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अस्पताल के बिस्तर पर टूटी टाँगों वाली पत्नी को पति ने पेट में मारा, फिर बोला “अब भी साइन करेगी”, लेकिन गलियारे की कैमरा फुटेज ने ऐसा सच खोल दिया कि पूरा परिवार अदालत तक काँप गया और बेटी की दुनिया बदल गई

PART 1

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अस्पताल के बेड पर पड़ी अपनी टूटी हुई पत्नी के पेट में जब राजीव ने दोनों मुट्ठियाँ दे मारीं, तब कमरे की सफेद दीवारें भी जैसे शर्म से कांप उठीं।

नंदिता शर्मा पहले ही मौत के मुँह से लौटकर आई थी। दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर के कमरा 307 में उसकी दोनों टाँगों पर प्लास्टर था, 3 पसलियाँ दरकी हुई थीं, चेहरा सूजा हुआ था और हाथों में सलाइन लगी थी। वह सड़क हादसे के बाद 18 दिन से उसी बिस्तर पर पड़ी थी। डॉक्टरों ने साफ कहा था कि उसे महीनों तक सहारे की जरूरत पड़ेगी।

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लेकिन राजीव शर्मा को अपनी पत्नी की टूटी हड्डियाँ नहीं दिखीं।

उसे सिर्फ खर्च दिखा।

— बहुत हो गया नाटक, नंदिता। आज घर चलना है।

वह बिना फल, बिना फूल, बिना चिंता के आया था। महँगी घड़ी, क्रीजदार शर्ट, हाथ में फोन और आँखों में वही ठंडी झुंझलाहट, जिससे नंदिता पिछले 9 साल से डरती आई थी।

नंदिता ने धीमे से कहा—

— डॉक्टर ने मना किया है। मैं अभी चल नहीं सकती।

राजीव हँसा नहीं, बस होंठ तिरछे कर दिए।

— डॉक्टर हमारे घर का किराया देगा? तेरे मायके वाले हमेशा बीच में कूदते हैं। तूने उन्हें क्या बताया है? कि मैं जानवर हूँ?

नंदिता चुप रही।

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यही उसकी आदत बन चुकी थी।

लाजपत नगर की उनकी सोसायटी में राजीव सबके सामने आदर्श पति था। मंदिर में प्रसाद बाँटता, पड़ोस की आंटियों के गैस सिलेंडर उठवा देता, बेटी अन्वी को स्कूल बस तक छोड़ते हुए मुस्कुराता। लोग कहते, “नंदिता भाग्यशाली है, इतना संभालने वाला पति मिला।”

लेकिन घर का दरवाजा बंद होते ही वही आदमी उसकी साँसों का हिसाब लेने लगता।

— तू मेरे बिना कुछ नहीं है।

— तेरे मायके ने तुझे बहुत सिर चढ़ा रखा है।

— घर पर बैठकर भी रानी जैसी थक जाती है?

नंदिता कभी चार्टर्ड अकाउंटेंट के दफ्तर में काम करती थी। शादी के बाद राजीव ने कहा था, “अन्वी छोटी है, माँ की जरूरत है।” नंदिता ने नौकरी छोड़ी, पर धीरे-धीरे नौकरी ही नहीं, बैंक कार्ड, फोन की स्वतंत्रता, दोस्तों से मिलना, सब छूटता गया।

हादसा 1 बरसाती दोपहर को हुआ था। वह अन्वी के लिए टिफिन बॉक्स और स्ट्रॉबेरी लेने बाजार गई थी। सड़क पार करते समय एक बूढ़े ड्राइवर की कार नियंत्रण खो बैठी। नंदिता हवा में उछली, फिर सड़क पर गिरी, और उसके बाद अंधेरा।

उसके माता-पिता, मीना और सुरेश, सबसे पहले अस्पताल पहुँचे। वे गाजियाबाद से दौड़े चले आए। मीना ने बेटी के बाल सहलाए, सुरेश ने डॉक्टरों, पुलिस और बीमा वालों से बात की। अन्वी को वे अपने घर ले गए।

