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74 साल की विधवा ने ₹38 और खाली रसोई के बावजूद 15 खतरनाक बाइकर्स को खाना खिला दिया, बेटे ने उसे पागल साबित कर घर बेचने की चाल चली… लेकिन सुबह 100 बाइकर्स ट्रकों के साथ लौटे

भाग 1

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जब बर्फीली रात में खोपड़ी वाले काले जैकेट पहने 15 अजनबी मोटरसाइकिल सवार कमला देवी के टूटे बरामदे पर खड़े हुए, तो पूरे मोहल्ले ने पर्दे बंद कर लिए, लेकिन 74 साल की उस विधवा ने दरवाजा खोल दिया।

शिमला से नीचे, पहाड़ियों के बीच बसे छोटे से कस्बे धरमपुर में लोग कमला देवी को “कमला काकी” कहते थे। उनका घर पुराना था, छत 3 जगह से टपकती थी, लकड़ी की सीढ़ी का 2वां पायदान दबते ही कराहता था, और सर्दियों में खिड़कियों के अंदर भी बर्फ जैसी नमी जम जाती थी। उनके पास उस रात कुल ₹38 बचे थे। रसोई में आधा किलो चावल, थोड़ी दाल, 2 आलू, थोड़ा आटा और मसालों की डिब्बी थी। फिर भी उनके चूल्हे पर राजमा उबल रहा था, क्योंकि अगले दिन मंदिर में गरीबों के लिए भंडारा था।

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उनकी 16 साल की पोती तारा कोने में बैठी अपनी कॉपी में चेहरे बना रही थी। तारा के पिता, कमला देवी के बेटे नीरज, 5 साल पहले सड़क हादसे में चले गए थे। नीरज की पत्नी दूसरी शादी करके शहर चली गई, और तारा को कमला देवी ने ही पाला। घर का खर्च वृद्धावस्था पेंशन, सिलाई और कभी-कभार लोगों के घर खाना बनाकर चलता था।

पर असली बोझ गरीबी नहीं था। असली जख्म उनका छोटा बेटा राघव था। वह चंडीगढ़ में रहता था, पर हर महीने फोन करके यही कहता था कि पुराना घर बेच दो। उसकी पत्नी पायल कहती थी, “इस लड़की पर खर्च करके क्या मिलेगा? तारा तो बोझ है।” उसी दोपहर राघव ने धमकी दी थी कि अगर कमला देवी ने कागजों पर दस्तखत नहीं किए, तो वह अदालत में कहेगा कि बूढ़ी मां पागल हो गई है और घर संभाल नहीं सकती।

कमला देवी ने फोन काट दिया था, मगर हाथ देर तक कांपते रहे थे।

शाम होते-होते मौसम बिगड़ गया। बारिश बर्फ में बदल गई। पहाड़ी सड़क शीशे जैसी फिसलनदार हो गई। बिजली 6:14 पर चली गई। कमला देवी ने लालटेन जलाई, तारा को रजाई दी और चूल्हे पर रखे राजमा को बचाने लगीं।

तभी बाहर गड़गड़ाहट हुई। पहले लगा बादल फटा है। फिर आवाज बढ़ती गई। मोटरसाइकिलों की आवाज। 1, 2 नहीं, 15।

तारा खिड़की से झांकते ही पीछे हट गई। आंगन में 15 भारी मोटरसाइकिलें खड़ी थीं। उनके पास 15 आदमी खड़े थे। काले चमड़े के जैकेट, दाढ़ी, टैटू, भारी जूते, भीगे चेहरे। सबसे आगे एक चौड़े कंधों वाला आदमी खड़ा था, जिसकी सफेद दाढ़ी बर्फ से भीगी हुई थी। उसके पीछे 2 आदमी एक जवान लड़के को संभाले हुए थे। लड़के के होंठ नीले पड़ चुके थे।

तारा ने कमला देवी की बांह पकड़ ली।

— दादी, दरवाजा मत खोलना। ये लोग अच्छे नहीं लग रहे।

कमला देवी ने उस लड़के को देखा। उसकी कांपती देह में उन्हें अपना नीरज दिखाई दिया। वही उम्र, वही बेबस झुकता सिर, वही जीवन और मौत के बीच अटका चेहरा।

