भाग 1:
—अगर तूने ये लैपटॉप विवान को नहीं दिया, तो मुझे दादी कहने का कोई हक नहीं है तुझे।
शांति देवी ने यह बात ऐसे शांत चेहरे से कही थी जैसे वह कोई आशीर्वाद दे रही हों, सजा नहीं। 9 साल की काव्या ने अपनी छोटी-सी उंगलियां मैकबुक के चमकते ढक्कन पर कस दीं। वह समझ नहीं पाई कि गलती उसकी थी या उस चीज की, जिसे पाने के लिए उसके मम्मी-पापा ने 8 महीने तक छोटी-छोटी खुशियां रोक दी थीं।
रात के 12:17 बजे मीरा जब अपनी बेटी के कमरे में दाखिल हुई, तो उसे पहले रैपर पेपर की सरसराहट सुनाई दी। कमरे में नाइट लैंप जल रहा था। पीली नहीं, हल्की सफेद रोशनी, जिसमें काव्या का चेहरा और भी पीला लग रहा था। वह फर्श पर बैठी थी, आंखें सूजी हुई, नाक लाल, और सामने वही मैकबुक रखी थी जिसके लिए उसने अपने जन्मदिन पर केक काटते हुए कहा था—
—मम्मा, मैं इससे अपने कार्टून बनाऊंगी। मैं बड़े होकर फिल्म एडिटर बनूंगी।
मीरा के हाथ में पानी का गिलास था। वह वहीं जम गई।
—काव्या?
काव्या ने चौंककर सिर उठाया। उसके हाथ में सुनहरे रंग का गिफ्ट पेपर था। रिबन आधा बंध चुका था।
—मम्मा, आप जाग गईं?
—ये क्या कर रही हो तुम?
काव्या ने होंठ भींच लिए। फिर इतनी धीमी आवाज में बोली कि मीरा को लगा शायद उसने गलत सुना।
—दादी ने कहा है ये विवान भैया को देना पड़ेगा।
गिलास मीरा के हाथ से छूटते-छूटते बचा।
—क्या?
काव्या ने सिर झुका लिया।
—दादी बोलीं, विवान भैया को कोडिंग क्लास के लिए चाहिए। उनके पापा की नौकरी चली गई है। हमारे घर में तो पापा अच्छा कमाते हैं। अगर मैंने नहीं दिया तो मैं स्वार्थी हूं। उन्होंने कहा, अच्छी लड़कियां अपने भाइयों के लिए त्याग करती हैं।
मीरा का सीना जैसे भीतर से फट गया। उसे उसी दोपहर की बात याद आई, जब काव्या दादाजी-दादी के घर से लौटी थी। आमतौर पर वह दिल्ली के लक्ष्मी नगर वाले उनके फ्लैट में घुसते ही तूफान बन जाती थी। बैग सोफे पर, जूते एक तरफ, और मुंह बिना रुके बोलता रहता—स्कूल की दोस्त अन्वी ने क्या कहा, यूट्यूब पर कौन-सा एडिट देखा, कौन-सा डांस ट्रेंड सीखना है।
लेकिन उस रविवार वह चुप थी।
अर्जुन उसे लेकर अंदर आया था। काव्या ने हुडी सिर तक खींच रखी थी।
—हाय मम्मा।
बस इतना कहकर वह कमरे में चली गई थी।
मीरा ने अर्जुन की ओर देखा था।
—क्या हुआ इसे?
अर्जुन ने जूते उतारते हुए थकी आवाज में कहा था—
—मां-पापा के घर में बच्चे बहुत खेल रहे थे। थक गई होगी।
मीरा ने उस समय कुछ नहीं कहा। लेकिन मां को अपनी बच्ची की चुप्पी की आवाज सबसे तेज सुनाई देती है।
अब वही चुप्पी उसके सामने रिबन बांध रही थी।
मीरा धीरे से काव्या के पास बैठ गई।
—दादी ने तुम्हें अकेले में ये सब कहा?
