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मौत का आदेश पा चुके सैन्य कुत्ते ने 20 परिवारों को ठुकराया, लेकिन शहीद की 5 साल की बेटी की नारंगी गेंद देखते ही वह कांप उठा—फिर डायरी में छिपा 1 संकेत सबको रुला गया

भाग 1

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मौत का आदेश लिख दिया गया था, और रुद्र को बचाने के लिए अब सिर्फ 2 दिन बचे थे। जयपुर के बाहर बने शौर्य सैन्य श्वान पुनर्वास केंद्र के ठंडे आकलन कक्ष में एक जर्मन शेफर्ड दीवार की तरफ मुंह किए खड़ा था, जैसे इस दुनिया से उसका रिश्ता बहुत पहले टूट चुका हो। शीशे के पीछे 3 सदस्यीय समिति बैठी थी। एक कोने में मीरा अपनी फाइल सीने से लगाकर खड़ी थी, आंखों में डर और उम्मीद दोनों थे। सामने अर्जुन राठौर खड़ा था, भारतीय सेना की विशेष टुकड़ी का पूर्व कमांडो, जिसने अपने जीवन में गोलियों, बारूदी सुरंगों और रात के अंधेरे में लिए गए फैसलों को देखा था, पर उस दिन उसे एक चुप कुत्ते की खामोशी सबसे भारी लग रही थी।

अर्जुन ने धीरे से हाथ उठाया। पहला संकेत। फिर दूसरा। रुद्र ने सिर तक नहीं घुमाया। कमरे में पंखे की हल्की आवाज भी चुभने लगी। समिति के सबसे बुजुर्ग सदस्य ने फाइल बंद करते हुए कहा — अगर यही आखिरी मौका था, तो फैसला बदलना मुश्किल है।

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मीरा का चेहरा उतर गया। अर्जुन ने गहरी सांस ली और एक कदम आगे बढ़ा। तभी रुद्र अचानक पीछे हटकर कोने में सिमट गया। उसकी पीठ के बाल खड़े हो गए, आंखों में ऐसा डर उतर आया जैसे उसने किसी अदृश्य खतरे को देख लिया हो। अर्जुन ने हाथ नीचे कर लिया, पर जब उसने धीरे से फिर कदम बढ़ाया, रुद्र इतनी तेजी से गरजा कि समिति का एक सदस्य कुर्सी से उठकर पीछे हट गया। वह हमला नहीं था, पर इतना काफी था कि कमरे में मौजूद हर आदमी समझ जाए कि दया मृत्यु का आदेश अब लगभग पक्का हो चुका है।

अर्जुन वहीं रुक गया। उसे गुस्सा नहीं आया। उसे बस यह महसूस हुआ कि सब लोग रुद्र को खतरनाक समझ रहे थे, जबकि असल में वह कुछ कहने की कोशिश कर रहा था।

7 दिन पहले मीरा ने अर्जुन को फोन किया था। वह उसी केंद्र में स्वयंसेविका थी। उसने बताया था कि रुद्र कोई साधारण कुत्ता नहीं, सेना का प्रशिक्षित खोजी श्वान था, जिसने सीमा पार अभियानों में 11 साल अपने संचालक के साथ बिताए थे। फिर एक अभियान में उसका संचालक वापस नहीं आया। रुद्र लौटा, घायल, थका हुआ, और भीतर से बुझा हुआ।

3 महीने में 20 परिवारों ने उसे अपनाने की कोशिश की थी। हर बार वही हुआ। वह न खेलता, न दुलार स्वीकार करता, न किसी से जुड़ता। वह बस दीवारों, दरवाजों और खाली रास्तों को देखता रहता, जैसे किसी के लौटने का इंतजार कर रहा हो।