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उन्होंने कुंडी खोली।

ठंडी हवा ने कमरे को चीर दिया। सामने खड़ा सफेद दाढ़ी वाला आदमी चौंक गया।

— माता जी, हम मुसीबत नहीं चाहते। रास्ता बंद है। बस थोड़ी देर बरामदे में खड़े होने देंगे तो…

कमला देवी ने उसकी बात काट दी।

— बरामदे में नहीं। अंदर आओ। और उस बच्चे को पहले भीतर लाओ, नहीं तो यहीं गिर जाएगा।

आदमी ने उन्हें ऐसे देखा जैसे किसी ने पत्थर में दरार डाल दी हो।

— माता जी, हम 15 हैं।

कमला देवी ने दरवाजा पूरा खोल दिया।

— भूख और ठंड गिनकर नहीं आती। अंदर आओ।

तभी गली के मोड़ से किसी ने मोबाइल की रोशनी में उनकी तस्वीर खींच ली। वह राघव का दोस्त था, जो उसी कस्बे में रहता था। कुछ ही मिनटों में तस्वीर राघव तक पहुंच गई।

और अगली सुबह यही तस्वीर कमला देवी के खिलाफ हथियार बनने वाली थी।

भाग 2

15 मोटरसाइकिल सवार कमला देवी के छोटे से कमरे में ऐसे समा गए जैसे पहाड़ अचानक मिट्टी के घर में उतर आए हों। काले जैकेटों पर बने निशान, भारी जूते, भीगे बाल, कांपते हाथ — सब देखकर तारा का डर अभी गया नहीं था, पर कमला देवी बिना डरे रसोई में लग गईं।

उन्होंने राजमा में पानी बढ़ाया, आलू काटे, चावल धोए और तवे पर मोटी रोटियां सेंकनी शुरू कीं। जवान लड़के को, जिसे सब “छोटू” कह रहे थे, उन्होंने नीरज की पुरानी रजाई ओढ़ाई। उसके माथे पर गरम कपड़ा रखा और बोलीं—

— सांस धीरे ले, बेटा। ठंड शरीर से पहले हिम्मत तोड़ती है।

सफेद दाढ़ी वाले आदमी का नाम वीर प्रताप था। वह कमरे के एक कोने में खड़ा सब देख रहा था। उसने छत से टपकते पानी के नीचे रखी बाल्टी देखी, खिड़की पर चिपका पुराना टेप देखा, खाली डिब्बे देखे, और फिर वह दृश्य देखा जिसने उसका चेहरा बदल दिया — कमला देवी ने अपनी आखिरी दाल भी भगोने में डाल दी।

तारा धीरे से बोली—

— दादी, कल हम क्या खाएंगे?

कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

— कल की चिंता कल करेगी। आज ये लोग हमारे दरवाजे आए हैं।

सबने खाना खाया। कमरे में पहली बार डर की जगह चुप आभार भर गया। जाते-जाते वीर प्रताप ने पीतल का एक सिक्का मेज पर रखा। उस पर लिखा था, “उधार चुकता।”

सुबह बर्फ थोड़ी पिघली। राइडर्स जाने लगे। वीर प्रताप ने पैसों की गड्डी बढ़ाई, पर कमला देवी ने हाथ पीछे कर लिया।

— मैंने खाना बेचा नहीं, बेटा। मैंने भूखे को खिलाया है।

वीर प्रताप की आंखें भर आईं। उसने बस इतना कहा—

— फिर हम भी कीमत नहीं देंगे, माता जी। कर्ज चुकाएंगे।

उनके जाते ही राघव आ पहुंचा। हाथ में वही तस्वीर थी।

— गुंडों को घर में रखा? अब मैं साबित करूंगा कि ये घर तुम्हारे हाथ में सुरक्षित नहीं है।

तारा सहम गई। कमला देवी ने पहली बार अपने बेटे की आंखों में देखकर कहा—

— जिस घर का दरवाजा भूखे के लिए बंद हो जाए, वही असुरक्षित होता है।

तभी दूर से फिर मोटरसाइकिलों की गड़गड़ाहट उठी। इस बार आवाज 15 की नहीं थी।

पूरा कस्बा बाहर निकल आया।

भाग 3

धरमपुर की तंग गली में उस सुबह जो आवाज गूंजी, वैसी आवाज लोगों ने किसी जुलूस, शादी या मेले में भी नहीं सुनी थी। पहाड़ी मोड़ से एक के बाद एक मोटरसाइकिलें उतरने लगीं। 10, 20, 50, फिर 100। उनके पीछे 4 ट्रक, 2 छोटी गाड़ियां और 1 बड़ा सामान ढोने वाला वाहन था। हर वाहन पर रस्सियों से बंधी लकड़ियां, टीन की चादरें, सीमेंट की बोरियां, पाइप, तार, नए खिड़की के फ्रेम, रंग के डिब्बे, औजार और 1 नया हीटर रखा था।

