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18 महीने बाद पति घर लौटा तो 9 महीने की गर्भवती पत्नी ताबूत में पड़ी थी, मां ने ठंडे स्वर में कहा, “वह नहीं बची”, लेकिन उसने रोने के बजाय घड़ी की रिकॉर्डिंग चालू की, और तभी सफेद कपड़े के नीचे ऐसी हलचल हुई कि पूरे परिवार का छिपा हुआ पाप खुलने वाला था।

PART 1

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जब आरव मेहरा 18 महीने बाद दुबई से जयपुर लौटा, तो अपनी 9 महीने की गर्भवती पत्नी को गले लगाने के बजाय उसने अपने ही पुश्तैनी हवेली के बैठकखाने में एक सफेद कफन से ढका ताबूत रखा देखा।

दरवाजे पर उसके हाथ से सूटकेस लगभग छूट गया। पूरे कमरे में मोगरे और सफेद गेंदे की इतनी तेज गंध भरी थी कि उसका दम घुटने लगा। हवेली की दीवारों पर पीतल के पुराने दीये जल रहे थे, पर्दे खींच दिए गए थे, और बीचोंबीच वही जगह जहां काव्या उसे देखकर हंसते हुए अपना बड़ा-सा पेट सहलाने वाली थी, वहां लकड़ी का ताबूत 2 काले कपड़ों से ढकी मेजों पर रखा था।

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उसकी मां, शारदा मेहरा, ताबूत के पास ऐसे खड़ी थीं जैसे किसी कारोबारी बैठक का फैसला सुना रही हों। काली बनारसी साड़ी, माथे पर छोटी-सी बिंदी, बालों का कसा हुआ जूड़ा, आंखों में एक भी आंसू नहीं।

“काव्या नहीं बची,” उन्होंने सपाट आवाज में कहा। “बच्चा भी नहीं।”

आरव की सांस जैसे सीने में अटक गई।

“कौन-सा बच्चा? कौन-सी मौत?” उसकी आवाज फट गई। “कल रात ही तो उसने वीडियो कॉल पर कहा था कि बच्चा मेरे लौटने का इंतजार कर रहा है।”

पीछे से उसके छोटे भाई निखिल की धीमी हंसी सुनाई दी। वह राजस्थानी झरोखे के पास खड़ा महंगी शराब का गिलास पकड़े हुए था।

“भैया, अब ड्रामा मत करो,” निखिल बोला। “तुम दुबई में थे। यहां जो होना था, हमने संभाल लिया।”

आरव की आंखें लाल हो गईं। काव्या गरीब घर की लड़की नहीं थी, पर मेहरा खानदान के हिसाब से वह “बाहर की” थी। लखनऊ में समाजसेवा करती थी, झुग्गियों की औरतों के लिए काम करती थी, और दहेज के नाम पर 1 रुपया भी न लाने के बावजूद आरव ने उसी से शादी की थी। शारदा ने कभी उसे बहू नहीं माना। पर असली आग तब लगी थी जब आरव के दादाजी ने मरने से पहले हवेली, होटल कारोबार और मेहरा ट्रस्ट के बड़े हिस्से आरव और काव्या के नाम कर दिए थे।

आरव ताबूत के पास गया। सफेद कपड़े के नीचे काव्या का चेहरा पीला था, होंठ सूखे हुए, माथे के पास हल्का नीला निशान। वह इतनी शांत नहीं सोती थी। वह नींद में भी भौंहें सिकोड़ती थी, जैसे दुनिया की किसी औरत का दुख उसके सपने तक पीछा कर रहा हो।

“इसे किसने तैयार किया?” आरव ने कांपते हुए पूछा।

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शारदा चुप रहीं।

आरव ने कफन हटाने को हाथ बढ़ाया तो निखिल चीखा, “छुओ मत उसे!”

