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एप्रन पहन लो, मेहमान तुम्हें देखने नहीं आए” — मां ने बेटी को दिवाली की दावत में रसोई में धकेला; मगर भीगा हाथ चूमने आया काले सूट वाला आदमी ऐसी फाइल खोलने वाला था, जिससे पूरा परिवार कांप गया।

भाग 1
दिवाली की रात अनन्या मेहरा को उसकी अपनी मां ने मेहमानों के सामने रसोई में भेज दिया और कहा कि वह परिवार की बेटी नहीं, आज की रात सिर्फ परोसने वाली लड़की की तरह रहेगी।

—एप्रन पहन लो, अनन्या। लोग तुम्हें सोफे पर बैठा हुआ देखने नहीं आए हैं।

सविता मेहरा ने यह बात इतनी धीमी आवाज में कही थी कि बाहर ड्राइंग रूम में बैठे रिश्तेदार न सुन सकें, लेकिन इतनी तेज जरूर कही कि अनन्या का सीना भीतर से कट जाए। उसके हाथ में चांदी की थाली थी, जिसमें काजू कतली, गुलाब जामुन और सूखे मेवों के कटोरे रखे थे। बाहर रोशनी, दीये, फूलों की झालरें और हंसी थी। अंदर रसोई में भाप, मसालों की गंध और उसके गले में अटका अपमान था।

उसके पिता राजीव मेहरा ने दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार वाले अपने बड़े बंगले में पूरे परिवार को दिवाली भोज पर बुलाया था। वह सबको बता रहे थे कि इस साल परिवार फिर से एक साथ होगा, जैसे पुराने दिन लौट आए हों। लेकिन अनन्या जानती थी कि इस घर में परिवार कभी सचमुच साथ नहीं था। यहां सिर्फ तस्वीरों के लिए मुस्कुराहटें थीं, रिश्तों के नाम पर सौदे थे, और प्यार के नाम पर जरूरतें।

शाम के 7 बजे तक पूरा घर मेहमानों से भर चुका था। उसकी बड़ी बहन रिया हल्के सुनहरे लहंगे में आई थी, जैसे हर दीया उसी के लिए जल रहा हो। उसका पति निवेश सलाहकार था और हर 5 मिनट में किसी न किसी को शेयर बाजार समझा रहा था। उसका भाई कुणाल नई कार की चाबी उछालता हुआ अंदर आया, जबकि सब जानते थे कि वह कार भी पिता के पैसे से आई थी। चाचा, चाची, मामा, बुआ, पड़ोसी और बिजनेस पार्टनर सब आए थे। कोई गुरुग्राम की जमीन की बात कर रहा था, कोई नोएडा के प्रोजेक्ट की, कोई दुबई की छुट्टियों की।

और अनन्या रसोई में थी।

सविता ने उसके हाथ में एप्रन ऐसे थमाया था जैसे कोई फैसला सुना रही हो।

—तुम्हें इस घर की रसोई सबसे अच्छी तरह आती है। नाटक मत करना। मेहमानों को संभालो, खाना परोसो और चेहरे पर कृतज्ञता रखो।

कृतज्ञता।

यह शब्द अनन्या ने 18 की उम्र से सुनना शुरू किया था। कृतज्ञ रहो कि तुम्हें छत मिली। कृतज्ञ रहो कि परिवार ने तुम्हें ऑफिस में रखा। कृतज्ञ रहो कि पिता की कंपनी मुश्किल में थी तो तुमने कॉलेज छोड़ दिया। कृतज्ञ रहो कि रिया की शादी में तुमने रात-रात भर काम किया। कृतज्ञ रहो कि कुणाल के 3 असफल स्टार्टअप्स की फाइलें तुमने संभालीं।

रिया ने फैशन मैनेजमेंट पढ़ने के लिए मिलान तक जा लिया था, क्योंकि मां कहती थी कि उसमें समाज में चमकने की कला है। कुणाल ने 30 साल का होने से पहले 3 बिजनेस डुबो दिए, फिर भी पिता उसे जोखिम लेने वाला लड़का कहते थे। अनन्या ने अकाउंट्स देखे, मजदूरों के भुगतान की सूचियां बनाई, बीमार दादी की सेवा की, रिश्तेदारों के फोन उठाए और हर बार मुस्कुराई जब कोई कहता था:

