
PART 1
—अगर आप इस गाड़ी में बैठे, सर, तो दोपहर से पहले आपकी मौत को हादसा बता दिया जाएगा।
गुलमोहर के पेड़ के पीछे से निकली वह फुसफुसाहट इतनी धीमी थी कि अगर हवा थोड़ी तेज होती, तो अरविंद मल्होत्रा उसे सुन ही नहीं पाता। वह अपने गुरुग्राम के विशाल बंगले के पोर्च में खड़ा था, हाथ में चमड़े का ब्रीफकेस, सामने काली बुलेटप्रूफ मर्सिडीज, और ड्राइवर पिछला दरवाज़ा खोलने को तैयार।
सुबह के 8 बजकर 20 मिनट हुए थे। लॉन पर माली ने अभी पानी डाला था। सुरक्षा गार्ड गेट पर खड़े थे। अंदर पूजा-घर से अगरबत्ती की हल्की खुशबू आ रही थी। सब कुछ हर सोमवार जैसा ही था।
सिवाय 10 साल के उस लड़के के, जो दीवार से चिपका कांप रहा था।
अरविंद ने उसे पहचानने में 2 सेकंड लगाए। वह रानी का बेटा था—रानी, जो 7 साल से उनके घर में खाना बनाती, झाड़ू-पोंछा करती और रात देर तक बर्तन समेटती थी। लड़के का नाम शायद कबीर था। दुबली कलाई, घिसी हुई चप्पलें, स्कूल की फीकी शर्ट और आंखों में ऐसी दहशत, जो किसी बच्चे के चेहरे पर नहीं होनी चाहिए थी।
—कबीर? तुम यहां क्या कर रहे हो?
लड़के ने उसका कोट पकड़ लिया।
—सर, मुझे उनके सामने मत आने देना। प्लीज़। वो मुझे भी मार देंगे।
अरविंद के चेहरे पर पहली बार सख्ती टूटी।
—कौन?
कबीर ने गाड़ी की ओर देखा।
—वो दीपक भैया नहीं हैं।
अरविंद की नजर ड्राइवर पर गई। वही काली टोपी, वही नेहरू जैकेट, वही झुका हुआ सिर। दूर से वह दीपक जैसा ही लग रहा था।
लेकिन दीपक की गाड़ी में हमेशा रियर-व्यू मिरर से उसकी बेटी का छोटा गणेश लॉकेट लटका रहता था।
आज शीशा खाली था।
अरविंद की गर्दन में ठंडी लहर दौड़ गई।
वह 49 साल का आदमी था। मल्होत्रा लॉजिस्टिक्स का मालिक, 7 राज्यों में गोदाम, 300 ट्रक, दिल्ली से दुबई तक कारोबार। उसने धमकियां देखी थीं, टैक्स छापे देखे थे, पार्टनरों की चालें देखी थीं। पर एक बच्चे की आंखों में यह डर झूठ नहीं हो सकता था।
—मेरे साथ आओ। धीरे। गाड़ी की तरफ मत देखना।
दोनों बंगले के साइड वाले रास्ते से होते हुए पुराने स्टोर-रूम के पीछे पहुंचे। अरविंद झुका।
—अब बताओ।
कबीर ने जेब से टूटा हुआ मोबाइल निकाला।
—कल रात मां सर्वेंट क्वार्टर में सो रही थी। मैं अपनी कॉपी लेने नीचे आया था। मैडम के लाउंज का दरवाज़ा थोड़ा खुला था। मैडम किसी आदमी से बात कर रही थीं। उन्होंने आपका नाम लिया। बोले कि आज आप जयपुर रोड वाले मीटिंग के लिए निकलेंगे। फ्लाईओवर के बाद गाड़ी धीमी होगी। फिर सबको लगेगा कि लूटपाट में हादसा हुआ।