राजीव नहीं आया।

18 दिन बाद जब वह आया, तो पति की तरह नहीं, वसूली करने वाले आदमी की तरह आया।

उसने नंदिता की कलाई पकड़ी और खींचा।

— उठ। अभी।

नंदिता दर्द से चीखी।

— छोड़ो, राजीव, मेरी टाँगें टूटी हैं।

— मुझे बदनाम करेगी तो इससे ज्यादा टूटेगा।

फिर उसने दोनों मुट्ठियाँ उठाईं और उसके पेट पर वार कर दिया।

नंदिता की चीख बाहर तक गई।

दरवाजा धड़ाम से खुला। नर्स प्रिया यादव और एक सुरक्षा गार्ड अंदर दौड़े।

— मरीज से दूर हटिए! अभी!

राजीव पल भर में बदल गया।

— ये मानसिक रूप से अस्थिर है। मैं इसका पति हूँ।

गार्ड उसके सामने खड़ा हो गया।

— इसलिए ही बाहर जाइए।

बाहर जाते हुए राजीव ने नंदिता को देखा और दाँत भींचकर कहा—

— तूने कैमरे के सामने रोना शुरू किया है न? अब देख।

तभी नर्स प्रिया के चेहरे पर अजीब सख्ती आई। उसने दरवाजे के ऊपर लगे छोटे काले कैमरे की तरफ देखा।

और नंदिता पहली बार समझी—शायद इस बार सच अकेला नहीं था।

PART 2

उसी रात अस्पताल की सुरक्षा टीम ने फुटेज निकाली। कैमरे ने पूरा कमरा नहीं देखा था, मगर दरवाजे से भीतर झुकता राजीव, उसका नंदिता को खींचना, उसके हाथों की हिंसक हरकत, नंदिता का शरीर झटके से सिकुड़ना और नर्स का दौड़कर आना साफ दिख रहा था।

डॉक्टर कविता मेहरा ने नया मेडिकल नोट लिखा। नर्स प्रिया ने गवाही दी। गार्ड ने कहा कि राजीव बाहर निकलते समय भी पत्नी को धमका रहा था।

मीना रोती रही। सुरेश चुप बैठे रहे, पर उनकी मुट्ठियाँ काँप रही थीं।

तभी नंदिता के फोन पर 23 संदेश आए।

“तू मेरी इज्जत मिट्टी में मिला रही है।”

“अन्वी को भूल जा।”

“तेरे नाम से जो कागज बनवाए हैं, उन पर साइन तो करवाकर ही रहूँगा।”

अगले दिन वकील अदिति राणा आईं। उन्होंने बैंक स्टेटमेंट, ऑनलाइन लोन और एक अधूरी पावर ऑफ अटॉर्नी सामने रखी।

— वह आपको घर नहीं ले जाना चाहता था, नंदिता। वह आपको अकेले ले जाकर आपकी दुर्घटना वाली मुआवजा राशि, गहने और खाते अपने कब्जे में लेना चाहता था।

नंदिता का चेहरा सफेद पड़ गया।

तभी अदिति ने दूसरा कागज खोला।

— और यह सब साबित करने के लिए कोई और भी बोलना चाहता है।

दरवाजे पर वही औरत खड़ी थी, जो पिछले 2 हफ्तों से उनके घर आती-जाती देखी गई थी।

PART 3

उसका नाम सिमरन अरोड़ा था। उम्र 33, गुरुग्राम की एक रियल एस्टेट कंपनी में काम करती थी। वह अस्पताल के कमरे में दाखिल हुई तो नंदिता की माँ मीना कुर्सी से उठ खड़ी हुईं। उनके चेहरे पर वह गुस्सा था जो एक माँ अपनी टूटी हुई बेटी के बिस्तर के पास खड़ी दूसरी औरत को देखकर महसूस करती है।

