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17 साल बाद टूटे तुलसी के गमले ने खोल दिया वह राज, जिसे पति ने अपराध की तरह छिपाया था; अस्पताल का ब्रेसलेट देखते ही पत्नी समझ गई— “जिस बच्ची को मृत कहा गया, वह जिंदा थी”

PART 1

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जब अनन्या शर्मा के हाथ से वह काला संगमरमर का तुलसी-गमला टूटकर फर्श पर बिखरा, तो मिट्टी के नीचे से उसकी 17 साल से दफन बेटी की जिंदा होने की निशानी निकल आई।

जयपुर के सी-स्कीम वाले फ्लैट में उस सुबह बस झाड़ू लग रही थी। बाहर हल्की सर्द हवा चल रही थी, मंदिरों की घंटियां दूर से सुनाई दे रही थीं, और घर के भीतर वही पुरानी चुप्पी थी जो राजीव शर्मा की मौजूदगी में दीवारों पर चढ़ जाती थी। राजीव चार्टर्ड अकाउंटेंट था, महंगे सूट पहनता था, धर्म-कर्म पर लंबे भाषण देता था, लेकिन पौधों से उसे हमेशा चिढ़ थी। वह कहता था, पौधे घर में नमी और कीड़े लाते हैं।

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फिर भी 3 दिन पहले वह खुद एक भारी तुलसी का गमला लेकर आया था। काले संगमरमर का, इतना भारी कि 2 आदमी उठाकर लाए। उसने गमले को पूजा वाले कोने में नहीं, बल्कि ड्रॉइंग रूम के सबसे अंधेरे हिस्से में रखवाया।

अनन्या ने पूछा था, “तुलसी को धूप चाहिए।”

राजीव ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। “इसे कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

उसकी आवाज में गुस्सा नहीं था, डर था। और अनन्या ने 20 साल की शादी में राजीव को झूठ बोलते, चीखते, नजरें चुराते देखा था, मगर डरते हुए पहली बार देखा था।

अनन्या 42 साल की थी, पर उसके भीतर एक हिस्सा 25 साल की उम्र पर ही अटका रह गया था। वही उम्र, जब उसने जयपुर के शांतिदेव मैटरनिटी हॉस्पिटल में बच्ची को जन्म दिया था। उसे बताया गया था कि बच्ची ने सांस नहीं ली। उसे बच्ची का चेहरा नहीं देखने दिया गया। राजीव ने सिरहाने बैठकर उसका हाथ दबाया था। सास सावित्री देवी ने कहा था, “कभी-कभी भगवान वही ले लेता है जिसे मां संभाल नहीं पाती।”

वह वाक्य अनन्या की हड्डियों में 17 साल से चुभा था।

उसने हर साल 18 अगस्त को एक छोटी-सी बिना नाम की कब्र पर फूल चढ़ाए थे। राजीव साथ जाता था, आंखें नम करता था, और कहता था, “अब आगे बढ़ो।”

उस दिन राजीव दिल्ली मीटिंग के लिए गया था। जाते-जाते उसने गमले की ओर उंगली उठाई। “इसे छूना मत। पानी भी मत देना।”

अनन्या ने पहली बार हल्की हंसी में कहा, “राजीव, यह बच्चा नहीं है।”

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उसका चेहरा पत्थर हो गया। “तुम्हारे हाथ लगते ही साधारण चीजें भी बर्बाद हो जाती हैं।”

अगले दिन झाड़ू का डंडा लकड़ी के स्टैंड से टकराया। गमला डगमगाया। अनन्या ने पकड़ने की कोशिश की, मगर वजन ने उसे घसीट लिया। संगमरमर फटकर बिखर गया। काली मिट्टी पूरे फर्श पर फैल गई।