राघव के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया। पायल, जो उसके पीछे खड़ी थी, घबराकर बोली—

— ये सब यहां क्यों आए हैं?

वीर प्रताप पहली मोटरसाइकिल से उतरा। आज भी वही सफेद दाढ़ी, वही भारी शरीर, वही चमड़े का जैकेट, मगर आंखों में रात वाली थकान नहीं थी। वह सीधे कमला देवी के सामने आया और दोनों हाथ जोड़कर झुक गया।

— माता जी, आपने उस रात हमारे 15 लोगों को बचाया। आज हमारे 100 लोग आपका घर बचाने आए हैं।

गली में सन्नाटा छा गया।

राघव आगे बढ़ा।

— यह हमारा पारिवारिक मामला है। किसी बाहरी को दखल देने का अधिकार नहीं है।

वीर प्रताप ने उसकी तरफ देखा, पर आवाज ऊंची नहीं की।

— बेटा, पारिवारिक मामला तब होता है जब परिवार साथ खड़ा हो। जब कोई अपनी बूढ़ी मां को छत टपकते घर में छोड़कर कागजों से डराने लगे, तब समाज भी गवाह बनता है।

राघव का चेहरा लाल हो गया।

— आप जानते भी हैं यह घर किसका है?

तभी कस्बे के वकील हरिदत्त शर्मा भी गली में आते दिखे। उनके हाथ में फाइल थी। वे कमला देवी के पुराने पड़ोसी थे। उन्होंने राघव की तरफ देखकर कहा—

— घर अभी भी कमला देवी के नाम है। नीरज की बेटी तारा का भी वैधानिक अधिकार सुरक्षित है। बिना इनकी मर्जी कोई बिक्री नहीं हो सकती।

राघव बौखला गया।

— मां को समझ नहीं है। ये लोग इन्हें बहका रहे हैं।

कमला देवी बहुत देर से चुप थीं। उन्होंने अपनी पुरानी शॉल कसकर पकड़ी, फिर पहली बार भीड़ के सामने बोलीं—

— राघव, जब नीरज की चिता से धुआं उठ रहा था, तब तारा मेरे आंचल में रो रही थी। तूने कहा था, “मां, इस लड़की को अनाथालय भेज दो, मेरा खर्च मत बढ़ाओ।” उस दिन मैंने कुछ नहीं कहा। जब छत टपकती थी, तूने कहा, “घर बेच दो, मेरे कर्ज उतर जाएंगे।” तब भी मैंने कुछ नहीं कहा। पर आज तू मेरे दरवाजे पर आए भूखे लोगों को गुंडा कहकर मुझे पागल साबित करना चाहता है। आज मैं कहती हूं — यह घर बिकेगा नहीं। यह घर तारा का सहारा बनेगा। और जब तक मेरी सांस है, इसका चूल्हा बुझने नहीं दूंगी।

तारा दादी से लिपट गई। भीड़ में कई औरतों की आंखें भर आईं। पायल ने राघव का हाथ खींचा, मगर राघव अभी भी हार मानने को तैयार नहीं था।

— ठीक है, देख लूंगा। पुलिस बुलाता हूं।

कस्बे के मंदिर के पुजारी, पोस्टमैन, स्कूल की अध्यापिका, राशन दुकान वाला, सब आगे आने लगे। स्कूल की अध्यापिका सुधा जी बोलीं—

— पुलिस बुलाइए। हम सब बयान देंगे कि कमला काकी ने जिंदगी भर इस कस्बे को खिलाया है।

राशन वाले इकबाल ने कहा—

— मेरे खाते में इनके उधार लिखे हैं, पर ये खुद भूखी रहकर भी दूसरों के लिए आटा ले जाती थीं।