सुरेश ने धीरे से मीना के कंधे पर हाथ रखा।

सिमरन दरवाजे के पास ही रुक गई। उसके हाथ में भूरे रंग की फाइल थी। आँखों के नीचे नींद और डर के काले घेरे थे।

— मैं माफी माँगने नहीं आई हूँ, क्योंकि शायद मुझे उसका हक नहीं है। मैं सच बताने आई हूँ।

नंदिता ने पहली बार उसकी तरफ पूरा चेहरा घुमाया।

— सच? किस सच की बात कर रही हो?

सिमरन की आवाज काँपी।

— राजीव ने मुझे बताया था कि आप दोनों 1 साल से अलग हो। उसने कहा कि आप बस घर छोड़ने से मना कर रही हैं, क्योंकि आपको उसके पैसों से मतलब है। उसने कहा कि दुर्घटना के बाद भी आप ठीक हैं, मगर बीमा के लिए अस्पताल में पड़ी हैं।

मीना के मुँह से घृणा भरी साँस निकली।

— झूठा आदमी।

सिमरन ने फाइल खोली। उसमें व्हाट्सऐप चैट के प्रिंट, कॉल रिकॉर्ड, कुछ ऑडियो की ट्रांसक्रिप्ट और बैंक से जुड़े कागज थे।

— उसने मुझसे पूछा था कि क्या मैं किसी ऐसे नोटरी को जानती हूँ जो ज्यादा सवाल न पूछे। उसने कहा, “बीवी को बस साइन करवाने हैं। एक बार मुआवजा और गहने हाथ में आ जाएँ, फिर मैं सब सेट कर दूँगा।”

नंदिता का गला सूख गया।

सिमरन ने फोन निकाला। कमरे में राजीव की आवाज गूँजी, साफ, निर्दयी और बेचैन।

— उसे अस्पताल से निकालना पड़ेगा। वहाँ उसकी माँ-बाप बैठे रहते हैं। घर आ जाएगी तो साइन करवा लूँगा। वैसे भी टूटी-फूटी पड़ी है, ज्यादा लड़ नहीं पाएगी।

यह वाक्य कमरे में पत्थर की तरह गिरा।

टूटी-फूटी।

नंदिता ने अपनी प्लास्टर चढ़ी टाँगों को देखा। उसे लगा जैसे शरीर की सारी चोटें अचानक नाम पा गई हों। वह सिर्फ घायल नहीं थी। वह राजीव की नजर में एक रुकावट थी, एक दस्तावेज थी, एक रकम थी।

सिमरन रो पड़ी।

— मैंने अपनी माँ को ऐसे ही आदमी के साथ जीते देखा है। जब उसने आपकी बेटी अन्वी के बारे में झूठ बोला, तब मुझे शक हुआ। उस दिन मैं आपके फ्लैट पर थी। अन्वी नीचे गार्ड के पास रो रही थी। वह अपनी कविता वाली कॉपी लेने आई थी। राजीव घर पर नहीं था। उसने मुझे कहा था कि बच्ची उससे मिलना ही नहीं चाहती। लेकिन वह बच्ची दरवाजे को पकड़कर कह रही थी, “पापा से कहो मेरी मम्मी को डाँटना बंद करें।”

नंदिता ने आँखें बंद कर लीं। दर्द अब पेट में नहीं था। दर्द उस जगह था जहाँ एक माँ अपनी बच्ची की आवाज छिपाकर रखती है।

वकील अदिति ने सबूत संभाले। डॉक्टर कविता ने बयान जोड़ा। अस्पताल प्रशासन ने फुटेज सुरक्षित किया। पुलिस को औपचारिक शिकायत दी गई। नंदिता ने पहली बार अपने विवाह को “घर” कहने से इनकार किया।

