
PART 1
8 महीने की गर्भवती काव्या को तपती दोपहर में नंगे पाँव पिछवाड़े के आँगन में बंद कर दिया गया था, जबकि उसका पति आरव भीतर ठंडी हवा वाले कमरे में खड़ा होकर चिल्ला रहा था, “सीख कबाब पलट दो, धुआँ माँ के बालों में जा रहा है।”
दिल्ली के वसंत विहार की उस बड़ी कोठी के संगमरमर की पट्टियाँ आग की तरह जल रही थीं। जून की लू दीवारों से टकराकर लौट रही थी। कोयले की अंगीठी से उठता धुआँ काव्या की आँखों में चुभ रहा था, और हल्के पीले सूती कुरते का कपड़ा उसके पेट से पसीने में चिपक चुका था। उसके होंठ सूख गए थे, पैरों के तलवे लाल पड़ चुके थे, और कानों में एक अजीब-सी सीटी बज रही थी।
भीतर काँच की बड़ी दीवार के उस पार आरव के माता-पिता आराम से आम पन्ना पी रहे थे। उसकी सास, सविता मल्होत्रा, अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए मुस्कराई।
“देखो इसे,” उसने धीमे नहीं, जान-बूझकर ऊँची आवाज़ में कहा, “मायके का पैसा देखकर रानी बनती थी। अब 2 कबाब पलटने में साँस फूल रही है।”
ससुर महेंद्र मल्होत्रा ने अखबार मोड़कर हँसी दबाई।
“कम से कम किसी काम तो आई।”
काव्या ने काँपते हाथ से चिमटा पकड़ा। अंगीठी की गर्मी चेहरे पर थप्पड़ जैसी लग रही थी। पेट के भीतर बच्चा अचानक हिला, जैसे वह भी बेचैनी समझ रहा हो।
“आरव,” काव्या ने काँच के दरवाज़े के पास आकर धीमी आवाज़ में कहा, “पानी दे दो। चक्कर आ रहा है।”
आरव ने सरकने वाला दरवाज़ा थोड़ा-सा खोला। अंदर की ठंडी हवा का एक झोंका उसके चेहरे को छूकर तुरंत गायब हो गया।
“नाटक बंद करो, काव्या,” उसने आँखें घुमाते हुए कहा।
“सच में तबीयत ठीक नहीं है। बच्चा बहुत जोर से हिल रहा है।”
आरव की आवाज़ और ठंडी हो गई।
“मेरी माँ को धुएँ से तकलीफ हो रही है। तुम बस काम जल्दी करो।”
उसने दरवाज़ा बंद किया।
फिर भीतर से कुंडी चढ़ा दी।
आवाज़ छोटी थी।
लेकिन काव्या के भीतर कुछ टूट गया।
जिस आदमी ने फेरे लेते समय कहा था कि वह हर जन्म में उसका साथ देगा, वही अब उसे तपती जमीन पर खड़ा देखकर ऐसे मुस्करा रहा था जैसे उसका दर्द कोई सबक हो। सविता उसके पास आई और आरव के कंधे पर हाथ रखकर बोली, “बहू को शुरू से उसकी जगह दिखानी पड़ती है। खासकर जब वह अपने बाप की जायदाद लेकर आए।”
काव्या की धड़कन थम-सी गई।
उसने पिछले 7 महीनों में बहुत कुछ सहा था। ताने, चुप्पी, हाथ पकड़कर जोर से खींचना, बैंक के कागज़ों पर दबाव, रात-रात भर चरित्र और मानसिक हालत पर सवाल। वह हर बार सोचती रही कि शायद शादी बच सकती है, शायद बच्चा आने के बाद आरव बदल जाएगा।
लेकिन उस पल उसे समझ आ गया कि वे उसे नहीं, उसकी विरासत को चाहते थे। दक्षिण दिल्ली की यह कोठी। उसके पिता की छोड़ी हुई रकम। माँ के नाम के गहने। और सबसे ज़रूरी, उसका डर।
आरव ने काँच पर उँगली से ठकठकाया।
“मुस्कराओ, काव्या। थोड़ी देर में लोग आने वाले हैं।”
काव्या ने सूखे होंठों से कहा, “कौन लोग?”