मिट्टी हटाते समय उसकी उंगलियों से प्लास्टिक में लिपटा एक पैकेट टकराया। उसने कांपते हाथों से पैकेट खोला। भीतर पीला पड़ा अस्पताल का ब्रेसलेट था, एक छोटी चांदी की पायल, लाल धागे में बंधा माता रानी का लॉकेट, और एक पेन ड्राइव।

ब्रेसलेट पर लिखा था—अनन्या शर्मा, कमरा 207, कन्या, 3.180 किलो, 18 अगस्त।

उसकी सांस रुक गई।

पेन ड्राइव में एक वीडियो था। स्क्रीन पर सफेद बालों वाली बूढ़ी नर्स दिखी।

“अनन्या जी, अगर आप यह देख रही हैं, तो समझिए मैंने बहुत देर से सही, पाप का बोझ उतारने की कोशिश की है। मैं शांति देवी, शांतिदेव हॉस्पिटल की नाइट नर्स थी। आपकी बेटी मरी नहीं थी। वह रोई थी। डॉक्टर महाजन ने उसे आपके होश में आने से पहले बाहर भिजवा दिया। फाइल बदली गई। आपके पति राजीव और उनकी मां सब जानते थे। कागजों में लिखा गया कि आपने बच्ची छोड़ दी। आपने कुछ भी साइन नहीं किया था। बच्ची एक अमीर परिवार को दी गई। नाम शायद मेहरा था। मुझे लगता है उन्होंने उसे आर्या कहा।”

उसी पल राजीव का फोन आया।

“घर में सब ठीक है?” उसने पूछा।

अनन्या ने फर्श पर फैली मिट्टी देखी।

“हां।”

“गमला?”

उसने आंखें बंद कर लीं। “वहीं है।”

“फोटो भेजो। अभी।”

तभी अनन्या समझ गई—उसका पति 3 दिन से पौधा नहीं, अपराध की कब्र बचा रहा था।

PART 2

अनन्या ने टूटे गमले की मिट्टी साफ की, पास की नर्सरी से वैसा ही गमला खरीदकर पौधा उसमें रख दिया और दूर से फोटो भेज दी। राजीव ने लाल दिल वाला इमोजी भेजा। अनन्या को उल्टी आ गई।

वह सीधे अपनी सहेली फराह के बुटीक पहुंची। फराह ने उसका चेहरा देखा और दुकान का शटर आधा गिरा दिया।

अनन्या ने पैकेट उसके हाथ में रखा। “अगर मैं गायब हो जाऊं, अगर राजीव कहे कि मैं पागल हूं, तो यह एडवोकेट नंदिता मेनन को देना।”

फराह फुसफुसाई, “उसने क्या किया?”

अनन्या की आवाज टूट गई। “उसने मेरी बच्ची छीन ली।”

नंदिता मेनन ने उसी शाम वीडियो देखा। फिर पुराने रिकॉर्ड, जन्मतिथि और मेहरा नाम खोजा। जयपुर के मालवीय नगर में एक बड़ा उद्योगपति था—विक्रम मेहरा। उसकी पत्नी नीलिमा सामाजिक संस्थाओं में मशहूर थी। उनकी 17 साल की बेटी थी, आर्या मेहरा।

सोशल मीडिया पर आर्या की तस्वीर देखते ही अनन्या सुन्न हो गई। वही भूरी आंखें। दाईं कनपटी पर अर्धचंद्र जैसा जन्म-निशान।

2 दिन बाद निजी डीएनए जांच ने सच लिख दिया—99.9 प्रतिशत संभावना।

उसी रात राजीव दिल्ली से अचानक लौट आया। उसने गमले में हाथ डालकर पैकेट खोजा, फिर अनन्या के सामने दरवाजे पर खड़ा हो गया।

“किसी को तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं होगा,” वह गुर्राया।

अनन्या ने फोन स्पीकर पर लगाया। “नंदिता जी, राजीव मुझे घर से निकलने नहीं दे रहा।”