तभी काव्या के पेट पर रखा सफेद कपड़ा हिला।

एक बार।

आरव जम गया।

फिर 2 बार, जैसे भीतर से किसी ने जोर से लात मारी हो।

आरव ने कफन झटके से खींच दिया।

“एम्बुलेंस बुलाओ!” वह चिल्लाया। “अभी!”

शारदा ने उसका हाथ पकड़ लिया। “तुम सदमे में हो, आरव। दुख में आदमी भ्रम देखता है।”

आरव ने उनका हाथ झटक दिया और काव्या की गर्दन पर उंगलियां रखीं। बहुत कमजोर, टूटी हुई, मगर जिंदा धड़कन उसके हाथों के नीचे कांप रही थी।

“ये जिंदा है,” वह गरजा।

कमरे में खड़े रिश्तेदारों के चेहरे सफेद पड़ गए। निखिल दरवाजे की तरफ बढ़ा, पर आरव ने अपनी स्मार्टवॉच पर रिकॉर्डिंग चालू कर दी। दुबई में रहते हुए वह महीनों से मेहरा होटल्स के खातों में गड़बड़ी देख रहा था। शेल कंपनियां, नकली बिल, निखिल के नाम पर छिपे कर्ज, और शारदा के हस्ताक्षर। उसे सबूत चाहिए था।

अब सबूत ताबूत में सांस ले रहा था।

“तुम हमारे खानदान की इज्जत मिट्टी में मिला दोगे,” शारदा फुफकार उठीं।

आरव ने काव्या को बहुत सावधानी से बाहों में उठाया। उसका भारी पेट उसके सीने से लगा, और उसी क्षण बच्चे ने फिर एक जोरदार हरकत की।

आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

“इज्जत?” उसने मां को देखा। “आपने मेरी पत्नी को जिंदा दफनाने की कोशिश की है।”

उसी पल हवेली के बाहर एम्बुलेंस की सायरन गूंजी, और शारदा मेहरा के चेहरे पर पहली बार डर की रेखा उभरी।

PART 2

सवाई मानसिंह अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में काव्या को सीधे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। आरव दरवाजे के बाहर खड़ा था, हाथों पर अब भी काव्या के चेहरे का अंतिम संस्कार वाला मेकअप लगा था। डॉक्टर ने बस इतना कहा, “जहर नहीं तो भारी सिडेटिव जरूर है। मां और बच्चे दोनों खतरे में हैं।”

रात 11:27 पर एक नर्स बाहर आई।

“बेटा जिंदा है,” उसने थकी आवाज में कहा। “बहुत कमजोर है, पर लड़ रहा है।”

आरव वहीं कुर्सी पर बैठते-बैठते टूट गया। 18 महीने की दूरी, हजारों अधूरे फोन, काव्या की हंसी, उसके हाथ से चुने हुए बच्चे के छोटे कपड़े—सब एक साथ उसकी छाती में फट पड़े।

पर काव्या बेहोश रही।

तभी शारदा, निखिल और परिवार के पुराने वकील महेंद्र खन्ना अस्पताल पहुंचे। खन्ना ने एक फाइल मेज पर रखी।

“अगर काव्या की मृत्यु हो जाती है,” उसने धीमे स्वर में कहा, “तो उसके हिस्से की संपत्ति अस्थायी रूप से आपकी मां के नियंत्रण में जाएगी। यहां आपके हस्ताक्षर चाहिए।”

आरव ने कागज देखा। आखिरी पन्ने पर उसके नकली हस्ताक्षर थे।

तभी शारदा बोलीं, “समझदार बनो। वह औरत अब नहीं उठेगी।”

आरव की घड़ी अब भी रिकॉर्ड कर रही थी।

और उसी क्षण आईसीयू के अंदर काव्या की उंगलियां हिलीं।

PART 3

आरव दरवाजा धकेलकर भीतर भागा। काव्या की पलकों में हल्की कंपकंपी थी। चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क था, होंठ फटे हुए थे, माथे के पास वही नीला निशान अब साफ दिखाई दे रहा था। वह जैसे किसी गहरी, काली सुरंग से वापस खींची जा रही थी।

“काव्या,” आरव ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मैं आ गया हूं।”

उसकी आंखें धीरे-धीरे खुलीं। पहले डर आया, फिर पहचान, फिर ऐसा दर्द जैसे किसी ने उसके सीने में दबे तूफान को खोल दिया हो।

“आरव…” उसकी आवाज टूटी हुई थी। “तुम जिंदा हो?”