आरव झुका, उसकी आँखों में अजीब चमक थी।
“तुम्हारे लिए नहीं।”
आँगन घूमने लगा। काँच की दीवार धुँधली पड़ने लगी। अंगीठी पर रखे कबाब जलने लगे थे और धुआँ सीधा उसके चेहरे पर आ रहा था। काव्या ने एक हाथ पेट पर रखा और दूसरे हाथ से कुरते की जेब में रखा फोन टटोला।
आरव और उसके माता-पिता समझते थे कि वह अकेली है, क्योंकि वह कम बोलती थी।
वे समझते थे कि वह कमजोर है, क्योंकि वह हर अपमान का जवाब चिल्लाकर नहीं देती थी।
पर वे यह भूल गए थे कि उसके बड़े भाई विक्रम राठौड़ की दिल्ली की सबसे भरोसेमंद निजी सुरक्षा संस्था थी। पिता की मृत्यु के बाद विक्रम ने उसके फोन में एक छिपा हुआ आपात संकेत लगा दिया था।
उसने कहा था, “शर्म मत करना, काव्या। खतरे में हो तो बस संकेत भेज देना। अपने लोग रास्ता ढूँढ लेते हैं।”
काव्या ने काँपते अंगूठे से बटन दबाया।
1 बार।
2 बार।
फिर लंबा दबाया।
स्क्रीन लाल हो उठी।
आपात स्थान-संकेत सक्रिय।
भीतर आरव ने अपना गिलास उठाया, जैसे उसकी हार पर जाम पी रहा हो।
अगले ही पल काव्या के घुटने मुड़ गए।
जमीन उसके चेहरे की तरफ दौड़ती हुई आई।
और गिरते हुए उसने काँच के पीछे से सविता की हँसी सुनी।
लेकिन उसी क्षण कोठी के बाहर किसी गाड़ी के तेज ब्रेक की आवाज़ गूँजी।
PART 2
काव्या ने आँखें खोलीं तो धूप अब भी सफेद आग जैसी थी, पर उसके ऊपर एक बड़ी छतरी तनी हुई थी।
“नाड़ी कमजोर है, पर साँस चल रही है।”
“गर्दन पर ठंडी पट्टी रखो।”
“बहनजी, आवाज़ सुन पा रही हैं?”
काले कुर्ते और गहरे नीले निशान वाली निजी सुरक्षा संस्था का एक कर्मचारी उसके पास घुटनों के बल बैठा था। दूसरा आदमी अंगीठी हटवा रहा था। तीसरा वायरलेस यंत्र पर किसी से कह रहा था, “गर्भवती महिला है। चिकित्सकीय गाड़ी 1 मिनट में चाहिए।”
काँच के भीतर आरव दरवाज़ा पीट रहा था।
“ये लोग अंदर कैसे आए?”
किसी ने जवाब नहीं दिया।
काव्या ने मुश्किल से कहा, “मेरा बच्चा…”
सुरक्षा अधिकारी ने शांत आवाज़ में कहा, “आपके भाई रास्ते में हैं। चिकित्सक भी आ रहे हैं।”
महेंद्र बाहर निकला, चेहरे पर वही पुराना रौब।
“यह निजी संपत्ति है। तुरंत निकल जाओ।”
अधिकारी खड़ा हुआ।
“हम उस महिला के संकेत पर आए हैं, जो इस घर की कानूनी स्वामिनी है।”
महेंद्र का चेहरा खाली पड़ गया।
आरव झटके से बाहर आया।
“वह मेरी पत्नी है। उसे मैं संभालूँगा।”
सुरक्षा अधिकारी उसके सामने दीवार की तरह खड़ा हो गया।
“आप पास नहीं जाएँगे।”
आरव हँसा, पर उसकी हँसी काँप गई।
“जानते हो मैं कौन हूँ?”
“हाँ,” अधिकारी ने कहा। “आरव मल्होत्रा। आपकी पत्नी काव्या राठौड़ की संपत्ति पर अवैध नियंत्रण, निजी खातों में घुसपैठ और हस्ताक्षर की नकल से जुड़े मामले में निगरानी में हैं।”
आँगन में सन्नाटा जम गया।
सविता चीखी, “झूठ है यह!”