फिर एक युवा स्वयंसेवक ने उसके गले में पीछे से पट्टा डालने की कोशिश की। रुद्र चौंका, स्वयंसेवक गिरा, सिर फटा, 6 टांके लगे। रुद्र ने काटा नहीं था, पर डर काफी था। समिति ने लिखा — जोखिम अस्वीकार्य।

अर्जुन पहले नहीं आना चाहता था। उसने मीरा से कहा था — हर टूटे हुए सैनिक को मैं ठीक नहीं कर सकता।

मीरा ने बस इतना कहा था — वह सैनिक नहीं, किसी का परिवार है।

अब वही अर्जुन आकलन कक्ष में खड़ा था, और रुद्र फिर कोने में कांप रहा था। बाहर शाम उतर रही थी। मीरा की आंखों में आंसू थे। समिति उठने लगी। तभी अर्जुन की नजर रुद्र की फाइल के आखिरी पन्ने पर पड़ी, जहां एक नाम धुंधली स्याही में लिखा था — हवलदार वीर प्रताप सिंह।

और उसके नीचे सिर्फ 1 पंक्ति थी — अभियान से रुद्र लौट आया, वीर नहीं।

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भाग 2

उस रात अर्जुन ने फाइल घर नहीं ले गया, फाइल उसे घर ले गई। हर पन्ना किसी अधूरे रिश्ते की तरह उसके दिमाग में अटका रहा। सुबह वह मीरा के साथ वीर प्रताप सिंह के घर पहुंचा। शहर से दूर एक शांत गली में छोटा-सा मकान था। दरवाजा वीर की पत्नी काव्या ने खोला। चेहरा थका हुआ, आवाज सधी हुई, जैसे रोना वह बहुत पहले बंद कर चुकी हो।

अर्जुन ने रुद्र का नाम लिया तो भीतर से 5 साल की तारा दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में पुरानी नारंगी गेंद थी। उसने पूछा — रुद्र अंकल आए हैं?

काव्या ने तुरंत बेटी को पीछे किया। उसकी आंखों में डर था। — वह कुत्ता अब वही नहीं रहा। वीर नहीं है। कोई उसे संभाल नहीं सकता।

तभी भीतर से वीर की मां सावित्री देवी की कड़क आवाज आई — उस जानवर को इस घर से दूर रखना। बेटे को तो सीमा ने खा लिया, अब उसकी यादों में यह बच्ची भी डूबेगी क्या?

अर्जुन चुप रहा। वह समझ गया कि रुद्र की लड़ाई सिर्फ समिति से नहीं, इस घर के डर से भी है।

काव्या ने आखिरकार एक लकड़ी का डिब्बा खोला। उसमें वीर के पदक, पुरानी तस्वीरें, तारा की बचपन की चिट्ठियां और एक डायरी थी। अर्जुन ने पन्ने पलटे। उसमें युद्ध से ज्यादा घर था — काव्या की चाय, तारा की हंसी, और रुद्र की शरारतें। एक जगह वीर ने लिखा था — जब भी मैं लौटता हूं, 2 उंगलियां सीने पर रखकर हाथ नीचे करता हूं। रुद्र समझ जाता है, घर आ गए, सब सुरक्षित है।

अर्जुन के हाथ ठिठक गए।

यह वही संकेत था जो उसने आकलन कक्ष में अधूरा किया था। रुद्र ने आदेश नहीं ठुकराया था। वह गलत जगह, गलत लोगों के बीच उस आदमी को खोज रहा था, जिसने यह संकेत देकर कभी कहा था — सब ठीक है।

उसी क्षण तारा ने धीरे से कहा — अगर रुद्र पापा का इंतजार कर रहा है, तो उसे हमारे घर आना चाहिए।