अरविंद का दिल जैसे पसलियों से टकराया।
निशा।
उसकी पत्नी।
12 साल की शादी। चैरिटी डिनर में मुस्कुराती हुई, मंदिर में उसके साथ आरती करती हुई, मेहमानों के सामने उसका हाथ पकड़कर कहती हुई—“अरविंद जी अपने काम में बहुत डूब जाते हैं, इन्हें संभालना पड़ता है।”
कबीर ने रिकॉर्डिंग चला दी।
निशा की आवाज़ साफ थी। नर्म, नियंत्रित, वही आवाज़ जिसे सुनकर लोग कहते थे—“कितनी संस्कारी बहू है।”
—उसे बस इतना लगे कि ड्राइवर वही है। अरविंद कभी ड्राइवर का चेहरा ठीक से नहीं देखता। गाड़ी में बैठते ही ईमेल खोल लेता है।
एक पुरुष की आवाज़ आई।
—असली ड्राइवर को 1 घंटे रोक लिया जाएगा। टोल के बाद गाड़ी मोड़ेंगे। फिर बाकी काम साफ दिखेगा—जैसे गलत जगह फंस गई हो।
फिर निशा की धीमी हंसी।
—इंश्योरेंस में एक्सिडेंटल डेथ पर रकम 2 गुना है। और नए पेपर के बाद मैं अकेली नॉमिनी हूं। घर, शेयर, खाते… सब।
अरविंद ने आंखें बंद कर लीं।
उसे 14 महीने पहले की शाम याद आई। साउथ एक्स के वकील के ऑफिस में निशा ने कुछ फाइलें आगे सरकाई थीं।
—बस फैमिली ट्रस्ट की अपडेट है। साइन कर दीजिए। आप मीटिंग में वैसे भी देर कर रहे हैं।
उसने साइन कर दिए थे।
जिस आदमी ने करोड़ों के कॉन्ट्रैक्ट की हर लाइन पढ़ी, उसने अपनी मौत की कीमत पढ़े बिना तय कर दी थी।
मोबाइल बजा।
निशा।
—आप अभी तक निकले नहीं? ड्राइवर इंतज़ार कर रहा है।
—एक फाइल भूल गया।
—मैं भेज दूं?
—नहीं। आ रहा हूं।
—जल्दी कीजिए, अरविंद जी। आज की मीटिंग बहुत जरूरी है।
अरविंद ने फोन काट दिया। सामने शीशे में उसका चेहरा दिख रहा था—महंगा सूट, सफेद पड़ते होंठ, और एक ऐसा आदमी जिसके अपने घर में उसकी मौत की तैयारी हो चुकी थी।
—कबीर, तुम्हारी मां को पता है?
—नहीं, सर।
—अभी मत बताना। जितना कम जानेगी, उतनी सुरक्षित रहेगी।
वह बाहर निकला। मुख्य हॉल में निशा खड़ी थी। क्रीम रंग की साड़ी, हीरे की पतली चूड़ियां, माथे पर छोटी बिंदी, और वही मुस्कान जिसने सालों तक सभी को धोखा दिया था।
—मिल गई फाइल?
—हां।
वह पास आई, उसका कॉलर ठीक किया।
—भगवान आपका दिन शुभ करे।
अरविंद ने उसके हाथ की उंगलियां देखीं। वही हाथ जिसने शायद उसकी मौत पर सफेद साड़ी चुन रखी थी।
—धन्यवाद।
वह बाहर आया। नकली ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला।
अरविंद 3 कदम आगे बढ़ा, फिर अचानक फोन कान पर लगाकर बोला—
—मैं कोने से बैठूंगा, गेट पर मीडिया वाले हैं।
ड्राइवर ठिठक गया।
—सर?