शुरू में राजीव ने सब नकारा। उसने कहा कि नंदिता हिस्टीरिया में थी। उसने कहा कि सिमरन बदला ले रही है। फिर कहा कि मीना और सुरेश उसकी शादी तोड़ना चाहते हैं। फिर उसने अपने परिवार में संदेश भेजे कि नंदिता पैसे के लिए नाटक कर रही है।

राजीव की माँ ने मीना को फोन किया।

— हमारी बहू बहुत जिद्दी है। मर्द से 2 बात ऊँची-नीची हो जाए तो घर नहीं तोड़ा जाता।

मीना ने जवाब दिया—

— आपकी 2 बातें मेरी बेटी की पसलियों पर लिखी हैं। अब फोन मत कीजिए।

और उन्होंने कॉल काट दिया।

नंदिता ने शिकायत दर्ज कराई। घरेलू हिंसा, मारपीट, आर्थिक धोखाधड़ी, पहचान का दुरुपयोग और मुआवजा हथियाने की साजिश—एक-एक बात कागज पर उतरती गई। हर वाक्य बोलते समय उसका शरीर काँपता, मगर हर वाक्य के बाद उसकी छाती से कोई भारी पत्थर हटता।

अन्वी को पहले कुछ नहीं बताया गया। वह नानी के घर में सोती, स्कूल जाती, फिर शाम को वीडियो कॉल पर माँ से बात करती।

— मम्मी, आप कब चलोगी?

नंदिता मुस्कुराने की कोशिश करती।

— जल्दी। पहले टाँगें डॉक्टर अंकल की बात मान लें।

एक दिन अन्वी ने धीरे से पूछा—

— पापा मुझसे नाराज हैं क्या? मैंने उस दिन पानी गिरा दिया था न?

यह सुनकर नंदिता टूटते-टूटते बची। उसे समझ आया कि बच्चे घर की हिंसा नहीं भूलते, वे उसे अपने छोटे दिल में गलती बनाकर रख लेते हैं।

— नहीं, बेटा। किसी बड़े के गुस्से की जिम्मेदारी बच्चे की नहीं होती। तुमने कुछ गलत नहीं किया।

अन्वी चुप रही, फिर बोली—

— फिर मम्मी, हम वापस उसी घर में नहीं जाएँगे न?

उस रात नंदिता ने अदिति को संदेश भेजा।

“मुझे अन्वी की सुरक्षा चाहिए। किसी भी कीमत पर।”

अगले 12 दिन में अदालत से अंतरिम सुरक्षा आदेश मिला। राजीव को नंदिता, अन्वी और नंदिता के माता-पिता से संपर्क करने से रोका गया। अन्वी से मुलाकात केवल निगरानी केंद्र में, काउंसलर की मौजूदगी में हो सकती थी। नंदिता के बैंक खातों पर सुरक्षा लगाई गई। जिन लोन के लिए उसके दस्तावेज इस्तेमाल हुए थे, उनकी जाँच शुरू हुई।

राजीव की असली घबराहट तब दिखी जब पुलिस ने उसके लैपटॉप से फाइलें निकालीं। उसमें नंदिता के पुराने गहनों की तस्वीरें थीं, जिन्हें बेचने के लिए ऑनलाइन ड्राफ्ट विज्ञापन बने हुए थे। मीना की दी हुई शादी की चूड़ियाँ, नंदिता की नानी का छोटा सोने का लॉकेट, अन्वी के जन्म पर मिला चाँदी का कटोरा—सबके आगे अनुमानित कीमत लिखी थी।

सुरेश ने वह सूची देखी तो पहली बार उनकी आँखों से आँसू गिर पड़े।

— उसने मेरी बेटी की जिंदगी को दुकान समझ लिया।

नंदिता ने पिता का हाथ पकड़ा।

— अब दुकान बंद है, पापा।

अस्थायी सुनवाई 1 महीने बाद हुई। नंदिता व्हीलचेयर में अदालत पहुँची। उसने कहा कि वह अंदर खुद खड़ी होकर जाना चाहती है। सुरेश ने उसे सहारा दिया। उसके पैर काँप रहे थे, मगर आँखें नहीं झुकीं।