और काव्या की आंखों से पहली बार आवाज के बिना आंसू गिर पड़े।

भाग 3

समिति ने पहले साफ मना कर दिया। उनका तर्क सीधा था — एक बच्ची वाले घर में ऐसे श्वान को भेजना गैरजिम्मेदारी होगी। मीरा ने रिपोर्ट दिखाई, अर्जुन ने अपनी जिम्मेदारी लिखित में दी, काव्या ने अस्थायी निगरानी की शर्तें मान लीं, फिर भी कमरे में बैठे लोग सिर्फ घटना याद कर रहे थे — गिरा हुआ स्वयंसेवक, चोट, दहशत, और रुद्र का गरजना।

तभी काव्या ने पहली बार आवाज उठाई। वह अब डरी हुई विधवा की तरह नहीं, एक मां और सैनिक की पत्नी की तरह बोली — आप लोग उसे फाइल में देख रहे हैं। हमने उसे घर में देखा है। उसने मेरी बेटी के कमरे के बाहर रातें काटी हैं। वह वीर के जूतों के पास सोया है। अगर वह टूटा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह खराब है।

समिति ने 6 सप्ताह की अस्थायी अनुमति दी। शर्तें कठोर थीं। हर सप्ताह निरीक्षण, हर व्यवहार की रिपोर्ट, बच्ची के साथ अकेला समय नहीं, किसी भी आक्रामक प्रतिक्रिया पर तुरंत वापसी। काव्या ने बिना बहस हस्ताक्षर कर दिए। अर्जुन ने भी।

पर घर लौटने से पहले सबसे मुश्किल लड़ाई घर के भीतर ही थी।

सावित्री देवी ने काव्या को दरवाजे पर ही रोक दिया। उनके साथ वीर का छोटा भाई नीरज भी था, जो महीनों से काव्या पर घर बेचकर अपने मायके जाने का दबाव बना रहा था। नीरज ने ताना मारा — अब एक पागल सैन्य कुत्ते को भी पालोगी? लोग पहले ही कहते हैं कि तुम वीर की मौत से बाहर नहीं आना चाहती।

काव्या ने पहली बार उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा — लोग क्या कहते हैं, उससे मेरा घर नहीं चलता।

नीरज हंसा — घर? यह घर वीर का था। अब मां का है। तुम तो बस पेंशन लेकर बैठी हो।

यह वाक्य हवा में पत्थर की तरह गिरा। तारा अपनी नारंगी गेंद पकड़े चुप खड़ी थी। मीरा ने गुस्से से नीरज को देखा, पर अर्जुन ने हाथ से उसे रोका। यह लड़ाई काव्या की थी।

काव्या ने शांत आवाज में कहा — वीर ने यह घर मेरे और तारा के नाम किया था। कागज अलमारी में नहीं, मेरे वकील के पास हैं। और जहां तक रुद्र की बात है, वह इस घर में किसी की दया से नहीं आएगा। वह वीर का साथी था। इस घर में उसकी जगह है।

उसी शाम रुद्र आया।

केंद्र की गाड़ी जब दरवाजे पर रुकी, पूरा मोहल्ला बाहर निकल आया। किसी ने कहा — यही है वह खतरनाक कुत्ता? किसी ने मोबाइल उठा लिया। किसी औरत ने तारा को पीछे खींचने की सलाह दी। सावित्री देवी ने बरामदे से मुंह फेर लिया।

रुद्र गाड़ी से धीरे उतरा। उसने पहले हवा सूंघी। फिर बरामदा, नीम का पेड़, दरवाजे की चौखट, और उस खिड़की को देखा जहां शायद कभी वीर खड़ा होकर उसे आवाज देता था। उसका शरीर तन गया, पर वह गरजा नहीं। उसने काव्या को देखा, फिर तारा को। तारा भागना चाहती थी, पर अर्जुन ने पहले ही समझाया था — उसे चुनने दो।

तारा ने बस गेंद जमीन पर रख दी।

रुद्र ने गेंद नहीं उठाई। उसने उसे सूंघा भी नहीं। वह सीधे दरवाजे के पास जाकर बैठ गया। सारी रात वह वहीं रहा। खाना आधा छुआ, पानी थोड़ा पिया, और हर हल्की आहट पर सिर उठाता रहा।