अरविंद मुड़ा नहीं। पैदल गेट से निकला, बाईं गली में गया। वहां एक पुरानी स्विफ्ट कार खड़ी थी। अंदर असली दीपक बैठा था, चेहरा पीला, माथे पर पसीना।
—सर, मुझे बेसमेंट के इलेक्ट्रिकल रूम में बंद कर दिया था। किसी ने पीछे से—
—चलो। ऑफिस नहीं। घर नहीं। बस चलो।
2 मिनट बाद अरविंद ने अपनी गोद में रखे टूटे मोबाइल को देखा।
एक नौकरानी के बेटे ने उसकी जान बचाई थी।
और बंगले के अंदर उसकी पत्नी शायद अभी से विधवा बनने का अभिनय रिहर्सल कर रही थी।
PART 2
10 बजकर 05 मिनट पर अरविंद अपनी वकील मीरा सूद से दिल्ली के एक शांत होटल कैफे में मिला। उसने रिकॉर्डिंग पूरी सुनी। जब निशा की आवाज़ में “अकेली नॉमिनी” आया, मीरा ने चाय का कप नीचे रख दिया।
—उसे पता नहीं चलना चाहिए कि यह आपके पास है।
मीरा ने सुरक्षित पोर्टल पर फाइलें खोलीं।
—14 महीने पहले पॉलिसी बदली गई। लाइफ कवर 42 करोड़। एक्सिडेंटल डेथ पर दोगुना। नॉमिनी सिर्फ निशा मल्होत्रा।
अरविंद ने सूखे गले से कहा—
—मैंने यह जानकर साइन नहीं किया।
शाम तक मीरा की निजी जांचकर्ता ने खबर दी।
—निशा के साथ जो आदमी है, उसका नाम रोहन मेहरा नहीं। असली नाम विक्रम साहनी है। 2014 में उसकी मंगेतर की कार खाई में गिरी थी। 2019 में एक अमीर विधवा की फार्महाउस आग में मौत हुई। दोनों केस में इंश्योरेंस था। दोनों बार वह गायब हुआ।
अरविंद चुप रह गया।
—हो सकता है, वह निशा को भी इस्तेमाल कर रहा हो, मीरा ने कहा।
यह बात अजीब तरह से चुभी। निशा उसे मरवाना चाहती थी, फिर भी शायद खुद मौत के जाल में जा रही थी।
रात को अरविंद घर लौटा। निशा रोती हुई उससे लिपट गई।
—मैं डर गई थी। सुना गाड़ी में कुछ गड़बड़ थी।
—शायद चोरी की कोशिश थी।
—भगवान ने बचा लिया।
अरविंद ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।
—हां। भगवान ने नहीं, कबीर ने।
वह शब्द उसके मन में रह गया, होंठों पर नहीं आया।
अगली सुबह नाश्ते की मेज पर उसने जाल बिछाया।
—जयपुर वाली मीटिंग शुक्रवार सुबह रखी है। इस बार सुरक्षा के साथ जाऊंगा।
निशा ने आंखें झुकाकर मुस्कुराया।
—तब मुझे चैन रहेगा।
मेज के दोनों ओर 2 झूठ बैठे थे।
और शुक्रवार को उनमें से एक सच बनकर फटने वाला था।
PART 3
शुक्रवार की सुबह बंगले में एक अजीब शांति थी।
अरविंद 7 बजकर 30 मिनट पर सीढ़ियों से उतरा। चारकोल ग्रे सूट, काला ओवरकोट, हाथ में वही ब्रीफकेस। उसने पिछली रात मुश्किल से 2 घंटे सोया था। डर के कारण नहीं। वह छत को घूरते हुए यही सोचता रहा कि एक शादी कब इतनी ठंडी हो जाती है कि पति की मौत भी एक वित्तीय योजना जैसी लगने लगती है।