काव्या ने सूखे गले से कहा, “झूठ नहीं, सविता जी। सोमवार को सब दर्ज हो चुका है।”
आरव ने उसे ऐसे देखा, जैसे पहली बार समझा कि वह चुप थी, अंधी नहीं।
काव्या 6 हफ्ते से सब जानती थी। छिपे हुए संदेश। वकील से बातचीत। उसके नाम से कर्ज़ लेने की कोशिश। बच्चे के जन्म के बाद उसे “अस्थिर” साबित कर उसकी जायदाद पर कब्ज़े की योजना।
यह क्रूरता अचानक नहीं हुई थी।
यह अभ्यास था।
उसे तोड़ने का अभ्यास।
तभी बाहर से सायरन सुनाई दिया।
और मुख्य फाटक से विक्रम राठौड़ भीतर दाखिल हुआ, आँखों में ऐसा गुस्सा था जो शोर नहीं करता, फैसला करता है।
वह काव्या के पास घुटनों के बल बैठा।
“मैं आ गया, छोटी।”
काव्या पहली बार रो पड़ी।
विक्रम ने उसका माथा छुआ, फिर आरव की तरफ देखा।
“तुमने मेरी गर्भवती बहन को लू में बंद किया।”
आरव बोला, “गलतफहमी थी।”
विक्रम ने एक छोटा पर्दा उठाया।
“नहीं। यह सब रिकॉर्ड हुआ है।”
और जो रिकॉर्डिंग चलने वाली थी, वह सिर्फ काव्या की नहीं, पूरे मल्होत्रा परिवार की दुनिया उलटने वाली थी।
PART 3
चिकित्सकीय गाड़ी पिछवाड़े के दरवाज़े तक पहुँच चुकी थी। काव्या को सावधानी से स्ट्रेचर पर रखा गया। उसकी बाँह में तरल चढ़ाया गया, नाक के नीचे ऑक्सीजन की नली लगाई गई, और पेट पर एक पट्टी बाँधकर बच्चे की धड़कन सुनने की मशीन जोड़ी गई।
टिक। टिक। टिक।
तेज।
मजबूत।
जिंदा।
उस आवाज़ ने काव्या को भीतर से पकड़ लिया। दुनिया धुँधली थी, चेहरों पर पसीना, डर और गुस्सा था, लेकिन उसके बच्चे की धड़कन किसी मंदिर की घंटी की तरह साफ सुनाई दे रही थी।
आरव स्ट्रेचर के पीछे बढ़ा।
“मैं पति हूँ। मुझे साथ जाने दो।”
एक महिला पुलिस अधिकारी, जो चिकित्सकीय दल के साथ पहुँची थी, उसके सामने खड़ी हो गई।
“महिला ने आपसे दूरी की मांग की है।”
सविता ने अचानक रोना शुरू कर दिया। अभी तक जो चेहरा कठोर था, वह पलक झपकते ही दुखियारी माँ का चेहरा बन गया।
“हमारे घर को बदनाम किया जा रहा है। काव्या शुरू से ही बहुत संवेदनशील है। गर्भावस्था में उसका दिमाग और कमजोर हो गया है। छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना देती है।”
काव्या ने स्ट्रेचर से गर्दन मोड़ी और विक्रम को देखा।
“चलाइए।”
विक्रम ने पर्दे पर रिकॉर्डिंग चालू की।
पहला दृश्य उसी आँगन का था।
आरव दरवाज़ा बंद कर रहा था। कुंडी चढ़ने की आवाज़ साफ थी। काव्या पानी माँग रही थी। सविता हँस रही थी। महेंद्र कह रहा था कि वह किसी काम आ रही है। आरव कह रहा था कि धुआँ उसकी माँ के बालों में जा रहा है।
फिर दूसरा दृश्य आया।
सुबह की रसोई।
सविता अपने बाल सँवार रही थी और आरव से कह रही थी, “आज रिश्तेदार आएँगे। उसे थोड़ा और दबाओ। अगर वह सबके सामने रो पड़ी, तो अच्छा रहेगा। अदालतें ऐसी औरतों पर भरोसा नहीं करतीं।”
आरव ने जवाब दिया, “बच्चा पैदा होने के बाद वह कुछ भी हस्ताक्षर कर देगी। अभी तो बस उसे यह यकीन दिलाना है कि वह अकेली है।”
महेंद्र की आवाज़ पीछे से आई।
“और अगर हस्ताक्षर न करे तो? डॉक्टर से लिखवा देंगे कि वह बच्ची के लिए खतरा है। फिर संपत्ति संभालना हमारा कर्तव्य बन जाएगा।”
सविता का रोना तुरंत बंद हो गया।
महिला अधिकारी का चेहरा सख्त हो गया। अब यह घरेलू झगड़ा नहीं था। यह षड्यंत्र था। यह गर्भवती महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़कर उसकी संपत्ति हथियाने की योजना थी।
आरव ने पर्दे की ओर झपट्टा मारा।
विक्रम पीछे हट गया। सुरक्षा कर्मचारियों ने तुरंत आरव को रोक लिया।
“यह निजी बातचीत है,” आरव चिल्लाया।
काव्या की आवाज़ कमजोर थी, लेकिन हर शब्द सीधा लगा।