आरव का खून खौल उठा, पर उसने आवाज को मुलायम रखा। “मैं जिंदा हूं। हमारा बेटा भी जिंदा है।”

काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

“मांजी ने फोन किया था,” वह बमुश्किल बोली। “उन्होंने कहा दुबई में तुम्हारा एक्सीडेंट हो गया। कहा कि कंपनी वाले बात छिपा रहे हैं। उन्होंने मुझे हवेली बुलाया। मैं पागलों की तरह टैक्सी लेकर पहुंची। मुझे लगा तुम्हें आखिरी बार देखना है।”

आरव ने उसकी उंगलियां और कसकर पकड़ लीं।

“फिर?”

“हवेली में सब अजीब था। कोई रो नहीं रहा था। निखिल हंस रहा था। मांजी ने मुझे पानी दिया। मैंने नहीं पिया। फिर एक औरत आई, नर्स जैसी। उसने कहा मेरी तबीयत खराब लग रही है। मैंने मना किया, पर निखिल ने पीछे से मेरे कंधे पकड़ लिए। उस औरत ने मुझे इंजेक्शन लगाया।”

काव्या की सांस तेज हो गई। मशीन ने चेतावनी की हल्की आवाज निकाली।

आरव ने उसके माथे पर हाथ रखा। “आराम से। मैं हूं।”

“मैं सब सुन रही थी,” काव्या रोते हुए बोली। “शरीर हिल नहीं रहा था, पर आवाजें आ रही थीं। निखिल कह रहा था, ‘पेट बड़ी मुसीबत है।’ मांजी बोलीं, ‘अगर बच्चा सांस ही नहीं लेगा, तो विरासत की दिक्कत खत्म।’ खन्ना साहब कह रहे थे कि ताबूत देखकर तुम टूट जाओगे और सब कागजों पर साइन कर दोगे।”

आरव की आंखें पत्थर जैसी हो गईं।

“उन्होंने बच्चे को भी मारना चाहा?”

काव्या ने आंखें बंद कर लीं। “दादाजी ने ट्रस्ट में लिखा था कि अगर मुझे कुछ हुआ तो बच्चे का हिस्सा सुरक्षित रहेगा। अगर बच्चा मृत पैदा घोषित हो जाए, तो सब अस्थायी नियंत्रण तुम्हारी मां को मिलता। वे कह रही थीं कि मैंने उनका नाम, उनका पैसा, उनका बेटा चुरा लिया।”

आरव ने उसके हाथ पर होंठ रखे।

“तुमने कुछ नहीं चुराया,” वह बोला। “तुमने मुझे बचाया था। अब मेरी बारी है।”

उसी रात 2:40 पर आरव ने अपनी वित्तीय अपराध विशेषज्ञ वकील समीरा सिद्दीकी को बुलाया। वह महीनों से उसके साथ मेहरा होटल्स के खातों की जांच कर रही थी। समीरा जयपुर पहुंचते ही सीधे अस्पताल आई। उसके साथ 2 पुलिस अधिकारी, एक मजिस्ट्रेट के आदेश की प्रति और खातों की प्राथमिक रिपोर्ट थी।

“यह अब सिर्फ धोखाधड़ी नहीं है,” समीरा ने कहा। “यह हत्या की कोशिश, अपहरण, जालसाजी, आपराधिक साजिश और संपत्ति हड़पने का मामला है।”

