला के लिए साड़ी, सैंडल और एक दुर्लभ नेकलेस दिया। —यह बहुत महंगा लग रहा है। —क्लियरेंस सेल से लिया है, लगभग मुफ्त। सानवी ने यकीन तो नहीं किया, पर पहली बार किसी बड़े ने उसे बेटी की तरह सजाया था।
गाला की रात दिल्ली के सबसे बड़े होटल में रोशनी, कैमरे और मीडिया थे। सानवी सुनहरी साड़ी में पहुंची तो दरवाजे पर नंदिता और उसकी सहेलियां खड़ी थीं। —यहां डिलीवरी वाले खाने छोड़ते हैं, अंदर नहीं जाते। गार्ड ने सानवी का कार्ड देखा और तुरंत झुक गया। —मैडम, आपका निमंत्रण टॉप वीआईपी है। नंदिता के चेहरे से हंसी गायब हो गई। अंदर घोषणा हुई कि प्रसिद्ध “रात्रि तारा” नेकलेस किसी निजी खरीदार ने खरीद लिया है, इसलिए प्रदर्शित नहीं होगा। तभी नंदिता ने अपनी गर्दन पर नकली नेकलेस दिखाया। —मेरे परिवार ने खरीदा है। फिर उसकी नजर सानवी के गले पर पड़ी। दोनों नेकलेस एक जैसे लग रहे थे। —चोरी! इस गरीब ने नकली कॉपी बनवाई है। उसने गार्ड को इशारा किया। सानवी को पकड़ने से पहले ही आर्यन आगे आया। —मेरी पत्नी को हाथ मत लगाना। —अरे, ड्राइवर पति भी आ गया? नंदिता ने व्यंग्य किया। आर्यन ने शांत स्वर में कहा। —सच्चाई जांच लेते हैं। असली पत्थर टेस्टिंग लिक्विड से खराब नहीं होता। नंदिता कांप गई। उसका नेकलेस काला पड़ गया। सानवी का वैसे ही चमकता रहा। तभी नंदिता का मामा भागता हुआ आया। —बॉस मल्होत्रा, माफ कीजिए। सानवी ने आर्यन की तरफ देखा। —बॉस? आर्यन ने तुरंत बात घुमाई। —ये लोग मुझे मेरे बॉस के साथ देखते हैं, इसलिए गलती कर देते हैं। वह रात बच गई, पर झूठ अब सांस लेने लगा था।
गाला के बाद सानवी को भारी मुआवजा मिला। आर्यन सोच रहा था वह कर्ज चुकाएगी, पर अगले दिन वह उसे पुराने अनाथालय ले गई। —मां के बाद मैं यहां आती थी। जिन बच्चों के पास कोई नहीं, उनके लिए कुछ करना चाहती हूं। उसने पैसे दान कर दिए। आर्यन चौंक गया। —तुमने अपने लिए कुछ नहीं रखा? —यह पैसा मेरे काम का नहीं था। मेहनत की कमाई अलग होती है। उस दिन आर्यन को पहली बार पूरी तरह समझ आया कि सानवी पैसा नहीं, गरिमा चाहती है।
लेकिन सानवी की मौसी सुनीता चुप नहीं बैठी थी। उसे पता लग गया कि आर्यन कोई ड्राइवर नहीं, असली आर्यन मल्होत्रा है। उसने तुरंत आर्यन की पूर्व मंगेतर वैनेसा कपूर को खबर दी। वैनेसा वही लड़की थी, जिसने आर्यन के परिवार के बुरे दिनों में रिश्ता तोड़ दिया था और अब उनकी संपत्ति लौटते ही वापस आई थी। वैनेसा ने नंदिता और सुनीता मौसी के साथ मिलकर सानवी को हटाने की योजना बनाई।
पहला वार परिवार के नाम पर हुआ। मौसी ने सानवी को डिनर पर बुलाया और वहां 1 कारोबारी लड़के, करण लूथरा, से उसकी जबरन मुलाकात कराई। —तू हमारी जिम्मेदारी है। उस ड्राइवर से शादी कोई शादी नहीं। यह कागज साइन कर। करण ने घमंड से कहा। —शादी के बाद काम बंद। और हां, तेरे जैसी लड़की के लिए 80000 काफी हैं। सानवी उठ खड़ी हुई। —मैं कोई पुराना सामान नहीं, इंसान हूं। तभी दरवाजा खुला। आर्यन अंदर आया। —किसने मेरी पत्नी की