काव्या ने सिर हिलाया।
—पापा बाहर थे। दादाजी मंदिर गए थे। चाची किचन में थीं। दादी ने मुझे कमरे में बुलाया। बोलीं, “तेरे पापा पर हमारा भी हक है। सारी कमाई तेरी मम्मी और तू खा जाओगी क्या?”
मीरा की उंगलियां ठंडी पड़ गईं।
—और?
काव्या की आंखों से आंसू फिर गिरने लगे।
—मैंने कहा ये पापा ने मेरे लिए खरीदा है। तो दादी बोलीं, “पापा को तो हमने पैदा किया है। वो जो कमाता है, पहले इस घर का है। तू अभी बच्ची है, तुझे क्या जरूरत इतने महंगे लैपटॉप की?” फिर उन्होंने कहा, अगर मैं अच्छी पोती हूं तो सोमवार को स्कूल से पहले इसे पैक करके विवान भैया को दे दूं।
मीरा ने काव्या को अपनी बांहों में खींच लिया। बच्ची फूट पड़ी।
—मम्मा, मैं बुरी हूं क्या? मुझे ये रखना है… लेकिन दादी नाराज हो जाएंगी। पापा भी दुखी होंगे क्या?
मीरा ने उसके बाल सहलाए।
—नहीं, मेरी जान। तुम बिल्कुल बुरी नहीं हो। किसी बच्चे से उसका सपना छीनना गलत है, त्याग नहीं।
दरवाजे पर हल्की आहट हुई। अर्जुन खड़ा था।
उसके चेहरे पर नींद नहीं थी, सिर्फ अपराधबोध था। शायद वह कुछ देर से सुन रहा था।
—काव्या…
काव्या ने तुरंत अपना चेहरा पोंछा। जैसे गलती पकड़ी गई हो।
—सॉरी पापा। मैं पैक कर रही थी। कल दे दूंगी।
अर्जुन के चेहरे पर कुछ टूट गया।
—किसने कहा तुम्हें कि तुम ये दोगी?
काव्या ने मीरा को देखा, फिर अर्जुन को।
—दादी ने।
कमरे में कुछ पल इतनी खामोशी रही कि बाहर सड़क से गुजरती ऑटो की आवाज भी भारी लगने लगी।
अर्जुन ने धीरे से मैकबुक उठाई, गिफ्ट पेपर हटाया और उसे वापस काव्या की स्टडी टेबल पर रख दिया।
—ये तुम्हारा है। और कोई इसे नहीं ले जाएगा।
काव्या ने डरते हुए पूछा—
—लेकिन दादी?
अर्जुन ने पहली बार अपनी बेटी की आंखों में देखकर वह बात कही, जिसे कहने में उसे 36 साल लग गए थे।
—गलत बात करने वाली दादी भी हो सकती हैं।
मीरा ने अर्जुन को देखा। उसके पति की आवाज शांत थी, लेकिन उसमें पुरानी राख के नीचे दबी आग जल उठी थी।
अर्जुन बाहर आया। उसने फोन उठाया। मीरा भी पीछे-पीछे आई।
—किसे फोन कर रहे हो?
—मां को।
—अभी? रात के 12 बजे?
—हां। क्योंकि उन्होंने मेरी बेटी को पूरी रात रोने पर मजबूर किया है।
फोन 4 बार बजा। फिर शांति देवी की उनींदी लेकिन चिढ़ी हुई आवाज आई।
—क्या हुआ अर्जुन? इस वक्त?
अर्जुन ने स्पीकर ऑन कर दिया।
—मां, आपने काव्या से उसका लैपटॉप विवान को देने को कहा?