राजीव सामने बैठा था। सफेद शर्ट, साफ शेव, चेहरे पर बनावटी दुख। जैसे वही पीड़ित हो। उसने नंदिता को देखकर सिर हिलाया, जैसे कह रहा हो—देख, अभी भी देर नहीं हुई।

इस बार नंदिता ने नजर नहीं हटाई।

नर्स प्रिया ने गवाही दी। उसने बताया कि राजीव की आवाज धमकी भरी थी और नंदिता बिस्तर पर असहाय थी। सुरक्षा गार्ड ने कहा कि बाहर आते हुए भी वह पत्नी को डराने की कोशिश कर रहा था। डॉक्टर कविता ने बताया कि चोट पहले से गंभीर थी और पेट पर वार से चिकित्सा जोखिम बढ़ा था।

सिमरन ने ऑडियो दिए। उसने यह भी स्वीकार किया कि वह राजीव के झूठ में फँसी थी, पर जब उसे नंदिता की स्थिति पता चली तो वह चुप नहीं रह सकती थी।

फिर नंदिता की बारी आई।

पहले शब्द उसके गले में अटक गए। उसने अदालत की लकड़ी की मेज पकड़ी। आँखों के सामने अन्वी का चेहरा आया—वह बच्ची जो अपने रंगीन पेन समेटते हुए पिता के मूड का अंदाजा लगाना सीख गई थी।

नंदिता ने धीरे से कहा—

— उसने सालों तक सोचा कि चुप रहना ही परिवार बचाना है। उसने बेटी के लिए सहा। मगर अब उसे समझ आया है कि बच्चा टूटा हुआ घर देखकर नहीं टूटता, बच्चा तब टूटता है जब वह डर को घर समझने लगता है।

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

राजीव पहली बार नीचे देखने लगा।

अदालत ने सुरक्षा आदेश मजबूत किया। अन्वी की कस्टडी फिलहाल नंदिता को दी गई। राजीव पर आपराधिक मुकदमा आगे बढ़ा। आर्थिक अपराध शाखा ने दस्तावेजों की जाँच शुरू की। तलाक की प्रक्रिया शुरू हुई। नंदिता को अस्पताल से छुट्टी मिलने तक सुरक्षित आश्रय और कानूनी सहायता सुनिश्चित की गई।

जब वह पहली बार पुलिस और पिता के साथ अपने पुराने फ्लैट में सामान लेने गई, तो वह घर उसे घर नहीं लगा। ड्रॉअर खुले थे, अलमारी उलटी-पुलटी थी, पूजा के कोने में धूल जमी थी। बेडरूम की मेज पर अन्वी की बनाई एक ड्राइंग पड़ी थी—एक पीले रंग का घर, 3 लोग और ऊपर बड़ा सा सूरज।

पीछे राजीव ने रकमों की सूची लिख रखी थी।

नंदिता ने ड्राइंग उठाई, उसे मोड़ा नहीं, सीने से लगा लिया।

— बस जरूरी चीजें लेनी हैं।

उसने अन्वी के कपड़े, स्कूल की किताबें, फोटो एलबम, मेडिकल फाइलें, अपने प्रमाणपत्र, नानी का लॉकेट, चूड़ियाँ, और वह छोटी डिब्बी ली जिसमें अन्वी के दूध के दाँत रखे थे। बाकी चीजें वहीं छोड़ दीं। सोफा, परदे, डाइनिंग टेबल, शादी के फ्रेम—सब उस औरत की चीजें थीं जो कभी यह समझती थी कि सहना ही पत्नी होना है।

रीहैब लंबा था। सुबहें दर्द से शुरू होतीं। कभी 3 कदम चलना भी पहाड़ जैसा लगता। कभी किसी आदमी की तेज आवाज सुनकर नंदिता की साँस अटक जाती। कभी फोन की घंटी उसे फिर उसी कमरे 307 में पहुँचा देती।

