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60 मेहमानों के सामने उसने माँ की आखिरी रजाई आग में फेंक दी, “यह गंदी चीज़ मेरे घर में नहीं रहेगी”, मगर उसी जली हुई रजाई के सितारों ने उसके बेटे की करोड़ों की आज़ादी बचा ली और उसके अहंकार को अदालत तक घसीट दिया

PART 1

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“यह गंदी रजाई मेरे घर की देहलीज़ पार नहीं करेगी,” आर्यन मेहरा ने 60 मेहमानों के सामने कहा और अपनी बीमार माँ के हाथों से सिली आखिरी निशानी को जलती अंगीठी में फेंक दिया।

दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार वाली उसकी नई कोठी में उस रात गृहप्रवेश की पार्टी थी। संगमरमर का फर्श, झूमर, विदेशी फूल, महंगे सूट, कैमरों के सामने मुस्कुराते लोग—सब कुछ इतना चमकदार था कि दरवाज़े पर खड़े 71 साल के हरिशंकर मेहरा अपनी धुली हुई सफेद कमीज़ और पुराने भूरे कोट में जैसे किसी और ही दुनिया से आए लग रहे थे।

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उनकी बाँहों में गहरे नीले रंग की एक रजाई थी, जिस पर सफेद सितारे सिले हुए थे।

वह रजाई उनकी पत्नी सरोज ने बनाई थी।

सरोज को गुज़रे 2 साल हो चुके थे। जयपुर के सरकारी कैंसर अस्पताल में आखिरी महीनों में जब दर्द उसे रात भर जगाए रखता था, तब वह सुई-धागा पकड़ लेती थी। उसकी उंगलियाँ काँपती थीं, आँखें धुंधली हो जाती थीं, पर वह हर सितारा ऐसे सीती जैसे अपने पोते आरव की नींद पर पहरा लगा रही हो।

8 साल का आरव सीढ़ियों से भागता हुआ नीचे आया।

“दादू! यह दादी वाली रजाई है? वही सितारों वाली?”

हरिशंकर के झुर्रियों भरे चेहरे पर पहली बार मुस्कान आई।

“हाँ बेटा, तेरी दादी ने तेरे लिए बनाई थी। सिर्फ तेरे लिए।”

आरव ने हाथ बढ़ाया ही था कि उसकी माँ रिया बीच में आ गई। क्रीम रंग की डिजाइनर साड़ी, हीरों का हार, चेहरे पर ऐसा बनावटी सुकून जैसे हर भावना को मेकअप के नीचे दबा देना सीखा हो।

“आरव, इसे मत छूना। पता नहीं कहाँ-कहाँ पड़ी रही होगी।”

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हरिशंकर ने रजाई सीने से लगा ली।

“बहू, यह मेरी अलमारी में साफ कपड़े में बंद थी।”

रिया ने आसपास खड़े मेहमानों की तरफ देखा और धीमे मगर चुभते स्वर में बोली, “पापा जी, यहाँ सब कुछ थीम के हिसाब से है। यह चीज़ इस घर में बिल्कुल नहीं जमेगी।”

तभी आर्यन आया। दिल्ली का मशहूर कॉस्मेटिक सर्जन, टीवी शो में आने वाला डॉक्टर, गुरुग्राम में अपनी क्लिनिक का मालिक। उसके चेहरे पर वही चिकनाहट थी जो पैसे, अहंकार और लोगों की चुप्पी खरीद लेने से आती है।

“पापा, हमने बात की थी। माँ जा चुकी हैं। उनकी पुरानी चीज़ें लाकर आरव को कमजोर मत बनाइए।”

हरिशंकर की आवाज़ भर्रा गई।

“तेरी माँ ने मरते वक्त कहा था, यह रजाई आरव को देना।”

आर्यन हँसा, मगर हँसी में नफरत थी।

“माँ अपनी बीमारी में अजीब बातें करती थीं। उन्हें लगता था धागे और कपड़े से रिश्ते बच जाते हैं।”

आरव की आँखें भर आईं।

“पापा, दादी ने मुझे वादा किया था…”

“तुम्हारे कमरे में इटैलियन बेडशीट है, कश्मीरी कंबल है, जितने खिलौने कई बच्चों ने सपने में भी नहीं देखे होंगे। तुम इस पुराने कपड़े के लिए रोओगे?”

