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अस्पताल में जब मेरा जबड़ा तारों से बंधा था, माँ ने रोकर कहा, “बस बोल दे तू सीढ़ियों से गिरा था”, और मैं चुपचाप नर्स से लिखने की पट्टी माँगने लगा, लेकिन 39 मिनट की देरी ने अदालत में ऐसा राज खोला कि पूरा परिवार काँप गया।

PART 1

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जब विवेक ने अस्पताल में आँखें खोलीं, उसकी ठुड्डी तारों से जकड़ी हुई थी और उसकी माँ हाथ जोड़कर रो रही थी—“बेटा, बस कह देना कि तू सीढ़ियों से गिर गया था, वरना तेरे पापा जीते-जी मर जाएंगे।”

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल की सफेद दीवारें उसकी धुंधली आँखों में तैर रही थीं। उसके मुँह में खून, दवाई और लोहे जैसा स्वाद भरा था। चेहरा इतना सूजा हुआ था कि दाईं आँख आधी बंद हो चुकी थी। 2 पसलियों में दरार थी, जबड़ा टूट चुका था, और जिस माँ ने कभी उसके बुखार पर रात भर माथा सहलाया था, वही आज उस आदमी को बचाने की भीख माँग रही थी जिसने उसे अधमरा कर दिया था।

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विवेक शर्मा 23 साल का था। वह लक्ष्मी नगर के एक निजी कॉलेज में कंप्यूटर एप्लिकेशन पढ़ता था और अब भी अपने माता-पिता के साथ करोल बाग की पुरानी दोमंजिला कोठी में रहता था। वह कोठी उसके पिता रमेश शर्मा ने ईंट-ईंट जोड़कर बनाई थी। रमेश 54 साल के थे, छोटे ठेकेदार थे। सुबह 6 बजे से पहले घर से निकलना, स्टील के डिब्बे में पराठे रखना, शाम को धूल और सीमेंट से सने कपड़ों में लौटना—यही उनकी जिंदगी थी।

उस दिन विवेक की क्लास जल्दी खत्म हो गई थी। रास्ते में उसने चांदनी चौक से 2 कुल्फी और माँ के लिए गरम जलेबी ली थी, क्योंकि पिछले कई दिनों से उसकी माँ सुनीता शिकायत कर रही थी कि घर में कोई उससे ढंग से बात नहीं करता। विवेक ने सोचा था, माँ खुश हो जाएगी।

लेकिन जैसे ही वह घर पहुँचा, बाहर एक सफेद बोलेरो खड़ी थी। उस पर लिखा था—“आर्यन इंटीरियर्स एंड रेनोवेशन।”

वह गाड़ी विवेक पहचानता था।

वह राजीव मल्होत्रा की थी, वही आदमी जिसने पिछले साल उनके घर की ऊपर वाली मंजिल की मरम्मत की थी। रमेश ने उसे अपने परिवार जैसा माना था। कई बार घर पर खाना खिलाया था। सुनीता भी उसके सामने जरूरत से ज्यादा मुस्कुराने लगी थी, पर विवेक ने कभी बुरा नहीं सोचा था।

घर में अजीब सन्नाटा था। टीवी बंद था। रसोई में चाय ठंडी पड़ी थी। फिर ऊपर से धीमी हँसी की आवाज आई। ऐसी हँसी, जिसमें शर्म नहीं थी, छिपाव था।

विवेक धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ा। उसके माता-पिता के कमरे का दरवाजा आधा खुला था।

उसने धक्का दिया।

बिस्तर पर सुनीता थी। उसके साथ राजीव मल्होत्रा था।

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वही बिस्तर, जिसे रमेश ने खुद मंडी से लकड़ी खरीदकर बनवाया था। वही कमरा, जिसे सुनीता ने कहा था कि हल्के पीले रंग से रंगवाना, ताकि घर में शांति लगे।