आरव ने अपना फोन खोला। 4 महीने पहले उसने हवेली में सुरक्षा के नाम पर धुएं के सेंसरों में बैकअप कैमरे लगवाए थे। शारदा ने उस शाम मुख्य कैमरे बंद करवा दिए थे, मगर उन्हें छिपे सिस्टम का पता नहीं था।

वीडियो खुला।

शाम 7:08 पर काव्या टैक्सी से उतरती दिखी। एक हाथ पेट पर, दूसरे हाथ में पर्स। शारदा ने उसे गले लगाया, पर चेहरे पर स्नेह नहीं, गणना थी। 7:22 पर सफेद कोट वाली महिला छोटे कमरे से निकली। 7:31 पर काव्या सीढ़ी के पास लड़खड़ाई। निखिल ने उसे संभालने के बजाय जोर से पकड़ लिया। 7:39 पर इंजेक्शन लगा। 8:05 पर वह बेहोश हालत में सोफे पर पड़ी थी। खन्ना फाइल खोल रहा था। निखिल उसका अंगूठा टैबलेट पर लगा रहा था। शारदा दरवाजे के पास खड़ी थी और किसी को फोन पर कह रही थी, “ताबूत समय पर पहुंचना चाहिए। सुबह 6 बजे से पहले सब खत्म।”

समीरा ने वीडियो रोक दिया।

कमरे में कुछ पल के लिए सिर्फ मशीनों की आवाज थी।

“गिरफ्तारी अभी हो सकती है,” पुलिस अधिकारी ने कहा।

आरव ने कांच के उस कमरे की तरफ देखा जहां उसका नवजात बेटा नन्ही-सी इनक्यूबेटर में पड़ा था। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे हर सांस दुनिया से अपना हक मांग रही हो।

“वे अभी हवेली में हैं?” आरव ने पूछा।

समीरा ने सिर हिलाया। “हां। हमारे आदमी बाहर हैं। शायद वे समझ रहे हैं कि तुम टूट चुके हो।”

आरव ने धीरे से कहा, “तो उन्हें यही समझने दो।”

सुबह 4:15 पर आरव फिर मेहरा हवेली के दरवाजे पर खड़ा था। वही बैठक, वही फूल, वही ताबूत। फर्क सिर्फ इतना था कि ताबूत खाली था और अब वह खालीपन हर अपराधी का चेहरा दिखा रहा था।

निखिल ने शराब का गिलास उठाकर मुस्कुराया। “आ गए भैया? आखिर समझदारी आ गई?”

शारदा दादाजी की पुरानी कुर्सी पर बैठी थीं। वह कुर्सी, जिस पर उनके जीते जी कोई नहीं बैठ सकता था। उन्होंने पूछा भी नहीं कि काव्या कैसी है, बच्चा जिंदा है या नहीं। उन्होंने सिर्फ कहा, “कागज?”

आरव ने फाइल मेज पर रख दी।

खन्ना आगे बढ़ा, “बहुत अच्छा फैसला है।”

आरव ने फाइल पर हाथ रख दिया। “साइन करने से पहले बस एक बात साफ कर दो। काव्या कैसे मरी?”

शारदा ने बिना पलक झपकाए कहा, “प्रसव में खून बह गया। ऐसी बातें हो जाती हैं।”

“और बच्चा?”

“मरा हुआ पैदा हुआ।”

आरव ने निखिल की तरफ देखा। “कितने बजे?”

निखिल झुंझला गया। “रात में। क्या फर्क पड़ता है?”