—अनन्या तो बहुत मजबूत है।

मजबूत का मतलब था, जिसे दर्द हो तो भी आवाज न निकले।

इसलिए उसने खाना बनाया।

उसने शाही पनीर की आंच धीमी की, दाल मखनी दोबारा गर्म की, पुलाव में केसर डाला, पूरी तलवाई, मिठाई सजाई, प्लेटें बदलीं और गिलास भरे। हर बार जब वह ड्राइंग रूम में जाती, मां की आवाज सुनाई देती।

—रिया बचपन से ही खास है। जहां जाती है, लोग उसे देखते रह जाते हैं।

फिर सविता कुणाल की ओर देखती।

—और कुणाल में तो बिजनेस का खून है। थोड़ा आवारा है, लेकिन दिल बड़ा है।

किसी ने अनन्या के बारे में नहीं पूछा।

किसी ने यह नहीं देखा कि उसका अपना खाना अभी तक स्टील की प्लेट में सिंक के पास ढका पड़ा था।

रात के 9 बजे, जब वह जले हुए बर्तन को खुरच रही थी, तभी मुख्य दरवाजे की घंटी बजी। बाहर की हंसी अचानक धीमी पड़ गई। पहले गेट पर गार्ड की आवाज आई, फिर नौकरानी राधा घबराई हुई रसोई के दरवाजे तक आई।

—सर… कोई बड़े साहब आए हैं। कह रहे हैं, राजीव मेहरा से मिलना है।

अनन्या ने सिर भी नहीं उठाया। उसे लगा कोई देर से आया मेहमान होगा या पिता का कोई नया साझेदार।

लेकिन अगले ही पल पूरा घर चुप हो गया।

एक आदमी रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ा था।

काला सूट, गहरा कोट, बारिश से हल्के भीगे जूते और चेहरे पर ऐसी शांति, जिसे देखकर शोर खुद रास्ता छोड़ दे। उसकी आंखें पहले सजाए हुए हॉल पर गईं, फिर खाने से भरी मेज पर, फिर उन लोगों पर जो आराम से बैठे थे, और अंत में अनन्या पर टिक गईं।

अनन्या के हाथ साबुन से भीगे थे। बाल जल्दबाजी में बंधे थे। उसके कुर्ते की आस्तीन पर दाल का दाग था और कमर पर एप्रन कसकर बंधा था।

वह आदमी सीधे उसकी ओर चला।

अनन्या कुछ कहती, उससे पहले उसने उसके भीगे हाथ को बड़ी नरमी से पकड़ा, झुका और उसकी उंगलियों पर हल्का चुंबन रख दिया।

—माफ करना, मेरी जान। देर हो गई।

कमरे की हवा जम गई।

सविता का चेहरा सफेद पड़ गया।

रिया तुरंत खड़ी हो गई।

कुणाल ने गिलास मेज पर रखते हुए बुदबुदाया।

—ये क्या चल रहा है?

क्योंकि वह आदमी कोई साधारण मेहमान नहीं था।

वह अर्जुन मल्होत्रा था, मल्होत्रा हेरिटेज होटल्स का मालिक, वही उद्योगपति जिसके साथ राजीव मेहरा 6 महीने से अपने जीवन का सबसे बड़ा निर्माण अनुबंध पाने की कोशिश कर रहे थे।

और उसने अभी अनन्या को मेरी जान कहा था।

राजीव मेहरा धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठे। उनकी आवाज में पिता की चिंता से ज्यादा व्यापारी की घबराहट थी।

—अनन्या… तुम अर्जुन जी को जानती हो?

अर्जुन ने अनन्या की कमर पर बंधे एप्रन को देखा। फिर उस मेज को देखा जहां 20 लोगों के लिए जगह थी, मगर अनन्या के लिए नहीं।

उसका चेहरा कठोर हो गया।

—काफी अच्छी तरह जानता हूं। यह मेरी मंगेतर है।

सविता ने जैसे किसी ने उसके कानों में अंगारे डाल दिए हों, वैसे अनन्या को देखा।

—मंगेतर?