“मेरे घर में। मेरी सुरक्षा व्यवस्था पर। मेरी जान खतरे में डालने के बाद।”
आरव का चेहरा पीला पड़ गया।
काव्या महीनों से जाग रही थी। वह कमजोर नहीं, सतर्क थी। पिता की मृत्यु के बाद उसने उनके व्यवसाय के लेखे सँभाले थे। उसने कंपनी के पुराने खातों में गड़बड़ियाँ पकड़ी थीं। शादी से पहले वह आर्थिक धोखाधड़ी की जाँच में काम करती थी। उसे पता था कि लालच कैसे कागज़ों में छिपता है, और झूठ बोलने वाले लोग अपनी ही आवाज़ में कैसे फँसते हैं।
पहली बार जब आरव ने उसके हाथ को इतना कसकर पकड़ा था कि कलाई नीली पड़ गई, उसने चिकित्सक से चोट दर्ज करवाई। पहली बार जब सविता ने कहा कि “बच्चे के बाद दिमाग बिगड़ जाता है,” उसने यह बात डायरी में लिखी। पहली बार जब बैंक से अजीब संदेश आया, उसने अपने लेखाकार से जाँच करवाई। पहली बार जब आरव ने देर रात उसका फोन खोलने की कोशिश की, उसने सुरक्षा व्यवस्था बदलवा दी।
और 6 हफ्ते पहले जब उसे पता चला कि उसके हस्ताक्षर की नकल करके संपत्ति से जुड़ी फाइल तैयार की जा रही है, उसने चुप रहकर सबूत जुटाना शुरू कर दिया।
क्योंकि वह जानती थी, ऐसे लोग रोती हुई औरत को पागल कहते हैं।
लेकिन रिकॉर्डिंग को पागल नहीं कह सकते।
महेंद्र ने आखिरी बार अपना रौब दिखाने की कोशिश की।
“अधिकारी जी, यह पारिवारिक मामला है। बहू-बेटे में ऐसी बातें हो जाती हैं।”
महिला अधिकारी ने तपती जमीन, बंद दरवाज़ा, अंगीठी, काव्या का पसीने से भीगा चेहरा, उसके 8 महीने के पेट और रिकॉर्डिंग की आवाज़ को एक साथ देखा।
“नहीं,” उसने कहा, “यह पारिवारिक मामला नहीं है। यह अपराध है।”
आरव की आँखें फैल गईं।
“आप मुझे ऐसे नहीं ले जा सकतीं।”
“गर्भवती पत्नी को गर्मी में बंद करना, चिकित्सकीय सहायता रोकना, धमकी, मानसिक प्रताड़ना और संपत्ति से जुड़ा षड्यंत्र। हाँ, हम ले जा सकते हैं।”
सविता ने हाथ जोड़ लिए।
“हमने तो बहू को घर की बेटी माना था।”
काव्या ने आँखें बंद कर लीं। यह झूठ उससे अब घायल नहीं कर पा रहा था। कभी वह इस वाक्य को सुनने के लिए तरसी थी। कभी वह चाहती थी कि सास उसे सचमुच बेटी समझे। कभी वह हर त्योहार पर उनके लिए साड़ी चुनती, उनके स्वाद का खाना बनाती, उनकी रिश्तेदारों के सामने हँसती, ताकि वे उसे स्वीकार कर लें।
पर उस दिन उसे समझ आ गया कि कुछ दरवाज़े बंद होने के लिए ही होते हैं। ताकि बाहर खड़ी औरत को पता चले कि घर सच में किसका है।
आरव को पुलिस ने वहीं रोका। उसके चेहरे से पति का अधिकार, बेटे का घमंड और अमीर घराने का आत्मविश्वास एक-एक कर उतरता गया। महेंद्र ने सुरक्षा कर्मचारियों को धमकाया तो उसे भी अलग ले जाया गया। सविता चिल्लाती रही कि काव्या ने घर तोड़ दिया, मगर पड़ोसी दीवारों और बरामदों से सब देख रहे थे।
जिस स्त्री को वे धूप में गिरता हुआ तमाशा समझ रहे थे, अब वही स्ट्रेचर पर पड़ी होकर भी सबसे मजबूत दिख रही थी।
अस्पताल पहुँचते ही काव्या को आपात कक्ष में ले जाया गया। डॉक्टरों ने कहा कि शरीर में पानी की भारी कमी हो गई थी, रक्तचाप गिर गया था, लेकिन समय पर सहायता मिल गई। बच्चा सुरक्षित था। काव्या ने यह सुनते ही आँखें बंद कर लीं और आँसू कानों के पास तक बह गए।
विक्रम पूरी रात उसके कमरे के बाहर बैठा रहा। सुबह जब उसे भीतर आने दिया गया, उसके हाथ में नारियल पानी और माँ की पुरानी ऊनी चुन्नी थी। गर्मी का मौसम था, फिर भी वह चुन्नी वह हमेशा साथ रखता था, क्योंकि पिता के बाद माँ की वही आखिरी निशानी बची थी।
वह काव्या के बिस्तर के पास बैठा।
“तूने पहले क्यों नहीं बताया?”