विवेक के हाथ से जलेबी का डिब्बा गिर गया।

“माँ?” उसके मुँह से बस यही निकला।

सुनीता चीख पड़ी। राजीव ने चादर उठाई भी नहीं, बस अहंकार से खड़ा हुआ, जैसे घर उसी का हो।

“तू यहाँ क्या कर रहा है?” राजीव गरजा।

विवेक का खून खौल उठा। उसे अपनी माँ से ज्यादा उस पल अपने पिता का चेहरा याद आया—धूप में झुलसा हुआ, थका हुआ, पर भरोसे से भरा। उसने राजीव की ओर बढ़कर उसे धक्का दिया।

अगले ही पल एक भारी मुक्का उसके जबड़े पर पड़ा।

कुछ टूटा।

वह फर्श पर गिरा। उसके कान में सीटी बजने लगी। वह उठ भी नहीं पाया था कि राजीव ने उसके पेट और पसलियों पर लात मारी। विवेक साँस के लिए तड़पने लगा। वह माँ की तरफ देख रहा था।

उसे उम्मीद थी, माँ चिल्लाएगी—“मेरे बेटे को मत मारो!”

लेकिन सुनीता की आवाज आई—“राजीव, जल्दी कपड़े पहनकर निकलो। मैं संभाल लूँगी।”

और फिर अंधेरा छा गया।

अब अस्पताल में वही माँ फिर संभाल रही थी—सच को झूठ में बदलकर।

“तू मेरी बात सुन रहा है ना?” सुनीता फुसफुसाई। “मैंने डॉक्टर को बोल दिया है कि तू सीढ़ियों से गिरा। पुलिस आए तो वही कहना। तेरे पापा यह सब नहीं सह पाएंगे।”

विवेक बोलना चाहता था, पर जबड़े में ऐसी बिजली दौड़ी कि उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। उसने माँ का हाथ झटका। सुनीता का चेहरा एक पल को कठोर हो गया, फिर तुरंत वह फिर से रोती माँ बन गई।

तभी दरवाजा खुला।

रमेश अंदर आए। उनके जूते पर सीमेंट की सफेद धूल लगी थी। माथे पर पसीना था, आँखों में डर। उन्होंने बेटे को देखा तो जैसे उनकी कमर टूट गई।

“विवेक… ये क्या हो गया?”

सुनीता तुरंत बोली, “सीढ़ियों से गिर गया। बहुत जल्दी में था। मैंने एम्बुलेंस बुला ली थी।”

रमेश ने पहली बार उसकी तरफ देखा भी नहीं। वह बेटे के चेहरे पर झुके।

“सीढ़ी आदमी का जबड़ा ऐसे तोड़ देती है?”

विवेक ने हाथ उठाया। उसने इशारे से लिखने के लिए कुछ माँगा।

सुनीता का रंग उड़ गया।

“उसे आराम करने दो रमेश। दवा का असर है। कुछ भी लिख देगा।”

नर्स ने छोटी सफेद पट्टी और मार्कर ला दिया। विवेक का हाथ काँप रहा था। सुनीता लगातार बोल रही थी—“बेटा, मत कर। घर टूट जाएगा।”

विवेक ने काँपते अक्षरों में लिखा—

“माँ राजीव के साथ आपके बिस्तर पर थी। राजीव ने मुझे मारा। माँ ने उसे भागने दिया।”

रमेश ने पट्टी पढ़ी।

उनकी आँखों का रंग बदल गया। आवाज नहीं निकली। बस उनका हाथ बेटे के कंधे पर टिक गया, बहुत धीरे, जैसे टूटे हुए शीशे को छू रहे हों।

सुनीता रोने लगी—“झूठ है! इसे भ्रम हो रहा है!”

रमेश ने फोन निकाला।

“नमस्ते, मुझे अपने बेटे पर हुए हमले की शिकायत दर्ज करवानी है। अभी। सफदरजंग अस्पताल में।”

सुनीता चीखी—“अगर तुमने पुलिस बुलाई, तो मेरा इस घर से रिश्ता खत्म!”