आरव ने धीमे से कहा, “फर्क पड़ता है। अस्पताल के रिकॉर्ड के हिसाब से काव्या 10:48 पर जिंदा भर्ती हुई। हमारा बेटा 11:27 पर पैदा हुआ। और वह अभी भी सांस ले रहा है।”

निखिल का गिलास हाथ से छूटते-छूटते बचा। सफेद कोट वाली महिला, जो कमरे के कोने में बैठी थी, एकदम रोने लगी। खन्ना का चेहरा राख जैसा हो गया।

शारदा फिर भी स्थिर रहीं। “तुम्हें गलत बताया गया है।”

आरव ने अपनी घड़ी पर उंगली रखी। कमरे में शारदा की अपनी आवाज गूंज उठी—

“वह औरत अब नहीं उठेगी।”

फिर टीवी स्क्रीन अपने आप चालू हुई। धुएं के सेंसरों से रिकॉर्ड हुए वीडियो चलने लगे। काव्या का लड़खड़ाना, इंजेक्शन, नकली कागज, ताबूत का आदेश, निखिल का अंगूठा लगवाना, खन्ना का दस्तावेज रखना—हर दृश्य कमरे की दीवारों पर अपराध की तरह चमक उठा।

खन्ना चिल्लाया, “ये गैरकानूनी रिकॉर्डिंग है!”

दरवाजा खुला।

समीरा अंदर आईं। उनके पीछे पुलिस अधिकारी, एक महिला कॉन्स्टेबल, फोरेंसिक टीम और आर्थिक अपराध शाखा के 2 लोग थे।

“रिकॉर्डिंग घर के कानूनी मालिक ने सुरक्षा कारणों से अधिकृत की थी,” समीरा ने ठंडे स्वर में कहा। “और हत्या की कोशिश में गोपनीयता की ढाल नहीं चलती।”

शारदा उठीं। “यह मेरा घर है। बाहर निकलो सब।”

आरव ने कोट की जेब से एक कागज निकाला और उनके सामने रख दिया।

“अब नहीं।”

शारदा ने पढ़ा। उनके हाथ पहली बार कांपे। कोर्ट के आदेश से मेहरा हवेली, होटल खातों और ट्रस्ट की संपत्ति पर अस्थायी रोक लग चुकी थी। निखिल के छिपे खातों की जांच शुरू हो चुकी थी। दादाजी की वसीयत के अनुसार, बेटे के जन्म के बाद काव्या और आरव को ट्रस्ट की सुरक्षा का अधिकार मिल गया था। शारदा अब सिर्फ एक आरोपी थीं।

“तू अपनी मां के साथ ऐसा करेगा?” उन्होंने दांत भींचकर पूछा।

आरव की आवाज धीमी थी, पर हर शब्द चाकू जैसा साफ।

“मां? आपने मेरी पत्नी को ताबूत में बंद किया। मेरे बच्चे को जन्म से पहले मारने की कोशिश की।”

“वह लड़की हमारे घर की मालकिन बनने लायक नहीं थी!” शारदा चीखीं। “उसने तुझे हमसे छीन लिया। उसने हमारे कारोबार में नाक घुसाई। उसने नौकरों, किरायेदारों और उन झुग्गी वालों के लिए फंड रोके, जिनसे हमें कोई मतलब नहीं!”

कमरे में सन्नाटा जम गया। वह स्वीकारोक्ति थी।

सफेद कोट वाली महिला घुटनों पर बैठ गई। “मुझे पैसे दिए गए थे,” वह रोती रही। “मुझे कहा गया था बस बेहोश करना है। मुझे नहीं पता था कि वे उसे सुबह दफना देंगे।”

निखिल अचानक भागा, पर बरामदे तक नहीं पहुंच पाया। 2 पुलिसवालों ने उसे जमीन पर गिराकर हथकड़ी लगा दी। वह चिल्ला रहा था, “सब मां का प्लान था! मैंने कुछ नहीं किया!”