अर्जुन ने मेज की ओर मुड़कर कहा:

—और अब मैं यह जानना चाहता हूं कि मेरी होने वाली पत्नी बर्तन क्यों धो रही है, जबकि उसका पूरा परिवार उसी के बनाए खाने पर बैठा हुआ है।

राजीव ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि अनन्या के फोन पर एक संदेश चमका। वह संदेश उसी फाइल से था जिसे वह पिछले 8 महीनों से छुपाकर बचा रही थी।

मेहरा बिल्डर्स के झूठे बिल, मजदूरों के रुके पैसे और 2 अवैध परमिटों का पूरा सबूत अब उसके सामने था।

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भाग 2

मंगेतर शब्द ने उस शानदार कमरे की सारी रोशनी को बेकार कर दिया, क्योंकि अब हर चेहरा साफ दिख रहा था। सविता ने पहले अनन्या की कलाई देखी, जैसे वहां अंगूठी खोज रही हो, फिर अर्जुन को देखा, जैसे अचानक रसोई में खड़ी बेटी कोई निवेश बन गई हो। रिया की मुस्कान सख्त हो गई, कुणाल की आंखों में ईर्ष्या और डर साथ-साथ चमकने लगे, और राजीव मेहरा ने तुरंत वही चेहरा पहन लिया जो वह बैंक वालों, मंत्रियों और अमीर क्लाइंट्स के सामने पहनते थे। अर्जुन और अनन्या 2 साल पहले गुरुग्राम के एक चैरिटी कार्यक्रम में मिले थे, जहां साउंड सिस्टम बंद हो गया था, कैटरर ने पैसे के झगड़े में खाना रोक दिया था और 300 मेहमानों के सामने आयोजक रोने लगे थे। अनन्या ने बिना चिल्लाए, बिना किसी से एहसान मांगे, 40 मिनट में पूरा कार्यक्रम बचा लिया था। अर्जुन ने उस रात पहली बार किसी को देखा था जो दबाव में टूटता नहीं, बल्कि और साफ हो जाता है। 4 महीने पहले दोनों की सगाई हुई, लेकिन अनन्या ने घर में नहीं बताया, क्योंकि उसे पता था कि उसके परिवार के लिए प्यार भी तब तक प्यार नहीं होता जब तक उससे कोई फायदा न निकले। राजीव तुरंत आगे बढ़े और बोले कि शायद कोई गलतफहमी है, अनन्या को घर के काम पसंद हैं। सविता ने कहा कि बेटी ने कभी बताया ही नहीं, तो उन्हें कैसे पता चलता कि उसे मेहमान की तरह बैठाना चाहिए। तब अनन्या ने पहली बार आंखें उठाईं और साफ कहा कि उसे बैठने के लिए सगाई का प्रमाणपत्र नहीं चाहिए था। कमरे में शर्म फैल गई, लेकिन किसी ने माफी नहीं मांगी। रिया ने उसे नाटकबाज कहा, कुणाल ने अर्जुन से हंसकर माहौल हल्का करने की कोशिश की, और राजीव ने धीरे से याद दिलाया कि कारोबार और परिवार को अलग रखना चाहिए। उसी पल अनन्या ने एप्रन खोला और रसोई की मेज पर रख दिया। सविता ने उसका हाथ पकड़कर फुसफुसाया कि अगर वह आज चली गई तो वापस आकर रोना मत। अनन्या ने पहली बार बिना कांपे जवाब दिया कि वह अब लौटकर कुछ मांगेगी नहीं। अर्जुन ने उसका कोट उठाया, लेकिन दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते राजीव ने उसका रास्ता रोक लिया और कहा कि इस अनुबंध पर बहुत लोगों की रोजी निर्भर है। अनन्या ने फोन खोला, स्क्रीन पर छिपी हुई फाइल दिखाई और बोली कि रोजी उन मजदूरों की भी थी, जिनके पैसे 6 महीने से रोके गए थे। यह सुनते ही राजीव के चेहरे से खून उतर गया, क्योंकि उसे समझ आ गया कि उसकी चुप रहने वाली बेटी सिर्फ अपमान नहीं सह रही थी, वह सच भी जमा कर रही थी।