उधर से आवाज आई, “दरवाजे की तरफ बढ़िए। अब हॉस्पिटल की पुरानी फाइलें खुलेंगी।”

PART 3

राजीव का चेहरा पहली बार अपनी असली शक्ल में उतर आया। वह पति नहीं लग रहा था, वह उस अंधेरे कमरे का पहरेदार लग रहा था जहां किसी ने 17 साल तक एक मां की चीख बंद कर रखी थी।

“तुम समझती नहीं हो,” उसने दांत भींचकर कहा। “तुम जिस लड़की को ढूंढ़ रही हो, वह तुम्हारी जिंदगी में नहीं आना चाहती। उसके मां-बाप हैं। घर है। इज्जत है। तुम क्या दोगी उसे? रोती हुई औरत, टूटी शादी, और 17 साल पुराना पागलपन?”

अनन्या का हाथ अब नहीं कांप रहा था। “मैं उसे कुछ लेने नहीं जा रही। मैं उसे बस यह बताने जा रही हूं कि उसकी मां ने उसे कभी छोड़ा नहीं।”

राजीव हंसा। “मां? तुम? उस रात तुम आधी बेहोश थीं। डॉक्टर ने कहा था बच्ची कमजोर है, खर्चा लगेगा, जिंदगी भर इलाज चल सकता है। मेरी नौकरी डूब रही थी। मां ने कहा था ऐसी बच्ची घर का भाग्य खा जाएगी। मेहरा लोग बच्चा चाहते थे, पैसे देने को तैयार थे। हमने उसे बेहतर जिंदगी दी।”

“बेचा था,” अनन्या ने कहा।

राजीव चीखा, “बचाया था!”

सन्नाटा फैल गया। इतने सालों में पहली बार अपराध ने अपने लिए शब्द चुना था। अनन्या ने बैग उठाया। मूल सबूत फराह के पास थे, कॉपी नंदिता के पास। वह अब खाली हाथ नहीं थी।

राजीव दरवाजे से हटा, पर जाते-जाते बोला, “जब वह लड़की तुम्हें ठुकराएगी, तब याद रखना, खून से मां नहीं बनती।”

अनन्या पलटी। “और चोरी से पिता नहीं बना जाता।”

अगले दिन शिकायत दर्ज हुई। मेडिकल रिकॉर्ड में हेराफेरी, नवजात बच्ची की गैरकानूनी सुपुर्दगी, फर्जी सहमति, धोखाधड़ी, साजिश। शांतिदेव हॉस्पिटल अब एक बड़े हेल्थकेयर ग्रुप के हाथ में था, मगर अदालत के आदेश पर पुराने रिकॉर्ड खोलने पड़े।

पहले जो फाइल निकली, वह साफ-सुथरी थी। बहुत साफ। उसमें लिखा था कि अनन्या ने बच्ची को त्याग दिया था। नीचे एक हस्ताक्षर था जो उसके नाम जैसा दिखता था। लेकिन नंदिता ने समय देखा। उस वक्त अनन्या ऑपरेशन थिएटर में थी, बेहोश।

फिर अस्पताल के एक पुराने गोदाम से धूल भरी रजिस्टर बुक मिली। 18 अगस्त की तारीख पर लिखा था—“अनन्या शर्मा, कन्या, जीवित, 3.180 किलो।” उसके आगे काली स्याही से काटा गया निशान था।

शांति देवी को अदालत के सामने बयान देने के लिए बुलाया गया। वह बहुत कमजोर थी। ऑक्सीजन पाइप के साथ व्हीलचेयर पर आई। उसने कांपती आवाज में कहा, “बच्ची रो रही थी। मैंने खुद सुना था। मैडम ने ऑपरेशन से पहले कहा था कि लाल धागे वाला लॉकेट बच्ची के पास रखना। मैंने रखा। फिर डॉक्टर महाजन ने कहा—जो देखा है भूल जाओ। मुझे नौकरी से निकालने और जेल भेजने की धमकी दी गई।”