पहली रात काव्या सोई नहीं। वह रसोई की बत्ती बुझाकर दूर से उसे देखती रही। उसे डर था कि कहीं समिति सही न निकले। पर उससे बड़ा डर यह था कि कहीं रुद्र सच में वीर के बिना जीना न भूल चुका हो।

दूसरी सुबह कटोरा खाली था।

काव्या ने कुछ नहीं कहा, पर तारा ने देख लिया। उसने धीरे से मुस्कुराकर मां की साड़ी खींची। — मम्मा, उसने खा लिया।

काव्या ने बस सिर हिला दिया। छोटी जीतों को जोर से बोलना कभी-कभी उन्हें डरा देता है।

अगले 4 दिन धीमे थे। रुद्र घर में घूमता नहीं था। वह ज्यादा समय पिछवाड़े के दरवाजे के पास लेटा रहता। तारा उसे कहानियां सुनाती, कभी स्कूल की, कभी अपनी गुड़िया की, कभी पापा की। रुद्र उसकी तरफ नहीं देखता, पर जब तारा कमरे से निकलती, उसकी आंखें उसके पीछे जातीं।

5वें दिन तारा ने गेंद फेंकी। नारंगी गेंद आंगन की धूल में लुढ़कती हुई रुकी। रुद्र ने उसे देखा। कुछ नहीं हुआ। तारा ने कंधे उचकाए, खुद उठाकर लाई, फिर फेंकी। तीसरी बार गेंद रुद्र के पंजे से छूकर रुकी। उसने धीरे से पंजा पीछे किया, जैसे उस चीज से दर्द जुड़ा हो। तारा उसके पास बैठ गई। उसने गेंद उठाई नहीं। बस बोली — यह तुम्हारी नहीं है, मेरी भी नहीं। यह पापा की है। हम दोनों रख सकते हैं।

उस शाम रुद्र पहली बार उसके पीछे बरामदे तक आया।

सावित्री देवी ने देखा, पर कुछ नहीं बोलीं। नीरज अगले दिन फिर आया। इस बार वह एक आदमी को साथ लाया, जो खुद को संपत्ति सलाहकार बता रहा था। काव्या ने दरवाजे पर ही रोक दिया। नीरज ने ऊंची आवाज में कहा — तुम इस घर को शोकालय बना रही हो। बच्ची को आगे बढ़ने दो।

तभी तारा पीछे से बोली — चाचा, आगे बढ़ना पापा को भूलना नहीं होता।

नीरज चुप हो गया, पर उसकी शर्म गुस्से में बदल गई। उसने रुद्र की तरफ इशारा कर कहा — और यह? यह किसी दिन काटेगा, तब समझोगी।

रुद्र बरामदे के कोने में शांत बैठा था। उसने सिर्फ नीरज को देखा। वह नजर इतनी स्थिर थी कि नीरज खुद एक कदम पीछे हट गया। काव्या ने दरवाजा बंद कर दिया।

उस रात एक अजीब घटना हुई। आधी रात के बाद तेज आंधी आई। खिड़कियां हिलने लगीं, बादलों की गड़गड़ाहट घर में भर गई। तारा नींद में डरकर रोने लगी। काव्या उठी, पर दरवाजे तक पहुंचने से पहले उसने देखा — रुद्र तारा के कमरे के बाहर लेटा था। अंदर नहीं गया था। दरवाजा नहीं धकेला था। बस चौखट के पास शरीर सटाकर बैठा था, जैसे पहरा दे रहा हो।

तारा ने भीतर से नींद में कहा — पापा?