खन्ना ने अपना फोन निकालकर किसी बड़े वकील को कॉल करने की कोशिश की, पर फोन पुलिस ने ले लिया। उसकी आवाज कांप रही थी, “मैं सहयोग कर सकता हूं। मेरे पास खातों की जानकारी है।”

शारदा, सबके बीच, अब भी सिर ऊंचा किए खड़ी थीं। जैसे साम्राज्य टूट गया हो, मगर रानी को यकीन न हो कि ताज उतर चुका है।

“तू कमजोर है,” उन्होंने आरव से कहा। “अपने खून के खिलाफ एक औरत को चुन रहा है।”

आरव ने उनकी आंखों में देखा। उसमें न गाली थी, न बदला। बस एक थका हुआ सच था।

“नहीं,” उसने कहा। “मैं अपराध के खिलाफ अपना परिवार चुन रहा हूं।”

जब शारदा के हाथों में हथकड़ी लगी, तब हवेली की खिड़कियों से सुबह की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी। बाहर पड़ोसी अपने परदे हटाकर देख रहे थे। जो हवेली कभी मेहरा खानदान की शान कही जाती थी, वह उस सुबह एक अपराध स्थल बन चुकी थी।

शारदा सीढ़ियों से उतरते हुए चिल्लाईं, “काव्या ने तुझे बरबाद कर दिया! वह इस घर को खा जाएगी!”

आरव ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे लगा, बचपन से जो डर उसके भीतर बोया गया था, वह आज पहली बार जड़ से हिल रहा है। उसकी मां ने उसे कभी ताकत नहीं सिखाई थी। उन्होंने सिर्फ चुप रहना सिखाया था। आज उसने चुप्पी तोड़ दी थी।

अगले महीने आसान नहीं थे। काव्या अस्पताल से घर लौटी तो हर तेज आवाज पर कांप जाती। रात को अचानक उठकर पेट पकड़ लेती, फिर याद आता कि बच्चा अब पेट में नहीं, पास की पालने में सो रहा है। वह कई बार नन्हे विराज को सीने से लगाकर रोती, जैसे हर सांस गिन रही हो। आरव उसे देखता और समझता कि बच जाना भी कभी-कभी लंबी लड़ाई की शुरुआत होता है।

विराज, वह छोटा-सा बच्चा, जिसे दुनिया ने मृत घोषित करने की तैयारी कर ली थी, इनक्यूबेटर से बाहर आया तो उसकी उंगलियां इतनी पतली थीं कि आरव की उंगली पकड़ते ही वह रो पड़ा। काव्या ने कमजोर मुस्कान के साथ कहा, “देखो, यही था जिसने ताबूत में लात मारी थी।”

आरव ने बेटे के माथे को छुआ। “इसने हम सबको जगा दिया।”

मुकदमा बड़ा बना। अखबारों ने लिखा—जयपुर के मशहूर कारोबारी परिवार में जिंदा बहू को ताबूत में रखने की साजिश। टीवी चैनलों ने शारदा मेहरा की पुरानी तस्वीरें दिखाईं। कुछ लोग बोले कि बेटा मां के खिलाफ कैसे जा सकता है। कुछ ने कहा कि बहू ने न्याय पा लिया। काव्या ने टीवी बंद कर दिया।

“मेरी कहानी तमाशा नहीं है,” उसने शांत स्वर में कहा। “मेरी कहानी उन औरतों की है जिन्हें घर के नाम पर चुप करा दिया जाता है।”

आरव ने दुबई का काम छोड़ दिया। उसने मेहरा होटल्स का पूरा ऑडिट करवाया। निखिल के खातों से करोड़ों की हेराफेरी निकली। खन्ना ने अपने बचाव में बेल्जियम और सिंगापुर के छिपे खातों की जानकारी दे दी। शारदा ने लंबे समय तक कोई अपराध नहीं माना, पर वीडियो, मेडिकल रिपोर्ट, नर्स की गवाही और नकली हस्ताक्षरों ने उनकी चुप्पी बेकार कर दी।

सबसे बड़ा फैसला काव्या ने लिया।

“हवेली को बेचेंगे नहीं,” उसने कहा।

आरव हैरान रह गया। “तुम वहां वापस जाना चाहती हो? उसी कमरे में?”