रसोई के पास निशा खड़ी थी।
उसने खुद कॉफी बनाई थी।
निशा ने शादी के 12 सालों में कभी उसके लिए कॉफी नहीं बनाई थी। नौकर थे, मशीन थी, रानी थी। उसे खुद कुछ करने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई।
—आज रास्ता लंबा है, उसने कप आगे बढ़ाया। थोड़ी एनर्जी चाहिए होगी।
उसकी आवाज़ में वही मिठास थी, जिससे वह मेहमानों को जीत लेती थी। गहरे नीले सूट में वह किसी बिजनेस मैगजीन की कवर फोटो जैसी दिख रही थी—संभ्रांत, सलीकेदार, निर्दोष।
अरविंद ने कप देखा। काली कॉफी में उसका चेहरा टूटा हुआ दिख रहा था।
उसे रिकॉर्डिंग याद आई। पॉलिसी याद आई। कबीर का कांपता हाथ याद आया। विक्रम साहनी का नाम याद आया—वह आदमी जो अमीर औरतों के आसपास पहले प्रेमी बनकर आता था, फिर शोकसभा की छाया बन जाता था।
—धन्यवाद।
उसने कॉफी नहीं पी।
निशा ने उसकी टाई सीधी की।
—ध्यान से जाइएगा। कल पंडित जी ने भी कहा था, आज यात्रा में सावधानी रखनी चाहिए।
अरविंद ने उसके चेहरे को गौर से देखा। वही चेहरा जिससे उसने कभी प्रेम किया था। 13 साल पहले एक आर्ट एग्ज़िबिशन में वह हंसते हुए गोलगप्पे खा रही थी। उसने कहा था, “मुझे पैसा दिखाने वाले आदमी पसंद नहीं।” अरविंद ने माना था कि वह अलग है।
शायद वह सचमुच अलग थी।
या शायद वह अभिनय शुरू से ही बहुत अच्छा करती थी।
—शाम तक लौट आऊंगा, उसने कहा।
निशा ने मुस्कुराकर कहा—
—मैं इंतज़ार करूंगी।
यह वाक्य उसके कानों में किसी श्राद्ध की तैयारी जैसा बजा।
बाहर मर्सिडीज तैयार खड़ी थी। इस बार दीपक सचमुच ड्राइविंग सीट पर था। रियर-व्यू मिरर से उसकी बेटी का गणेश लॉकेट झूल रहा था। छोटा सा पीतल का भगवान सड़क की हल्की हवा में कांप रहा था।
अरविंद पीछे बैठा। गेट खुला।
गाड़ी आगे बढ़ी। 6 सेकंड बाद एक सफेद टेंपो चालू हुआ। थोड़ी दूर पर एक काली बाइक भी सड़क पर आ गई।
दीपक ने शीशे में देखा।
—सर, पीछे लगे हैं।
—कितने?
—कम से कम 2।
—योजना के मुताबिक चलो।
दीपक की उंगलियां स्टीयरिंग पर कड़ी हो गईं। वह कई सालों से अरविंद का ड्राइवर था। उसने बड़े नेताओं, विदेशी मेहमानों, शादी-ब्याह, अस्पताल, एयरपोर्ट सब जगह उसे छोड़ा था। लेकिन आज पहली बार वह अपने मालिक को ऐसे ले जा रहा था जैसे किसी युद्धभूमि में जा रहा हो।
दिल्ली-जयपुर हाईवे पर ट्रैफिक धीरे-धीरे खुलने लगा। धूप धुंधली थी। हवा में धूल थी। सड़क किनारे चाय की दुकानों पर लोग कुल्हड़ पकड़े खड़े थे। कोई नहीं जानता था कि उसी सड़क पर एक आदमी अपनी हत्या के जाल में खुद चलकर जा रहा है।
अरविंद के फोन पर संदेश आया।
“निकले?”