काव्या की सांस अटक गई।

रुद्र ने हल्की कराह भरी। वह जवाब नहीं था, पर उस घर में पहली बार किसी ने खालीपन को थोड़ा नरम होते महसूस किया।

धीरे-धीरे दिन बदलने लगे। रुद्र ने तारा के स्कूल बैग के पास बैठना शुरू किया। काव्या जब शाम को बाजार जाती, वह दरवाजे तक चलता। कभी-कभी वह वीर की पुरानी कुर्सी को सूंघकर वापस आ जाता। अर्जुन रोज नहीं आता था, पर हर दूसरे दिन आता। वह रुद्र को आदेश नहीं देता था। वह बस घर के माहौल को देखता, नोट बनाता, काव्या से बात करता।

एक दिन काव्या ने उसे वीर की अधूरी लकड़ी की नाव दिखाई। वीर ने तारा के साथ उसे बनाना शुरू किया था, पर अभियान पर जाने से पहले काम अधूरा रह गया। छोटे-छोटे टुकड़े, गोंद, पुराना नक्शा, और वीर की लिखावट में कुछ निर्देश। काव्या ने इतने महीनों तक उस डिब्बे को छुआ नहीं था।

अर्जुन ने पूछा — पूरा करें?

काव्या ने बहुत देर बाद कहा — शायद अब समय है।

उस शाम मेज पर काव्या, तारा, अर्जुन और नीचे पास लेटा रुद्र थे। तारा बार-बार गलत टुकड़ा उठाती, काव्या मुस्कुराती, अर्जुन चुपचाप ठीक करता। जब नाव का ढांचा बन गया, तारा ने नारंगी गेंद उसके पास रख दी। — पापा देख रहे होंगे न?

काव्या ने कोई धार्मिक जवाब नहीं दिया, कोई बड़ी बात नहीं कही। उसने सिर्फ बेटी के बाल सहलाए। — अगर याद सच्ची हो, तो लोग पूरी तरह जाते नहीं।

6 सप्ताह ऐसे ही बीते। निरीक्षण करने वाले लोग आए। उन्होंने देखा कि रुद्र अभी भी अचानक आवाजों से चौंकता है, अनजान पुरुषों से दूरी रखता है, और पीछे से छूने पर सख्त हो जाता है। पर उन्होंने यह भी देखा कि उसने किसी पर हमला नहीं किया, तारा के आसपास संयम रखा, काव्या की आवाज पर शांत हुआ, और घर की दिनचर्या को स्वीकार किया।

फिर अंतिम आकलन का दिन आया।

सुबह काव्या ने सफेद सूती साड़ी पहनी। तारा ने अपनी नारंगी गेंद बैग में रखी। रुद्र गाड़ी में चढ़ते समय रुका, जैसे जानता हो कि यह रास्ता फिर उसी जगह जा रहा है जहां उसका फैसला होगा। अर्जुन अपनी जीप में पीछे-पीछे चला।

केंद्र में माहौल भारी था। मीरा की आंखें उम्मीद से चमक रही थीं, पर वह भी जानती थी कि एक गलती सब खत्म कर सकती है। समिति वही थी। कमरा वही था। ठंडी फर्श, शीशे की दीवार, फाइलें, पेन, और लोगों की सावधान नजरें।

इस बार रुद्र अकेला नहीं था। वह काव्या के पास खड़ा था। तारा कमरे के बाहर मीरा के साथ बैठी थी, हाथ में गेंद दबाए।

पहला परीक्षण आसान था। एक अनजान कर्मचारी कमरे में आया, कुर्सी खिसकाई, फिर वापस गया। रुद्र सतर्क रहा, पर शांत। दूसरा परीक्षण — पट्टा बदलना। उसने काव्या की तरफ देखा, फिर अनुमति दी। तीसरा — हल्की आवाज, गिरती लकड़ी, दरवाजे की चरमराहट। वह तनता, फिर ढीला पड़ता। समिति नोट लिखती रही।