पोस्टमैन रमेश ने कहा—

— इनके पति की पेंशन आती है, और आधा पैसा दवाइयों से पहले पड़ोसियों के इलाज में चला जाता है।

वीर प्रताप ने अपनी जेब से वही पीतल का सिक्का निकाला। उसके पीछे खड़े 100 सवारों ने भी वैसा ही सिक्का उठाया। सुबह की धूप में 100 पीतल के सिक्के चमक उठे।

— हमारे यहां एक बात मानी जाती है, माता जी, — वीर प्रताप बोला, — जो दरवाजा मौत और ठंड के बीच खुलता है, उसका कर्ज पैसे से नहीं उतरता। उसे कर्म से चुकाया जाता है।

फिर काम शुरू हुआ।

मिनटों में पुरानी छत की टीन उतरने लगी। 1 दल ने लकड़ी की सड़ी बल्ली बदली। 1 दल ने बरामदे की टूटी सीढ़ियां उखाड़ीं। 1 बिजली मिस्त्री ने पुराने खतरनाक तार निकाले। 1 प्लंबर ने जंग लगी पाइप बदली। 1 बढ़ई ने तारा के कमरे की खिड़की को नया फ्रेम दिया। 1 औरतों का समूह, जो राइडर्स के परिवार से आया था, रसोई साफ करने लगा। किसी ने नए बर्तन दिए, किसी ने राशन के डिब्बे भरे, किसी ने कंबल रखे।

कमला देवी ने घबराकर कहा—

— मैं तुम्हें चाय बना दूं?

वीर प्रताप मुस्कुराया।

— आज आप नहीं बनाएंगी। आज आप बैठेंगी।

पर कमला देवी बैठ नहीं पाईं। वह आंगन में खड़ी अपने घर को बदलते हुए देखती रहीं। जिस छत के नीचे उन्होंने बच्चों को पाला था, पति को विदा किया था, बेटे की राख पर रोई थीं, उसी छत को 100 अजनबी अपने हाथों से नया जीवन दे रहे थे।

दोपहर तक मोहल्ले का डर पिघल गया। पहले लोग दूर खड़े तमाशा देख रहे थे। फिर किसी ने चाय लाई। किसी ने पकौड़े बनाए। किसी ने मजदूरों को पानी दिया। जो लोग रात को पर्दे बंद कर चुके थे, वे अब शर्म से सिर झुकाकर मदद कर रहे थे।

तारा पूरे समय अपनी कॉपी सीने से लगाए खड़ी रही। छोटू, वही जवान लड़का जिसे कमला देवी ने रजाई में लपेटा था, उसके पास आया।

— तुम चित्र बनाती हो?

तारा ने हिचकते हुए कॉपी खोली। उसमें दादी के हाथ थे, चूल्हे की आंच थी, बर्फ में खड़े मोटरसाइकिल सवार थे, और 1 खाली फोटो फ्रेम था। छोटू देर तक देखता रहा।

— ये बहुत अच्छे हैं।

तारा ने धीमे से कहा—

— दादी कहती हैं कि खाली फ्रेम में मेरी डिग्री वाली तस्वीर लगेगी, पर शायद ऐसा कभी नहीं होगा।

छोटू ने यह बात वीर प्रताप को बताई।

शाम तक घर पहचान में नहीं आ रहा था। नई छत लग चुकी थी। बरामदा मजबूत था। खिड़कियों से हवा नहीं आ रही थी। कमरे में नया हीटर धीरे-धीरे गरम हवा छोड़ रहा था। दीवारों पर हल्का पीला नहीं, साफ सफेद रंग था, जिससे घर बड़ा और उजला लग रहा था। रसोई वही थी, मगर अलमारियों में चावल, दाल, आटा, तेल, मसाले, चाय, चीनी, सब कुछ भरा था।

कमला देवी दरवाजे पर खड़ी थीं। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, पर चेहरा वैसा था जैसे किसी ने उनके अंदर बुझती हुई लौ फिर जला दी हो।

राघव दूर खड़ा सब देख रहा था। अब उसकी आवाज में पहले जैसा जोर नहीं था। उसने धीरे से कहा—

— मां, मैंने गलत किया। कर्ज में था। डर गया था।

कमला देवी ने उसकी तरफ देखा। यह वही बेटा था जिसे उन्होंने बुखार में रात-रात भर सीने से लगाया था। वही बेटा आज उन्हें अदालत और पागलपन की धमकी देकर आया था। मां का दिल नरम होता है, पर टूटी हुई इज्जत तुरंत नहीं जुड़ती।