रमेश ने सिर्फ इतना कहा—“रिश्ता उस दिन खत्म हुआ, जब तूने मेरे बेटे को फर्श पर छोड़ दिया।”

विवेक ने आँखें बंद कर लीं।

उसे लगा, उसने माँ को उसी पल दूसरी बार खो दिया।

PART 2

पुलिस ने जब पड़ोसी की सीसीटीवी फुटेज देखी, तो असली डरावना सच सामने आया। राजीव 2 बजकर 16 मिनट पर घर से निकला था। वह बेल्ट लगाते हुए हँस भी रहा था। सुनीता ने दरवाजा बंद किया था। एम्बुलेंस को फोन 2 बजकर 55 मिनट पर किया गया था।

39 मिनट।

विवेक फर्श पर पड़ा था। उसका जबड़ा टूटा था। वह बेहोश था। और उसकी माँ 39 मिनट तक यह तय करती रही कि प्रेमी को बचाना है या बेटे को।

रमेश यह संख्या बार-बार दोहराते रहे—“39 मिनट।”

घर वापस जाने की बजाय उन्होंने विवेक को राजौरी गार्डन के एक छोटे होटल में रखा। वहीं बैठकर उन्होंने बैंक खाते खंगाले। 3 साल से सुनीता छोटे-छोटे पैसे निकाल रही थी—5000, 12000, 30000। होटल, महंगे रेस्टोरेंट, पुरुषों की शर्ट, और “आर्यन इंटीरियर्स” को कई ट्रांसफर।

सबसे बड़ा ट्रांसफर था—680000 रुपये।

रमेश ने कागज मोड़ दिया।

“मैंने उनके धोखे का भी खर्च उठाया,” उन्होंने धीमे से कहा।

उसी रात सुनीता होटल पहुँची। उसने दरवाजे पर रोते हुए कहा—“शिकायत वापस ले लो। राजीव का परिवार बर्बाद हो जाएगा।”

विवेक ने मोबाइल पर लिखा—“उसने मुझे जमीन पर पड़े-पड़े मारा।”

सुनीता ने होंठ भींचे—“तूने उसे पहले धक्का दिया था।”

रमेश हँसे नहीं, बस टूट गए।

फिर सुनीता ने उंगली विवेक की ओर उठाई—“इस घर को तूने तोड़ा है। माँ को बचाना चाहिए था।”

विवेक ने पहली बार टूटी आवाज में कहा—“बेटे को भी।”

अगले दिन विवेक के फोन पर अनजान नंबर से संदेश आया—

“आगे बढ़ा तो बोल दूँगा तूने अपनी माँ पर हाथ उठाया था। सुनीता गवाही देगी।”

नीचे लिखा था—राजीव।

रमेश ने वह संदेश वकील को भेजा।

“अब,” उन्होंने कहा, “वह खुद जाल में आ गया।”

PART 3

अदालत का दिन नवंबर की ठंडी सुबह आया। दिल्ली की हवा धुएँ और धूप के बीच अटकी हुई थी। विवेक ने ढीली सफेद कमीज पहनी थी, क्योंकि पसलियों में अभी भी दर्द था। रमेश ने अपना पुराना नेवी ब्लू सूट निकाला था, जो उन्होंने आखिरी बार किसी रिश्तेदार की शादी में पहना था। सूट थोड़ा तंग था, पर साफ था। उसकी सिलवटों में भी एक आदमी की इज्जत बची हुई थी।

कोर्ट के बाहर सुनीता अपने मायके वालों के साथ खड़ी थी। बड़ी बहनें, एक मामा, 2 चचेरे भाई—सबके चेहरों पर ऐसा दुख था जैसे अपराध उनके साथ हुआ हो। किसी ने विवेक की तरफ देखकर कहा, “आजकल के बच्चे माँ-बाप की इज्जत मिट्टी में मिला देते हैं।”