कीमत लगाई? करण हंसा। —ड्राइवर, तू चुप रह। मेरी कंपनी मल्होत्रा ग्रुप से जुड़ी है। आर्यन ने फोन मिलाया। —करण लूथरा की कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट खत्म। हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट। कुछ ही सेकंड में करण का फोन बजा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया। सानवी ने आर्यन को घूरा। —एक ड्राइवर किसी की कंपनी कैसे बंद करवा सकता है? —मैंने सही आदमी को फोन किया। वह मानना चाहती थी, पर शक अब उसके भीतर बैठ चुका था।
फिर वैनेसा ऑफिस आई। उसने सबके सामने कहा। —तुम उस आदमी की जगह लेने आई हो जो मेरा मंगेतर था। सानवी घबरा गई। —मेरा किसी बॉस मल्होत्रा से कोई रिश्ता नहीं। वैनेसा हंसी। —तुम्हें सच में नहीं पता? तुम्हारा पति ही आर्यन मल्होत्रा है। आर्यन तुरंत पहुंचा और वैनेसा को बाहर जाने को कहा, पर शब्द हवा में रह गए। उस रात सानवी ने पूछा। —क्या तुमने मुझसे कुछ छुपाया है? आर्यन ने कहा। —सिर्फ इतना कि वैनेसा कभी मेरे परिवार की पसंद थी। सच पूरा नहीं था, और झूठ फिर भी जारी था।
अगले दिन वैनेसा ने जन्मदिन पार्टी के नाम पर जाल बिछाया। उसने सानवी की पुरानी डिलीवरी साथी हेमा को पैसे देकर कहा कि बीमार बच्चे का बहाना बनाकर सानवी से केक डिलीवर करवाए। सानवी ने मना नहीं किया। वह पार्टी में पहुंची तो वैनेसा ने जानबूझकर केक गिरवा दिया और सबके सामने कहा। —घुटनों पर बैठकर साफ करो। गरीबों को अपनी औकात याद रहनी चाहिए। सानवी की मुट्ठियां कस गईं, पर हेमा की नौकरी याद आई। तभी मीडिया, मेहमान और आर्यन एक साथ अंदर आए। वैनेसा ने घोषणा की। —आर्यन मल्होत्रा और मेरी सगाई जल्द होगी। आर्यन गरजा। —मैं पहले से शादीशुदा हूं। मेरी पत्नी सानवी मल्होत्रा है। हॉल में सन्नाटा छा गया। कोई बोला। —देश के सबसे युवा अरबपति सीईओ ने डिलीवरी गर्ल से शादी की? सानवी के कानों में सिर्फ 3 शब्द गूंजे—अरबपति, सीईओ, पति। उसे गाला, नेकलेस, ऑफिस, फोन कॉल, सब समझ आने लगा। —तुम बॉस मल्होत्रा हो? आर्यन आगे बढ़ा। —सानवी, मैं समझा सकता हूं। —नहीं। तुमने मुझे झूठ में रखा। तुमने मुझे रात में डिलीवरी करते देखा, खाने के पैसे गिनते देखा, तुम्हारे लिए डिब्बा पैक करते देखा, और फिर भी गरीब बनने का नाटक करते रहे। वैनेसा ने ताली बजाई। —देखा? उसे कभी तुम्हारी दुनिया में जगह नहीं मिलेगी। सानवी ने आंसुओं में कहा। —मुझे तुम्हारी दुनिया चाहिए ही नहीं थी। मुझे सच चाहिए था। मैं तलाक चाहती हूं।
आर्यन कई रात उसके छोटे कमरे के बाहर खड़ा रहा। सानवी ने दरवाजा नहीं खोला। दादाजी आए, मीरा आईं, पर किसी ने उसे मजबूर नहीं किया। मीरा ने बस इतना कहा। —बेटी, आर्यन ने गलत किया। पर उसने झूठ तुम्हें चोट पहुंचाने के लिए नहीं, खुद को बचाने के लिए बोला। जब हमारा बिजनेस डूब रहा था, वैनेसा का परिवार हमें छोड़ गया। तब से वह हर प्यार में सौदा ढूंढता है। सानवी ने आंखें झुका लीं। —दर्द का मतलब यह नहीं कि हम दूसरों को दर्द देने लगें। —बिल्कुल नहीं। इसलिए फैसला तुम्हारा होगा।