हरिशंकर ने पहली बार कठोर स्वर में कहा, “यह पुराना कपड़ा नहीं है।”

आर्यन ने हाथ बढ़ाया।

“दीजिए।”

“नहीं।”

पूरा हॉल जम गया। सिर्फ सजावट के लिए जलाई गई अंगीठी में लकड़ियाँ चटक रही थीं।

आर्यन ने झटके से रजाई पिता की बाँहों से छीनी।

“मेरे घर में क्या रहेगा, यह मैं तय करूँगा।”

“तेरी माँ ने…”

“माँ मर चुकी हैं,” आर्यन गरजा। “और यह घर गरीब यादों का गोदाम नहीं है।”

आरव चीखा, “पापा, नहीं!”

पर आर्यन ने काँच का दरवाज़ा खोला और रजाई आग में फेंक दी।

नीला कपड़ा सिकुड़ने लगा। एक सफेद सितारा काला पड़ गया। धुएँ की गंध ने कमरे की महंगी खुशबू को चीर दिया। मेहमानों ने नज़रें झुका लीं। रिया ने फोन निकाल लिया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

हरिशंकर आग की तरफ बढ़े।

“पापा, ड्रामा मत कीजिए,” आर्यन ने कहा।

लेकिन बूढ़े आदमी ने नहीं सुना। उसने जलते काँच का दरवाज़ा खोला, अपनी नंगी हथेलियाँ आग में डाल दीं और रजाई को खींच लिया। दर्द से उसका शरीर काँप उठा। आरव रोते हुए जमीन पर बैठ गया।

हरिशंकर ने जलती किनारी को अपने हाथों से दबाकर बुझाया।

रजाई बच गई थी।

काली, जली हुई, धुएँ से भरी, मगर बची हुई।

उन्होंने आर्यन की तरफ देखा।

“तेरी माँ ने आरव के लिए जो छोड़ा था, तूने उसे जलाने की कोशिश की। अब मैं देखूँगा कि उसने इसमें क्या छिपाया था।”

उस रात जब हरिशंकर जयपुर लौटे, उनके हाथों पर पट्टियाँ थीं और पास की सीट पर वही जली हुई रजाई। घर पहुँचकर उन्होंने उसे मेज पर फैलाया। एक सितारा बाकी सितारों से मोटा था। फिर दूसरा। फिर तीसरा।

उन्होंने काँपते हाथ से सिलाई टटोली।

और पहली बार उन्हें सरोज की आखिरी बात याद आई।

“अगर आर्यन इस रजाई की इज़्ज़त न करे, तो समझ लेना आरव को इसके अंदर छिपी चीज़ की ज़रूरत पड़ेगी।”

PART 2

अगली सुबह हरिशंकर रजाई लेकर पुरानी बस्ती की दर्जिन कमला मौसी के पास पहुँचे, जो सरोज की 35 साल पुरानी सहेली थी।

रजाई देखते ही कमला मौसी के होंठ काँप गए।

“उसने सच में जला दी?”

हरिशंकर सुन्न रह गए।

“तुम जानती थीं?”

कमला मौसी ने दुकान का शटर आधा गिरा दिया। फिर उसने बीच वाले मोटे सितारे की सिलाई धीरे-धीरे खोली। अंदर से प्लास्टिक में बंद कागज़ निकले—जमीन के कागज़, बैंक दस्तावेज़, एक ट्रस्ट डीड, और हर पन्ने पर लिखा था: आरव आर्यन मेहरा।

सरोज ने 30 साल तक अपनी छोटी-छोटी बचत से जयपुर-अजमेर हाईवे के पास जमीन खरीदी थी। अब वहाँ नया औद्योगिक कॉरिडोर बनने वाला था। कीमत लगभग 22 करोड़ तक पहुँच चुकी थी।