उसकी आंखों से पानी बह रहा था। “मैंने पाप किया। पर बच्ची मरी नहीं थी।”

फिर दूसरी नर्स मिली—कमला राठौड़। वह जोधपुर के पास अपने मायके में रहती थी। पहले उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन जब अनन्या ने चांदी की पायल उसकी हथेली पर रखी, कमला फूटकर रो पड़ी।

“मैंने उसे कपड़े में लपेटा था। बाहर गाड़ी खड़ी थी। सावित्री देवी खुद आई थीं। डॉक्टर महाजन ने कहा था यह परिवार का फैसला है। हमें बताया गया कि मां बच्ची नहीं चाहती।”

“क्या मैंने ऐसा कहा था?” अनन्या ने पूछा।

कमला ने सिर झुका लिया। “नहीं।”

जांच की आग फैलने लगी। डॉक्टर महाजन ने पहले सब नकारा, फिर बैंक लॉकर, पुराने फोन रिकॉर्ड और नकद लेन-देन सामने आए। सावित्री देवी ने कहा, “हमने जो किया, कुल की भलाई के लिए किया। उस समय अनन्या कमजोर थी। बच्ची भी कमजोर थी। मेहरा परिवार उसे राजकुमारी की तरह रख सकता था।”

अदालत में नंदिता ने पूछा, “तो आपने मां से पूछा क्यों नहीं?”

सावित्री देवी चुप रहीं।

“क्योंकि मां की सहमति जरूरी होती, और वह बच्ची कभी नहीं छोड़ती,” नंदिता ने कहा।

इस बीच मेहरा परिवार की दुनिया भी टूट गई। विक्रम मेहरा को जब पहली बार सच बताया गया, वह अपने ऑफिस में खड़ा रह गया, जैसे पैरों के नीचे से संगमरमर खिसक गया हो।

“हमें बताया गया था कि बच्ची की मां ने खुद त्याग किया है,” उसने कहा। “हमने एजेंसी, वकील, मेडिकल खर्च—सब दिया। पर अपहरण? नहीं… हमें यह नहीं बताया गया था।”

नीलिमा मेहरा ने फोन पर अनन्या से बात की। उसकी आवाज में डर, गुस्सा और मां का बिखरता हुआ अधिकार था।

“आप 17 साल बाद हमारी बेटी की जिंदगी में तूफान बनकर नहीं आ सकतीं।”

अनन्या ने धीमे कहा, “मुझे 17 साल तक बताया गया कि मेरी बेटी मर चुकी है।”

“मैंने उसे पाला है। बुखार में रातें काटी हैं। स्कूल के पहले दिन हाथ पकड़ा है। उसके हर डर में मैं थी।”

“और मैं खाली कब्र के सामने रोती रही।”

फोन पर लंबी चुप्पी रही। दोनों औरतें एक-दूसरे की दुश्मन नहीं थीं, पर एक ही अपराध ने दोनों को अलग-अलग तरह से लूटा था।

आर्या को सच एक रविवार शाम बताया गया। मेहरा हाउस के सफेद ड्रॉइंग रूम में, जहां दीवारों पर उसकी बचपन की तस्वीरें लगी थीं। नीलिमा पहले से रो रही थी। विक्रम का चेहरा बुझा हुआ था।

आर्या ने दोनों को देखा। “आप लोगों ने मुझे खरीदा?”

नीलिमा चीखी, “ऐसा मत बोलो!”