सानवी ने नौकरी छोड़ दी, क्योंकि अब ऑफिस में कोई उसे डिजाइनर नहीं, बॉस की पत्नी कहता था। नंदिता और वैनेसा की नफरत और बढ़ गई। एक रात सानवी अकेली मंदिर से लौट रही थी। ऑटो बीच रास्ते खराब हो गया। एक महिला ने मदद का बहाना किया। कुछ मिनट बाद आर्यन को अज्ञात नंबर से फोन आया। वैनेसा की आवाज थी। —अपनी पत्नी चाहिए तो कल प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमारी सगाई की घोषणा करो। अकेले आना। आर्यन की आवाज बर्फ जैसी हो गई। —अगर सानवी को खरोंच भी आई तो तुम पछताओगी। —तुम्हारी ताकत मीडिया के सामने काम नहीं करेगी। कल तुम मुझे चुनोगे।
पुरानी बंद फैक्ट्री में सानवी को कुर्सी से बांधा गया था। वैनेसा सामने बैठी थी, नंदिता दरवाजे पर। सानवी ने थकी आवाज में कहा। —तुम उसे मजबूर कर सकती हो, उसका दिल नहीं। वैनेसा चिल्लाई। —चुप रहो। तुम जैसी लड़की ने मुझसे मेरा स्थान छीना। सानवी ने कहा। —स्थान प्यार से मिलता है, दौलत से नहीं। नंदिता आगे आई। —तुम कॉलेज से ही सबकी पसंद बनती थीं। तुम्हारी प्रतिभा से मुझे नफरत थी। —तो मेहनत करती, चोरी नहीं। नंदिता ने मुंह फेर लिया, पर उसके चेहरे पर डर दिखने लगा था।
अगले दिन होटल में मीडिया जमा थी। वैनेसा मुस्कुरा रही थी। —आज 2 परिवार फिर जुड़ेंगे। आर्यन मंच पर आया। सबने कैमरे उठाए। उसने माइक पकड़ा। —मेरी सिर्फ 1 पत्नी है। उसका नाम सानवी मल्होत्रा है। मैं वैनेसा कपूर से कभी शादी नहीं करूंगा। और आज से मेरी सारी संपत्ति, शेयर, घर, जमीन और कंपनियों की प्रमुख हिस्सेदारी मेरी पत्नी सानवी के नाम है। हॉल में हंगामा मच गया। वैनेसा चीखी। —क्या? आर्यन ने उसे देखा। —तुम्हें मेरा नाम और पैसा चाहिए था। मैंने सब सानवी को दे दिया। अब मेरे पास सिर्फ मैं हूं। अगर तुम्हारा प्यार सच है तो मुझे ऐसे ही स्वीकार करो। वैनेसा का चेहरा बिगड़ गया। उसी समय कबीर ने कान में कहा। —लोकेशन मिल गई। पुलिस पहुंच गई है। आर्यन मंच से उतर चुका था।
फैक्ट्री में पुलिस घुसी। नंदिता भागने लगी, पकड़ी गई। वैनेसा ने आखिरी बार सानवी को चोट पहुंचाने की कोशिश की, पर आर्यन उससे पहले पहुंच गया। —सानवी! उसने रस्सियां खोलीं। सानवी कांप रही थी, पर जिंदा थी। —तुम आए। —मैं हमेशा आऊंगा। वैनेसा और नंदिता गिरफ्तार हुईं। सुनीता मौसी और करण के खिलाफ भी बयान दर्ज हुआ। हेमा ने सच बता दिया कि उसे पैसे दिए गए थे। दादाजी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो गुस्से में बोले। —जिसने मेरी बहू को रुलाया, उसे अदालत तक मैं देखूंगा।
अस्पताल में डॉक्टर ने जांच के बाद मुस्कुराकर कहा। —उन्हें आराम चाहिए। और 1 बात, मिसेज मल्होत्रा गर्भवती हैं। कमरे में जैसे समय रुक गया। दादाजी ने दोनों हाथ आकाश की तरफ उठा दिए। —मेरे परपोते या परपोती का आशीर्वाद आ गया। सानवी और आर्यन एक-दूसरे को देखते रह गए। उन्हें वही रात याद आई जब सानवी की पहली बड़ी सफलता पर उन्होंने छोटे कमरे में प्लास्टिक की टेबल पर चाय और समोसा रखकर जश्न मनाया था, और पहली बार आर्यन ने उसका हाथ ऐसे पकड़ा था जैसे वह कोई जिम्मेदारी नहीं, घर हो।