निशा।
उसने लिखा—
“हां।”
तुरंत जवाब आया—
“जय श्री कृष्ण। सुरक्षित रहिए। प्यार।”
अरविंद स्क्रीन देखता रह गया। प्रेम का नाम कभी-कभी सबसे खतरनाक मुखौटा होता है।
उसने फोन बंद कर दिया।
मीरा सूद और पुलिस ने पूरा जाल बिछाया था। साइबर सेल ने पिछली रात निशा के कॉल रिकॉर्ड निकाले थे। विक्रम के 3 प्रीपेड नंबर लोकेट हुए थे। उसके साथ नकली ड्राइवर, 2 भाड़े के लोग और एक मैकेनिक जुड़ा था, जो गाड़ी को ऐसे मोड़ने वाला था कि हादसा और हमला दोनों सच लगें।
योजना थी—मानेसर के आगे एक सर्विस रोड पर टायर पंचर का बहाना। फिर गाड़ी रोकना। दीपक को अलग करना। अरविंद को बेहोश दिखाना। बाद में खबर—“लूट के दौरान कारोबारी की मौत।”
और शाम तक निशा की भूमिका शुरू हो जाती।
कंपकंपाती आवाज़ में फोन।
ड्रॉइंग रूम में सफेद दुपट्टा।
न्यूज़ चैनल के कैमरों के सामने भरे हुए आंसू।
और बैंक खातों में धीरे-धीरे उतरती करोड़ों की रकम।
गाड़ी मानेसर के बाद सर्विस रोड पर मुड़ी। सड़क सुनसान थी। दूर एक आधा बना वेयरहाउस था। सड़क किनारे एक पिकअप वैन खड़ी थी, बोनट खुला हुआ। एक आदमी रिफ्लेक्टिव जैकेट पहनकर हाथ दे रहा था।
अरविंद ने उसे पहचान लिया।
सोमवार वाला नकली ड्राइवर।
दीपक ने सांस रोकी।
—सर?
—धीरे करो। रुकना मत जब तक वे सामने न आएं।
गाड़ी की रफ्तार कम हुई।
तभी पीछे की बाइक पास आई। सफेद टेंपो ने साइड से रास्ता काटा। नकली ड्राइवर आगे बढ़ा।
पर उससे पहले ही वेयरहाउस के पीछे से 4 सफेद एसयूवी निकलीं। नीली बत्तियां चमकीं। सादे कपड़ों वाले अधिकारी बाहर कूदे।
—क्राइम ब्रांच! हाथ ऊपर!
सब कुछ 30 सेकंड में बदल गया।
बाइक वाला गिर पड़ा। टेंपो पीछे लेने की कोशिश में खंभे से टकराया। नकली ड्राइवर ने भागना चाहा, पर 2 पुलिसकर्मियों ने उसे जमीन पर दबा दिया। पिकअप वैन से एक बैग मिला—नकली नंबर प्लेट, रस्सी, इंजेक्शन, प्रीपेड फोन, अरविंद की यात्रा का प्रिंटआउट, और इंश्योरेंस पॉलिसी की कॉपी।
फिर दूसरी गाड़ी से विक्रम साहनी निकाला गया।
साफ शेव, महंगी घड़ी, हल्की मुस्कान। वह सड़क का गुंडा नहीं लगता था। वह उन लोगों में से था जो अच्छे होटलों के लॉबी में बैठकर मरने वालों की संपत्ति पर बात करते हैं।
उसने अरविंद को देखा।
—आप बहुत किस्मत वाले हैं, मल्होत्रा साहब।
अरविंद आगे बढ़ा।
—नहीं। मैं उस बच्चे का कर्जदार हूं, जिसे तुम लोगों ने गिना ही नहीं।
विक्रम की मुस्कान बुझ गई।
उसी समय मीरा का फोन आया।
—घर पर कार्रवाई शुरू हो गई है।
गुरुग्राम के बंगले में निशा मुख्य लिविंग रूम में बैठी थी। उसने टीवी नहीं चलाया था। फोन उसके हाथ में था। मेज पर तुलसी वाली चाय ठंडी हो चुकी थी।
वह इंतज़ार कर रही थी।
उसने सब सोचा हुआ था।
पहले 3 मिस्ड कॉल।
फिर दीपक का फोन न लगने पर बेचैनी।
फिर किसी अनजान नंबर से खबर।
फिर चीख।
फिर जमीन पर गिर जाना।
फिर रानी को आदेश—“सबको फोन करो।”
उसने अलमारी में एक ऑफ-व्हाइट साड़ी अलग रखी थी। पूरी तरह सफेद नहीं, क्योंकि उसे पता था कैमरे में बहुत नाटकीय लगेगी। वह दुख को भी सौंदर्य के साथ निभाना चाहती थी।
जब दरवाज़ा जोर से खुला, वह उठी।
लेकिन सामने कोई दुखद खबर लेकर आया अधिकारी नहीं था।
सामने एक महिला डीसीपी खड़ी थी, पहचान-पत्र हाथ में।
—निशा मल्होत्रा?