“तो क्या बोलूं?” आर्या की आवाज पतली हो गई। “सबने मेरे बारे में फैसला किया। जिसने जन्म दिया उससे झूठ बोला, जिसने पाला उसे झूठ बेचा, और मुझसे मेरी कहानी छिपाई।”

विक्रम ने सिर झुका लिया। “हमने सच जानने की कोशिश नहीं की। शायद क्योंकि हमें डर था कि सच हमारे खिलाफ होगा।”

आर्या कमरे से चली गई। उस रात उसने किसी से बात नहीं की।

जब वह अनन्या से मिलने को तैयार हुई, उसने 4 शर्तें रखीं—मुलाकात मनोवैज्ञानिक के क्लिनिक में होगी, मेहरा दंपती मौजूद रहेंगे, कोई उसे छुएगा नहीं, और वह जब चाहे उठकर चली जाएगी।

अनन्या समय से 20 मिनट पहले पहुंच गई। उसके हाथ में एक छोटा डिब्बा था—वही लाल धागे वाला लॉकेट। वह बार-बार सोचती रही कि क्या कहना चाहिए। “बेटी” कहना बहुत बड़ा लगेगा। “आर्या” कहना बहुत छोटा। “मुझे माफ कर दो” कहना झूठ लगेगा, क्योंकि उसने छोड़ा ही नहीं था।

आर्या आई तो ग्रे कुर्ता और जींस में थी। बाल खुले थे। चेहरा सख्त, आंखें भीगी हुई नहीं, पर भीतर कहीं कांपती हुई।

“आपने मुझे स्कूल के बाहर देखा था?” उसने पूछा।

“हां।”

“मेरी कंघी चुराई थी?”

“हां।”

“यह सब सुनकर मुझे आप पर भरोसा करना चाहिए?”

अनन्या ने सिर झुका लिया। “नहीं। मैंने गलत किया। मैं पागल दर्द में थी, पर गलत फिर भी गलत था।”

आर्या ने जैसे ऐसी उम्मीद नहीं की थी। वह कुछ पल चुप रही।

“आप मुझसे क्या चाहती हैं?”

अनन्या ने डिब्बा मेज पर रखा। “कुछ नहीं जो तुम देना न चाहो। मैं तुम्हें नीलिमा जी से छीनने नहीं आई। मैं बस तुम्हें यह बताने आई हूं कि तुम्हारी पहली रोने की आवाज मैंने नहीं सुनी, क्योंकि मुझे बेहोश रखा गया। तुम्हारा चेहरा नहीं देखा, क्योंकि मुझसे छीन लिया गया। और तुम्हें छोड़ा नहीं, क्योंकि मुझे कभी मौका ही नहीं दिया गया।”

नीलिमा की सिसकी कमरे में टूट गई। विक्रम ने चेहरा ढक लिया।

आर्या ने डिब्बा खोला। लाल धागा पुराना था, पर लॉकेट चमक रहा था।

“यह मेरा था?”

“मैंने तुम्हारे जन्म से पहले खरीदा था,” अनन्या ने कहा। “सोचा था, जब पहली बार गोद में लूंगी, तब बांधूंगी।”

आर्या ने लॉकेट उठा लिया, लेकिन अनन्या की तरफ हाथ नहीं बढ़ाया।

“मैं इसे रखूंगी। इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको मां मानती हूं।”

अनन्या की आंखों में आंसू आ गए, पर आवाज स्थिर रही। “तुम्हें कोई जल्दी नहीं करनी।”

न्यायिक डीएनए रिपोर्ट ने 3 हफ्ते बाद वही सच अदालत की भाषा में लिख दिया—आर्या मेहरा जैविक रूप से अनन्या शर्मा की बेटी थी। कागज ने खोए साल वापस नहीं दिए, मगर झूठ की आखिरी दीवार गिरा दी।

मुकदमा महीनों चला। अखबारों ने इसे “जयपुर बेबी स्वैप कांड” कहा। सोशल मीडिया पर लोग पक्ष बांटने लगे। कुछ कहते, अनन्या ने मेहरा परिवार तोड़ दिया। कुछ कहते, राजीव और सावित्री को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। कुछ नीलिमा के पक्ष में रोते। बहुत कम लोग पूछते कि आर्या पर क्या बीत रही है।