रमेश ने पलटकर देखा।

“इज्जत सच से नहीं टूटती,” उन्होंने शांत आवाज में कहा, “झूठ से टूटती है।”

कोर्ट रूम में राजीव मल्होत्रा बैठा था। पहले जैसा रोब नहीं था, पर आँखों में वही गंदा आत्मविश्वास बचा था। उसने विवेक को देखते ही हल्की मुस्कान दी। विवेक का दिल एक पल को काँपा, पर उसने पिता का हाथ पकड़ लिया।

सरकारी वकील ने मेडिकल रिपोर्ट पढ़ी। डॉक्टर ने साफ कहा कि चोटें सीढ़ियों से गिरने जैसी नहीं थीं। जबड़े की हड्डी सामने से भारी चोट से टूटी थी। पसलियों की दरार किसी लात या दबाव से आई थी। विवेक की गर्दन और कंधे पर जो निशान थे, वे गिरने से नहीं, झटके और पकड़ से बने थे।

फिर सीसीटीवी फुटेज चलाई गई।

स्क्रीन पर राजीव घर से निकलता दिखा। उसके चेहरे पर घबराहट कम, जल्दबाजी ज्यादा थी। सुनीता पीछे से दरवाजा बंद कर रही थी। कोई मदद नहीं। कोई चिल्लाहट नहीं। कोई पड़ोसी नहीं बुलाया गया।

कोर्ट में सन्नाटा फैल गया।

फिर एम्बुलेंस कॉल की रिकॉर्डिंग सुनाई गई।

“मेरा बेटा गिर गया है… शायद बेहोश है,” सुनीता की आवाज थी।

ऑपरेटर ने पूछा, “मैडम, वह साँस ले रहा है?”

कुछ सेकंड चुप्पी।

फिर सुनीता बोली, “रुकिए, मैं देखती हूँ।”

रमेश ने अपना चेहरा हथेली में छिपा लिया। विवेक की आँखों में आँसू नहीं आए। शायद कुछ दर्द इतने बड़े होते हैं कि आँसू भी उनके सामने छोटे पड़ जाते हैं।

वकील ने पूछा, “सुनीता जी, आपने अपने बेटे को बेहोश हालत में पाया, फिर भी 39 मिनट बाद मदद क्यों बुलाई?”

सुनीता ने कहा, “मैं घबरा गई थी।”

“घबराकर आपने पहले राजीव को जाने दिया?”

वह चुप रही।

“घबराकर आपने डॉक्टरों से झूठ बोला?”

वह फिर चुप रही।

“घबराकर आपने अपने बेटे को झूठा, नशे में और हिंसक बताने की कोशिश की?”

सुनीता ने सिर झुका लिया।

फिर राजीव की पत्नी आई। उसका नाम पूजा मल्होत्रा था। वह गुरुग्राम के एक छोटे क्लिनिक में नर्स थी। आँखों के नीचे काले घेरे थे, पर आवाज मजबूत थी। उसने बताया कि राजीव कई महीनों से घर देर से आता था, झूठ बोलता था, पैसों की तंगी का रोना रोता था। उसने कहा कि उसने सुनीता को 2 बार देखा था, जब वह राजीव को साइट से लेने गई थी। सुनीता ने उसे देखकर मुस्कुराकर नमस्ते भी किया था।

“मुझे लगा था, ये क्लाइंट हैं,” पूजा बोली। “मुझे नहीं पता था कि मेरा पति इनके घर में इनके पति की मेहनत और इनके बेटे की साँस दोनों पर पैर रख रहा है।”

सुनीता रोने लगी।

पर अदालत रोने से नहीं, सबूतों से चलती है।

रमेश के वकील ने बैंक स्टेटमेंट रखे। होटल बुकिंग, कपड़ों की दुकानें, कैफे के बिल, और राजीव की कंपनी को ट्रांसफर। फिर सुनीता का एक संदेश पढ़ा गया, जो उसने राजीव को हमले से 5 दिन पहले भेजा था—