भाग 3

बाहर बारिश हो रही थी और दिवाली की रोशनियां भीगी हुई सड़क पर ऐसे तैर रही थीं, जैसे किसी ने शहर के आंसुओं में दीपक छोड़ दिए हों। अर्जुन की कार वसंत विहार से निकलकर शांत सड़क पर आ गई। पीछे मेहरा परिवार का बंगला चमक रहा था, लेकिन अनन्या को पहली बार वह घर नहीं, एक बड़ा सजाया हुआ पिंजरा लगा।

वह कार में चुप बैठी रही। उसके हाथों में अभी भी साबुन की हल्की गंध थी। एप्रन उतर चुका था, पर उसका भार जैसे त्वचा के अंदर रह गया था।

अर्जुन ने थोड़ी देर बाद धीमे स्वर में कहा:

—मुझे पहले आ जाना चाहिए था।

अनन्या ने खिड़की से बाहर देखते हुए सिर हिलाया।

—तुम तब आए जब मैं खुद को छोड़ना बंद करने वाली थी।

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। वह जानता था कि उस रात शब्द कम पड़ जाएंगे।

वे चाणक्यपुरी के पास अर्जुन के अपार्टमेंट पहुंचे। घर शांत था, सादा था, मगर उसमें वह ठंडापन नहीं था जो अनन्या के अपने घर की दीवारों में था। अर्जुन की पुरानी घरेलू सहायक, कमला काकी, दरवाजे तक आईं। उन्होंने अनन्या का चेहरा देखा, उसके भीगे बाल देखे, और बिना कोई सवाल किए बोलीं:

—पहले गरम चाय बनेगी। खाली पेट और टूटे मन से कोई फैसला नहीं करता।

अनन्या की आंखें भर आईं। उसे याद नहीं था कि आखिरी बार किसी ने उसके चेहरे को देखकर उसकी जरूरत पहचानी थी।

कमला काकी रसोई में चली गईं। अर्जुन ने उसके कंधे से कोट उतारा। नीचे उसने गहरा नीला सूट पहना था, जिसे उसने बहुत सोचकर चुना था। वह चाहती थी कि उस रात पहली बार परिवार उसे सचमुच देखे। लेकिन सविता ने उस पर एप्रन बांध दिया था, जैसे उसकी सुंदरता, उसका सम्मान और उसका अस्तित्व सब ढक देना चाहती हो।

अर्जुन ने धीमे से कहा:

—तुम बहुत सुंदर लग रही हो।

अनन्या की हंसी टूट गई।

—मुझसे दाल और घी की गंध आ रही है।

—तो दाल को भी आज सम्मान मिल गया।

वह मुस्कुराने की कोशिश करती रही, मगर अगले ही पल उसका चेहरा दोनों हथेलियों में छिप गया और वह रो पड़ी। वह रोना सिर्फ उस रात का नहीं था। वह उन 10 सालों का था, जिनमें उसने अपनी पढ़ाई छोड़ी, पिता की कंपनी बचाई, भाई की गलतियां छुपाईं, बहन की शादी संभाली, मां की कटु बातें निगलीं और हर अपमान को परिवार कहकर माफ किया।

अर्जुन ने उसे चुप कराने की कोशिश नहीं की। उसने बस उसे थाम लिया।

कुछ देर बाद कमला काकी ने उसके सामने अदरक वाली चाय, गरम पराठा और दही रखा।

—बेटी, पहले खा लो। जिन लोगों ने तुम्हें खाना नहीं खिलाया, उनके लिए भूखी मत रहो।

अनन्या ने पहली बार उस रात कुछ खाया।

तभी उसका फोन लगातार बजने लगा।

मां।

पिता।

रिया।

कुणाल।

बुआ।

मामा।

फिर पिता का संदेश आया।

घर की बात बाहर मत ले जाना। सुबह बात करेंगे। अनुबंध खराब हुआ तो बहुत नुकसान होगा।

अनन्या ने संदेश अर्जुन को दिखाया। अर्जुन ने उसे पढ़ा और फोन मेज पर रख दिया।

—उन्हें अभी भी तुम्हारा दर्द नहीं दिख रहा।

—उन्हें सिर्फ अनुबंध दिख रहा है।

—और अब उन्हें सच भी दिखेगा।

अगली सुबह 10 बजे राजीव मेहरा ने सीधे अर्जुन को फोन किया। अर्जुन ने फोन उठाने से पहले अनन्या की ओर देखा।

—तुम सुनना चाहती हो?