निशा ने भौंहें सिकोड़ीं।
—जी। मेरे पति कहां हैं?
—जिंदा हैं।
वह शब्द कमरे में चाबुक की तरह पड़ा।
निशा का चेहरा आधे पल के लिए खाली हो गया।
फिर उसने तुरंत अभिनय पकड़ लिया।
—क्या मतलब? उन्हें क्या हुआ? मुझे उनसे बात करनी है।
डीसीपी ने शांत आवाज़ में कहा—
—आपको गिरफ्तार किया जा रहा है। आप पर हत्या की साजिश, बीमा धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज़ और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप हैं।
—यह बकवास है। मैं अपने वकील को बुलाऊंगी।
—बुलाइए। लेकिन पहले यह सुन लीजिए।
एक अधिकारी ने टैबलेट पर रिकॉर्डिंग चलाई।
निशा की अपनी आवाज़ पूरे हॉल में फैल गई।
—उसे बस इतना लगे कि ड्राइवर वही है…
रानी, जो रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थी, दोनों हाथों से मुंह ढककर रह गई। कबीर उसके पीछे छिपा था। उसने अपनी मां की साड़ी कसकर पकड़ रखी थी।
निशा ने टैबलेट को ऐसे देखा जैसे वहां किसी और औरत की आवाज़ हो।
—यह एडिटेड है, उसने कहा। यह मेरी आवाज़ नहीं।
डीसीपी ने दूसरा ऑडियो चलाया।
—इंश्योरेंस में एक्सिडेंटल डेथ पर रकम 2 गुना है…
इस बार निशा की आंखें फड़क गईं।
—विक्रम ने कहा था किसी को दर्द नहीं होगा, वह अचानक बोल पड़ी। उसने कहा था सब साफ रहेगा। अरविंद को पता भी नहीं चलेगा। बस… बस एक झटका होगा। उसके बाद हम बाहर चले जाएंगे।
कमरे में ऐसा सन्नाटा पड़ा कि घड़ी की टिक-टिक भी भारी लगने लगी।
डीसीपी ने ठंडी आवाज़ में कहा—
—आप एक आदमी की हत्या की बात कर रही हैं, मैडम। अपने पति की।
निशा ने होंठ भींच लिए। शायद उसी क्षण उसे समझ आया कि अभिनय अब काम नहीं करेगा।
जब अरविंद 1 घंटे बाद घर लौटा, तो बंगला किसी अदालत की फाइल बन चुका था। दराज खुले थे। अलमारियों से दस्तावेज़ निकाले जा रहे थे। लैपटॉप सील हो रहा था। पूजा-घर के पास रखी चांदी की थाली भी अब उस घर की पवित्रता साबित नहीं कर सकती थी।
रानी सर्वेंट कॉरिडोर में कबीर को सीने से लगाए खड़ी थी।
लड़का सफेद पड़ गया था, पर इस बार उसकी आंखें झुकी नहीं थीं।
अरविंद उसके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया।
—डर लग रहा है?