“रमेश बहुत भोला है। उसे लगता है तुम अभी भी बाथरूम का लीकेज देखने आते हो।”

रमेश ने आँखें बंद कर लीं। यह वाक्य किसी हथौड़े से ज्यादा भारी था। विवेक ने धीरे से उनका हाथ दबाया। उस पल बेटा पिता को संभाल रहा था।

राजीव के वकील ने कहा कि यह पारिवारिक झगड़ा था, भावनात्मक स्थिति में हुई धक्का-मुक्की थी। पर फिर विवेक के फोन पर आया धमकी भरा संदेश पढ़ा गया। अदालत में राजीव का चेहरा फीका पड़ गया।

“आगे बढ़ा तो बोल दूँगा तूने अपनी माँ पर हाथ उठाया था।”

न्यायाधीश ने चश्मा उतारा और राजीव की ओर देखा।

“यह धक्का-मुक्की नहीं,” उन्होंने कहा, “पीड़ित को डराने की कोशिश है।”

उस दिन राजीव को हिरासत में भेज दिया गया। बाद में उसने लंबा मुकदमा टालने के लिए अपराध स्वीकार किया। उसे 3 साल की सजा हुई, जुर्माना लगा, विवेक से संपर्क करने पर रोक लगी, और इलाज तथा मानसिक क्षति की भरपाई का आदेश हुआ। यह सजा विवेक के टूटे जबड़े की रातें वापस नहीं ला सकती थी, लेकिन इतनी काफी थी कि राजीव पहली बार अदालत से सिर झुकाकर निकला।

मगर असली लड़ाई तलाक की अदालत में हुई।

वहाँ मामला सिर्फ मारपीट का नहीं था। वहाँ 26 साल की शादी के नीचे दबे झूठ, पैसों की चोरी, परिवार की बदनामी और उस घर की दीवारों पर लगे भरोसे का हिसाब था।

सुनीता ने घर में हिस्सा माँगा। उसने कहा कि उसने अपनी जिंदगी परिवार को दी, रमेश ने उसे अकेला छोड़ दिया, वह आर्थिक रूप से निर्भर थी। उसने गुजारा भत्ता भी माँगा। उसके वकील ने उसे त्यागी हुई पत्नी की तरह पेश किया।

रमेश के वकील ने एक-एक पन्ना खोला।

“यह होटल बुकिंग किसलिए थी?”

सुनीता बोली, “याद नहीं।”

“यह 680000 रुपये राजीव को क्यों भेजे गए?”

“मरम्मत के लिए।”

“लेकिन उस तारीख को कोई मरम्मत नहीं हुई।”

सुनीता चुप रही।

फिर एक और संदेश पढ़ा गया—

“आज रमेश साइट पर रात भर रहेगा। कमरा सुबह 11 बजे तक है।”

कोर्ट में बैठे रिश्तेदारों की गर्दनें झुक गईं। वही लोग, जो फेसबुक पर लिख रहे थे कि “माँ को माफ कर देना चाहिए”, अब एक-दूसरे की तरफ भी नहीं देख पा रहे थे।

फिर सुनीता ने आखिरी कोशिश की। उसने विवेक को मानसिक रूप से कमजोर, गुस्सैल और माँ से ईर्ष्या करने वाला बताया। बोली कि बेटे ने बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहा। तभी वकील ने वह संदेश रखा, जो उसने अस्पताल से राजीव को भेजा था—

“अगर विवेक ज्यादा बोलेगा तो कह दूँगी वह दिमागी तौर पर कमजोर है। रमेश मेरी बात मान लेगा।”

रमेश की हँसी निकली, मगर वह हँसी नहीं थी, जैसे कोई पुरानी रस्सी टूट जाए।

“सही लिखा था,” उन्होंने कहा। “मैं तुम्हारी बात मान लेता था। मेरी यही गलती थी।”