फिर अचानक वही हुआ जिससे सब डर रहे थे।

एक स्वयंसेवक के हाथ से लोहे की ट्रे छूटकर फर्श पर गिरी। तेज धमाका हुआ। कमरे में बैठे 2 लोग चौंक गए। रुद्र बिजली की तरह मुड़ा। उसका शरीर सख्त, कान पीछे, आंखें फैल गईं। एक पल के लिए पुराना डर लौट आया। वही डर, जिसने उसे मौत के आदेश तक पहुंचा दिया था।

काव्या ने कुछ नहीं कहा। अर्जुन पीछे दीवार के पास खड़ा था। उसने आगे कदम नहीं बढ़ाया। उसने सिर्फ 2 उंगलियां अपने सीने पर रखीं, फिर धीरे से हाथ नीचे किया।

वही संकेत।

घर। सुरक्षित। सब ठीक है।

रुद्र ने अर्जुन को देखा। फिर काव्या को। फिर दरवाजे के बाहर बैठी तारा को, जिसकी मुट्ठी में नारंगी गेंद थी। कमरे में कोई सांस भी जोर से नहीं ले रहा था।

धीरे-धीरे रुद्र के कंधे ढीले पड़े। उसकी गर्दन नीचे आई। उसने फर्श को सूंघा, फिर शांत होकर बैठ गया।

समिति के बुजुर्ग सदस्य की आंखें पहली बार फाइल से उठीं। उन्होंने लंबे समय तक रुद्र को देखा। जैसे उन्हें पहली बार समझ आया कि यह कुत्ता आज्ञा नहीं तोड़ रहा था, वह भरोसे की भाषा खोज रहा था।

आकलन 25 मिनट और चला। रुद्र पूर्ण नहीं था। कोई भी जीव इतना दुख झेलकर पूर्ण नहीं रहता। पर वह खतरनाक नहीं था। वह घायल था, सतर्क था, और सही हाथों में सुरक्षित था।

बाहर सबको इंतजार करने को कहा गया। तारा घास पर बैठकर गेंद घुमाती रही। रुद्र उसके पास लेट गया। काव्या खड़ी थी, पर उसके हाथ कांप रहे थे। अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। कुछ फैसले शब्दों से भारी होते हैं।

जब दरवाजा खुला, समिति के अध्यक्ष बाहर आए। उनकी आवाज पहले जैसी कठोर नहीं थी।

— दया मृत्यु का आदेश वापस लिया जाता है।

मीरा रो पड़ी। काव्या ने आंखें बंद कर लीं, जैसे लंबे समय से रोके हुए सांस को आखिर बाहर आने दिया हो। तारा ने रुद्र को गले लगा लिया। रुद्र ने खुद को छुड़ाया नहीं। उसने बस सिर थोड़ा मोड़कर उसकी हथेली को छुआ।

फैसला सिर्फ इतना नहीं था। काव्या का गोद लेने का आवेदन स्वीकार हुआ, 1 साल तक निरीक्षण की शर्त के साथ। अर्जुन को व्यवहार सलाहकार के रूप में दर्ज किया गया। मीरा ने कागज संभाले। तारा ने सबसे आखिर में अपने छोटे हाथ से एक जगह निशान लगाया, जहां असल में हस्ताक्षर की जरूरत भी नहीं थी। उसने कहा — मैं भी जिम्मेदार हूं।

किसी ने उसे रोका नहीं।

घर लौटने पर सावित्री देवी बरामदे में बैठी थीं। काव्या ने फैसला बताया। वह कुछ देर चुप रहीं। फिर धीरे से बोलीं — वीर बचपन में भी ऐसे ही जिद्दी था। जिसे अपना मान ले, छोड़ता नहीं था।

यह उनकी माफी नहीं थी, पर शायद पहला पुल था।

नीरज फिर कभी घर बेचने की बात लेकर नहीं आया। मोहल्ले वालों ने भी धीरे-धीरे मोबाइल निकालना बंद कर दिया। रुद्र अब तमाशा नहीं था। वह उस घर का पहरेदार, साथी और चुप गवाह बन गया था।