अनन्या ने लंबी सांस ली और सिर हिला दिया।

फोन स्पीकर पर रखा गया।

—अर्जुन बेटा, कल रात बात बिगड़ गई। परिवारों में ऐसी बातें हो जाती हैं।

अर्जुन की आवाज शांत थी।

—आपकी बेटी रसोई में खड़ी थी और बाकी परिवार उसके हाथ का खाना खा रहा था। यह बात कैसे हो जाती है?

राजीव ने हल्की खांसी की।

—अनन्या भावुक है। वह हमेशा से चीजों को दिल पर लेती है। सविता सख्त है, पर मां है। मां-बेटी में ऐसा चलता रहता है।

अनन्या की उंगलियां कप पर कस गईं।

अर्जुन ने पूछा:

—अनन्या, क्या कल रात तुम अपनी इच्छा से खाना परोस रही थीं?

कमरे में कुछ सेकंड का सन्नाटा रहा।

फिर उसने पहली बार अपने पिता के सामने सीधा जवाब दिया।

—नहीं।

फोन के उस पार चुप्पी जम गई।

राजीव ने आवाज नरम की।

—बेटा, ठीक है, गलती हो गई। हम उसे घर बुलाकर माफी मांग लेंगे। लेकिन बिजनेस अलग चीज है। इतना बड़ा प्रोजेक्ट किसी भावनात्मक बात पर नहीं रुकना चाहिए।

अर्जुन ने बिना गुस्से के कहा:

—वह प्रोजेक्ट अब नहीं होगा।

राजीव की सांस अटक गई।

—क्या?

—मल्होत्रा हेरिटेज होटल्स मेहरा बिल्डर्स के साथ कोई अनुबंध नहीं करेगा।

—तुम यह फैसला एक घरेलू झगड़े पर ले रहे हो?

—नहीं। यह फैसला आपके कागजों पर लिया गया है।

अब राजीव सचमुच चुप हो गए।

अर्जुन ने आगे कहा:

—पिछले 3 हफ्तों से हमारी कानूनी टीम आपकी कंपनी की जांच कर रही थी। 14 मजदूरों का भुगतान रुका है। 2 उपठेकेदारों ने लिखित शिकायत दी है। नोएडा वाले प्रोजेक्ट में परमिट की तारीख बदली गई है। और कुछ बिल ऐसे हैं, जिन पर हस्ताक्षर अनन्या के नाम से दिखाए गए हैं, जबकि वह उस दिन शहर में थी ही नहीं।

अनन्या का शरीर ठंडा पड़ गया।

उसे पता था कि कंपनी में गड़बड़ है, इसलिए उसने फाइलें बचाई थीं। लेकिन यह नहीं पता था कि उसके नाम का इस्तेमाल भी हुआ है।

—मेरे नाम से? उसने फुसफुसाकर कहा।

फोन पर राजीव ने तुरंत कहा:

—वह सिर्फ तकनीकी बात थी। परिवार में नाम चलता रहता है। किसी को नुकसान नहीं हुआ।

अनन्या ने फोन के करीब आकर कहा:

—मुझे नुकसान हुआ, पापा। आपने मेरे नाम से झूठ बोला।

राजीव की आवाज कड़ी हो गई।

—अपनी आवाज नीचे रखो। तुम भूल रही हो कि हमने तुम्हें पाला है।

अनन्या ने आंखें बंद कीं। वह वही पुराना वाक्य था, जिससे हर बार उसका गला दबा दिया जाता था।

लेकिन इस बार उसने गला साफ किया।

—पालना और इस्तेमाल करना एक बात नहीं होती।

अर्जुन ने फोन उठा लिया।

—राजीव जी, हमारी टीम आज शाम तक आपको आधिकारिक ईमेल भेज देगी। और जिन मजदूरों के भुगतान रुके हैं, उनकी सूची श्रम विभाग को भी भेजी जाएगी।

—तुम्हें अंदाजा है इससे क्या होगा?