कुछ दिनों बाद आर्यन उसे अपनी असली हवेली में ले गया। सानवी विशाल दरवाजे, संगमरमर की सीढ़ियां और लंबे लॉन देखकर रुकी। —तो यह तुम्हारा घर है? —हमारा घर। —और तुम मेरे कमरे में छत टपकते हुए सोते रहे? —हां। —मुझे हंसना चाहिए या थप्पड़ मारना चाहिए? —हंसी बेहतर है, पर थप्पड़ भी स्वीकार है। सानवी की आंखें नम थीं, पर होंठों पर मुस्कान आ गई। —मैं तुम्हें इस घर की वजह से माफ नहीं कर रही। मैं तुम्हें इसलिए माफ कर रही हूं क्योंकि तुमने मुझे दुनिया के सामने चुना, और क्योंकि इस बार सच बोलने में देर नहीं की। लेकिन सुन लो, फिर झूठ बोला तो पति और कर्मचारी दोनों पद से निकाल दूंगी। आर्यन ने सिर झुका दिया। —स्वीकार है, मैडम चेयरपर्सन। —और मैं घर बैठकर सिर्फ तुम्हारी पत्नी नहीं बनूंगी। मैं डिजाइन करूंगी, काम करूंगी, और बच्चों के लिए फाउंडेशन चलाऊंगी। —हम साथ करेंगे। —साथ, लेकिन नियंत्रण मेरा। —बिल्कुल।
अगले महीनों में अर्चना जेम्स एंड डिजाइन पूरी तरह बदल गया। हर डिजाइन डिजिटल रजिस्टर में दर्ज होने लगा। किसी इंटर्न का काम कोई वरिष्ठ चोरी नहीं कर सकता था। गरीब पृष्ठभूमि वाले छात्रों के लिए स्कॉलरशिप शुरू हुई। सानवी ने “रोटी और रोशनी फाउंडेशन” बनाया, जहां अनाथ बच्चों को शिक्षा, कला और सुरक्षा मिली। आर्यन पैसे देता था, पर फैसले सानवी लेती थी। दादाजी हर उद्घाटन पर वही कहानी सुनाते। —मैं भूखा था, दुनिया देख रही थी, पर मेरी बहू रुकी थी। लोग हंसते, पर सानवी जानती थी कि उस दिन उसने सिर्फ 2 ब्रेड नहीं खरीदी थीं, उसने अपनी किस्मत का दरवाजा खोला था।
एक शाम दादाजी ने परिवार को इकट्ठा किया। फूलों से सजा आंगन, दीये, हल्की बारिश और आर्यन हाथ में अंगूठी लेकर सानवी के सामने घुटनों पर बैठ गया। —पहली बार तुम्हें चुनने का मौका नहीं मिला। दादाजी ने जल्दबाजी की, मैंने झूठ बोला, दुनिया ने तुम्हें चोट पहुंचाई। आज मैं बिना नाम, बिना पद, बिना कंपनी के पूछ रहा हूं। सानवी, क्या तुम मुझे फिर से चुनोगी? सानवी ने उसकी आंखों में देखा। वहां अब कोई झूठ नहीं था, सिर्फ डर, प्यार और इंतजार था। —हां। लेकिन इस बार मैं सिर्फ आर्यन को चुन रही हूं, बॉस मल्होत्रा को नहीं। दादाजी रो पड़े। —मेरी आंखें अब भी तेज हैं। मैंने पहले दिन पहचान लिया था। सानवी ने अंगूठी पहनी और आर्यन का हाथ पकड़ा। वह लड़की जो कभी पेट्रोल के पैसों से ब्रेड खरीद रही थी, अब करोड़ों की मालकिन थी, पर उसकी असली जीत दौलत नहीं थी। असली जीत यह थी कि जिन लोगों ने उसे औकात दिखाई थी, उन्होंने अंत में उसकी कीमत नहीं, उसका दिल देखा। और उस रात हवेली के सबसे बड़े कमरे में, सानवी ने अपनी मां की पुरानी तस्वीर रखी और धीरे से कहा। —मां, इस बार किसी ने आपकी बेटी को खरीदा नहीं, सच में अपनाया है।
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