एक लिफाफे में आरव के नाम पत्र था।

“अगर यह रजाई तुझ तक जली हुई पहुँची है, तो समझना बेटा, पैसे से बड़ा खतरा वह आदमी है जो प्यार को बेकार समझता है।”

हरिशंकर की आँखों से आँसू गिरने लगे।

तभी वकील माया सूद का फोन आया।

“हरिशंकर जी, तुरंत सावधान हो जाइए। आर्यन आज रात आरव को दुबई ले जाने की टिकट बुक कर चुका है।”

PART 3

हरिशंकर को लगा जैसे कमरे की हवा अचानक पत्थर बन गई हो। पट्टियों के नीचे हाथ जल रहे थे, मगर उस दर्द से बड़ा डर उनके सीने में फैल चुका था। आरव, जो उस रात रजाई के लिए रो रहा था, शायद कुछ घंटों बाद देश से बाहर ले जाया जाता। उस बच्चे को, जिसे अपनी दादी की गोद की आखिरी गर्माहट तक ठीक से याद नहीं थी, उसके पिता अपनी लालच की दीवारों के पीछे बंद करने वाला था।

वकील माया सूद ने कहा, “आप अभी जयपुर से दिल्ली आइए। मूल कागज़ साथ रखिए। रजाई भी। अदालत को सिर्फ संपत्ति नहीं दिखानी है, यह भी दिखाना है कि बच्चा भावनात्मक खतरे में है।”

हरिशंकर ने लोहे के पुराने संदूक से सरोज की तस्वीर निकाली। उसमें वह हल्की पीली साड़ी में मुस्कुरा रही थी। बीमारी से पहले की तस्वीर थी। उसकी आँखों में वही चतुर शांति थी, जैसे वह सब पहले से जानती हो।

“सरोज,” हरिशंकर ने धीमे से कहा, “तूने अपने पोते के लिए आसमान सी दिया था। अब मैं उसे किसी के हाथ से गिरने नहीं दूँगा।”

माया सूद ने उसी दिन निजी जाँचकर्ता नदीम कुरैशी को लगाया। नदीम पहले दिल्ली पुलिस में था, फिर पारिवारिक मामलों और आर्थिक धोखाधड़ी की जाँच करता था। 48 घंटे में उसने आर्यन की चमकदार जिंदगी के नीचे की दरारें खोल दीं।

गुरुग्राम की क्लिनिक पर भारी कर्ज था। 3 बैंक नोटिस भेज चुके थे। एक मरीज के परिवार ने लापरवाही का केस डाल रखा था। आर्यन ने अपनी पत्नी रिया से छिपाकर एक फार्मा कंपनी की प्रतिनिधि तनिषा के साथ गोवा और दुबई की टिकटें बुक की थीं। तीसरी टिकट आरव के नाम पर थी।

सबसे खतरनाक चीज़ एक चैट थी।

आर्यन ने तनिषा को लिखा था, “माँ ने कुछ बड़ा छोड़ा है। बूढ़ा आदमी छिपा रहा है। अगर आरव मेरे साथ रहेगा तो सब मेरे कंट्रोल में आ जाएगा।”

तनिषा ने जवाब दिया था, “बच्चे को बाहर ले जाओ। एक बार दुबई पहुँच गए तो बूढ़ा कुछ नहीं कर पाएगा।”

हरिशंकर देर तक मोबाइल स्क्रीन को देखते रहे। उन्हें अपना बेटा याद आया—वही आर्यन जो बचपन में बारिश में भीगकर घर आता था और सरोज उसके बाल तौलिए से रगड़ते हुए कहती थी, “मेरा बेटा बड़ा होकर लोगों का दर्द दूर करेगा।” वह सचमुच डॉक्टर बना, पर शायद उसने दूसरों के चेहरे सुंदर करते-करते अपना दिल बदसूरत होने दिया।

माया सूद ने तुरंत परिवार अदालत और बाल कल्याण समिति में अर्ज़ी डाली। साथ में ट्रस्ट डीड, जमीन के कागज़, सरोज का पत्र, फ्लाइट टिकट, चैट और स्कूल रिपोर्ट लगाई गई।