उधर कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर आवाज बदल गई।
—अरे तो क्या गलत कहा? घर का बच्चा ही तो है विवान। वैसे भी लड़की को इतना महंगा सामान देकर बिगाड़ रहे हो तुम लोग।
मीरा के होंठ खुल गए, पर अर्जुन ने हाथ से उसे रोका।
—मां, ये लैपटॉप हमने अपनी बेटी के लिए खरीदा है। मेरी कमाई से। मेरी पत्नी ने अपनी ट्यूशन की कमाई जोड़ी। हमने 8 महीने बाहर खाना नहीं खाया। काव्या ने अपने जन्मदिन की पार्टी छोटी रखी। ये किसी को नहीं मिलेगा।
शांति देवी हंस पड़ीं।
—बहू ने कान भर दिए होंगे। शादी के बाद से तू बदल गया है। पहले घर के लिए जान देता था।
अर्जुन की आवाज और धीमी हो गई।
—घर? कौन-सा घर, मां? वो घर जहां मेरे नाम पर लिए गए पैसे मुझसे छुपाकर रमेश भैया के बिजनेस में लगाए गए? वो घर जहां पापा की पेंशन का आधा हिस्सा चाची के मायके भेजा गया? या वो घर जहां हर बार काव्या को इसलिए कमतर समझा गया क्योंकि वह लड़की है?
फोन पर अचानक दूसरी आवाज आई। अर्जुन के बड़े भाई रमेश की।
—अर्जुन, जुबान संभालकर बात कर। मां से ऐसे बात करता है?
अर्जुन ने आंखें बंद कीं।
—भैया, आप भी सुन रहे हैं तो अच्छा है। कल सुबह 10 बजे सब लोग पापा के पुराने बैंक लॉकर की चाबी लेकर मेरे ऑफिस आना।
रमेश हंसा।
—कौन-सा लॉकर?
अर्जुन ने धीरे से कहा—
—वही, जिसका किराया पिछले 11 साल से मेरे खाते से कट रहा है… और जिसके अंदर के कागजों की फोटो आज रात मेरे पास पहुंच चुकी है।
उधर सांस रुकने जैसी चुप्पी छा गई।
शांति देवी की आवाज कांपी।
—तुझे किसने भेजी फोटो?
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा। उसकी आंखें गुस्से से भरी थीं, पर उनमें डर नहीं था।
—जिसे आपने 11 साल तक चुप रहने के पैसे दिए थे, मां।
दरवाजे के पीछे काव्या खड़ी थी। उसकी छोटी उंगलियां मैकबुक के किनारे को पकड़े हुए थीं। उसे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन पहली बार उसे लगा कि शायद यह लड़ाई सिर्फ एक लैपटॉप की नहीं थी।
अर्जुन ने फोन काटने से पहले कहा—
—कल सच सामने आएगा। और इस बार मेरी बेटी किसी के पाप की कीमत नहीं चुकाएगी।
कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇
भाग 2:
सुबह 8 बजे तक शांति देवी के घर में तूफान आ चुका था। रमेश बार-बार अलमारी खोल रहा था, उसकी पत्नी पायल रोते हुए कह रही थी कि सब अर्जुन की बीवी की चाल है, और शांति देवी पूजा के कमरे में बैठकर माला फेरने का नाटक कर रही थीं, लेकिन उनके हाथ कांप रहे थे। उधर मीरा ने काव्या को स्कूल नहीं भेजा। बच्ची डाइनिंग टेबल पर बैठी थी, सामने मैकबुक खुली थी, मगर स्क्रीन पर कार्टून एडिट नहीं, एक खाली डॉक्यूमेंट था। अर्जुन ने उसे पास बैठाकर कहा कि आज उसे डरने की जरूरत नहीं, क्योंकि सच कभी बच्चों से नहीं छिपाना चाहिए, बस उम्र के हिसाब से समझाना चाहिए। 