अनन्या ने हर सुनवाई में यही ध्यान रखा कि आर्या को सबूत नहीं, इंसान माना जाए। वह अदालत में पीछे मुड़कर उसे देखने की इच्छा रोकती। उसे अपनी बेटी को जीत का निशान नहीं बनाना था।

फैसले वाले दिन अदालत भरी हुई थी। डॉक्टर महाजन दोषी ठहरा। रिकॉर्ड बदलने वाली वरिष्ठ नर्स भी दोषी ठहरी। राजीव और सावित्री देवी पर साजिश, फर्जी सहमति और नवजात की गैरकानूनी सुपुर्दगी में सहभागिता साबित हुई। सजा अनन्या की रातों की आग जितनी बड़ी नहीं थी, पर पहली बार कानून ने लिखा—बच्ची मरी नहीं थी, मां ने त्याग नहीं किया था, और 17 साल का शोक रचा गया झूठ था।

बाहर निकलते समय राजीव ने उसे देखा। चेहरे पर थकान थी, पर अहंकार अभी जिंदा था।

“जीत गई?” उसने पूछा। “क्या मिला?”

अनन्या ने शांत स्वर में कहा, “अपनी जिंदगी का सच।”

“आर्या कभी वैसी बेटी नहीं बनेगी जैसी तुम सोचती हो।”

“वह कोई चीज नहीं है जिसे मैं वापस ले लूं। वह खुद तय करेगी किसे अपने जीवन में जगह देनी है।”

सावित्री देवी ने मुंह फेर लिया। पहली बार उसके पास कोई वाक्य नहीं था।

तलाक जल्दी हो गया। अनन्या ने फ्लैट से राजीव की चीजें बाहर रख दीं—फाइलें, पुराना लैपटॉप बैग, उसकी मां की दी हुई पीतल की थाली, और वे तस्वीरें जिनमें उनके बीच मुस्कान थी पर सच नहीं था। फिर वह ड्रॉइंग रूम में बैठी। नए गमले में लगी तुलसी की एक छोटी पत्ती खुल रही थी।

“तुम्हें भी छिपाने के लिए इस्तेमाल किया गया,” उसने पौधे से कहा। “अब धूप में रहो।”

महीने बीते। कोई फिल्मी चमत्कार नहीं हुआ। आर्या कभी संदेश भेजती, फिर कई दिन गायब हो जाती। उसके सवाल तेज होते।

“अगर मैं तुम्हारे साथ रहती, तो मेरा नाम क्या होता?”

अनन्या ने लिखा, “ईरा। लेकिन आर्या बहुत सुंदर नाम है। मैं तुमसे तुम्हारा नाम नहीं छीनना चाहती।”

एक दिन आर्या ने पूछा, “क्या आप नीलिमा मां से नफरत करती हैं?”

अनन्या ने बहुत देर बाद जवाब दिया, “नहीं। उन्हें तुम्हारे साथ देखकर दर्द होता है, क्योंकि वह जीवन मुझे नहीं मिला। लेकिन उन्होंने तुम्हें प्यार किया। दर्द और नफरत एक ही चीज नहीं हैं।”

धीरे-धीरे नीलिमा भी बदलने लगी। वह अपनी भयभीत पकड़ ढीली करना सीख रही थी। एक दोपहर वह आर्या को लेकर अनन्या के घर आई। रसोई में खड़ी रही, जैसे मेहमान भी नहीं और परिवार भी नहीं।

अचानक उसने कहा, “मुझे सच नहीं पता था। पर शायद मुझे सच जानने की कोशिश करनी चाहिए थी।”

अनन्या ने 2 कप चाय मेज पर रखे। “मुझे भी शायद 17 साल पहले और जोर से चिल्लाना चाहिए था, जब उन्होंने मुझे बच्ची दिखाने से मना किया।”