स्कूल रिपोर्ट ने हरिशंकर का दिल तोड़ दिया।

आरव की क्लास टीचर ने लिखा था कि बच्चा अक्सर छुट्टी के बाद देर तक स्कूल में बैठना चाहता है। तेज आवाज़ सुनकर चौंक जाता है। चित्र बनाने पर पहले पूछता है, “गलत हुआ तो फाड़ेंगे तो नहीं?” एक दिन उसने कहा था, “पापा कहते हैं रोने वाले बच्चे कमजोर होते हैं। दादी की चीज़ों से लगाव रखना भी कमजोरी है।”

उस रात हरिशंकर ने आरव को फोन किया। घर में शायद किसी ने उसे चुपके से मोबाइल दिया था। बच्चे की आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी।

“दादू, रजाई बची है?”

“हाँ बेटा, बची है।”

“बहुत जल गई?”

“थोड़ी। लेकिन अभी भी सारे सितारे साथ हैं।”

आरव कुछ देर चुप रहा।

“मैं भी बच जाऊँगा न?”

हरिशंकर की साँस अटक गई।

“हाँ, मेरे बच्चे। तू भी बचेगा। मैं आ रहा हूँ।”

अगले दिन दिल्ली की परिवार अदालत में सुनवाई थी। आर्यन पहले से वहाँ था। गहरे नीले सूट में, बंधी हुई टाई, नपे-तुले दुख का चेहरा। रिया उसके साथ बैठी थी, जैसे वह किसी मेडिकल कॉन्फ्रेंस में आई हो।

आर्यन की वकील ने कहा, “माननीय न्यायाधीश, हरिशंकर मेहरा उम्रदराज हैं। हाल ही में उन्होंने पार्टी में आग में हाथ डालकर खुद को घायल किया। उनका व्यवहार अस्थिर है। वे बच्चे पर मृत दादी की यादों का भावनात्मक दबाव बना रहे हैं। मेरे मुवक्किल सिर्फ अपने पिता और अपने पुत्र की सुरक्षा चाहते हैं।”

हरिशंकर ने सिर झुका लिया। एक पल को उन्हें सचमुच लगा, अदालत में शब्द आग से भी ज्यादा जलाते हैं। जिस रजाई को बचाने के लिए उन्होंने हाथ जलाए थे, उसी को पागलपन का सबूत बनाया जा रहा था।

माया सूद खड़ी हुईं।

“माननीय न्यायालय, यह मामला बुज़ुर्ग पिता की सनक का नहीं, एक बच्चे की सुरक्षा और उसकी संपत्ति पर नियंत्रण पाने की कोशिश का है।”

उन्होंने सबसे पहले रजाई अदालत में रखी। जली हुई किनारी, काले पड़े सितारे, बीच की खुली सिलाई। फिर सरोज का पत्र पढ़ा गया।

अदालत में सन्नाटा फैल गया।

जब यह बताया गया कि सरोज ने 30 साल की बचत से जमीनें खरीदीं, और ट्रस्ट में स्पष्ट लिखा था कि आरव 25 साल की उम्र से पहले संपत्ति नहीं बेच सकेगा, और तब तक हरिशंकर प्रशासक रहेंगे, तो आर्यन का चेहरा पहली बार बदल गया।

“यह झूठ है,” वह बोल पड़ा। “मेरी माँ के पास इतना पैसा कभी नहीं था।”

माया ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि आपकी माँ ने पैसा दिखाने के लिए नहीं, बचाने के लिए कमाया था। आपने महंगे घर खरीदे। उन्होंने जमीन खरीदी। आपने अपना नाम छपवाया। उन्होंने पोते का भविष्य छिपाकर सी दिया।”

फिर नदीम ने फ्लाइट टिकट और चैट पेश की।

आर्यन की वकील ने विरोध किया, पर अदालत ने दस्तावेज़ देखे। आर्यन की गर्दन पर पसीना चमकने लगा।

माया ने पूछा, “आप आज रात दुबई क्यों जा रहे थे?”