लेकिन हर छोटा कदम जीत था।

पहली बार वॉकर से बाथरूम तक जाना।

पहली बार सीढ़ी की 4 पायदान चढ़ना।

पहली बार अन्वी के बाल खुद बाँधना।

पहली बार बिना डर के रात में दरवाजा बंद करना।

मीना और सुरेश ने गाजियाबाद में अपने घर के पास एक छोटा सा फ्लैट किराए पर दिलाया। 2 कमरे, छोटी रसोई, बालकनी में सिर्फ 1 कुर्सी रखने भर की जगह। अन्वी ने पीले परदे चुने।

— मम्मी, इससे घर में धूप रहेगी, चाहे बाहर बारिश हो।

नंदिता दुकान के बीचोंबीच रो पड़ी। दुकानदार ने सोचा शायद पैसे की परेशानी है। मीना ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उन्हें पता था—यह रोना हार का नहीं, बच जाने का था।

धीरे-धीरे नंदिता ने काम शुरू किया। पहले पड़ोस की एक बुटीक वाली आंटी के खातों का हिसाब बनाया। फिर 2 छोटे दुकानदार मिले। फिर पुराने ऑफिस की सहेली ने कुछ क्लाइंट भेजे। वह डाइनिंग टेबल पर लैपटॉप खोलती, चाय रखती, और अन्वी बगल में होमवर्क करती।

एक शाम उसने सोशल मीडिया पर छोटा सा लेख लिखा। उसने राजीव का नाम नहीं लिया। उसने कोई सनसनी नहीं बनाई। उसने बस लिखा—

“कभी-कभी औरतें बच्चों के लिए घर में रुकती हैं। लेकिन अगर घर डर से बना हो, तो बाहर निकलना ही बच्चे को पहला सुरक्षित कमरा देना होता है।”

सुबह तक पोस्ट 500 बार शेयर हो चुकी थी। 2 दिन में 3000 से ज्यादा लोगों ने पढ़ा। संदेश आने लगे—दिल्ली, जयपुर, लखनऊ, पटना, मुंबई से। कई महिलाएँ रात 2 बजे लिखतीं, फिर शायद चैट मिटा देतीं। कुछ सिर्फ इतना लिखतीं, “मुझे लगा गलती मेरी है।”

नंदिता हर किसी को लंबा उत्तर नहीं दे पाती थी। कभी बस 3 शब्द भेजती—

“आप अकेली नहीं हैं।”

उसकी कहानी एक महिला सहायता समूह तक पहुँची। उन्होंने उसे घरेलू हिंसा पर छोटी सभा में बोलने को कहा। नंदिता पहले डर गई। फिर अन्वी ने उसका दुपट्टा ठीक करते हुए कहा—

— मम्मी, आप दूसरों की मम्मियों को भी बताओ कि डरना जरूरी नहीं।

नंदिता मंच पर गई। सामने महिलाएँ थीं, कॉलेज की लड़कियाँ थीं, कुछ बुजुर्ग पिता थे, 2 पुलिसकर्मी थे। उसने कमरे 307 की बात की। उसने बताया कि कैसे एक आदमी बाहर “मेरी पत्नी मेरी ताकत है” कह सकता है और अंदर उसी ताकत को रोज तोड़ सकता है। उसने कहा कि हिंसा हमेशा थप्पड़ से शुरू नहीं होती। कभी वह बैंक कार्ड लेने से शुरू होती है। कभी फोन चेक करने से। कभी “तुम मेरे बिना कुछ नहीं” कहने से।

सभा के बाद एक वृद्ध महिला उसके पास आई।

— मेरी बेटी भी इसी में फँसी है। मैं उसे समझाती थी कि सहन कर, बच्चा है। आज पहली बार समझ आया कि मैं गलत कहती थी।