—शायद पहली बार हिसाब बराबर होगा।

कॉल कट गई।

अनन्या लंबे समय तक वहीं बैठी रही। उसे लगा था कि अपराधबोध उसे काटेगा, लेकिन भीतर सिर्फ खालीपन था। ऐसा खालीपन जिसमें दर्द था, पर डर नहीं था।

दोपहर होते-होते परिवार की असली शक्ल बाहर आने लगी। सविता ने संदेश भेजा कि बेटी ने मां को समाज में शर्मिंदा कर दिया। रिया ने लिखा कि अनन्या हमेशा से ध्यान चाहती थी। कुणाल ने भेजा कि अगर अर्जुन इतना अमीर है तो घर बर्बाद करने की जरूरत क्या थी। बुआ ने कहा कि लड़की चाहे कितनी भी पढ़-लिख जाए, घर की इज्जत नहीं भूलनी चाहिए।

एकमात्र अलग फोन उसकी दादी शारदा का आया।

शारदा पिछले 6 महीनों से हरिद्वार में अपनी छोटी बहन के घर रह रही थीं। उम्र 82 थी, आवाज धीमी थी, लेकिन शब्द साफ थे।

—अनन्या, तूने घर छोड़ दिया?

—हां, दादी।

—अच्छा किया।

अनन्या रो पड़ी।

—आपको सब पता था?

—जितना बूढ़ी आंखें देख सकती हैं, उतना सब पता था। तेरी मां तुझे बेटी कम, सहारा ज्यादा समझती थी। तेरे पिता तुझे कर्मचारी से भी कम समझते थे, क्योंकि कर्मचारी वेतन मांगता है।

—आपने कभी कहा क्यों नहीं?

शारदा की सांस भारी हो गई।

—क्योंकि मैं भी डरी हुई औरत थी। मैंने भी यही सीखा था कि घर बचाने के लिए औरत खुद को जलाती रहती है। पर बेटा, जो घर तेरी राख से रोशन हो, वह घर नहीं चिता है।

इस बार अनन्या का रोना अलग था। वह उसे तोड़ नहीं रहा था, धो रहा था।

अगले 20 दिनों में बहुत कुछ बदल गया। मल्होत्रा समूह ने अनुबंध रद्द कर दिया। श्रम विभाग ने मेहरा बिल्डर्स को नोटिस भेजा। जिन मजदूरों के पैसे रोके गए थे, उनकी आवाज पहली बार बाहर आई। मीडिया तक बात पहुंची, लेकिन अर्जुन ने अनन्या का नाम बचाकर रखा। उसने सिर्फ इतना कहा कि कंपनी की जांच में गंभीर अनियमितताएं मिली हैं।

राजीव ने कई बार अनन्या को फोन किया, पर हर बार बात अनुबंध, नोटिस, बदनामी या पैसे से शुरू होती। एक बार भी उन्होंने यह नहीं पूछा कि वह कैसी है।

सविता ने आखिरी कोशिश की। वह अचानक अर्जुन के अपार्टमेंट के बाहर आ पहुंची। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखों में अभी भी वही पुराना आदेश।

—घर चलो, अनन्या। लोग बातें कर रहे हैं।

अनन्या ने दरवाजे पर खड़े-खड़े पूछा:

—मुझसे मिलने आई हो या लोगों को चुप कराने?

सविता चुप रहीं।

—तुमने मुझे उस रात खाने की मेज पर क्यों नहीं बैठने दिया, मां?

सविता ने नजर फेर ली।

—इतने मेहमान थे। व्यवस्था देखनी थी।

—रिया क्यों नहीं देख सकती थी? कुणाल क्यों नहीं देख सकता था?

—क्योंकि तुम संभाल लेती हो।

अनन्या के होंठ कांपे, मगर आवाज नहीं टूटी।

—यही गलती थी। मैं संभालती रही, इसलिए तुम सबने मुझे इंसान समझना बंद कर दिया।

सविता की आंखें भर आईं, लेकिन शायद आदत इतनी पुरानी थी कि माफी गले तक आकर भी बाहर नहीं निकली।

—परिवार टूट जाएगा।

—परिवार उस रात टूटा था जब मेरी कुर्सी खाली नहीं रखी गई। क्योंकि मेरे लिए कुर्सी थी ही नहीं।