कबीर ने धीरे से पूछा—
—वो जान जाएंगी कि मैंने बताया?
—उन्हें पता चलेगा कि तुमने सच बोला।
—फिर वो मां को निकाल देंगी?
अरविंद की आंखें भर आईं।
—इस घर से अब कोई तुम्हारी मां को नहीं निकालेगा। यह घर ही बदल जाएगा।
तभी सीढ़ियों से निशा को नीचे लाया गया। उसके हाथों में हथकड़ी थी। बाल बिखर गए थे। माथे की बिंदी तिरछी हो गई थी। वह अब वह निर्दोष पत्नी नहीं लग रही थी जिसे शहर की औरतें “आदर्श” कहती थीं। वह पहली बार वैसी दिख रही थी जैसी भीतर से थी—डरी हुई, क्रोधित, खाली।
उसकी नजर कबीर पर पड़ी।
—तुम थे?
रानी तुरंत आगे आई।
—मेरे बेटे को मत देखिए ऐसे।
निशा चीखी—
—तुम लोग समझते क्या हो? इस घर में रहकर मेरे खिलाफ जासूसी करोगे? तुम्हारी औकात—
अरविंद ने पहली बार तेज आवाज़ में कहा—
—बस।
कमरा ठहर गया।
निशा ने उसकी ओर देखा।
—तुम्हें नहीं पता मैंने क्या झेला है। तुम हमेशा बिजनेस में रहे। मीटिंग, विदेश, बोर्ड, मंत्री, मीडिया। मैं इस घर में सजावट की चीज बनकर रह गई थी।
अरविंद बहुत देर तक उसे देखता रहा।
—तुम जा सकती थीं।
निशा हंसी। वह हंसी रोने से ज्यादा भयानक थी।
—जाकर बनती क्या? फिर से साधारण? फिर से किसी की बेटी? किसी की छोड़ी हुई पत्नी? यहां मैं निशा मल्होत्रा थी।
उस एक वाक्य ने सब साफ कर दिया।
उसे प्रेम नहीं चाहिए था।
उसे नाम चाहिए था।
और उस नाम को बचाने के लिए वह किसी की सांस बंद कर सकती थी।
अरविंद ने धीमे से कहा—
—तुम विधवा बनना चाहती थीं, पत्नी नहीं।
निशा ने जवाब नहीं दिया।
पुलिस उसे बाहर ले गई। गेट के पास वही लॉन था, वही गुलमोहर, वही रास्ता जहां कबीर ने पहली बार फुसफुसाकर मौत को रोक दिया था। पुलिस जीप का दरवाज़ा बंद हुआ, और बंगले की दीवारों से जैसे वर्षों का झूठ गिरने लगा।
अगले कई महीने अदालत, मीडिया और जांच में बीते। न्यूज चैनलों ने उसे “हाई सोसाइटी मर्डर प्लॉट” कहा। अखबारों ने लिखा—“नौकरानी के बेटे ने बचाई उद्योगपति की जान।” लोगों ने कबीर की तस्वीर ढूंढने की कोशिश की, पर अरविंद ने उसकी पहचान बचाई।
विक्रम साहनी की पुरानी फाइलें खुलीं। 2014 की पहाड़ी दुर्घटना, 2019 की फार्महाउस आग, 2 महिलाएं, 2 इंश्योरेंस क्लेम, 2 परिवार बर्बाद। पुलिस ने समझा कि वह अकेला ठग नहीं था, बल्कि ऐसे लोगों का शिकारी था जिन्हें लालच और अकेलापन दोनों खा रहे थे।
निशा ने अदालत में खुद को पीड़िता बताया। उसके वकील ने कहा कि विक्रम ने उसे बहकाया, उसका भावनात्मक शोषण किया। पर जब अभियोजक ने रिकॉर्डिंग चलाई—
—इंश्योरेंस में एक्सिडेंटल डेथ पर रकम 2 गुना है…
तो अदालत में बैठे लोग भी सिर झुका गए।
अरविंद पहली सुनवाई में गया। दूसरी में नहीं गया। वह अब यह नहीं सुनना चाहता था कि उसकी जान की कीमत कितने करोड़ थी।