10 बजे अर्जुन के छोटे-से फाइनेंस ऑफिस में पूरा परिवार जमा हुआ। शांति देवी ने आते ही मीरा को घूरा, पायल ने विवान को आगे कर दिया ताकि सबको लगे कि बेचारा बच्चा ही असली जरूरतमंद है। विवान 12 साल का था, चुप और शर्मिंदा, जैसे उसे भी पता था कि उसके नाम पर कुछ गलत हो रहा है। अर्जुन ने बिना चिल्लाए टेबल पर 3 चीजें रखीं: लॉकर की फोटो, बैंक स्टेटमेंट और एक पुरानी वसीयत की कॉपी। सबके चेहरे बदल गए। कागजों में लिखा था कि अर्जुन के दिवंगत दादाजी ने अपनी पुरानी करोल बाग वाली दुकान और 1 छोटा फ्लैट सिर्फ अर्जुन और उसकी भविष्य की संतान के नाम किया था, क्योंकि अर्जुन ने बचपन से दुकान संभाली थी। लेकिन 11 साल पहले शांति देवी और रमेश ने नकली हस्ताक्षर से वह संपत्ति गिरवी रख दी थी। उस पैसे से रमेश का असफल इवेंट बिजनेस चला, पायल के गहने खरीदे गए और अब कर्ज चुकाने के लिए वे काव्या का लैपटॉप, मीरा के गहने और अर्जुन की नई सेविंग्स हड़पने की तैयारी कर रहे थे। तभी ऑफिस का दरवाजा खुला और अंदर सफेद कुर्ते में बूढ़े वर्मा जी आए, जो दादाजी के पुराने मुनीम थे। उन्होंने कांपती आवाज में बताया कि उन्होंने ही अर्जुन को फोटो भेजी थी, क्योंकि पिछली रात शांति देवी ने उन्हें धमकी दी थी कि अगर उन्होंने मुंह खोला तो उनका बेटा नौकरी से निकलवा दिया जाएगा। उसी पल रमेश ने गुस्से में टेबल पलट दी, कागज उड़ गए, और पायल चीखी कि अगर अर्जुन ने पुलिस बुलाई तो वे काव्या पर चोरी का झूठा आरोप लगा देंगे। लेकिन असली झटका तब लगा जब दरवाजे पर 2 पुलिसकर्मी और एक महिला वकील खड़ी दिखीं। मीरा ने शांत आवाज में कहा कि शिकायत रात को ही दर्ज हो चुकी है।
भाग 3:
महिला वकील का नाम निधि मल्होत्रा था। वह मीरा की कॉलेज की सहेली थी, और पिछले 2 महीने से चुपचाप अर्जुन के दस्तावेज देख रही थी। अर्जुन ने पहले मीरा को भी पूरी बात नहीं बताई थी। वह डरता था कि कहीं सच खुलते ही उसका अपना घर बिखर न जाए। लेकिन काव्या के आंसुओं ने वह डर जला दिया था।
—मिस्टर रमेश मल्होत्रा, ये कागज सिर्फ पारिवारिक झगड़ा नहीं हैं।
निधि ने फाइल खोलते हुए कहा।
—यह जालसाजी, आर्थिक धोखाधड़ी और नाबालिग बच्ची पर मानसिक दबाव का मामला है।
रमेश गरजा।
—तुम लोग भूल रहे हो कि हम एक ही खून के हैं।
अर्जुन पहली बार हंसा, मगर वह हंसी दर्द से भरी थी।
—खून का मतलब यह नहीं कि कोई मेरी बेटी की आंखों का सपना चुरा ले।
शांति देवी अचानक कुर्सी पर बैठ गईं। उनकी आवाज भर्रा गई।
—मैंने सब घर के लिए किया। रमेश कमजोर था। उसका बिजनेस डूब रहा था। उसकी बीवी रोज रोती थी। तू तो हमेशा समझदार था, अर्जुन। तू संभाल लेता।
मीरा के भीतर जमा हुआ गुस्सा बाहर आ गया।
—समझदार बेटा मतलब एटीएम? और मेरी बेटी? वह सिर्फ इसलिए त्याग करे क्योंकि वह लड़की है?