— डर में आदमी मदद मांगता है, बेटा। मां को बेचता नहीं।

राघव की आंखें झुक गईं। पायल पहली बार आगे आई।

— मां जी, हमने तारा के बारे में भी गलत कहा।

तारा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस दादी का हाथ पकड़ लिया।

वीर प्रताप ने उसी समय 2 लिफाफे निकाले। पहला कमला देवी को दिया।

— यह धरमपुर अन्न सहायता कोष के नाम है। ₹25,000 अभी, और हर महीने राशन की व्यवस्था अलग। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और स्कूल मिलकर तय करेंगे कि किन घरों में भोजन पहुंचेगा। आपने अकेले बहुत साल लोगों को खिलाया। अब यह कस्बा आपके साथ खिलाएगा।

कमला देवी ने लिफाफा छाती से लगा लिया।

— बेटा, इतना क्यों?

वीर प्रताप ने दूसरा लिफाफा तारा को दिया।

— और यह तुम्हारे लिए है।

तारा ने खोला। अंदर चंडीगढ़ कला संस्थान से पत्र था। उसके चित्रों की तस्वीरें भेजी गई थीं। उसे 1 साल की तैयारी छात्रवृत्ति, फिर प्रवेश परीक्षा की पूरी फीस, सामग्री और रहने की सहायता का वादा था। तारा के हाथ कांपने लगे।

— दादी… मेरी पढ़ाई…

कमला देवी ने उसे गले लगा लिया। वह बच्ची, जो हर महीने अपनी छोटी कमाई दादी की दराज में रखती थी, अब पहली बार अपने लिए रो रही थी।

भीड़ में किसी ने ताली बजाई। फिर 1, फिर 10, फिर पूरी गली तालियों से भर गई।

कमला देवी ने वीर प्रताप का हाथ पकड़ लिया।

— तू कौन है, बेटा? भगवान ने तुझे किस मिट्टी से बनाया?

वीर प्रताप की आंखें दूर कहीं चली गईं।

— 18 साल पहले मैं भी रास्ते पर पड़ा था, माता जी। न घर, न काम, न इज्जत। अमृतसर में 1 बूढ़ी सिख मां ने मुझे 21 दिन अपने घर में रखा। रोटी दी, कंबल दिया, पूछा भी नहीं कि मैं कौन हूं। जब कमाने लगा तो पैसे लेकर गया। उन्होंने कहा, “मुझे मत लौटा। आगे किसी को बचा देना।” उस रात आपके घर में राजमा खाते हुए मुझे वही मां याद आ गई। आप उनका जवाब थीं।

कमला देवी ने उसके माथे को छूकर आशीर्वाद दिया।

— फिर उन्होंने तुझे सही रास्ते पर भेजा था।

वीर प्रताप ने सिर झुका लिया। सफेद दाढ़ी वाला वह भारी आदमी पहली बार बच्चे की तरह रो पड़ा।

अगले 12 महीनों में धरमपुर बदलने लगा। अन्न सहायता कोष से हर गुरुवार 15 घरों में राशन जाने लगा। बाद में संख्या 30 हो गई। कमला देवी ने मंदिर के आंगन में “सांझी रसोई” शुरू की। हर शनिवार वह लड़कियों, विधवाओं और मजदूरों की पत्नियों को सिखातीं कि कम पैसों में पेट और दिल दोनों कैसे भरे जाते हैं। राजमा कैसे गाढ़ा बनता है, बची रोटी से नाश्ता कैसे बनता है, दाल का पानी फेंकना क्यों पाप है, और खाना सिर्फ अनाज नहीं, संबंध भी होता है।

तारा चंडीगढ़ चली गई। पहले महीने हर रात रोती थी। उसे लगता था कि शहर के बच्चे उससे आगे हैं। वे रंगों के नाम जानते थे, तकनीक जानते थे, बड़े कलाकारों की बातें करते थे। तारा सिर्फ चेहरों की झुर्रियां, आंखों की थकान और हाथों की मेहनत पहचानती थी। पर यही उसकी ताकत निकली। उसने अपने पहले प्रदर्शन में 5 चित्र लगाए — दादी का चूल्हा, बर्फ में खड़े 15 सवार, वीर प्रताप के हाथ में पीतल का सिक्का, खाली राशन डिब्बा, और दादी की गोद में सोता छोटू।