काव्या ने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा, “क्योंकि हर बार लगता था शायद मैं बढ़ा-चढ़ाकर सोच रही हूँ।”
विक्रम की आँखें लाल थीं।
“जब कोई तुझे रोज़ छोटा महसूस कराए, तो गलती तेरी सोच में नहीं होती। गलती उसके इरादे में होती है।”
काव्या चुप रही।
उसकी उँगलियाँ पेट पर ठहर गईं। बच्ची ने हल्का-सा धक्का दिया।
विक्रम ने धीमे से पूछा, “नाम सोचा है?”
काव्या की आँखें भर आईं।
“आशना।”
“क्यों?”
“क्योंकि इसे डर नहीं, अपनापन मिलना चाहिए।”
अगले कुछ हफ्ते तूफान जैसे थे। अदालत में सुरक्षा आदेश दायर हुआ। काव्या की चिकित्सकीय रिपोर्ट, बैंक की जाँच, नकली हस्ताक्षर की विशेषज्ञ रिपोर्ट और घर की रिकॉर्डिंग पेश की गई। आरव के वकीलों ने कोशिश की कि इसे पति-पत्नी का झगड़ा बताया जाए, पर हर दस्तावेज़ उसके झूठ को छोटा करता गया।
काव्या ने अपना बयान दिया। वह अदालत में सफेद सूती साड़ी पहनकर पहुँची थी, पेट और भी भारी था, चाल धीमी थी, पर आवाज़ साफ थी। उसने चिल्लाया नहीं। उसने रोकर दया नहीं माँगी। उसने बस क्रम से बताया कि कैसे उसे अलग किया गया, कैसे उसे संपत्ति पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाया गया, कैसे उसके गर्भ को भी सौदे की तरह देखा गया।
सविता ने अदालत में सिर पर आँचल रखकर कहा कि वह बस बहू को काम सिखा रही थी।
न्यायाधीश ने रिकॉर्डिंग सुनने के बाद पूछा, “गर्भवती महिला को 44 डिग्री ताप में बाहर बंद करना किस परंपरा का हिस्सा है?”
सविता के पास जवाब नहीं था।
महेंद्र की सामाजिक प्रतिष्ठा गिरने लगी। जिन लोगों के सामने वह अपने खानदान का रौब दिखाता था, वे अब फोन नहीं उठा रहे थे। रिश्तेदारों के समूहों में वह रिकॉर्डिंग घूमने लगी। कुछ ने काव्या को दोष दिया कि घर की बात बाहर ले गई। पर कई औरतों ने चुपचाप उसे संदेश भेजे।
“आपने हमारे लिए भी बोला।”
“हम भी सहते रहे।”
“आप बच गईं, यह देखकर हिम्मत मिली।”
काव्या ने हर संदेश पढ़ा, पर बहुत कम जवाब दिया। वह अभी भी रात में पसीने से उठ जाती थी। उसे कभी-कभी लगता काँच का दरवाज़ा फिर बंद हो रहा है। कभी अंगीठी की गंध नाक में आ जाती। डॉक्टर ने कहा कि शरीर ठीक हो जाएगा, मन को समय चाहिए।
पर इस बार वह अकेली नहीं थी।
विक्रम ने उसी कोठी की सारी सुरक्षा व्यवस्था बदलवा दी। नौकरों में जो लोग मल्होत्रा परिवार को सूचना देते थे, उन्हें हटाया गया। नई ताले लगे। आँगन में जलती पट्टियों पर लकड़ी की छाया वाली छत बनवाई गई। अंगीठी हटाकर वहाँ तुलसी, चमेली और मोगरे के गमले रख दिए गए।
काव्या ने पहली बार उस आँगन को देखा तो साँस अटक गई।
यही जगह थी जहाँ वह गिरी थी।
यही जगह थी जहाँ उसकी बच्ची की धड़कन ने उसे वापस पकड़ा था।
फिर 1 बरसाती रात, आशना पैदा हुई।