पायल ने तुरंत जवाब दिया।
—अरे लड़की ही तो है। कल शादी करके चली जाएगी। विवान इस खानदान का नाम आगे बढ़ाएगा।
काव्या, जो अब तक मीरा के पीछे खड़ी थी, सहम गई। उसका चेहरा उतर गया। अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—यही सोच इस घर को खा गई, भाभी। खानदान नाम से नहीं, इंसानियत से चलता है।
पुलिसकर्मी आगे बढ़े। रमेश ने पीछे हटते हुए फोन निकाला।
—मैं विधायक गुप्ता को फोन करता हूं। तुम लोगों की औकात दिखा दूंगा।
निधि ने बिना घबराए कहा—
—कर लीजिए। लेकिन पहले ये भी सुन लीजिए कि लॉकर से निकले दस्तावेजों की डिजिटल कॉपी, बैंक ट्रेल और वर्मा जी का बयान पहले ही साइबर सेल और आर्थिक अपराध शाखा को भेजा जा चुका है।
रमेश का चेहरा सफेद पड़ गया।
विवान अचानक फूट पड़ा।
—पापा, बस करो!
सबकी नजरें उसकी ओर घूम गईं। वह 12 साल का बच्चा, जिसे अब तक लालच का कारण बनाकर आगे किया जा रहा था, रोते हुए पायल से दूर हट गया।
—मुझे काव्या का लैपटॉप नहीं चाहिए। मुझे कभी नहीं चाहिए था। मम्मी ने कहा था अगर मैं चुप रहा तो मुझे नया गेमिंग फोन मिलेगा। दादी ने कहा था काव्या को समझाना आसान है क्योंकि वह डरती है।
शांति देवी ने चीखकर कहा—
—चुप!
लेकिन देर हो चुकी थी।
काव्या ने पहली बार विवान को देखा। उसमें दुश्मन नहीं, एक और फंसा हुआ बच्चा दिखा। वह धीरे से आगे आई।
—तुम्हें सच में नहीं चाहिए था?
विवान ने सिर हिलाया।
—नहीं। मुझे लगा था तुम मुझसे नफरत करोगी।
काव्या की आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज साफ थी।
—मैं तुमसे नफरत नहीं करती। पर दादी से डर लगता है।
यह सुनते ही कमरे में ऐसा सन्नाटा फैल गया, जिसमें सबसे भारी आवाज शांति देवी की टूटती सांसों की थी। एक 9 साल की बच्ची ने वह सच कह दिया था, जिसे बड़े लोग वर्षों से धर्म, संस्कार और परिवार की इज्जत के पीछे छिपाते आए थे।
पुलिस ने रमेश से कुछ सवाल पूछे। वह पहले चिल्लाया, फिर धमकाया, फिर चुप हो गया। पायल रोने लगी कि उसे कुछ नहीं पता था, मगर बैंक स्टेटमेंट में उसके खाते में गए 14 लाख रुपये साफ दिख रहे थे। शांति देवी बार-बार कहती रहीं कि उन्होंने सिर्फ बड़े बेटे को बचाने की कोशिश की, पर हर जवाब में एक ही बात लौट आती—बचाने के नाम पर उन्होंने छोटे बेटे को लूटा, बहू को अपमानित किया, और पोती को अपराधबोध में धकेला।
वर्मा जी ने कांपते हाथों से एक और लिफाफा निकाला।
—बिटवा, ये तुम्हारे दादाजी ने मुझे दिया था। बोले थे, जब अर्जुन अपने बच्चे के लिए खड़ा होना सीख जाए, तभी देना।
अर्जुन ने लिफाफा खोला। अंदर पुराने कागज के साथ दादाजी की लिखावट थी।
“अर्जुन सीधा है, मगर कमजोर नहीं। इसे परिवार की सेवा करना सिखाया है, गुलामी नहीं। अगर कभी मेरे बाद इस घर में किसी बेटी को कम समझा जाए, तो मेरी संपत्ति उस बेटी के नाम मानना।”