उस प्रदर्शन का नाम था — “खुला दरवाजा।”

कमला देवी 1 पुरानी बस से चंडीगढ़ पहुंचीं। जब उन्होंने दीवार पर अपना चित्र देखा, जिसमें उनकी झुर्रियों भरी हथेलियां गरम कटोरा पकड़े थीं, तो वह बहुत देर चुप रहीं। फिर बोलीं—

— तारा, इसमें मेरी हथेली नहीं, मेरे भगवान का काम दिख रहा है।

राघव भी धीरे-धीरे बदलने लगा। वह तुरंत अच्छा आदमी नहीं बना। ऐसी कहानियों में लोग 1 दिन में पवित्र नहीं हो जाते। वह पहले शर्म से दूर रहा, फिर महीने में 1 बार आने लगा, फिर अन्न सहायता में राशन उठाने में मदद करने लगा। 1 दिन उसने सबके सामने कहा—

— मैंने अपनी मां को बोझ समझा था। असल में बोझ मेरी लालच थी।

कमला देवी ने उसे माफ कर दिया, पर घर के कागज तारा के नाम सुरक्षित कर दिए। यह माफी थी, भूलना नहीं।

हर साल सर्दियों से पहले वीर प्रताप और उसके राइडर्स धरमपुर आते। अब लोग उन्हें देखकर दरवाजे बंद नहीं करते थे। बच्चे मोटरसाइकिलें गिनते, औरतें चाय देतीं, बुजुर्ग हाथ उठाकर आशीर्वाद देते। उनकी जैकेटों पर बने कठोर निशान अब लोगों को डराते नहीं थे, क्योंकि धरमपुर जान चुका था कि आदमी का असली चेहरा उसके कपड़ों पर नहीं, उसके किए हुए कामों में लिखा होता है।

फिर 1 रात वैसी ही बर्फीली बारिश आई। सड़कें बंद, बिजली गायब, हवा चाकू जैसी। सांझी रसोई में उस दिन कम लोग आए थे। कमला देवी फिर भी बड़ी देग में राजमा चला रही थीं। तारा छुट्टियों में घर आई हुई थी और दादी की तस्वीर बना रही थी।

दरवाजे पर दस्तक हुई।

बाहर 1 जवान औरत खड़ी थी। भीगी हुई, कांपती हुई, छाती से 1 छोटा बच्चा चिपकाए। उसकी गाड़ी पहाड़ी मोड़ पर बंद हो गई थी। मोबाइल बंद था। पास में कोई नहीं था। वह डर से बोल भी नहीं पा रही थी।

कमला देवी ने कोई सवाल नहीं पूछा। उन्होंने बच्चा अपनी गोद में लिया, औरत को अंदर बैठाया, उसके कंधे पर कंबल डाला और तारा से कहा—

— कटोरा ला।

औरत ने कांपते हुए कहा—

— मेरे पास पैसे नहीं हैं।

कमला देवी मुस्कुराईं।

— यहां भूख से पहले पैसे नहीं पूछे जाते।

उन्होंने गरम राजमा और चावल का कटोरा उसके सामने रखा। बाहर बर्फ गिरती रही। भीतर चूल्हे की आंच जलती रही।

रसोई की दीवार पर 1 फ्रेम में पीतल का वही सिक्का लगा था — “उधार चुकता।” उसके बगल में तारा की डिग्री वाली तस्वीर थी। वह खाली फ्रेम अब खाली नहीं था।

कमला देवी ने लालटेन को खिड़की पर रख दिया, ताकि बाहर रास्ते से गुजरने वाला कोई भी भटका हुआ इंसान उसे देख सके।

तारा ने पूछा—

— दादी, आप हर तूफान में यह लालटेन क्यों जलाती हैं?

कमला देवी ने बाहर अंधेरे में देखा और धीरे से बोलीं—

— क्योंकि पता नहीं किस रात कौन सा बेटा, कौन सी बेटी, कौन सा अजनबी ठंड से लड़ते-लड़ते हमारे दरवाजे तक पहुंच जाए। और जब तक इस घर में चूल्हा जलेगा, कोई भूखा वापस नहीं जाएगा।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.