काव्या ने विराज को गोद में उठाया। “नहीं। मैं वहां डर लेकर नहीं लौटना चाहती। मैं चाहती हूं कि वह जगह डर से मुक्त हो।”

कुछ महीनों बाद मेहरा हवेली का बैठकखाना बदल गया। जहां ताबूत रखा था, वहां अब औरतों के लिए परामर्श कक्ष बना। ऊपर के कमरों में उन गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए अस्थायी आश्रय बना जिन्हें अपने ही घरों से निकाला गया था। दीवारों पर सफेद फूलों की जगह रंगीन मधुबनी चित्र लगे। बरामदे में सुबह चाय बनती, बच्चों की हंसी गूंजती, और काव्या कभी-कभी उसी जगह खड़ी होकर लंबी सांस लेती जहां उसे मौत के लिए तैयार किया गया था।

एक दिन आरव ने पूछा, “तुम्हें दर्द नहीं होता?”

काव्या ने कहा, “होता है। पर अगर हम भागेंगे, तो वह कमरा हमेशा ताबूत रहेगा। अगर हम उसे किसी और की जिंदगी बचाने में लगा दें, तो शायद उसका अर्थ बदल जाएगा।”

विराज का 1वां जन्मदिन आया तो आरव और काव्या उसे लेकर पुष्कर गए। सुबह की ठंडी हवा में झील शांत थी। घाट पर आरती की घंटियां बज रही थीं। काव्या ने हल्की पीली साड़ी पहनी थी, सिर पर दुपट्टा, आंखों में थकान थी पर डर कम हो गया था। विराज उसकी गोद में बैठा पानी पर पड़ती रोशनी पकड़ने की कोशिश कर रहा था।

आरव ने जेब से एक छोटा कागज निकाला। वह काव्या का वह आखिरी संदेश था, जो उसे बाद में ईमेल में मिला था। काव्या ने साजिश से पहले शारदा के कमरे में छिपे खातों की तस्वीरें भेजी थीं और लिखा था—

“अगर मेरे साथ कुछ हो, तो सफेद कपड़ों में रोने वालों पर भरोसा मत करना।”

काव्या ने वह कागज देखा और उसकी आंखें भर आईं।

“तुम अब भी इसे रखते हो?”

आरव ने सिर हिलाया। “हर दिन।”

कुछ देर दोनों चुप रहे। झील के ऊपर सूरज धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था।

काव्या ने पूछा, “तुम उस ताबूत के बारे में सोचते हो?”

आरव ने विराज को देखा, जो अब उसकी उंगली कसकर पकड़े था।

“हर दिन,” उसने कहा।

काव्या ने धीमे से कहा, “मुझे कभी-कभी अब भी लकड़ी की गंध आती है। फूलों की भी। और फिर तुम्हारी आवाज याद आती है। तुम चिल्ला रहे थे कि मैं जिंदा हूं।”

आरव ने उसका हाथ थाम लिया। “वह ताबूत तुम्हारा अंत होना था।”

काव्या ने अपने बेटे को चूमते हुए झील की तरफ देखा। उसकी आवाज बहुत शांत थी।

“नहीं,” उसने कहा। “वह उनका अंत था।”

सूरज की रोशनी विराज के चेहरे पर पड़ी। वह बिना किसी डर के हंस पड़ा। उस हंसी में न अदालत थी, न हवेली, न ताबूत, न शारदा की चीखें। उसमें सिर्फ जीवन था—जिद्दी, नन्हा, चमकता हुआ जीवन।

आरव ने पहली बार महसूस किया कि वे पुराने जीवन में वापस नहीं लौटेंगे। वह जीवन मर चुका था। लेकिन उसके बाद जो बचा था, वह राख नहीं था। वह एक बच्चा था, जो मौत के अंधेरे में भी लात मारकर दुनिया से कह आया था—अभी नहीं।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.