आर्यन ने कहा, “छुट्टी पर।”

“बिना अदालत को बताए बच्चे को विदेश ले जाना छुट्टी नहीं, हटाने की कोशिश कहलाती है।”

रिया ने धीमे से कहा, “आरव को थोड़ा माहौल बदलना था।”

जज ने पहली बार सीधे पूछा, “बच्चे से पूछा गया था?”

कोई जवाब नहीं आया।

फिर स्कूल काउंसलर की रिपोर्ट पढ़ी गई। उसमें लिखा था कि आरव पिता के सामने बोलने से डरता है, अपनी गलतियों पर जरूरत से ज्यादा माफी माँगता है, और दादी से जुड़ी चीज़ों को छिपाकर रखता है क्योंकि घर में उन्हें “गंदी भावुकता” कहा जाता है।

माया ने एक वीडियो भी चलाया। वह पार्टी से 2 दिन पहले का था। कोठी के ड्रॉइंग रूम में आरव अपनी कॉपी लेकर पिता के पास खड़ा था।

“पापा, मैंने दादी वाला तारा बनाया है।”

आर्यन ने बिना ध्यान से देखे कहा, “ये तारा है? यह तो दाग जैसा लग रहा है। तुम्हें हर समय वही पुरानी औरत याद रहती है? जाओ, नया बनाओ। ढंग का।”

बच्चा कॉपी लेकर पीछे हटता है। फिर जब आर्यन कमरे से बाहर जाता है, वह फटी हुई पन्नी को सीधा करता है, बैग में रखता है, और उसे ऐसे सहलाता है जैसे किसी घायल चिड़िया को छू रहा हो।

हरिशंकर की आँखें भर आईं।

जज ने लंबी चुप्पी के बाद कहा, “यह अदालत मानती है कि बच्चे के भावनात्मक हित, संपत्ति की सुरक्षा और संभावित विदेश ले जाए जाने के खतरे को देखते हुए तत्काल अंतरिम आदेश आवश्यक है। आरव मेहरा की अस्थायी अभिरक्षा हरिशंकर मेहरा को दी जाती है। बच्चे को बिना न्यायालय की अनुमति देश से बाहर नहीं ले जाया जाएगा। पिता आर्यन मेहरा की आर्थिक और अभिभावकीय भूमिका की जाँच होगी। स्कूल, काउंसलर और बाल कल्याण अधिकारी विस्तृत रिपोर्ट देंगे।”

आर्यन कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

“वह मेरा बेटा है!”

जज ने चश्मा उतारकर उसे देखा।

“बेटा अधिकार नहीं होता, जिम्मेदारी होता है। और जिम्मेदारी जलती आग में नहीं फेंकी जाती।”

दोपहर बाद बाल कल्याण अधिकारी आरव को अदालत परिसर में लेकर आई। उसकी यूनिफॉर्म साफ थी, जूते चमक रहे थे, लेकिन चेहरा ऐसा था जैसे कई रातों से ठीक से सोया न हो। उसकी बाँहों में एक छोटा कपड़े का हाथी था।

हरिशंकर ने घुटनों के दर्द के बावजूद नीचे बैठकर बाँहें फैला दीं।

आरव भागकर उनसे लिपट गया।

“दादू, मैं आपके साथ चलूँगा?”

“हाँ बेटा। जयपुर वाले घर में। जहाँ तेरी दादी सिलाई करती थीं।”

“रजाई भी होगी?”

“तेरे बिस्तर पर।”

“और पापा?”