अर्जुन पढ़ते-पढ़ते रुक गया। उसकी आंखें भर आईं।
मीरा ने कागज लिया, फिर काव्या की ओर देखा। काव्या कुछ समझ नहीं पा रही थी, पर उसे महसूस हो रहा था कि दादाजी, जिन्हें उसने कभी नहीं देखा, जैसे आज उसके साथ खड़े थे।
निधि ने कागज ध्यान से देखा।
—यह भावनात्मक पत्र है, कानूनी वसीयत नहीं। लेकिन मूल वसीयत और जालसाजी का मामला बहुत मजबूत है। हम संपत्ति वापस लेने और नुकसान की वसूली की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
शांति देवी ने अर्जुन के पैरों की ओर झुकने की कोशिश की।
—बेटा, पुलिस में मत दे। समाज में हमारी नाक कट जाएगी।
अर्जुन पीछे हट गया।
—मां, नाक तब नहीं कटी जब आपने मेरी बेटी को रात में रोने पर मजबूर किया? तब इज्जत बची रही जब आपने दादाजी के दस्तखत नकली किए? अब कानून अपना काम करेगा।
शांति देवी ने आखिरी दांव खेला।
—तो आज से मेरा कोई बेटा नहीं।
अर्जुन ने आंखें बंद कीं। यह वही वाक्य था जिससे वह बचपन से डरता आया था। जब भी वह अपने लिए कुछ चाहता, मां यही कहतीं—“फिर मुझे मां मत कहना।” वह डर कर चुप हो जाता। अपनी पहली तनख्वाह, अपनी शादी की बचत, मीरा के गहनों का पैसा, सब “घर” के नाम पर देता रहा।
लेकिन आज उसके पीछे मीरा थी। उसके हाथ में काव्या का हाथ था।
—ठीक है मां।
शांति देवी जैसे पत्थर हो गईं।
अर्जुन ने शांत आवाज में कहा—
—अगर बेटा होने का मतलब अपनी बच्ची को रुलाना है, तो मैं पहले पिता रहूंगा।
यह सुनकर मीरा की आंखों से आंसू बह निकले। काव्या ने अर्जुन की कमर पकड़ ली।
रमेश को उसी दिन पूछताछ के लिए थाने ले जाया गया। पायल को नोटिस मिला। शांति देवी को उम्र और स्वास्थ्य के कारण तुरंत नहीं ले जाया गया, लेकिन उनका बयान दर्ज हुआ। वह घर, जो सालों से “संस्कार” की दीवारों पर खड़ा दिखता था, पहली बार सच की धूप में नंगा दिखाई दिया।
अगले कुछ हफ्ते आसान नहीं थे। रिश्तेदारों के फोन आए।
—बड़ों को माफ कर देना चाहिए।
—लड़की के चक्कर में मां-बाप से रिश्ता तोड़ लिया?
—इतनी सी चीज थी, लैपटॉप ही तो था।
मीरा हर बार फोन काट देती। अर्जुन कुछ दिनों तक चुप रहा। रातों को उठकर काव्या के कमरे तक जाता, देखता कि वह सो रही है या नहीं। काव्या भी पहले जैसी नहीं रही थी। वह मैकबुक खोलती, पर लंबे समय तक स्क्रीन देखती रहती। जैसे उसे डर हो कि कोई फिर आकर कहेगा—“यह तुम्हारा नहीं है।”
एक शाम अर्जुन उसके पास बैठा।
—एक नया प्रोजेक्ट बनाएं?
काव्या ने पूछा—
—किस पर?
—एक लड़की पर, जो अपना सपना वापस लेती है।
काव्या ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
—उसमें दादी विलेन होंगी?
अर्जुन ने कुछ पल सोचा।
—विलेन नहीं। एक ऐसी इंसान जो गलत सोच में इतनी फंस गई कि उसे बच्चों के आंसू भी नहीं दिखे।
काव्या ने सिर हिलाया।
—और लड़की रोएगी नहीं?