“आप ऑपरेशन से निकली थीं,” नीलिमा बोली।

“और आप मां बनने की हताशा से निकली थीं,” अनन्या ने कहा।

उस दिन माफी नहीं हुई। माफी बहुत साफ शब्द था, और उनका दर्द अभी कीचड़ से भरा था। लेकिन उन्होंने एक-दूसरे को चोर कहना बंद कर दिया। बीच में आर्या थी, जिसे किसी एक मां को चुनने की सजा नहीं मिलनी चाहिए थी।

आर्या पहले 15 मिनट बैठी। फिर 30। फिर 1 दिन अपना स्केचबुक लाई। आखिरी पन्ने पर अनन्या का ड्रॉइंग रूम बना था—खिड़की, तुलसी का गमला, और एक औरत जो पीछे से दिख रही थी।

“यह आप नहीं हैं,” आर्या ने जल्दी से कहा। “बस प्रैक्टिस है।”

अनन्या मुस्कुराई। “प्रैक्टिस बहुत अच्छी है।”

आर्या ने पन्ना पलट दिया, पर उसके कान लाल हो गए।

बसंत के अंत में आर्या एक कार्डबोर्ड डिब्बा लेकर आई। भीतर से तीखी म्याऊं की आवाज आई।

“यह क्या है?” अनन्या ने पूछा।

“बिल्ली का बच्चा। कॉलेज के पास मिला। सब कह रहे थे बहुत शोर करता है, गमले गिरा देता है, कोई नहीं रखेगा।”

अनन्या हंसी और रोई, दोनों साथ। “नाम?”

“जीवा,” आर्या ने कहा। “क्योंकि यह जिद्दी है। जिंदा रहने पर अड़ी हुई।”

बिल्ली डिब्बे से निकली, 3 टेढ़े कदम चली और सीधे तुलसी के गमले के पास बैठ गई। आर्या उसे देखती रही।

“सोचो,” उसने धीमे कहा, “अगर वह गमला नहीं टूटता, तो शायद किसी को सच कभी पता नहीं चलता।”

अनन्या ने तुलसी की पत्तियों, शांत मिट्टी और सामने खड़ी अपनी बड़ी हो चुकी बच्ची को देखा।

“कुछ सच अंधेरे में तब तक बढ़ते रहते हैं, जब तक कोई चीज टूटकर रास्ता नहीं बना देती।”

आर्या चुप रही। फिर उसने बहुत धीरे पूछा, “मैं अभी भी नहीं जानती आपको क्या कहूं।”

अनन्या ने अपनी सांस रोक ली।

“जरूरी नहीं अभी जानो।”

“पर मैं कोशिश करना चाहती हूं। धीरे-धीरे। फिल्मों जैसा नहीं। बस… सच में।”

अनन्या ने आंसू रोकते हुए कहा, “मैं तुम्हारी रफ्तार से चलूंगी।”

आर्या सोफे पर बैठ गई। जीवा उसकी गोद में चढ़ गई और पंजे से लाल धागे वाले लॉकेट को छूने लगी।

“चाय मिलेगी?” आर्या ने पूछा।

“अभी,” अनन्या ने कहा।

रसोई में चाय चढ़ाते हुए उसने खिड़की से बाहर देखा। जयपुर की शाम गुलाबी हो रही थी। 18 अगस्त अब सिर्फ एक झूठी मौत की तारीख नहीं थी। वह उस चीख का दिन था, जिसे किसी ने दबा दिया था, पर मिटा नहीं पाया था। ड्रॉइंग रूम में उसकी बेटी, अपनी दोनों मांओं की कहानियों के बीच, एक शोर करती बिल्ली को सहला रही थी। अनन्या जानती थी कि सच खोए हुए 17 साल वापस नहीं लाएगा। मगर सच ने एक दरवाजा खोल दिया था। और इस बार, उस दरवाजे के सामने कोई राजीव खड़ा नहीं था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.