सुनीता ने पहली बार रमेश की आँखों में देखा, पर वहाँ वह आदमी नहीं बचा था जिसे वह आँसुओं से मोड़ सके।

निर्णय 2 महीने बाद आया। घर रमेश के पास रहा, क्योंकि साबित हुआ कि उसका अधिकांश खर्च, मरम्मत और कर्ज उसी ने चुकाया था। सुनीता को उसकी निजी चीजें, गाड़ी और कुछ सामान मिला, पर गुजारा भत्ता नहीं। अदालत ने यह भी माना कि परिवार की संपत्ति से रिश्ते और निजी खर्च छिपाकर किए गए थे।

उस दिन बाहर कोई रिश्तेदार सुनीता के साथ नहीं खड़ा था।

जिस परिवार ने विवेक को दोषी कहा था, वही परिवार अब फोन नहीं उठा रहा था। जब तक घर और पैसे की उम्मीद थी, सुनीता के आँसू सबको पवित्र लगते थे। जैसे ही उम्मीद खत्म हुई, सबका धर्म, संस्कार और ममता गायब हो गई।

विवेक ने उसे आखिरी बार पारिवारिक अदालत के बाहर देखा। वह एक छोटी काली अटैची के साथ खड़ी थी। वही बेज रंग की शॉल थी, पर अब उसमें न ठाठ था, न गर्माहट। वह सचमुच बूढ़ी लग रही थी।

“रमेश,” उसने धीमे से कहा।

रमेश रुक गए। विवेक का शरीर तन गया, पर पिता ने उसके हाथ पर हाथ रखा।

“ठीक है,” उन्होंने कहा।

सुनीता की आँखों से आँसू बह रहे थे। “मेरे पास जाने की जगह नहीं है।”

रमेश ने उसे लंबे समय तक देखा। न गुस्सा था, न जीत। बस थकान थी।

“तेरे पास घर था। पति था। बेटा था। तूने सब कुछ होटल के कमरों और उस आदमी के लिए बेच दिया, जिसने तुझे तब छोड़ दिया जब तेरे पास उसे देने को कुछ नहीं बचा।”

“मैंसे गलती हो गई,” सुनीता रोई।

रमेश की आवाज बहुत धीमी थी, पर हर शब्द साफ था।

“गलती चाय में चीनी कम डालना होती है। तूने चुनाव किए। 3 साल तक। झूठ बोला, पैसे छिपाए, बेटे को मरता छोड़ दिया, और फिर उसे झूठा साबित करने की कोशिश की। यह गलती नहीं, फैसलों की कतार है।”

सुनीता ने विवेक की ओर देखा।

“मैं तेरी माँ हूँ।”

विवेक के भीतर कुछ हिला। उसे बचपन की एक तस्वीर याद आई—बारिश में स्कूल गेट पर खड़ी माँ, हाथ में छाता, बैग में गरम पराठा। उसे वह रात भी याद आई जब उसे तेज बुखार था और सुनीता ने उसके माथे पर पट्टी रखी थी। किसी बच्चे के भीतर माँ कभी पूरी तरह नहीं मरती। वह किसी अंधे कमरे में साँस लेती रहती है।

लेकिन फिर उसे वे 39 मिनट याद आए।

वह बोला, शब्द अभी भी थोड़ा भारी थे—

“माँ पहले देखती कि बेटा साँस ले रहा है या नहीं। तुमने पहले देखा कि राजीव निकल गया या नहीं।”

सुनीता काँप गई।

“ऐसा मत बोल।”

“तुमने ऐसा किया।”

वह आगे बढ़ना चाहती थी, पर रमेश बीच में आ गए।

“इसे मत ढूँढना,” उन्होंने कहा। “कभी इसे तुमसे बात करनी होगी, तो वह इसका फैसला होगा। तुम्हारा हक नहीं।”