बाहर बादल गरज रहे थे। अस्पताल की खिड़की पर पानी की लकीरें दौड़ रही थीं। काव्या दर्द से टूटी जा रही थी, लेकिन जब बच्ची की पहली आवाज़ कमरे में गूँजी, तो उसे लगा जैसे उसके भीतर की बंद कुंडी टूट गई।
विक्रम बाहर खड़ा रो रहा था। नर्स ने जब बच्ची को काव्या की बाँहों में रखा, तो उसने उसके छोटे चेहरे को देखा। गुलाबी त्वचा, बंद आँखें, नन्ही उँगलियाँ जो उसकी उँगली पकड़ने की कोशिश कर रही थीं।
“तू किसी की संपत्ति नहीं है,” काव्या ने धीमे से कहा। “तू मेरी साँस है।”
तलाक की प्रक्रिया लंबी चली, लेकिन अंत साफ था। आरव को काव्या और बच्ची से दूर रहने का आदेश मिला। उसे अनिवार्य परामर्श, निगरानी और आर्थिक धोखाधड़ी से जुड़े मुकदमे का सामना करना पड़ा। महेंद्र की कंपनी की जाँच खुली। सविता ने कई बार रिश्तेदारों के हाथ पत्र भिजवाए।
काव्या ने कोई पत्र नहीं खोला।
एक दिन सविता खुद अस्पताल के बाहर आई, जहाँ आशना की नियमित जाँच थी। उसका चेहरा थका हुआ था, गहने कम थे, आवाज़ में पुराना घमंड पूरी तरह तो नहीं, पर कमजोर जरूर पड़ गया था।
“बहू, पोती को एक बार देखने दे।”
काव्या ने आशना को अपने सीने से और कस लिया।
“जिस दिन आप मुझे धूप में गिरता देखकर हँसी थीं, उस दिन आपने यह अधिकार खो दिया था।”
सविता की आँखें भर आईं।
“मुझसे गलती हो गई।”
काव्या ने कहा, “गलती वह होती है जो अचानक हो। योजना गलती नहीं होती।”
वह मुड़ी और बिना पीछे देखे चली गई।
6 महीने बाद काव्या उसी कोठी की रसोई में खड़ी थी। सुबह की रोशनी काँच से छनकर भीतर आ रही थी। वही काँच, जिसके पीछे कभी उसका अपमान हुआ था, अब खुला था। दरवाज़े की कुंडी बदल चुकी थी। बाहर आँगन में मोगरे की खुशबू थी। आशना लकड़ी के पालने में सो रही थी, उसके पास माँ की पुरानी चुन्नी रखी थी।
विक्रम दो मिट्टी के कुल्हड़ों में ठंडी छाछ लेकर आया।
“आँगन में चलेगी?”
काव्या कुछ पल चुप रही।
फिर उसने चप्पल उतार दी।
विक्रम घबरा गया।
“काव्या…”
वह हल्के से मुस्कराई।
“अब जमीन जलती नहीं है।”
वह धीरे-धीरे बाहर चली गई। पट्टियाँ सचमुच ठंडी थीं। ऊपर नई छत से छाया गिर रही थी। हवा में मोगरा था, धुआँ नहीं। काँच खुला था, बंद नहीं। भीतर कोई हँस नहीं रहा था। कोई आदेश नहीं दे रहा था। कोई उसे रानी बनकर जीने से रोक नहीं रहा था।
काव्या ने आशना को गोद में उठाया और आँगन के बीच खड़ी हो गई।
एक पल के लिए उसे वही पुराना दृश्य याद आया। तपती जमीन। धुआँ। काँच। आरव का गिलास। सविता की हँसी। उसका गिरता हुआ शरीर।
फिर आशना ने नींद में उसकी साड़ी का किनारा पकड़ लिया।
काव्या ने बच्ची के माथे को चूमा।
“यह घर अब डर का नहीं,” उसने फुसफुसाया, “हमारा है।”
उसने खुला दरवाज़ा देखा।
फिर आँगन में कदम और मजबूती से रख दिया।
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