सविता ने पहली बार कुछ नहीं कहा। वह लौट गईं।

3 महीने बाद अनन्या ने एक छोटा-सा कार्यक्रम रखा। कोई बड़ी हवेली नहीं, कोई दिखावा नहीं, कोई 20 कोर्स का खाना नहीं। बस अर्जुन का घर, शारदा दादी, कमला काकी, अनन्या की 2 पुरानी सहेलियां, अर्जुन की बहन मीरा और कुछ लोग जो सचमुच उसे देखकर खुश हुए।

कमला काकी ने छोले, पूरी, खीर और आलू टिक्की बनाई। अनन्या ने खुद खीर में बादाम डाले, क्योंकि वह चाहती थी, किसी ने आदेश नहीं दिया था।

जब सब खाने बैठे, अनन्या अचानक रुक गई।

मेज पर उसके लिए एक कुर्सी थी।

बीच में।

न रसोई के पास, न दरवाजे के किनारे, न बाद में खाने के लिए अलग प्लेट।

अर्जुन ने उसकी आंखों में नमी देखी।

—क्या हुआ?

अनन्या ने धीरे से कहा:

—कुछ नहीं। बस आज पहली बार मुझे परोसा नहीं जा रहा, मेरे साथ खाया जा रहा है।

शारदा दादी ने उसका हाथ दबाया।

—अब आदत डाल ले।

उस रात अर्जुन ने सबके सामने गिलास उठाया।

—अनन्या के नाम। जिसने उस घर से बाहर कदम रखा जहां उसे जरूरत समझा गया, और उस जीवन में आई जहां उसे सम्मान मिलेगा।

किसी ने हंसी नहीं उड़ाई। किसी ने उसे भावुक नहीं कहा। किसी ने उससे पानी नहीं मांगा। सबने गिलास उठाए।

6 महीने बाद अनन्या और अर्जुन की शादी जयपुर की एक छोटी हवेली में हुई। सुबह की हल्की धूप, गेंदे के फूल, शहनाई की आवाज और आंगन में बैठे वे लोग जो सचमुच उसका नाम प्रेम से बोलते थे।

राजीव और सविता को निमंत्रण नहीं भेजा गया। रिया ने एक संदेश लिखा, फिर मिटा दिया। कुणाल ने शादी से 2 दिन पहले पैसे मांगे और जवाब न मिलने पर सोशल मीडिया पर लिखा कि आजकल लड़कियां परिवार भूल जाती हैं।

अनन्या ने पहली बार कोई सफाई नहीं दी।

शारदा दादी पहली पंक्ति में बैठी थीं, हल्की गुलाबी साड़ी में, आंखों से आंसू बहते हुए भी मुस्कुराती हुईं।

जब अनन्या मंडप की ओर चली, तो उसे लगा नहीं कि कोई राजकुमार उसे बचाने आया था। यह कहानी उतनी आसान नहीं थी। सच यह था कि उसने खुद को उसी रात बचाना शुरू किया था, जब उसने एप्रन उतारकर मेज पर रख दिया था।

अर्जुन ने सिर्फ दरवाजा खोला था।

फेरे खत्म होने के बाद अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ा, उसी तरह झुककर उसकी उंगलियों को चूमा जैसे उस दिवाली रात रसोई में चूमा था।

—माफ करना, मेरी जान। देर हो गई।

अनन्या मुस्कुराई।

—नहीं। तुम तब आए जब मैं खुद को चुनने के लिए तैयार थी।

दूर से शहनाई बज रही थी। आंगन में लोग हंस रहे थे। किसी ने उसे रसोई से नहीं बुलाया। किसी ने उसे कृतज्ञ रहने को नहीं कहा। किसी ने यह नहीं जताया कि उसका स्थान किसी और की सुविधा से तय होगा।

उस दिन अनन्या ने समझा कि परिवार हमेशा वह नहीं होता जो तुम्हें अपना उपनाम देता है।

कभी-कभी परिवार वह होता है जो देख ले कि तुम मेज पर नहीं बैठी हो।

कभी-कभी परिवार वह होता है जो तुम्हारे लिए जगह बचाकर रखता है।

और कभी-कभी परिवार तुम खुद होती हो, जब तुम दूसरों को आराम देने के लिए खुद को छोड़ना बंद कर देती हो।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.