वे चले गए।

कार में लौटते समय विवेक ने पीछे देखा। सुनीता फुटपाथ पर खड़ी थी, उसके पास छोटी अटैची रखी थी। भीड़ उसके आसपास से गुजर रही थी, पर कोई उसके लिए नहीं रुक रहा था। विवेक को खुशी नहीं हुई। बदला भी नहीं लगा। बस एक खाली, ठंडी शांति थी।

करोल बाग का घर उन्हें किसी घायल शरीर जैसा मिला। हर सीढ़ी झूठ की तरह चुभती थी। ऊपर का कमरा बंद रहता। बिस्तर, परदे, अलमारी—सबमें धोखे की गंध थी। कई रातें दोनों नीचे ड्राइंग रूम में सोए। रमेश चुप रहते, टीवी बिना आवाज के चलता रहता, विवेक आधी रात को जागकर देखता कि पिता छत को घूर रहे हैं।

फिर एक रविवार रमेश ने कहा, “जो टूटा है, उसे ऐसे ही नहीं छोड़ते।”

उन्होंने ऊपर का कमरा खाली किया। पुराना गद्दा बाहर फेंका। परदे उतारे। दीवारों से हल्का पीला रंग घिसा। विवेक ने धीरे-धीरे मदद की। पसलियाँ अभी भी दर्द करती थीं, इसलिए वह 10 मिनट काम करता, फिर बैठ जाता। रमेश बिना शिकायत ब्रश चलाते रहे।

“कौन सा रंग?” विवेक ने पूछा।

“सफेद,” रमेश बोले। “अब इस कमरे की यादें कोई और रंग नहीं चुनेगा।”

उस दिन पहली बार घर में पेंट की गंध आई, जो अजीब तरह से अच्छी लगी। जैसे घाव पर दवा लगती है—जलती है, पर सड़न रोकती है।

शाम को रमेश ने पुराने रेडियो पर मुकेश का गीत चला दिया। सुनीता कहती थी कि ऐसे गाने सुनकर घर मातमखाना लगता है। रमेश ब्रश हाथ में लिए रुक गए।

विवेक ने कहा, “मम्मी कहती थीं आपके गाने बहुत दुखी होते हैं।”

रमेश ने हल्की मुस्कान दी। “वह पहली बात सही बोलती थी।”

दोनों हँस पड़े।

वह हँसी लंबी नहीं थी, मगर सच्ची थी। टूटे घर में वह आवाज नई दीवार की पहली ईंट जैसी लगी।

महीने बीते। विवेक का जबड़ा ठीक हुआ, पर पूरी तरह नहीं। कभी-कभी ज्यादा चबाने पर हल्की क्लिक की आवाज आती। उसके चेहरे पर ठुड्डी के नीचे छोटा निशान रह गया। कॉलेज लौटना कठिन था। कुछ लोग दया से देखते, कुछ कानाफूसी करते। पर उसके 3 दोस्त हर हफ्ते नोट्स लेकर आते। कोई सूप लाता, कोई बेकार चुटकुले सुनाता, ताकि वह हँसे नहीं, बस मुस्कुराए।

एक दिन उसने पहली बार बिना दर्द के समोसे का छोटा टुकड़ा खाया। आँखें भर आईं। रमेश ने देखा, पर कुछ नहीं कहा। बस अगले दिन 4 समोसे ले आए और बोले, “प्रैक्टिस जरूरी है।”

दोनों ने काउंसलिंग भी शुरू की। पहले रमेश को यह सब “अमीर लोगों की बात” लगता था। फिर धीरे-धीरे उन्होंने सीखा कि धोखा खाने वाला मूर्ख नहीं होता। भरोसा करना कमजोरी नहीं होता। विवेक ने सीखा कि माँ को याद करना, माँ को माफ करने जैसा नहीं है। इंसान किसी को अपने दिल से निकालने में वक्त ले सकता है, पर उसे अपनी जिंदगी में वापस लाना जरूरी नहीं।