हरिशंकर ने बच्चे के सिर पर हाथ रखा।

“पापा को अब सीखना पड़ेगा कि टूटे हुए दिल कैसे जोड़े जाते हैं।”

जयपुर की पुरानी हवेली जैसी छोटी-सी घर में लौटते समय आरव गाड़ी की खिड़की से बाहर देखता रहा। दिल्ली की ऊँची इमारतें पीछे छूटती गईं। फिर हाईवे आया। फिर सड़क किनारे चाय की दुकानें, सरसों के खेत, ऊँटगाड़ी, मंदिर की घंटियों की दूर से आती आवाज़।

घर पहुँचकर हरिशंकर उसे उस कमरे में ले गए जहाँ सरोज सिलाई करती थी। दीवार पर अभी भी रंगीन धागों की रीलें लगी थीं। एक कोने में पुरानी सिलाई मशीन थी। मेज पर छोटा दीपक रखा था। खिड़की के पास हरिशंकर ने नया बिस्तर लगाया था।

उस पर वही रजाई बिछी थी।

आरव धीरे-धीरे उसके पास गया। उसने जले हुए सितारों को उंगलियों से छुआ।

“दादी नाराज़ होंगी कि यह जल गई?”

हरिशंकर ने सिर हिलाया।

“नहीं। मुझे लगता है, वह खुश होंगी कि यह बच गई।”

“मेरी तरह?”

हरिशंकर के गले में शब्द अटक गए।

“हाँ बेटा। बिल्कुल तेरी तरह।”

अगले कुछ महीने आसान नहीं थे। आरव रात में अचानक उठ जाता। कभी कहता कि उसे जलने की गंध आ रही है। कभी अपना चित्र फाड़कर खुद ही कूड़ेदान में डाल देता, फिर रोते हुए निकालता। हरिशंकर ने उसके लिए बाल मनोवैज्ञानिक की मदद ली। धीरे-धीरे बच्चा सीखने लगा कि गलती करने पर घर नहीं टूटता, दूध गिराने पर किसी का प्यार कम नहीं होता, और दादी को याद करना कमजोरी नहीं, जड़ें होती हैं।

हरिशंकर ने फ्रिज पर आरव के सारे चित्र चिपकाने शुरू किए। एक चित्र में दादू के 4 हाथ थे। दूसरे में दादी आसमान में बहुत बड़ी बनी थीं। तीसरे में नीली रजाई के ऊपर 25 सितारे थे—कुछ सफेद, कुछ काले।

“ये काले क्यों?” हरिशंकर ने पूछा।

आरव ने कहा, “क्योंकि वे जले थे, लेकिन भागे नहीं।”

आर्यन पर बच्चे को विदेश ले जाने की कोशिश, झूठे मेडिकल प्रमाणपत्र बनवाने और ट्रस्ट संपत्ति पर अनुचित नियंत्रण पाने के प्रयास की जाँच शुरू हुई। उसकी क्लिनिक पर मीडिया का दबाव बढ़ा। जिन लोगों ने कभी उसकी मुस्कान पर भरोसा किया था, वे अब उसके चरित्र पर सवाल पूछने लगे।

रिया ने शुरुआत में खुद को अलग दिखाने की कोशिश की। उसने कहा कि उसे दस्तावेज़ों की जानकारी नहीं थी। मगर बाल कल्याण अधिकारी के सामने उसकी एक बात ने सब साफ कर दिया।

“आरव बहुत संवेदनशील है। बोर्डिंग स्कूल भेज देंगे तो सबको राहत मिलेगी।”

रिपोर्ट में लिखा गया कि माँ भी बच्चे की भावनात्मक ज़रूरतों को प्राथमिकता नहीं देती। अदालत ने मुलाकातें निगरानी में कर दीं।

एक दिन आर्यन का पत्र आया। लिफाफे पर गुरुग्राम के एक मनोचिकित्सा केंद्र का पता था।

“पापा, मुझे नहीं पता आप मुझे कभी माफ करेंगे या नहीं। मैंने माँ के हाथों की आखिरी चीज़ जला दी। मैंने अपने बेटे को प्यार नहीं, अपनी संपत्ति समझा। मुझे लगा सफल होना मतलब पुराने रिश्तों से ऊपर उठ जाना है। अब समझ रहा हूँ कि मैं उसी आदमी में बदल गया जिससे माँ डरती थीं।”

हरिशंकर ने पत्र 3 बार पढ़ा। उन्हें नहीं पता था यह पछतावा था या अदालत का डर। उन्होंने उसे फाड़ा नहीं। आरव के लिए दराज में रख दिया। कुछ चीज़ों को तुरंत माफ नहीं किया जाता, पर सबूत की तरह संभालकर रखा जाता है, ताकि भविष्य सच से भाग न सके।