महीनों बाद बारिश का मौसम आया। आंगन में तुलसी के पास मिट्टी भीगती, छत से पानी टपकता, और तारा स्कूल से लौटते ही गेंद फेंकती। रुद्र हर बार नहीं दौड़ता था। कभी देखता रहता, कभी धीरे चलता, कभी अचानक बच्चे की तरह गेंद उठा लाता। तारा हर बार ताली बजाती, मानो कोई युद्ध जीत लिया हो।

काव्या शाम को बरामदे में बैठकर चाय पीती। रुद्र उसके पैरों के पास लेटता। कभी-कभी वह वीर की तस्वीर की तरफ देखती और कहती — देखो, तुम्हारा साथी ड्यूटी पर है।

एक रविवार अर्जुन मछली पकड़ने की छड़ें लेकर आया। झील ज्यादा दूर नहीं थी। काव्या पहले मना करने वाली थी, फिर तारा की खुशी देखकर तैयार हो गई। सावित्री देवी ने रास्ते के लिए पराठे बांध दिए। यह छोटी बात थी, पर घरों में रिश्ते अक्सर बड़ी बातों से नहीं, ऐसे ही छोटे डिब्बों में लौटते हैं।

झील के किनारे तारा लकड़ी के घाट पर बैठी थी। रुद्र उसके बगल में, आंखें दूर पानी पर। काव्या थोड़ी दूर चटाई पर डिब्बा खोल रही थी। अर्जुन ने देखा, उस दृश्य में वीर नहीं था, फिर भी उसकी कमी पहली बार इतनी निर्दयी नहीं लग रही थी। जैसे वह अनुपस्थिति अब घाव से बदलकर स्मृति बन रही हो।

रुद्र ने कभी वीर की जगह नहीं ली। वह ले भी नहीं सकता था। उसका काम किसी को बदलना नहीं था। वह तो बस उस अधूरे वादे की आखिरी सांस था, जो एक सैनिक अपने घर, अपनी पत्नी, अपनी बच्ची और अपने साथी से कर गया था — लौटूंगा तो साथ चलेंगे।

वीर नहीं लौटा। पर उसका संकेत लौट आया।

2 उंगलियां सीने पर। हाथ धीरे से नीचे। घर। सुरक्षित। सब ठीक है।

साल के अंत में तारा ने स्कूल में परिवार पर चित्र बनाया। उसमें काव्या थी, सावित्री देवी थीं, एक छोटी लकड़ी की नाव थी, नारंगी गेंद थी, और बीच में रुद्र था। ऊपर आसमान में उसने एक छोटा तारा बनाया और उसके पास लिखा — पापा देख रहे हैं।

शिक्षिका ने पूछा — यह कुत्ता कौन है?

तारा ने बिना सोचे कहा — यह रुद्र है। पापा का दोस्त। हमारा पहरेदार। और जब हम बहुत उदास होते हैं, यह हमें याद दिलाता है कि घर अभी भी घर है।

उस शाम चित्र दीवार पर लगा दिया गया। रुद्र ने उसे सूंघा, फिर तारा के कमरे के बाहर अपनी पुरानी जगह पर जाकर लेट गया। भीतर तारा सो रही थी। बाहर बरामदे में काव्या ने दीया जलाया। हवा हल्की थी, लौ कांपी, पर बुझी नहीं।

कभी-कभी उम्मीद शोर करके वापस नहीं आती। कभी वह एक खाली कटोरे में आती है, जो सुबह भरा नहीं मिलता। कभी वह दरवाजे के बाहर सोते हुए श्वान के रूप में आती है। कभी वह एक बच्ची की गेंद के पीछे धीमे-धीमे चलती है। और कभी वह उस संकेत में छिपी रहती है, जिसे दुनिया आदेश समझती है, पर कोई टूटा हुआ दिल उसे घर लौटने की भाषा की तरह पहचान लेता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.