घर बदलने लगा। रसोई में अब सुनीता की इलायची वाली चाय की जगह रमेश की कड़क, थोड़ी जली हुई चाय की गंध आने लगी। पराठे कभी गोल नहीं बनते थे, पर दोनों खाते थे। टोस्ट अक्सर जल जाता था। कपड़े कभी-कभी गलत रंग के साथ धुल जाते थे। लेकिन घर में एक बात साफ थी—अब किसी को प्यार पाने के लिए झूठ नहीं बोलना पड़ता था।

एक शाम रमेश को पुराने एलबम में परिवार की तस्वीर मिली। विवेक 8 साल का था, बीच में खड़ा। पीछे सुनीता मुस्कुरा रही थी। रमेश ने उसका कंधा पकड़ा हुआ था। तस्वीर में सब कुछ सच लगता था।

“इसे क्या करें?” रमेश ने पूछा।

विवेक ने देर तक देखा।

न उसे फाड़ने का मन हुआ, न दीवार पर लगाने का।

“एक डिब्बे में रख देते हैं,” उसने कहा। “कूड़े में नहीं। सामने भी नहीं।”

रमेश ने सिर हिला दिया।

उन्होंने तस्वीर को पुराने कागजों के साथ एक डिब्बे में रखा और अटारी में रख आए। इसलिए नहीं कि सब माफ था। बल्कि इसलिए कि कभी अच्छे दिन भी थे, और अच्छे दिन होने से बुरे फैसले छोटे नहीं हो जाते। बस धोखा समझना और मुश्किल हो जाता है।

उस रात विवेक धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहा था। वही सीढ़ियाँ, जिन्हें उसकी माँ ने झूठ बना देना चाहा था। नीचे रमेश खड़े थे।

“ठीक है?” उन्होंने पूछा।

विवेक आखिरी पायदान पर रुका।

“हाँ,” उसने कहा।

और पहली बार उसे लगा, यह सच है।

पूरा नहीं। पहले जैसा नहीं। मगर काफी।

उसने समझ लिया कि परिवार सच बोलने से नहीं टूटता। परिवार तो उससे पहले टूट चुका होता है—उन बंद दरवाजों में, उन छिपे संदेशों में, उन 39 मिनटों में, जब कोई माँ अपने बेहोश बेटे की साँस से पहले अपने प्रेमी की सुरक्षा चुनती है। सच सिर्फ मलबा दिखाता है, मलबा बनाता नहीं।

रमेश और विवेक ने पुरानी जिंदगी वापस नहीं पाई।

उन्होंने नई जिंदगी बनाई।

एक घर जिसमें अब 3 की जगह 2 प्लेटें लगती थीं। दीवारों पर नए रंग थे, मगर कुछ दरारें अब भी दिखती थीं। खाने में नमक कभी कम, कभी ज्यादा होता था। रातें कभी लंबी होती थीं। पर उस घर में अब कोई यह नहीं कहता था—“झूठ बोल दे, वरना परिवार मर जाएगा।”

क्योंकि वहाँ दोनों जानते थे, परिवार को बचाने के लिए झूठ नहीं, साथ चाहिए।

और जब भी विवेक उस सफेद कमरे के पास से गुजरता, उसे सिर्फ अपनी माँ का धोखा याद नहीं आता था।

उसे अस्पताल का वह पल याद आता था—उसका काँपता हाथ, सफेद पट्टी पर लिखे टेढ़े अक्षर, और उसका पिता, जो सब कुछ टूटते देखकर भी सच के साथ खड़ा हो गया था।

उस दिन विवेक ने समझा था कि माँ-बाप वह नहीं होते जो सिर्फ जन्म देते हैं।

माँ-बाप वह होते हैं जो आपकी टूटी हुई जिंदगी के पास बैठकर कहते हैं—“मैं हूँ, अब तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.