मीरा कमरे के दरवाजे पर खड़ी थी। उसने कहा—
—रोएगी भी। लेकिन रुकेगी नहीं।
उस रात काव्या ने अपना पहला छोटा वीडियो बनाया। उसमें एक छोटी लड़की थी, जिसके हाथ से एक चमकता डिब्बा छीनने की कोशिश होती है। लड़की पहले डरती है, फिर डिब्बा खोलती है। डिब्बे से लैपटॉप नहीं, रोशनी निकलती है। नीचे उसने हिंदी में लिखा—“सपने दान नहीं किए जाते।”
वीडियो स्कूल के प्रोजेक्ट में दिखाया गया। टीचर ने काव्या को गले लगा लिया। कुछ ही दिनों में स्कूल के पैरेंट्स ग्रुप में वह वीडियो फैल गया। लोगों ने लिखा कि यह सिर्फ एक बच्ची की कहानी नहीं, हर उस बेटी की कहानी है जिसे बचपन से सिखाया जाता है कि भाई पहले, परिवार पहले, खुद बाद में।
6 महीने बाद अदालत ने प्रारंभिक आदेश में करोल बाग की संपत्ति पर रोक लगा दी। रमेश का झूठा बिजनेस खाता खुला। पायल के मायके में छिपाए गहने सामने आए। वर्मा जी के बेटे की नौकरी सुरक्षित रही क्योंकि अर्जुन ने उसे अपनी कंपनी में काम दिला दिया। विवान कुछ समय तक अपनी नानी के घर रहा। वह काव्या से बात करना चाहता था, पर शर्माता था।
एक दिन स्कूल के बाहर वह खड़ा मिला। हाथ में छोटी-सी ड्राइंग कॉपी थी।
—काव्या, ये तुम्हारे लिए है।
काव्या ने कॉपी खोली। उसमें उसने 2 बच्चों की ड्राइंग बनाई थी—एक लड़की लैपटॉप पर काम कर रही थी और एक लड़का उसके पास बैठकर पेंसिल से स्केच बना रहा था। ऊपर लिखा था, “सॉरी।”
काव्या ने उसे देखा।
—तुम मेरे अगले वीडियो के लिए ड्रॉ करोगे?
विवान की आंखें चमक उठीं।
—सच?
—हां। लेकिन मेरी चीज बिना पूछे कोई नहीं लेगा।
—कभी नहीं।
उन दोनों को साथ देखकर मीरा के मन में हल्की राहत आई। उसे समझ आया कि बड़े लोग रिश्ते तोड़ते हैं, बच्चे कभी-कभी उन्हें नए सच पर फिर से बना सकते हैं।
शांति देवी ने कई बार अर्जुन को फोन किया। पहले रोकर, फिर बीमार होने का बहाना बनाकर, फिर रिश्तेदारों से कहलवाकर। अर्जुन ने इलाज का खर्च भेजा, दवाई की व्यवस्था की, लेकिन काव्या को उनके पास अकेले कभी नहीं भेजा। उसने मां होना और सीमा होना, दोनों सीख लिया था।
दीवाली आई। इस बार घर छोटा था, पर रोशनी ज्यादा थी। मीरा ने बेसन के लड्डू बनाए। अर्जुन ने बालकनी में दीये लगाए। काव्या और विवान ने साथ मिलकर नया वीडियो एडिट किया—एक कहानी 2 बच्चों की, जो तय करते हैं कि विरासत जमीन की नहीं, न्याय की होनी चाहिए।
रात को जब पटाखों की आवाज दूर से आ रही थी, काव्या अपनी मैकबुक लेकर अर्जुन के पास आई।
—पापा, ये सच में मेरा है ना?
अर्जुन ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया।
—ये सिर्फ तुम्हारा नहीं, तुम्हारी मेहनत का है। और तुम्हारे सपनों पर कोई रिश्तेदारी टैक्स नहीं लग सकता।
काव्या हंस पड़ी। मीरा ने उसे सीने से लगा लिया।
दरवाजे के पास वही सुनहरा गिफ्ट पेपर रखा था, जिससे उस रात काव्या अपना सपना पैक कर रही थी। मीरा ने उसे फेंका नहीं। उसने उसे काटकर काव्या की स्टडी टेबल के ऊपर चिपका दिया। उस पर काव्या ने अपने हाथ से लिखा—
“जिस रात मुझे लगा था कि मैं बुरी पोती हूं, उसी रात पापा ने मुझे सिखाया कि अच्छी बेटी होने से पहले अच्छा इंसान होना जरूरी है।”
और उस घर में फिर कभी किसी बच्चे से यह नहीं कहा गया कि प्यार साबित करने के लिए अपना सपना दे दो।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.