सरोज के ट्रस्ट से आई पहली आय का एक हिस्सा अदालत की अनुमति से उन बच्चों की सहायता के लिए दान किया गया जो घरों में अपमान और डर के बीच जीते थे। आरव ने उस पत्र पर अपना नाम लिखा। अक्षर टेढ़े थे, पर हाथ नहीं काँपा।

हरिशंकर ने उसे बताया, “तेरी दादी ने यह जमीन इसलिए नहीं बचाई थी कि तू अपने पिता जैसा अमीर बने। उसने यह इसलिए बचाई थी कि तू कभी किसी ऐसे आदमी का कैदी न बने जो तुझे प्यार करने के नाम पर तोड़ता रहे।”

एक शाम आरव आँगन में लकड़ी की छोटी तख्ती रगड़ रहा था। हरिशंकर उसे खिलौना अलमारी बनाना सिखा रहे थे।

“दादू?”

“हाँ बेटा?”

“पापा ने रजाई क्यों जलाई?”

हरिशंकर ने औज़ार नीचे रख दिया।

“क्योंकि उन्हें लगा जो महंगा नहीं दिखता, उसकी कोई कीमत नहीं होती।”

“अब उन्हें पता चलेगा?”

“शायद। कभी-कभी इंसान को अपना घर जलने से पहले आग की गर्मी समझ नहीं आती।”

आरव ने देर तक सोचा।

“मुझे तो पहले से पता है।”

“क्या?”

“जो कोई चीज़ प्यार से बनाता है, वह सबसे महंगी होती है।”

उस रात हरिशंकर ने आरव को उसी रजाई से ढक दिया। सफेद सितारे उसके चेहरे के चारों तरफ चमक रहे थे। जले हुए सितारे भी वहीं थे, काले निशानों के साथ, मगर किसी ने उन्हें काटकर हटाया नहीं था।

आरव ने पूछा, “दादू, यह मेरी सबसे कीमती चीज़ है, पता है क्यों?”

हरिशंकर ने हल्की मुस्कान से कहा, “क्योंकि इसमें दादी की जमीनों के कागज़ छिपे थे?”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं। क्योंकि दादी ने इसे मेरे बारे में सोचकर बनाया। और आपने इसे आग से निकाला।”

हरिशंकर कुछ नहीं बोल पाए।

बच्चा कुछ ही देर में सो गया। उसकी साँसें शांत थीं। वह पहली बार कई महीनों बाद बिना डर के सो रहा था।

हरिशंकर दरवाज़े पर खड़े रहे। सामने बिस्तर पर एक पुरानी नीली रजाई थी—कुछ सितारे साफ, कुछ जले हुए, कुछ टेढ़े, कुछ मोटे। मगर सारे एक साथ सिले हुए थे।

ठीक वैसे ही जैसे एक परिवार, जो लगभग जल चुका था, पर पूरी तरह राख नहीं बना।

नीचे जाकर हरिशंकर ने सरोज की तस्वीर के सामने दीपक जलाया। अपनी पट्टी बंधी उंगलियाँ तस्वीर के फ्रेम पर रखीं।

“सरोज,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा, “मैंने वादा निभाया। हमारा आरव अब डरकर नहीं सोता।”

बाहर जयपुर की रात शांत थी। दूर कहीं मंदिर की घंटी बजी। ऊपर कमरे में एक बच्चा अपनी दादी के सिले आसमान के नीचे सो रहा था।

और उस छोटे-से घर में, जहाँ न संगमरमर था, न शैंपेन, न 60 मेहमानों की तालियाँ, दुनिया की सबसे अमीर चीज़ एक बच्चे के बिस्तर पर रखी थी—एक पुरानी नीली रजाई, जिसमें सितारे, राख, जमीनों के कागज़ और एक दादी का ऐसा प्यार छिपा था, जो आग में जलकर भी अपने पोते की आज़ादी बचा गया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.