6 महीने बाद उसने बंगला बेच दिया।
क्योंकि घर ईंट-पत्थर से नहीं, भरोसे से बनता है। और उस घर की हर दीवार पर धोखे की परछाई लग चुकी थी।
रानी ने नौकरी छोड़ने की बात कही।
—साहब, कबीर अब हर काली गाड़ी देखकर कांप जाता है। हम यहां नहीं रह सकते।
अरविंद ने उसे रोका नहीं। उसने रानी के लिए द्वारका में छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया, फिर उसके नाम जमा राशि कर दी। कबीर का स्कूल बदला। फीस, किताबें, ट्यूशन—सबकी जिम्मेदारी उसने ली।
रानी ने पहले मना किया।
—मेरे बेटे की हिम्मत का दाम मत लगाइए, साहब।
अरविंद ने शांत स्वर में कहा—
—दाम नहीं लगा रहा। उसका भविष्य सुरक्षित कर रहा हूं। क्योंकि उसने मेरा वर्तमान बचाया है।
रानी की आंखों से आंसू गिर गए। उसने बस इतना कहा—
—वो बच्चा है, साहब। उसने डरते-डरते सच बोला था।
—और कई बड़े लोग पूरी जिंदगी डर के कारण झूठ बोलते रहते हैं।
1 साल बाद अरविंद एक छोटे पार्क में कबीर से मिला। शाम का समय था। बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। कबीर बेंच पर बैठा ड्रॉइंग बना रहा था। कागज पर एक बड़ा बंगला था, गेट था, काली गाड़ी थी, और पेड़ के पीछे खड़ा एक छोटा लड़का।
अरविंद पास बैठ गया।
—फिर वही सुबह?
कबीर ने शर्माते हुए कंधे उचकाए।
—मैं हर बार अलग बनाता हूं।
—आज इसका अंत क्या है?
कबीर ने पेंसिल से गाड़ी और आदमी के बीच एक लंबी रेखा खींची।
—आज कोई उसे पहले ही रोक देता है।
अरविंद का गला भर आया।
—तुम्हें पता है, मैं पहले सोचता था ताकत उन लोगों के पास होती है जिनके पास कंपनी, गाड़ियां, सिक्योरिटी और पैसे होते हैं।
कबीर ने पूछा—
—अब क्या सोचते हैं?
अरविंद ने उस बच्चे को देखा, जिसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि दुनिया ने शायद उसे कभी सुना ही नहीं होता।
—अब समझ आया कि कभी-कभी सबसे बड़ी ताकत एक कांपती हुई फुसफुसाहट में होती है।
कबीर हल्का सा मुस्कुराया और फिर चित्र में रंग भरने लगा।
जिंदगी पहले जैसी कभी नहीं हुई। पर जिंदगी बच गई थी।
और कई बार, जब अरविंद किसी काली गाड़ी का खुला दरवाज़ा देखता, उसका दिल आज भी तेज धड़कने लगता। उसे खाली शीशा याद आता। निशा की मुस्कान याद आती। कॉफी का वह काला कप याद आता।
फिर उसे गुलमोहर के पीछे से आती वह आवाज़ सुनाई देती—
—सर, मत बैठिए।
उस दिन मौत किसी दुश्मन की तरह नहीं आई थी।
वह रोज़ की आदत बनकर आई थी।
और उसे पहचानने वाला कोई वकील, पुलिस, सुरक्षा गार्ड या करोड़पति नहीं था।
वह 10 साल का बच्चा था, जिसे उस घर में लोग नाम से भी मुश्किल से बुलाते थे।
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