नंदिता घर लौटी तो थकी हुई थी, मगर उसकी चाल हल्की थी।

कुछ महीनों बाद राजीव को सजा हुई। यह फिल्मों जैसा दृश्य नहीं था। न कोई जोरदार संगीत, न कोई नाटकीय चीख। बस अदालत के शब्द थे—दोष, आदेश, प्रतिबंध, मुआवजा, निगरानी, रिकॉर्ड। मगर नंदिता के लिए वे शब्द दीवार बन गए। ऐसी दीवार जिसके इस तरफ वह और अन्वी सुरक्षित थीं, और उस तरफ उसका डर बंद था।

तलाक भी हो गया।

अदालत से बाहर निकलते समय अदिति ने कागज उसकी ओर बढ़ाया।

— अब आप स्वतंत्र हैं, नंदिता जी।

नंदिता ने कागज देखा। उसे लगा वह हँसेगी, रोएगी, चिल्लाएगी। पर उसके भीतर बस हवा भरी। जैसे सालों बाद फेफड़े पूरे खुले हों।

उस शाम अन्वी ने कहा—

— आज पेपर वाली पार्टी करेंगे। सूजी का हलवा और आलू पूरी।

मीना ने रसोई संभाली, सुरेश ने मिठाई लाई। अन्वी ने स्टील के गिलास में आम का जूस भरकर कहा—

— हमारी पीली धूप वाले घर के नाम।

फ्लैट पीला नहीं था। सिर्फ परदे पीले थे। लेकिन किसी ने उसे सुधारा नहीं।

रात को अन्वी सो गई। नंदिता बालकनी में आई। नीचे गली में चाय वाले की केतली से भाप उठ रही थी। दूर मंदिर की घंटी हल्की सुनाई दे रही थी। हवा में धूल, धूप और आजादी का स्वाद था।

फोन पर एक अनजान संदेश आया।

“आज मैंने अपनी बहन को सब बताया। अभी जाने की हिम्मत नहीं है, पर अब झूठ बोलना बंद कर दिया है।”

नंदिता ने लंबे समय तक स्क्रीन देखी। फिर उसने जवाब लिखा—

“सच बोलना ही पहला दरवाजा है।”

वह अंदर आई, अन्वी के कमरे में गई। बच्ची गहरी नींद में थी, गाल के नीचे हाथ, पास में वही पुराना टेडी। नंदिता ने उसके माथे को चूमा। दरवाजे के पास लगे पीले परदे हल्के-हल्के हिल रहे थे।

कभी-कभी डर लौटता था। अस्पताल की गंध, अचानक बजता फोन, किसी आदमी की कसी हुई आवाज, चाबी की खनक—सब पुरानी यादों को जगा देते। मगर अब नंदिता डर को पहचानती थी। वह उसे आदेश नहीं मानती थी।

वह बिल देखती, जो उसके अपने कमाए पैसों से भरे गए थे। वह अन्वी की हँसी सुनती, जो अब किसी कदमों की आहट से बंद नहीं होती थी। वह अपने पैरों के निशान देखती, जो दर्द के बावजूद आगे बढ़े थे।

कमरा 307 में राजीव ने सोचा था कि उसने उसे वहीं तोड़ दिया है जहाँ वह बचाव नहीं कर सकती।

उसे नहीं पता था कि उसी वार ने दरवाजा खोल दिया था।

वही दरवाजा, जिससे नंदिता अपनी बेटी का हाथ पकड़कर बाहर चली आई।

और सालों बाद भी, जब अन्वी स्कूल से दौड़ती हुई आती, पीला बैग उछलता, चेहरे पर पूरा सूरज लिए, नंदिता उन परदों को याद करती।

फिर वह मन ही मन कहती—

धूप हमेशा आसमान से नहीं आती।

कभी-कभी एक माँ अपनी टूटी टाँगों पर खड़े होकर उसे घर में वापस लाती है।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.